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कहानी

आखिरी सवाल
रजनी गुप्त


सचमुच! समय ऐसा पहिया है जो जीवन के हर रंग, हर रूप और हर मोड़ के तमाम रंगों को दिखाता जाता है। कितनी बार वो गीता में लिखे कर्मयोग को पढ़ता रहता है - जो गुजर चुका, उसका शोक मत कर मगर वह है कि अभी तक गुजरे जमाने में ही जी रहा है। निर्मल ने करवट बदल आँखों में भर आए आँसुओं को फिर से पोंछा मगर चंद पलों बाद फिर वही आँसू... रह-रहकर बेमौसम टपकती बूँदों की तरह पलकों को भिगो देते। कितनी बार वह उस वाकये को परे झटकना चाहता मगर उतने पैनापन से वही पल आँखों के सामने नमूदार हो जाता। बेचैनी के मारे नींद नहीं आती और घुटन ऐसी जबरदस्त कि पिछले कई महीनों से नींद आँखें छोड़कर न जाने कहाँ किस खोह में दुबक गई है?

वक्त को कभी कोई मुट्ठी में पकड़ पाया है? कोई थाम पाया है उन अनमोल पलों को? बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने वक्त के हाथों शिकस्त खाई है फिर वह तो एक मामूली इनसान है। न जाने कौन सी ऐसी कुघड़ी क्यूँ आन खड़ी हुई कि उसके हाथों... इन्ही नामुराद खुरदुरे हाथों से उस से ऐसी चूक कैसे हो गई कि आज किसी से नजरें मिलाने तक की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा वह। कब, किससे और क्या बात करे वह? बात करने लायक कुछ छोड़ा भी है उसने? ग्लानि और आत्मभर्त्सना का विषैला अहसास रात के अँधेरे में गहराता जाता और गहरा काला रंग बदनुमा दाग बनकर माथे से चिपक जाता। वह किसके सामने कैसे मुँह खोलकर क्या सफाई देगा? इस बारे में जिससे भी शेयर करेगा, वही उसे धिक्कारने लगेगा। अब तक की जिंदगी में जिससे सब कुछ साझा करता रहा, बचपन से लेकर अब तक जिसके सहारे वह कदम दर कदम मजबूती से चलकर जिंदगी की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर आगे कदम बढ़ाता रहा, वह, वह जो उसके जीवन की धुरी थीं, वह जिसे देखे बगैर उसके जीवन में सब तरफ अंधियारा भरा रहता, वह जिसे देखे बगैर वह चैन से सो नहीं पाता था, वह जिसने अपनी मान-मर्यादा ताक पर रखकर भरे समाज में उसे अपना सबसे ज्यादा भरोसेमंद मीत कहकर टेरा था।

न जाने कहाँ से उनके कंठ के भीतर वैसी ताकत भरती गई कि वे जहाँ-जहाँ जिन रास्तों पर चलती जातीं, उसे अपने पास बिठाकर ले जातीं, ऐसी, बिल्कुल ऐसी ही थी हमारी सुधा जिज्जी।

'निर्मल, तू चल रहा है भैया के संग दिल्ली, इसमें इतना सकुचाने की क्या जरूरत?'

'अब हम का करेंगे वहाँ? इत्ती दूर जाके? भैया तो अब खुद ही समझदार हो गए। वैसे भी हमें तो बड़े शहरों का रास्तों का कुछ भी अंदाजा नहीं हो पाता, साँची कै रय जिज्जी।'

'तू बाहर निकलेगा नहीं तो सीखेगा-जानेगा कैसे दुनियादारी के बारे में? वो तो सब कुछ खुद ही कर लेंगे, तू तो बस उनके बगल में बैठे रहना।' उन्होंने अपना फरमान सुना दिया था।

धीरे-धीरे उनके बच्चों के संग रच-बस गया था निर्मल। भैया बाहर पढ़ने गए तो वह भी उनके पीछे-पीछे उन्हें छोड़ने लेने जाता। बीच वाली सुनीता को भी कभी-कभार कॉलेज लेने जाना पड़ता। ऐसे न जाने कितने सारे अनगिनत कामों के सिलसिले चलते रहते जिन्हें वह पूरी गंभीरता, लगन, तन्मयता और निष्ठा से करता रहता। सच तो ये था कि घर के कामों को वह हँसी-खुशी पूरा करता जैसे वह खुद अपने कामों को कर रहा हो। सुधा जिज्जी का स्नेहपात्र वह कब और कैसे बनता गया? उनके साथ कितने सारे मिठास भरे अंतरंग पलों को लगातार सालों-साल कैसे जीता रहा वह? सोचता रहा देर तक उकड़ू बैठे-बैठे। याद करते-करते लगा जैसे अभी कल की ही तो बात है जब वह 22-24 साल का रहा होगा और पिता के गुजर जाने के बाद पेट की खातिर उसे मजूरी करनी पड़ी फिर बाद में मिस्त्री का काम सीखने जाने लगा। मुहल्ले के हुनरमंद मिस्त्री नए-नए मकान बनाते रहते तो ऐसे ही किसी दिन मिस्त्री रवींद्र का सहायक काम पर नहीं आया सो उसने सबसे पहले निर्मल को ही बुलाया - 'अरे ओ निर्मल, आज तू नारायण मुहल्ले में आ जाना। वहाँ एक मकान बन रहा है, तेरी जरूरत पड़ेगी वहाँ।'

'समझ गया कक्का, हम जरूर पहुँच जाएँगे। हमें भी अपने जैसी कलाकारी सिखा दोगे न? कक्का, तुम्हारी तमाखू भी लेते आएगे।' प्रसन्नमन वह दौड़ते हुए पहुँचा था नारायण मुहल्ले में।

