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कहानी

साईन बोर्ड
योगिता यादव


लॉ के नए विद्यार्थियों के स्वागत में दी जा रही यह लॉ कॉलेज की फ्रेशर पार्टी थी। सभी लड़कियाँ बला की खूबसूरत लग रहीं थीं। कुछ ने ग्लैमरस दिखने की कोशिश में वेस्टर्न कपड़ों का चुनाव किया था। लड़कियों के बीच छितरा हुआ लड़कों का झुंड बता रहा था कि वे अपनी कोशिश में कामयाब भी हुई हैं।

इन सबसे दूर कलाई तक ढकी बाजू का कुर्ता और चूड़ीदार पायजामी पहने एक कोने में कुछ सहेलियों के साथ खड़ी थी शबनम।

शबनम सईद।

छात्र नेताओं की अनौपचारिक भाषणबाजी के बाद शुरू हुआ नए विद्यार्थियों का इंट्रो राउंड। इसमें सभी नए विद्यार्थियों को बारी-बारी आकर अपना नाम, अपनी पसंद आदि बताकर कोई एक परफोर्मेंस देनी थी। किसी ने चुटकुले सुनाए, तो किसी ने लेटेस्ट डांस की प्रस्तुति की।

''अब आ रहीं हैं शबनम सईद",

''देखें क्या कमाल दिखाती हैं मिस सईद?", एंकर ने घोषणा की।

''ओ... तो शबनम नाम है, मैंने कहा था न कि लड़की मुसलमान है।"

कुछ विद्यार्थियों ने आपस में टिप्पणी की। मद्धिम स्वर में ऐसी ही और भी कई टिप्पणियाँ हॉल में हो रहीं थीं।

शबनम पूरे आत्मविश्वास के साथ मंच पर आई,

''डांस, वी वॉन्ट डांस"

अब हॉल में मौजूद लड़के-लड़कियों ने डांस की फरमाईश कर डाली।

बड़े सलीके से शबनम ने इस फरमाईश को ठुकरा दिया। बड़ी-बड़ी आँखों के ऊपर की लंबी काली पलकों में वे सब इस कदर उलझ चुके थे कि उन्हें इस ठोकर का अहसास ही न हुआ।

जब तक हो पाता तब तक शबनम ने अपनी ओर से गाना सुनाने की अनुमति चाही।

''इफ यू डोंट माइंड, आई वुड लाइक टू सिंग"

''यस ऑफकोर्स", ''वाय नॉट" की गूँज हॉल में होने लगी। गूँज को विराम तब लगा जब शबनम ने गाना शुरू किया...

''ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम...

सलाम...,

ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम..."

***

शबनम की खूबसूरती और फर्स्ट इंप्रेशन का ही कमाल था कि वह उस पार्टी में 'मिस फ्रेशर' चुनी गई और पार्टी के बाद 'सलाम गर्ल' के नाम से कॉलेज में मशहूर हो गईं। उस पार्टी में एंकर की भूमिका में नजर आने वाला अंतिम वर्ष का छात्र साहिल सिंह जब भी शबनम को देखता तो 'हाय' या 'हैलो' की बजाए सलाम ही कहता। शबनम भी सलाम का जवाब मुस्कुरा कर देती।

मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा अब दिलों में वादों के अंकुर फूटने लगे थे। अंतिम वर्ष का छात्र होने के नाते साहिल ने शबनम की बहुत मदद की। फिर चाहे परीक्षाओं की तैयारी हो या फिर वाइवा की जानकारी।

दोनों वकालत की पढ़ाई कर रहे थे इसलिए अपने आप को बुद्धिजीवी मानते हुए फालतू बातों से परहेज ही किया करते थे।

साहिल सीनियर होने की वजह से खुद को ज्यादा समझदार मानता था और शबनम को लगता था कि 'क्योंकि वह लड़की है इसलिए ज्यादा मेच्योर है।'

दो समझदारों की आपसी समझ बढ़ती गई और वे एक-दूसरे को खुद का पूरक मानने लगे। सलाम गर्ल और स्मार्ट ब्वॉय की यह जोड़ी कुछ विद्यार्थियों को खासी आकर्षित करती थी। इसलिए उनमे उन्हें बॉलीवुड की कई सफल जोड़ियों के साक्षात दर्शन हुआ करते थे।