मिस्त्री उसे जैसा-जैसा सिखाते जाते, वह पूरी मेहनत, जोश और उत्साह से भरकर काम सीखता जाता। वाकई, उसके हाथ में कलाकारी तो थी ही, तभी तो वह मिस्त्री की बताई डिजाइनों में से अपनी तरफ से भी कुछ नया और अनूठा जोड़कर सबको चकित कर देता। कुछ न कुछ नया करने जज्बा तो था उसके अंदर। ईंटों पर कितनी मात्रा में सीमेंट का लेप बिछाकर बिल्डिंग के किस छोर पर गोल काट के घेरे बनाए जाएँ और कहाँ किस नमूने को छज्जे पर सेट करके राजसी लुक बाले कँगूरे बनाए जाएँ? यह सब उसके दिमाग की उपज थी। उसके भीतर बैठा कलाकार कला के नए और नायाब नमूने तैयार करने लगता। एक दिन मकान मालकिन सुधा जिज्जी उसकी कलाकारी देखकर गदगद हो उठीं। फिर क्या था? उन्होंने उसे अपने घर बुला लिया। कहाँ ये बड़े लोग और कहाँ हम छोटे लोग? सोचकर संकोच से सिकुड़ता वह जमीन पर बैठने लगा जो उन्होंने बड़े आग्रह से कुर्सी पर बिठाया। वे प्रफुल्लित होकर बोलने लगीं - 'निर्मल, तेरे हाथों में इतनी हुनर है, तू तो गजब का कलाकार निकला। सब तेरी तारीफ कर रहे हैं।'

'अरे कहाँ? बस ऐसे ही थोड़ा बहुत... बालों पर हाथ फेरते हुए अटक-अटककर बोला। अपनी तारीफ सुनकर वह संकोच और दुविधा से घिर गया।

'ले, चाय पी और साथ में ये नमकीन वगैरा भी।'

ट्रे में रखे इतने सारे सामानों को देखकर उनकी समझ में नहीं आया कि वह खाने के लिए क्या उठाए? सो बस चाय सुड़कते हुए गर्दन नीचे किए बैठा रहा मगर वो लगातार पूछती जा रही थीं।

'तू कितने तक पढ़ा है? घर में और कौन-कौन हैं? बाल बच्चे वगैरा...'।

'दसवीं में फेल हो गया साब।'

'ये साब-साब क्या लगा रखा है? मेरा नाम सुधा है, सो वही कहा कर।' उन्होंने मीठी झिड़की दी।

'आप इतने बड़े इज्जतदार घराने की... मैं आपका नाम तो नहीं ले सकता न? तो क्या कहकर बुलाऊँ साब?' अंदर की ताकत बटोरकर किसी तरह खुलकर बोल पाया वह।

'तो सुन, जैसे दुनियाभर के लोग जिज्जी बुलाते हैं, तू भी वही बुलाया कर, समझ गया?'

'ठीक है साब... जमीन पर आँखें गड़ाए बोल पाया वह।

'फिर वही साब... कहकर वे हँसने लगी तो उसने भी सिर उठाकर उनकी तरफ देखा। उन्हें इतना खुलकर हँसते हुए देखा तो देखता रह गया। हँसते हुए कितनी अच्छी और भली लगती हैं जिज्जी।

'क्या सोच रहा है? निर्मल, तुझे कुछ पता भी है मेरे बारे में?' क्या जानता है मेरे बारे में?'

'ज्यादा कुछ नहीं।'

'तेरे जीजा को गाँव के किसी अनजान आदमी ने मार डाला था। जानता है, क्यों?'

'वही जमीन-जायदाद का चक्कर था। वे नेता आदमी थे और चकबंदी के चक्कर में सबको साथ लेकर चलना चाहते थे लेकिन तभी किसी दुश्मन की गोली...। वहाँ से जान बचाकर भाग आए यहाँ और इन बच्चन की खातिर मकान बनवाना पड़ रहा। वैसे तो गाँव में हमारी शानदार कोठी है मगर पति के गुजर जाने के बाद ससुराल वालों ने आँखें फेर लीं। साफ लफ्जों में कह दिया - 'हमारे पास है क्या? बस ये घर और एक दुकान जहाँ दोनों भाई बैठते हैं। चाहो तो रह सकती हो यहाँ मगर...।'

'ताई के पास पैसों की कमी तो है नहीं। फिर वो क्यों रहेंगी हमारे साथ? कितना कुछ तो छोड़ गए है ताया जी। पहले वे अपनी जमीन-जायदाद हमारे नाम करें, तभी रह पाएँगी हमारे संग फिर हमें कोई ऐतराज नहीं'। देवर ने साफ कहने में गुरेज नहीं की।

'फिर क्या हुआ?' निर्मल ने पहली बार अपना मुँह खोला - 'उनकी मंशा ठीक नहीं थी।'

'हाँ, ऐन मौके पर मेरा बेटा मुकर गया - नहीं, हमें कतई नहीं रहना यहाँ इनके संग। इनके लड़के हमें मारते हैं, अपने संग ठीक से खिलाते भी नहीं। अम्मा, हम तो अलग रहेंगे।'

सो तभी से हमने यहाँ घर बनवाने की सोची। वर्षो पहले खरीदी गई जमीन पर सिर छिपाने लायक मकान बनाने का विचार बच्चों का ही था। हमने तुम्हारी मेहनत, सच्चाई और ईमानदारी देखी सो हमने सोचा कि अब से पैसों की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी। बढ़ई हों या पेंटर या कारीगर, सबसे हिसाब करना तुम्हारा काम।'

'मगर हमने अभी तक इतनी जिम्मेदारी कभी ली नहीं। कोई तर्जुबा नहीं है हमें। सो हम कैसे का करें?'

'नहीं है तो हो जाएगा।' उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी बात पूरी की फिर हिसाब की कापी थमाते हुए बोली - 'निर्मल, कभी-कभार हमारे यहाँ आया कर। हम तो यहाँ बिल्कुल अकेले पड़ गए। यहाँ तो मन नहीं लगता हमारा। तुम्हीं बताओ, किसे परवा है हमारी? कौन है सच्चा हितू हमारा?' कहते-कहते वो रुआँसी हो उठी। विवेक और संयम से बँधा-बाँध पल भर में ढह गया।

'हिम्मत से काम लो जिज्जी। हमसे जो भी बन पड़ेगा, हम जरूर अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ेंगे कभी। बस्स, सौ परसेंट सच्ची बात पक्की। हम तो मरते दम तक आपके हर सुख-दुख में आपका साथ निभाएँगे, चाहे जो हो जाए।'

बस इसी क्षण निर्मल ने खुद से वादा किया कि जिज्जी को हर हाल में खुश रखना हमारा पहला फर्ज है। बेचारी कितनी सीधी-सच्ची हैं। इतनी कम उम्र में ऐसे पहाड़ से दुख झेलने पड़ रहे हैं उन्हें। बेचारी मुश्किल से 30-32 की होंगी। अभी तो उनके जीवन की शुरुआत ही थीं और कसाइयों ने कितनी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया उन्हें। इसमें बेचारी जिज्जी का क्या कुसूर?

तब से उसने मकान की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लीं। ईंट, गारे, सीमेंट, सरिया, पत्थर वगैरा खरीदना हो या मजूरों-मिस्त्रियों का हिसाब करना या दुकानदारों के पैसों का भुगतान वगैरा, वह पूरी मुस्तैदी से हर काम निबटाता। पहले तो वह हर हफ्ते जिज्जी के पास हिसाब वगैरा करने जाता मगर उस दिन से तो - घर में किससे क्या कहासुनी हुई या ससुराल वालों से क्या तनाव हुआ, कुछ तो ऐसा अघटित घटा था कि सुधा जिज्जी खटिया पर अर्धमूर्छित अवस्था में कलप रही थीं। जैसे ही उसने घर का दरवाजा खटखटाया, उनके कराहने की आवाज सुनाई पड़ी - 'निर्मल, उठा नहीं जा रहा। यहीं आ जा तू। पूरे बदन में दर्द ही दर्द...'।

उनकी हालत देखकर डर गया था वो। उल्टे पैर घर लौटकर बगल में रहने वाले देसी वैद्य जी को अपने साथ बुला लाया फिर तमाम जड़ी बूटियों से उनका देर तक इलाज चलता रहा। कभी किसी दवा को पीसकर माथे पर लेप लगाता तो कभी वैद्य जी की बताई विधि से तलुवों पर काली मिट्टी का लेप या फिर हथेली पर कड़ुवा तेल मलता।

पहली बार उसने महसूस किया कि सुधा जिज्जी सचमुच बहुत अकेली और अलग थलग पड़ गईं। 10-12 और 13 साल के उनके बच्चे डरे सहमे एक कोने में खड़े थे और वह पूरी एकाग्रता, जतन और निष्ठा से घंटे भर तक उनकी सेवा में लगा रहा। कड़ी मशक्कत के बाद उनके शरीर में जैसे चेतना लौटी और सबके मुरझाए चेहरे खिल उठे।

'देख लिया निर्मल, कौन काम आया हमारे सुख-दुख में? अब तो समझे कि कितने मतलबी है समाज के लोग? न हमारे देवर, न जेठ और न किसी और को हमारे मरने-जीने से कोई मतलब है। बस अपनी प्रापर्टी उनके हवाले कर दो फिर सब अपने हो जाएँगे। कहलाने के लिए अपने... बस्त, इसी का नाम दुनिया हैं। जबकि बच्ची देवर के पास भागी-दौड़ी गई भी थीं मगर...

'आपकी प्रॉपर्टी मिलते ही वो आपको घर से बाहर का रास्ता दिखाने में पल भर की भी देरी नहीं करेंगे।'

'सच्ची बात कह रहे हो तुम... कराहते हुए वे निर्मल के सहारे खटिया पर बैठी और रुक-रुककर धीमी आवाज में निर्मल को अपना राजदार बनाते हुए बोलीं - 'तुम्हारे जीजा ने बीस बीघा जमीन खरीदी थी सो अपने पास कोनऊ कमी नहीं। मगर इन बच्चन के सिर पर छत्रछाया नहीं रही किसी की, इनके सिर पर हाथ फेरने वाला कोई नहीं... बोलते-बोलते वे सुबकने लगीं।

'जिज्जी, इतनी चिंता करोगी तो फिर से बीमार पड़ जाओगी फिर है किसी का आसरा? इतनी दूर की सोचकर न घबराया करो जिज्जी। हम तो जिंदा हैं अभी फिर काहे को इतना खराब सोचती हो?'

उसकी आँखों में आश्वासन की कौंध थी और आवाज में भरोसे की खनक। तब से अपनी तरफ से निर्मल उन्हें सहारा देने की सच्चे मन से कोशिश करता मगर लोगों के चलती जुबान को कौन बंद कर सकता है? कोई कहता - 'देखो तो निर्मल को, साले की किस्मत ही बदल गई। ढंग के कपड़े पहनना सीख गया और अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाने लगा। क्या ठाठ है इसके?' तो कोई कहता - 'सुधा का पालतू पिल्ला बन गया ये तो, बेचारा, क्या करता वो भी? दुधारू गाय जो मिल गई उसे।

इसी तरह कोई राह चलते उसे मिल जाता और द्विअर्थी संवाद बोलकर उसका रास्ता रोक पूछने लगता - 'ये निर्मल, जिज्जी से कुछ जमीन-जायदाद अपने नाम कराई तूने? करा लेना वरना सारी जिंदगी तुझे यूँ ही निचोड़ती रहेंगी वो और फिर छिलके की तरह फेंक देंगी किसी किनारे।'

वो सबकी सुनता लेकिन चुप बना रहता। इसी दौरान किसी ने उसकी बीवी के कान भरे कि वो धड़धड़ाते हुए जिज्जी के पास लड़ने जा पहुँची। उन्होंने बड़े संयत और शांत भाव से जवाब दिए मगर वो तो कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं थीं। उसके अनर्गल प्रलाप को वे बर्दाश्त नहीं कर पाईं और गश खाकर ढह गई। किसी तरह उनके बच्चों ने उसे धक्का देकर घर से निकाला। तब से महीने दर महीने बीतते गए, न ही वो अपने आप घर आया और न ही उन्होंने उससे कोई मतलब रखना चाहा। खेती-बाड़ी में अपनी मेहनत के बलबूते अच्छी पैदावार हुई और वे फिर से अपनी बनाई खोह में दुबकी पड़ी रहीं।

और निर्मल? कुछ दिन तक तो वो सड़कों पर बेमकसद यहाँ-वहाँ टहलता रहा फिर आस-पास बन रहे मकानों में मिस्त्री का काम तलाशने लगा। कभी 10 दिन का, तो कभी बीस दिन खाने का जुगाड़ हो पाता फिर वही ठन-ठन वाले दिन शुरू हो जाते।