शबनम और साहिल भी कॉलेज के इस सामान्य ज्ञान से अपरिचित नहीं थे। इसलिए उनके बारे में जब भी कोई नई जानकारी कॉलेज कैंपस में उदित होती, तो साहिल का चेहरा सूर्य के समान और शबनम सुबह की कुँआरी धूप की तरह चमकने लगती। इस सब के बीच एक साल कब बीत गया पता ही नहीं चला।

***

आज कॉलेज में एक और पार्टी थी। पर आज उमंग उत्साह की जगह निराशा और उदासी ने ले ली थी। शबनम का दिल एक-एक पल में कई-कई बार धड़क रहा था क्योंकि यह अंतिम वर्ष के छात्रों की फेयरवेल पार्टी थी। अंतिम वर्ष का छात्र यानी साहिल सिंह... बस और कुछ नहीं।

पार्टी में जैसे -

शबनम का बहुत कुछ छूटने लगा था।

एक मौसम जो खुशनुमा था, वह बीतने लगा था।

शबनम की आँखों से आज बेशकीमती उपहार झड़ रहे थे। साहिल का मन हुआ कि वह बढ़कर इन्हें सँभाल लें, पर क्या करता ऐसे बहुत से उपहारों के गुबार उसके दिल में भी बनने लगे थे। जो पुरुष होने के गुमान में आँखों का रास्ता नहीं ले पा रहे थे।

बिछुड़ने की मजबूरी ने दोनों के बीच का प्यार कई गुना बढ़ा दिया था। शबनम को लगा कि कहीं कॉलेज के अकादमिक वर्ष की तरह साहिल के दिल का प्यार भी न खत्म हो जाए...।

***

पर ऐसा नहीं हुआ। साहिल एक वकील के अंडर काम करने लगा था और शबनम का यह लॉ का दूसरा वर्ष था। प्यार अब भी बरकरार था। सबूत यह कि शबनम अब क्लास 'बंक' करने लगी थी और साहिल को अक्सर अपने सीनियर से लेट आने और कभी-कभी न आने पर डाँट पड़ने लगी थी।

दोनों अब भी अपने आप को बुद्धिजीवी मानते थे। इसलिए इस दशा पर विराम लगाने की मंशा से दोनों ने तय किया कि अब उन्हें शादी कर लेनी चाहिए।

शादी के लिए मियाँ और बीवी दोनों ही थे राजी।

पर सवाल था कि पंडित आए या काजी?

सलाम लेते और देते हुए भी वे दोनों भूले नहीं थे कि शबनम 'सईद' है और साहिल 'सिंह'।

घरवालों का खून खौलाने के लिए दोनों का नाम ही काफी था। इस शादी के लिए परिवार वालों की अनुमति न मिलनी थी और न ही मिली।

दोस्त पहले भी तैयार थे और घरवालों के इनकार करने के बाद अब और ज्यादा तैयार हो गए थे। अकसर होता भी है जिस फल को खाने की समाज वर्जना करता है उसे चखने को दोस्त सबसे ज्यादा उत्साहित करते हैं।

फिर भी शादी करना आसान नहीं था।

क्योंकि समाज की आलोचना करना आसान है पर उसके समानांतर अपनी मर्जी का समाज खड़ा करना बहुत मुश्किल। दोस्तों की मंडली में बैठे हुए इस समाज की परिकल्पना जितनी आसान होती है उससे कही ज्यादा मुश्किल होती है इस समाज की परिघटना।

यह मानव मन है। हताश होने के बावजूद आशा की कोई न कोई किरण कहीं न कहीं से खोज ही लेता है। सामान्य परिस्थितियों में जो लोग अनावश्यक लगते हैं वहीं आपात स्थिति में ईश्वर से जान पड़ते हैं। आशा की उसी किरण के सहारे साहिल को अपने एक परिचित की याद आई।

''अंतर्जातीय विवाह पर बड़ा ओजपूर्ण भाषण दिया था उन्होंने, वो जरूर मेरी मदद करेंगे।

पर वहाँ शबनम को ले जाना ठीक नहीं है। कहीं नाराज ही न हो जाएँ..."

इसलिए साहिल अकेला ही उनके पास पहुँच गया...

***

भैया मैं एक परेशानी में हूँ...

'कहो क्या बात है'

'मुझे समझ नहीं आ रहा मैं ठीक कर रहा हूँ या गलत?'

'ह्मम...'

'मेरे साथ ही लॉ कर रही थी, मेरी जूनियर है'

'ह्मम...'

'हम शादी करना चाहते हैं'

'ह्मम...'