ऐसे में निर्मल को जिज्जी की बेतरह याद आतीं। उसके घर पहुँचते ही वे हुलस से उमंगकर भर-भरकर नाश्ता भरी प्लेटें ले आतीं। तीज-त्योहार पर तो उसने जैसा स्वादिष्ट खाना उनके यहाँ खाया होगा, पूरी जिंदगी में कहीं नहीं खाया कभी। उनसे अलग होकर जाना कि उनके बगैर जीवन कितना खाली, कितना बेरौनक और उजड़ा-उजड़ा लगने लगा है। अब क्या बचा उसके पास? महज पेट भरने का जुगाड़, ये जिंदगी भी कोई जिंदगी है भला? जानवर और उड़ते पंछी भी अपना पेट भरना जानते है, तो वह अगर अपने घर वालों का पेट भर पा रहा है तो ऐसा क्या खास काम कर रहा है वह? निरर्थक है मेरा जीवन। आवारा मन किसी काम में लगता ही नहीं। बाहर जाएगा भी तो मतलब भर की सबसे बात करके लौट आता और मुँह ढापकर बिस्तर पर पड़ा रहता। इतनी घुटन का अनुभूति उसे पहली कभी नहीं हुई मगर करे तो क्या करे वह? इस औरत ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। क्या लेकर अपना मुँह दिखाएगा उन्हें? ऐसी बेइज्जती की है इसने कि क्या...?

इधर सुधा जिज्जी ने अपने खालीपन को भरने के लिए धर्म-कर्म का सहारा लिया। जितने भी धार्मिक ग्रंथ उन्हें मिलते, गीता, रामायण, महाभारत, पुराणादि... वे एक-एक करके सबको एकाग्रता से पढ़ती, गुनतीं और जीवन के खोए अर्थों को अध्यात्म के जरिए तलाशने में जुटी रहतीं। बावजूद इसके, उनके जीवन की धुरी भी गड़बड़ाई जरूर। खेती-बाड़ी से जुड़ी दिक्कतें भी आतीं। वे अकेले ही सारे काम निबटाती। चाहे कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाने, दौड़ पड़ती तो कभी फसल कटाई के वक्त मजूरों से संग देर रात माल की तुलाई जैसे अनंत कामों में खुद को खपा देतीं। विचित्र किस्म का अनमनापन, नामालूम किस्म की उदासी और दिन-ब-दिन अकेले पड़ते चले जाने का अहसास उन्हें भीतर ही भीतर कचोटता। उन्हें देखकर लगता जैसे भरी बाल्टी को किसी ने पूरी ताकत से उनसे छीनकर कहीं और फेंक दी हो। उनके बच्चे बड़े होते जा रहे थे। वे सब अपनी पढ़ाई करने बाहर निकलते गए और वे खुद को अकेली गुफा में बंद सा महसूस करतीं। बेचैनी का पंछी सिर पर गोल-गोल मँडराता रहता। उससे बचने वे काम के नशे में झोंक देती अपने को। काम, काम और काम, बस यही जीवन मंत्र रटने लगीं थी वो अनवरत, अनथक।

अचानक एक दिन रात के अंधियारे में दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी।

'कौन?'

'हम निर्मल... खोलो दरवाजा...'

आहिस्ते से दरवाजा खुलते ही वो फूट-फूटकर रोते हुए बोला - 'अब हमारा आपके सिवाय और कोई नहीं बचा जिज्जी। ओ जिज्जी, आज से तुम्ही हो मेरी सब कुछ। जन्मदाता-माता ने तो हाथ पकड़कर घर से बेघर कर दिया हमें, हम कहीं के नहीं रहे जिज्जी। सो अब तुम्हारे आसरे आए है तुम्हारे दर पै। बचा लो हमें...।

'आखिर हुआ क्या है? पूरी बात तो बताओ।'

'जिज्जी, महतारी ने हाथ पकड़कर निकाल दिया घर से। पता नहीं सास-बहू के बीच क्या कहा-सुनी हुई और हाथा-पाई भी हुई कि मेरे पहुँचते ही... पूरी बात बताने से पहले ही गला रुँध गया उसका।

'कहाँ है तुम्हारी बीवी, बच्चे?'

'घर के पिछवाड़े, डर के मारे अंदर घुसने की हिम्मत ही नहीं कर पा रही थी वो।'

सुनते ही वे दबे पाँव बाहर निकलीं और उन्हें देखते ही नाटकीय अंदाज में लपककर सुधा जिज्जी के पाँवों में गिर पड़ी - 'अब तो आप ही हो हमारी पालनहार। आपके सिवा और कोई नहीं हमारा। चाहे हमारे अपराध के लिए हमें मारो-पीटो, चाहे कुछ भी करो मगर अपनी गलती की माफी माँगने लायक भी नहीं रहे हम तो। आप तो साक्षात लक्ष्मी जू हों हमाय लिए। ये जिज्जी, माफ कर दियो हमें।'

'क्या चाहिए हमसे तुम लोगों को? ये तुम्हारा आपसी मामला है, हम क्या कर सकते हैं?'

'न, ऐसा न कहो जिज्जी। ओ जिज्जी, ऐसी निठुर न बनो। जा औरत की सोलाना गलती है मगर जाकी सजा जे बच्चा लोग भुगतेंगे। जाने आप पर गलत लांछन लगाय सो जे खुद भुगत रही अपने पापन की सजा। चल माँग माफी इनसे। साली, जब तक ये नाक रगड़कर माफी नहीं माँगेगी, तब तक भगवान भी इनसाफ नहीं करेंगे इसके संग। साक्षात मैया पे आरोप लगाय जाने, लोगन की बातन में आ गई जा तौ। लोग मानस की का है, वे तो जई चाहत ते कै हमाई बनी बनाई गिरस्ती बिखर जाए और वे ताली बजाके खुस होवें।'

'बस करो अब ये सब। चुप रहो तुम। हाँ बोलो, रामरती?'

'जिज्जी कहूँ सिर छिपाबे लायक मड़ैया चाहिए हमें। हम कहाँ जाएँ इतनी रात?'

तब तक जिज्जी के बच्चे भी आ गए जिन्होंने इशारे से उन्हें अंदर बुलाकर साफ शब्दों में समझा दिया - 'इस मतलबी औरत के चक्कर में मत आना। यहाँ इस घर में रहने के लिए हामी मत भरना मातारानी, सदाव्रत करो मगर इनके साथ कतई नहीं। साफ बात है, ये लोग यहाँ नहीं रह सकते।'

'ठीक है... कहकर वे फिर से उनसे मुखातिब थीं।

'ऐसा है निर्मल, फिलहाल तो हमारे पास रहने का यही एक ठिया है और बच्चे हैं हमारे पढ़ने वाले...।' उनकी बात पूरी होने के पहले ही निर्मल बोल पड़ा - 'जिज्जी, इतेक कठोर न बनो। आप तो खुद जानती कि बचपन से ही हम तो बस आपके सहारे जीवन काट रहे थे। आप एक रोटी डाल देंगी तो उसी तिनके के सहारे जी लेंगे हम तो।'

'हमारी मजबूरी समझने की कोशिश करो निर्मल।'

'हम तो गैयन-भैंसन वाली कुठरिया में ही गुजर-बसर कर लेंगे। वहीं अपना छप्पर तान लेंगे, अब तो मंजूर? बोलो जिज्जी? हामी तो भरो...'

इसी बीच उसकी पत्नी उनके पैरों पर गिर पड़ी - 'अम्मा, हम कहूँ और नहीं जाएँगे। यहीं आपके चरणों पर ही जिएँगे-मरेंगे, हाँ कहे देत हैं।'

'अच्छा ठीक है। खेत पर बनी कुठरिया में रहन लगो तुम लोग। वहीं मन लगाकर ईमानदारी से खेती-बाड़ी सँभालो और अपना घर दुआर भी।'

उसके बाद जीवन थोड़ा सम पर आया। सुधा जिज्जी ने उनकी ईमानदारी और मेहनत देखकर अपनी तरफ से पचास हजार रुपये लगाकर निर्मल के लिए मकान बनवाया। इसके बाद तो स्थितियाँ बिल्कुल ही पलट गईं। निर्मल ने सच्ची लगन से जिज्जी के घर और खेतीबाड़ी से जुड़ी हर समस्या को बिल्कुल अपनी समझा और खेतीबाड़ी के साथ-साथ गाय, भैंसों की जिम्मेदारी भी सँभाल ली। सब्जियाँ बेचने का काम उसकी पत्नी ने सँभाला। जब कभी घर बाहर के कामों के बोझ से वे परेशान होती तो ढाल बनकर खड़ा हो जाता निर्मल। कभी पैरों में तेल मलकर उन्हें राहत पहुँचाने में जुट जाता तो कभी गर्म दूध का गिलास उनके हाथों में पकड़ाकर पीने का मनुहार करने लगता। क्रमशः जीवन आगे बढ़ता जा रहा था। उनके बच्चे सयाने होकर बाहर निकलते गए। निर्मल के बच्चे भी बड़े होते जा रहे थे लेकिन उसकी पत्नी को ये नागवार गुजरता कि निर्मल अपने बच्चों से ज्यादा जिज्जी के बच्चों के लिए क्यों अपनी जान छिड़कता है? सच तो ये है कि उसकी नीयत तो शुरू से ही ठीक नहीं थी।

सुधा जिज्जी ने भी ताड़ लिया कि कभी बीस किलो की सब्जियाँ थीं मगर हाथ में दस-बारह किलो के रेट ही आ पाते तो कभी देखती कि दस किलो दूध में से सिर्फ पाँच या छह किलो दूध का ही हिसाब आ पा रहा है। कई बार तो वे देखकर भी अनदेखी करती क्योंकि निर्मल खुद अपनी पत्नी की इन आदतों की शिकायत किया करता। खेतीबाड़ी सँभालने की एवज में वे दो कुंतल गेहूँ के साथ-साथ घर भर के लिए राशन और कपड़ों का इंतजाम करती आ रही थीं। इसी बीच जब उनकी बिटिया की भी शादी हो गई तो एक दिन रामायण बाँचते हुए पूछ बैठा निर्मल - 'क्यों जिज्जी, चलें न हम लोग भी गंगा स्नान कर ही आएँ। फिर पता नहीं दुबारा कभी मौका मिले, न मिले। अपने इस जन्म को तो सार्थक कर लें।'

'चलो, सच्ची में। तूने तो हमारे मुँह की बात छीन ली मगर तुम जा कैसे पाओगे? बीवी, बच्चे वगैरा? सबको लेकर जाना आसान नहीं, खेतीबाड़ी, जानवरों की देखरेख और फिर तुम्हारा इतना बड़ा कुनबा...।'

'अरे! हम तो अकेले ही जाएँगे जिज्जी, साफ बात है। मैंने तो घर पर साफ कह दिया है, हमारे जीवन में किसी का कोई हक नहीं। हम तो जिज्जी की सेवा के लिए जी रहे हैं। हाँ, सच्ची कह रय, मैंने सच्चे मन से जिंदगी भर सिर्फ और सिर्फ आपको ही चाहा है और भगवान से कुछ भी तो नहीं माँगा, सिवाय इसके कि आप बस खुश रहें। आपकी खुशी में ही हमारी खुशी हैं। आपको हँसते देखकर मेरे दिल को राहत मिलती है, सुकून का अहसास होता है कि मेरा जीवन अकारथ नहीं गया। आप यूँ ही खुश बनी रहें, बस यही एक...।' कहते हुए निर्मल ने अपनी हथेलियों में सुधा जिज्जी का हाथ ले लिया।

अनायास उस पल प्रकाश का एक वृत्त बना जिसकी रंगीनियत में डूब गए थे वे। उन्हें लगा जैसे पत्थर की मूरत के भीतर से कई सारे बंद सुराख अचानक खुलते जा रहे हों।

'चलो निर्मल, चाहे जहाँ ले चलो। अब निकल चलो इस माया मोह से। दस-पंद्रह दिन तो प्रभु के दर्शन करेंगे और रोज गंगा मैया के दर्शन भी करते रहेंगे।'

भावातुर जिज्जी ने निर्मल की तरफ कोमल नजरों से देखा और फिर कुछ याद आया तो भीतर जाकर नारियल के लड्डू उठा लाईं - 'लो, खा लो। खास तुम्हारे लिए बनाए थे। खेत पर रात-रात भर जागना जो पड़ता है। फसल कटी पड़ी है खलिहानों पे कितना काम छूटा पड़ा है...।'

'अरे! चलता हूँ जिज्जी, याद आया, खेत पर मशीन को खुला छोड़ आया हूँ। हिसाब जो करने आया था।'

'अरे, खाना तो खाता जा।'

'टैम नहीं है अभी... कहता हुआ वो जूते पहनने लगा।

'ले नाश्ता लेता जा... उन्होंने जल्दी-जल्दी टिफिन में ढेर सारे लड्डू, खुरमा और खाजा रख दिए।

'चलते-चलते थक गई हो तो कंधे पर उठा लूँ, डरना नहीं जिज्जी, कितनी हल्की तो हो।'

'अरे नहीं निर्मल, चल लूँगी, जैसे भी हो। तू साथ में है न फिर डर काहे का?'