'घर वाले नहीं मान रहे'

'तुम्हारी क्या इच्छा है?'

'मेरी इच्छा वही है जो...

'क्या नाम है लड़की का?'

'जी, शबनम। शबनम सईद।'

'क्या? पूरे शहर में तुम्हें कोई और लड़की नहीं मिली।' साहिल को जो ईश्वर से जान पड़ रहे थे उन भैया जी का चेहरा दैत्यों की भाँति आग उगलने लगा।

'पर भैया आप तो...'

'हम अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दे रहे हैं ताकि तुम जैसे युवा भटककर दूसरे धर्म में न जाएँ... और तुम...।'

'पर भैया...'

'पर वर कुछ नहीं। क्या धर्मांतरण करोगे?'

'क्या जरूरी है? अगर जरूरी है तो...'

'नालायक! तुम जैसों के कारण ही हम सदियों से अपमान झेलते आए हैं। अगर रगों में एक राजपूत का खून है तो उसे अपने यहाँ लाओ। क्या कर सकोगे ऐसा?'

'हमें इस सबसे फर्क नहीं पड़ता। फिर भी कोशिश करूँगा।' साहिल ने अपने प्रेम को अमर प्रेम साबित करते हुए मिसाल देनी चाही।

'अगर कर सकने की क्षमता है तो बताना, मैं काका जी से बात करूँगा।'

***

बहुत कम समय और उससे भी कम शब्दों में समाज का एक बहुत बड़ा पृष्ठ साहिल के सामने खुला। जिसकी चर्चा स्कूली पढ़ाई में तो कभी हुई ही नहीं थी, लॉ में भी इसका बहुत ज्यादा वर्णन साहिल ने नहीं पाया था।

पर उसे याद आया कि हमारे कानून में भी तो दूसरे धर्म में शादी करने की अनुमति नहीं है।

क्या प्रेम करते वक्त उसे धर्म और जाति के बारे में सोच लेना चाहिए था? अगर सोच लेता तो क्या प्रेम कर पाता...?

पर क्या जरूरी है शादी करना, हम बिना शादी के भी तो... पर नहीं... कहीं तो ठहरना ही होगा...

सवाल बहुत सारे थे...

***

साहिल अगले दिन फिर उन्हीं सज्जन के पास पहुँचा...

'भैया प्रणाम'

(साहिल को पता था कि भैया गुड मॉर्निंग से चिढ़ जाते हैं। इसलिए यहाँ वह प्रणाम ही किया करता था।)

'हाँ, मैंने काका जी से तुम्हारे बारे में बात की थी। उन्होंने कहा है कि शबनम हमारी बेटी जैसी है। हम नहीं चाहते कि हमारी बेटियों को यहाँ-वहाँ परेशान होना पड़ा। कल उसे यहाँ ले आना अपने साथ।'

कुछ लोगों के क्रोध और प्रेम की लगाम भी उनके वरिष्‍ठों के हाथों में होती है। भैया जी का उस वक्त का क्रोध और इस वक्त का प्रेम इसी का प्रमाण का था।

'सच... क्या वह मान गए...'

'हाँ... मानते क्यों नहीं... आखिर तुम जो इतना बड़ा कार्य करने जा रहे हो।

काका जी बहुत ज्ञानी हैं। वह जानते हैं कि यहाँ के ज्यादातर मुसलमान धर्मांतरण के बाद ही मुसलमान बने हैं। हमारा कर्तव्य है कि उनकी फिर से शुद्धि करके उन्हें अपने घर लौटने का अवसर दें...।'

'मैं कल ही उसे यहाँ ले आऊँगा... फिर?'

'फिर की तुम चिंता मत करो। वह सब हम पर छोड़ दो। हम करेंगे लड़की का कन्यादान।'

'भैया...भैया, आप कितने अच्छे है। आपका यह उपकार मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगा। आपने तो मुझे मेरी जिंदगी ही लौटा दी...।'

खुशी में पंख बने साहिल के कदम रुकते ही नहीं थे। वह बार-बार काका जी के प्रति नतमस्तक हो रहा था।

***

अपनी समस्या को गंभीर बताते हुए साहिल ने शबनम को भैया जी और काका जी के पास जाने के लिए तैयार कर लिया। शुरू की कुछ मुलाकातों में तो शबनम का वहाँ एक पल भी ठहरने का मन नहीं किया, लेकिन प्यार करती थी और उसे अंजाम तक पहुँचाना चाहती थी। इसलिए जैसा साहिल कहता गया वह करती गई...।