'आज कुछ अनमनी सी लग रही, क्या बात है? भैया या सुनीता की याद आ रही?'

'वे सब तो अपने-अपने ठिकानों पर राजी-खुशी से हैं। वैसे तेरे अलावा किसी को मेरी फिक्र ही नहीं कि महतारी मर रही है या जिंदा भी है। पिछले महीने भर से कोई फोन नहीं आया। हमीं हैं जो फोन किए बिना चैन नहीं पड़ता जी को।'

'सब मतलब के रिश्ते नाते हैं दुनिया भर में। फिर चाहे खुद के ही बाल-बच्चे क्यों न हों?'

कभी वे दुनियादारी, लोगों की बढ़ती स्वार्थपरता और रिश्तों के बारे में चर्चा करते तो कभी अच्छे-बुरे फैसलों का प्रसंग छेड़ देते। अनायास वे बोल पड़ी - 'निर्मल, मेरी जिंदगी का तो कोई ठिकाना है नहीं। बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं। मेरे बाद कौन सँभालेगा मेरी खेती बाड़ी को? मेरे ढोर तो अनाथ हो जाएँगे और ये सब...'

'अरे! ऐसा क्यों कह रही हो? मैं तो हूँ न? मेरे रहते किसी की हिम्मत जो भी टेढ़ी नजर से मेरी रोपी फसल देखेगा, उसकी आँखें निकाल के रख दूँगा आपकी हथेली पे। मगर हाँ! एक बात का डर तो है, आपके बच्चे शायद मेरा दखल पसंद न करें।'

'मेरे रहते तो ठीक है, मगर आँखें मिंचने पर कौन क्या कर गुजरेगा, कैसे तुमसे क्या व्यवहार करेगा? अनुमान लगाना मुश्किल तो है। वे तो ये सब चीजें बेचबाच देंगे, और क्या उम्मीद करूँ उनसे?'

'जिज्जी, अगर जीते जी आप कुछ ऐसी व्यवस्था कर जाएँ कि मेरे हाथ में भी गुजर-बसर लायक चार पैसे आते रहें तो ताजिंदगी मैं आपकी खातिर कुछ भी करने को तैयार हूँ, फिर जैसा आपको ठीक लगे, वही करें।' कहकर वह पूर्ववत उनके तलुवों पर तेल मालिश करता रहा।

इस तरह बात-बात में अपना मंतव्य जाहिर कर गया वो। फिर सिर पर मालिश करते हुए बोला - 'अब कुछ आराम मिला? बेचैनी से राहत मिली?'

'हाँ, अब आराम है। तुम भी सो जाओ अब।'

चारों तरफ प्रकृति का सौंदर्य बिखरा पड़ा था जैसे ईश्वर ने एक ही जगह इतनी सारी सुंदरता और सुख का सागर भर दिया हो। पहाड़ों की चढ़ाई-उतराई, बनते-मिटते बादलों का गुबार, चारों तरफ पसरी धुंध ही धुंध और बीच-बीच में होती बारिश में भीगते रहे दोनों। सुख के इस अनूठे अनुभव में दोनों ही डूबे थे। प्रकृति का साहचर्य हमारे भीतर बसे प्रेम को वेग से बढ़ाता है और प्रेम ही है जो हमें प्रकृति के सानिध्य में ले जाता है। ये कैसा रहस्यलोक है? वे सुख सागर में डूबते उतराते, एक-दूसरे का हाथ पकड़े मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते फिर शाम को गंगा मैया की आरती देखते और फिर एकाग्रता से प्रवचन सुनकर देर रात लौटते। उस रोज जोरदार बारिश में भीग गईं थीं वे। ठंड के मारे कँपकँपा रहा था बदन। निर्मल भाग दौड़कर अँगीठी जलाने की व्यवस्था करता रहा, उसके बाद भीगते हुए कहीं किसी झोपड़पट्टी से चाय खाने का इंतजाम करके लौटा। गर्म कंबल को चारों तरफ से लपेटे कँपकँपा रही थी जिज्जी। उसने जल्दी-जल्दी अँगीठी में कोयले गर्म किए, फिर तौलिया गर्म करके उनके तलुवों, माथे और हथेलियों को गर्म करता रहा। ऐसे किन्हीं खास क्षणों में वे भावुक हो उठीं - 'ये निर्मल, न जाने किस जन्म का कर्जा उतारने जन्मा है तू? इतनी सेवा तूने मेरी की, जरूर पिछले जन्म का हिसाब-किताब रहा होगा।' उनकी प्रेमाकुल आवाज पिघलने लगी थीं, बूँद-बूँद बनकर।

'पिछले का क्यों, इस जन्म का कर्जा कुछ कम है क्या? याद करो, पिछले पूरे बीस सालों से आपके साथ निभा रहा हूँ, आपकी सेवा में हाजिर रहता हूँ वीरबली, हनुमान जी की तरह।' चटपट बोल पड़ा।

'हनुमान नहीं, कृष्ण-सुदामा की तरह साथ रहा है हमारा तुम्हारा, बराबरी वाला, सखा भाव।'

'नहीं, नहीं, इतनी बड़ी-बड़ी बातें करना ठीक नहीं जिज्जी। कहाँ आप, कहाँ मैं? आपके पास भगवान का दिया सब कुछ है और मेरे पास क्या है, आपका दिया हुआ ही है, जो भी है, वरना मेरी क्या औकात?' इस बार वह सोच-समझकर धीरे-धीरे बोल रहा था।

'ये निर्मल, ऐसी बातें कभी मत सोचना। जो मेरा, वो तेरा, कृष्ण सुदामा वाला बराबरी वाला साथ है हमारा, साँची।'

'न, ऐसी ऊँची-ऊँची बातें सुनाकर सपने न दिखाओ जिज्जी। कानूनन तो आपकी संपत्ति पर आपके बच्चों का ही हक बनता है। मैं तो ठहरा एक मामूली नौकर... ज्यादा से ज्यादा बटाई पर खेती जोतने वाला आम आदमी।' वह सँभल-सँभलकर एक-एक बात ऐसे बोल रहा था जैसे बच्चे रटा-रटाया पाठ बोलते हैं लेकिन उनका आशय उन्हें पता नहीं रहता।