शबनम जानती थी कि उसके मम्मी-पापा को शहर भर से उसके और साहिल के बारे में भनक लगने लगी है। पर वह क्या करती... उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। वह वही कर रही थी जो साहिल उसे करने को कह रहा था। और इस बारे में साहिल कुछ कह ही नहीं रहा था। सवाल यहाँ भी बहुत सारे थे...।

उसने जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर अपनी बड़ी बहन की मार्फत मम्मी-पापा के सामने अपने और साहिल के रिश्ते के बारे में बात की। मानो महायुद्ध से पहले शांति का अंतिम संदेश भेजा जा रहा हो।

इस शांति संदेश का जवाब कुछ यूँ मिला,

'खबरदार जो एक साँस भी बाहर निकाली। तुम्हारी जुबान पर भी उस काफिर का नाम आना गुनाह है। हमने तुम्हें इतने लाड़-प्यार से पाला है। और उसका सिला ये... कि हमें शहर भर में तुम्हारी खबरें सुनने को मिल रहीं हैं। और सुना है आजकल तुम उन जलसे-जुलूसों वालों के पास भी जाकर बैठती हो...'

उफ्फ् कितनी संगदिल और बेरहम है ये दुनिया। हर बात के कितने मतलब निकाल लेती है। असल बात समझने की कोशिश ही नहीं करती... मेरे खुदा तू ही बता अब मैं क्या करूँ...?

क्या वही... पर क्या तब अम्मी, अब्बू की बदनामी नहीं होगी?

या अल्लाह! हमारी सात पुश्तों पर दाग लग जाएगा...!

नहीं मुझे कुछ नहीं सूझ रहा...

***

पाँच दिन बाद शबनम और साहिल की शादी के तमाम इंतजाम किए जा चुके थे। शादी शहर से बाहर एक मंदिर में थी। उससे पहले शुद्धिकरण के लिए हवन होना था और शादी के बाद एक फाइव स्टार होटल में पार्टी...

दोनों ने अपने सभी दोस्तों को वहीं आने का निमंत्रण दिया था। पर इस सबसे पहले शबनम को कुछ तैयारियाँ करनी थीं...

मसलन

अपने आप को सँभालना था

अपने अपनों को भूलना था

स्वाभिमान को मारना था

उन लोगों की हर बात को मानना था

और

उसे अब शीतल बन जाना था।

इन सबमें उसे ध्यान ही नहीं रहा कि उसके सेकेंड ईयर के एग्जाम आने ही वाले हैं।

***

वह बाहर से बहुत खुश थी कि उसका प्यार अपने अंजाम तक पहुँच रहा है।

पर भीतर से वह अकेली हो गई थी।

सारे कर्मकांड के दौरान उसे एक बार भी नहीं लगा कि उसके जिस्म में जान बाकी है।

पार्टी बहुत अच्छी रही। सारे दोस्तों का साथ पाकर वह एक बार के लिए अपने सारे दुख भूल गई। साहिल भी।

***

इस नए समाज ने हाथों हाथ उसका स्वागत किया। कई जगह उसे प्यार और बलिदान की मिसाल बताकर पेश किया गया, तो कईयों को अपने धर्म पर नाज होने लगा जहाँ उसे शरण मिली।

'हैप्पी मैरिड लाइफ' शुरू हो चुकी थी।

काका जी ने ही दोनों के रहने के लिए शहर से दूर दो कमरों का एक मकान किराए पर ले दिया था। पर इस घर में शबनम को आने की अनुमति नहीं थी। यहाँ सिर्फ शीतल रह सकती थी। सिर्फ शीतल। साहिल की शीतल। काका जी, भैया जी और जलसे-जुलूसों वालों की बनाई शीतल। शबनम के बलिदान पर पैदा हुई शीतल।

शबनम के मर जाने पर उस घर में भी मातम मनाया जा चुका था।

साहिल की प्रैक्टिस में भी काका जी और भैया जी खूब मदद कर रहे थे। इसलिए शीतल उन्हें अपने अपनों की तरह सम्मान देने लगी थी।

नई जिंदगी बिल्‍कुल नई-नई सी थी, जहाँ किसी भी पुराने को आने की इजाजत नहीं थी। इसके बावजूद वहाँ एक दिन ईद आई...

हर साल ईद पर आने वाली खुशियों को इस बार शबनम नहीं मिली। न अम्मी ने सिवईयों की मिठास दी और न अब्बू ने ईदी। पिछली रात जब शीतल बिस्तर पर लेटी थी तो उसने देखा था कि कोई उसकी खिड़की से झाँक रहा था। एक बार के लिए वह डर गई... साहिल पास में ही लेटा था। पर गहरी नींद में था। उसने डर के मारे आँखें बंद कर लीं और साहिल से और सटकर सो गई। थोड़ी देर बाद उसकी आँख फिर खुली। वह परछाईं अब भी खिड़की से झाँक रही थी। इस बार उसका दुपट्टा लहरा रहा था।

शायद कोई औरत है, पर वो यहाँ क्यों झाँक रही है?

शीतल हिम्मत करके उठी।

धीरे-धीरे कदमों से खिड़की की तरफ गई। अँधेरे में कुछ भी साफ-साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

चूड़ीदार पायजामी, कलाई तक ढकी बाजुओं वाला कुर्ता, लहराता हुआ दुपट्टा... और फिर एक खूबसूरत सलाम... ये तो... शबनम... शबनम शबनम, जब तक शीतल उसे पहचान पाती उस परछाईं का चेहरा चाँद में बदल गया। और परछाईं चाँदनी की तरह शीतल के सामने छिटक गई।

चाँद की इस सुंदर रात में शबनम कहाँ से आ गई? उसे तो यहाँ आना ही नहीं चाहिए था...

ये तो ईद का चाँद है! इसका मतलब रोजे पूरे हो गए। पर मैंने तो इस बार...।

कुछ भी हो कल जरूर जाऊँगी ईद की नमाज अता करने।

ये परवरिश के वो निशान थे जो शुद्धियों के तमाम पाखंड के बाद भी मिट नहीं पाए थे। आस्था की कुछ लकीरें हमारे जन्मने से लेकर मरने तक हमारे साथ रहती हैं। माहौल सकारात्मक हो तो वह प्रफुल्लित होती हैं और अगर नकारात्मक हो तो बरगद की जड़ों की भाँति भीतर ही भीतर फैला करती हैं।

'पर क्या साहिल...?

नहीं, नहीं वो क्यों मना करेंगे? भला उन्हें इससे क्या ऐतराज? मस्तिष्क को मथते हुए शादी वाली रात के तमाम वायदे शीतल को एक बार फिर से याद हो आए।

पर आज की सुबह वैसी नहीं थी जैसी तसवीर उसने बनाई थी। शबनम की कल्‍पनाओं का कोई रंग शीतल की तसवीर नहीं सजा पाया। उन रंगों को तो यहाँ आने ही नहीं दिया जाता था। यहाँ सिर्फ यथार्थ था। सच्‍चा सलेटी बदशक्‍ल यथार्थ।

***

साल के भीतर ही शीतल की गोद भरी और वह और ज्यादा बिजी हो गई। साहिल की प्रैक्टिस अच्छी चलने लगी थी। इसलिए वह और खुश रहने लगी थी। कभी-कभी ख्याल आता कि उसने पढ़ाई बीच में ही न छोड़ दी होती तो वह भी आज साहिल की तरह जानी-मानी वकील होती।

पर क्या हुआ जो लॉ पूरी नहीं हो पाई। वह कुछ न कुछ तो कर ही सकती है। आखिर वह ग्रेजुएट है। और कितनी ही लड़कियाँ ऐसी हैं जो ग्रेजुएशन के बाद ही अच्छी नौकरी कर रही हैं।

शीतल हर रोज अखबार में नौकरी के विज्ञापन देखती और संभावित नौकरी के समयानुसार शेष बचे समय में घर के काम का शेड्यूल बनाती। पर जब बारी एप्लीकेशन फॉर्म भरने की आती तो वह परेशान हो जाती। वह शीतल सिंह के नाम से फॉर्म भरती मगर उसके पास कुछ भी तो नहीं था जिससे शीतल सिंह पढ़ी-लिखी साबित होती। शीतल सिंह की डेट ऑफ बर्थ भी तो उसे ठीक तरह से पता नहीं थी।

एक बार साहिल ने कुछ कानूनी दाँव-पेच समझाए थे जिनके बाद वह शबनम के सर्टिफिकेट शीतल के बायोडाटा में इस्तेमाल कर सकती थी। मगर फिर लगता अब्‍बू की नंगी तलवार अब भी शबनम की बाट देख रही होगी। उसका मन न माना। सारे दाँव-पेंच एक तरफ और मन की मनाही एक तरफ।

शेष बचा अवसाद और घोर निराशा।

'क्या मैं किसी काबिल नहीं? दोनों में से एक भी जिंदगी मेरे काम नहीं आएगी।

नौकरी नहीं तो क्या हुआ मैं कुछ और कर सकती हूँ। कोई रेस्टोरेंट, कोई कैफेटेरिया या फिर कोई बुटीक। हाँ बुटीक ठीक रहेगा। पर उसे शुरू करने के लिए कुछ तो पैसा चाहिए ही...' साहिल के पास तो वैसे ही...'