अचानक उन्होंने उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया फिर प्यार से उसकी आँखों में देखते हुए बोलीं - 'अपने को कभी कम मत समझना। मैंने या मेरे बच्चों ने कभी तुझसे नौकरों सा सुलूक किया है? नहीं न, कानूनन तेरा हक नहीं बनता सो वैसी व्यवस्था सोच रखी है मैंने भी। यहाँ से घर चलकर सबसे पहले सिर्फ एक ही काम करना है और वो है - तेरे नाम अपनी एक चौथाई जमीन की रजिस्ट्री कराना।' वे अचानक फैसलाकुन हो उठीं।

'मगर आपके बच्चे ऐतराज करेंगे तो?' इस बार उसका सोचा समझा रेडीमेड जवाब आ गया।

'करेंगे तो देखा जाएगा। उनसे निबटना आता है। कितनी देखभाल कर रहे है वो मेरी? धेले भर की नहीं। कब से भैया ने फोन नहीं किया? बस हमीं है जो उनके नाम की माला जपते रहते हैं।'

'विजी रहते होंगे, नौकरी है नई-नई।'

'कहने को दस बहाने हैं, लड़की भी तो नौकरी करती है मगर वो तो नियम से रोज फोन कर लेती हैं, तो क्या वो विजी नहीं रहतीं?' वे अब तर्क करने लगीं।

कभी तो वो उनकी हाँ में हाँ मिलाता तो कभी इधर-उधर की बातें करके हँसता हँसाता। धार्मिक जगहों की सैर-सपाटे के बाद वे प्रवचन सुनने जाते। वक्त जो भरा-भरा होता है, जल्दी से गुजर भी जाता है, उसके गुजरने का अहसास तक नहीं होने पाता।

वहाँ से लौटकर वाकई सुधा जिज्जी ने सबसे पहले यही किया यानी पूरे पाँच बीघे की जमीन की रजिस्ट्री निर्मल के नाम कर दीं, बिना किसी को बताए, बिना किसी से कहे सुने, बिना किसी से पूछे।

धीरे-धीरे निर्मल के बच्चे बड़े होने लगे थे सो उनका खर्चा भी दिन ब दिन बढ़ता गया। वह कभी किसी को टेलरिंग का काम सिखाने की सोचता तो कभी किसी को ज्वैलरी की दुकान पर बिठाने की योजना बनाता। इसी बीच सुधा जिज्जी के बेटे ने निर्मल के एक लड़के को मॉल में नौकरी पर लगवा दिया और लड़कियों की शादियों में भी उन्होंने दिल खोलकर खर्चा किया।

अड़ोसी-पड़ोसी हों या सगे संबंधी, सभी निर्मल की मुक्त कंठ से तारीफ करते। इसी बीच अचानक एक दिन सुधा जिज्जी के बड़े बेटे सपरिवार वहाँ आए। उसी समय सुधा जिज्जी को अपनी बहन के यहाँ जरूरी काम से जाना पड़ गया लेकिन घर पर उनकी एकलौती पोती को छोड़कर वे जाएँ कैसे? उनकी बहू को भी अपने किसी काम से अपने मायके जाना था। वे बड़े पशोपेश में थीं कि तभी किसी काम से वहाँ निर्मल को आते देख पूछ बैठी - 'क्या बात है, आजकल तू दिखता ही नहीं। कहाँ खोया रहता है?'

'बस ऐसे ही, इन बच्चों की चकरघिन्नी में नाचता रहता हूँ चौबीस घंटे।'

'सुन, एक समस्या है, वो ये कि नेहा आई हुई है जबकि आज रात मुझे बाहर निकलना है, सुमन के यहाँ पूजा है, वहाँ जाना जरूरी है। तू एक रात यहीं, इस घर में रुक सकता है? भैया किसी इमरजेंसी केस में उलझे हैं, वो देर रात लौट पाएँगे या नहीं, कह नहीं सकते।'

'मगर भाभी तो होंगी, वो कहाँ चली गई? इसे क्यों नहीं ले गई?'

'पता नहीं, सबके अपने-अपने काम होते है। आजकल के बच्चे पूरी बात तो बताते नहीं हैं। होगा कोई काम। वे भी देर रात तक लौट आएँगी। शायद सुबह तक आए। क्या पता?'

'ठीक है...' कहकर वह सर्र से बाहर निकल गया।

रात की नीरवता, झींगुरों की आवाजें और मंद-मंद बहती हवाएँ तन-मन को कहीं और लिए जा रही थी। इसी बीच अचानक तेज हवा चलने लगीं और खिड़की दरवाजों के भड़भड़ाने की आवाजें आने लगीं।

'नेहा, जरा दरवाजा बंद कर लेना ठीक से।'

'अच्छा चाचा, ठीक है।'

'क्या लाइट चली गई? जरा मोमबत्ती तो जला लो।'

'काहे को चाचा? आप वहीं सोते रहो। मैं यहाँ आँगन में लेट जाती हूँ। अच्छी हवा आ रही है।'

'बेटा, क्या नींद नहीं आ रही?' बेचैन मन पर बोझिलता बढ़ने लगीं। आँखों में भभकती लौ की लपटन बढ़ती जा रही थी।

'बारिश और हवा के शोर से नींद टूट गई चाचा।' चौतरफा हवाएँ तूफानी गति से चलने लगीं थीं।

न जाने किस वजह से नींद में चलता हुआ निर्मल विभ्रम की स्थिति में उसके पास खिंचा चला आया और वहीं नीचे जमीन पर बैठकर बतियाने लगा, फालतू की बातें।

'किस क्लास में पहुँची हो? कौन से टीचर्स अच्छा पढ़ाते हैं?'

'नौवीं में। अब यहाँ से जाओ चाचा। हमें सोना है... उसे न जाने क्यों चाचा से ज्यादा बातें करना रास नहीं आ रहा था। अंदर से थोड़ा डर भी लग रहा था कि इतनी रात गए क्यों ये उसके पास चला आया।

उस एक पल में अचानक अनायास जैसे ही वो उसके ऊपर झुका और उसके होंठों पर अपने होंठ रखे ही थे कि वो चिल्ला पड़ी।

'हटो चाचा, ये क्या कर रहे हैं?' अचानक उसने जोर का धक्का देना चाहा मगर तभी वो पलटा और उसे दबोचने की कोशिश करने लगा। वह छटपटाई और फिर से चिल्लाने की कोशिश करने लगीं।

नवजात गुलाब की पंखुड़ियों को अपने अजगरी वजूद में लपेटने की कोशिश करने लगा वो। बच्ची का मुँह जोर से दबाने की कोशिश की तो उसने दाँतों से काट लिया और मौका पाते ही दरवाजे की तरफ भागी। एन मौके पर मोबाइल बज उठा - 'मम्मी, कहाँ हो? जल्दी आव। ये चाचा हमारे साथ बदतमीजी कर रहे हैं।'

'हम तो यहीं घर के पास आ ही गए, बस...पहुँचने वाले हैं।'

अगले ही पल दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई पड़ी। पल भर के लिए बदहवास हो उठा वो। अब उसे होश आया। ये, ये क्या हो गया था मुझे? गर्दन नीची किए दरवाजा खोलने मुड़ा वो।

इधर बच्ची का जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना सुनकर वो घबड़ा गई।

'क्या हुआ मेरी बच्ची को? क्या किया इसने? बोल बेटा, आज मैं इसे छोड़ूँगी नहीं। साला, जिसका नमक खा खाकर बड़ा हुआ, उसी की थाली में छेद करते इसे जरा भी लाज नहीं आई।

'आप मुझे अकेला छोड़कर कहाँ चली गई थी ममा? इस, इस आदमी ने मुझे किस करने की कोशिश की ममा, इसने मेरी फ्राक उठाई थी ममा, ममा, आई हेट दिस डर्टी फैलो।'

'मैंने तो कुछ भी नहीं किया। आखिर क्या किया है मैंने? क्यों बिटिया, क्या किया है मैंने? क्या कुसूर है मेरा?' खुद को बेकसूर साबित करने के लिए अब बचाव की मुद्रा में आ गया वो।

तड़ाक-तड़ाक, उन्होंने भरपूर ताकत से पूरे दो-तीन मुक्के उसे मारे फिर जूते उठाकर अपने दोनों हाथों से मारती जा रही थी, मारते-मारते हथेलियाँ थक जातीं तो रोने लगती फिर मारना शुरू कर देती।

'साले, हरामी, इसी दिन के लिए तुझे और तेरे कुनबे को पाल-पोसकर बड़ा करती रहीं अम्मा? अरे! तू तो दूध पी-पीकर जिंदा जहरीले नाग से भी बदतर निकला। कुजात साला, कमीना, नीच...।'

'कोई मेरा कसूर बताएगा? आखिर कुछ भी तो नहीं किया मैंने?'

'पूछ इस फूल सी बच्ची से, क्या सोचकर इसे चूमना शुरू किया था तूने? झूठ बोलते तुझे जरा भी शर्म नहीं आती? तेरी जुबान नहीं कटती झूठ बोलते हुए? राक्षस, देवता का भेष धरे काला अजगर निकला तू तो। अभी बुलाती हूँ पुलिस को, तेरी सारी हेकड़ी उतारेंगे वो। उन्हें ही सफाई देना तू, कि क्या किया है तूने? हमारे टुकड़ों पर पलने वाला पिल्ला हमीं को काटने दौड़ेगा?' गुस्से की ज्यादती की वजह से हाँफनी चलने लगी थी उनकी।

'आप लोगों को मुझे जो सजा देना हो, मंजूर है मगर पुलिस को मत बुलाना। मैं हाथ जोड़ता हूँ, पैर पड़ता हूँ। कुछ तो रहम करो, मैंने आपकी वर्षो सेवा की है।' बोलते-बोलते वो रुँआसा हो उठा।

'तो सेवा का ये इनाम दिया है तूने हमें? बोल?'

खबर सुनते ही अम्मा भी सब काम छोड़कर उल्टे पैर वापस हो लीं। गुस्से से बिफरती शेरनी की तरह गुर्राते हुए दहाड़ने लगीं वो। आते ही उसकी कमीज की कालर कॉलर खींचकर चिल्ला पड़ी - 'मुन्नी, जरा इसकी पोती को तो पकड़ ला।'

किसी को कुछ समझ में नहीं आया तो फिर से चीख पड़ी वो - 'कोई सुनता क्यों नहीं मेरी बात? मैंने कहा न, इसकी वहू और पोती को तो पकड़ ला'।

'अभी जाता हूँ अम्मा... कहकर बगल वाला लड़का दौड़ पड़ा।

बहू और पोती को एक साथ देखकर अचानक बौरा गया वो। कुछ कहते बने, न सुनते। तभी सुनाई पड़ी वो दहलाने वाली चीख - 'तुझ से एक आखिरी सवाल पूछती हूँ। इसकी जगह अगर तेरी खुद की पोती जो इसी उम्र की है, उसके साथ भी तू यही सुलूक करता? उसे भी इसी तरीके से... चूमता तू?'

सवालों से घिरा निर्मल के पास कोई जवाब नहीं था। ऐसे सवालों का भी कोई जवाब होता है भला? जमीन पर नजरें गड़ाए लुटा-पिटा सा खड़ा रहा वह फिर जैसे ही बाहर जाने को मुखातिब होने लगा कि उसका हाथ पकड़ गुस्से में फनफनाते हुए एक बार फिर से दहाड़ने लगीं वो - 'मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं है न तेरे पास तो अपनी सजा भी सुनता जा, तभी इस घर से आगे कदम बढ़ा पाएगा वरना सीधे जेल में ही जाएगा तू।'

उसने गर्दन मोड़कर उनकी तरफ देखा तो उसकी पोती को उसके सामने ठेलते हुए जोर से चीख पड़ी वो - 'सबके सामने आज तू उसी तरह अपनी इस पोती के होठों में होंठ डालकर चूमेगा और जो भी मेरी बच्ची के साथ किया है, इसके साथ भी वही करना पड़ेगा तुझे, तभी मेरे जलते कलेजे को ठंडक मिल पाएगी वरना खैर नहीं तेरी। जलते अंगारे उठाकर तेरा मुँह न झुलसा दिया तो...' गुस्से में बिफरती सुधा जिज्जी लगातार ताबड़तोड़ गालियाँ बकती जा रही थीं।

इसी बीच न जाने किसने पुलिस को फोन कर दिया था। साँय-साँय करती पुलिस जीप के आते ही जमा होती भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगीं।


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हिंदी समय में रजनी गुप्त की रचनाएँ