जब कुछ न हो सका तो उसने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। अपना खर्चा भी निकलेगा और बुटीक के लिए पैसे भी जमा हो जाएँगे।

***

पैसे जमा करना मुश्किल तो था पर इतना मुश्किल होगा इसका पहले उसे अंदाजा नहीं था। फिर भी उसकी इच्छा उसका संबल बनी। महीनों बीत जाने के बाद उसकी इच्छा लगने लगी कि पूरी हो जाएगी और उसने अपने बुटीक के ख्वाब बुनने शुरू कर दिए।

ख्वाब बुनते वक्त साहिल हमेशा उसके साथ होता था, पर उनकी परिघटना पता नहीं कैसी होती थी, मायूस सी... कड़म के साग के बासी पत्तों जैसी... ओस की एक बूँद भी नहीं...

एक दिन ब्रेकफास्ट टेबल पर बैठे हुए उसने शीतल से सवाल किया, शीतल अब तो तुमने पैसे भी जमा कर लिए हैं। कल जाकर हम तुम्हारे बुटीक के लिए दुकान पसंद कर आएँगे। पर तुमने सोचा है कि तुम उस बुटीक का क्या नाम रखोगी?

'इस बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। पर हाँ क्या नाम रखूँगी मैं उसका?'

'कोई अच्छा सा नाम होना चाहिए...'

'जैसे...?'

'जो तुम्हें बड़ा अपना सा लगे...

अच्छा चलो मैं चलता हूँ मुझे देरी हो रही है। तुम सोचना क्या नाम होगा तुम्हारे बुटीक का?' नैपकिन से हाथ पोंछते हुए साहिल कुर्सी से उठा और कोर्ट के लिए निकल पड़ा।

***

इधर शीतल बुटीक के नाम के बारे में सोचने लगी...

क्या नाम होगा? साहिल ने कहा था जो मुझे बड़ा अपना सा लगे।

कौन है मेरा अपना

साहिल, वो तो है ही

मेरी बेटी, हाँ वो भी है

पर..., पर कुछ और होना चाहिए

जिसका अहसास ही मेरे जहन से निकले

क्या हो सकता है ऐसा?

मेरा प्यार?, मेरी पसंद? मेरी अना?

हाँ अना...

मेरी अना ही तो है जिसके लिए मैंने खुद मेहनत की और अपने पैरों पर खड़ी होने जा रही हूँ।

अना, अना बुटीक

यही नाम होगा मेरे बुटीक का।

साहिल सुनेंगे तो कितने खुश होंगे।

***

साहिल घर लौटा तो शीतल की खुशी का ठिकाना न था। शीतल ने खुशी से बाँहें फैलाए साहिल का स्वागत किया। अपनी दोनों बाहें उसके गले में डालते हुए वह लगभग झूल सी गई।

बताओ क्या खाओगे खाने में? आज सबकुछ आपकी पसंद का बनेगा।

क्या बात है बहुत खुश नजर आ रही हो

खुश तो होऊँगी ही इतना बड़ा काम जो किया है आज

अरे वाह, जरा हम भी तो सुनें ऐसा क्या कमाल कर दिया हमारी 'मैडम' ने।

याद कीजिए सुबह आपने क्या काम सौंपा था हमें?

तुम्हारा खिला हुआ चेहरा देखकर मैं तो सबकुछ भूल गया। अब तुम ही बताओ प्लीज।

साहिल को वाकई कुछ याद नहीं था।

मैंने अपने बुटीक का नाम ढूँढ़ लिया है।

सच, क्या नाम सोचा है?

आपने कहा था न कुछ ऐसा होना चाहिए जो बिल्कुल मेरा अपना सा हो...

हाँ कहा तो था।

तो अंदाजा लगाइए क्या हो सकता है?

अंदाजा तो लग रहा है पर तुम बताओगी तो ज्यादा खुशी होगी।

अना, मेरी अना, अना बुटीक।

और सुनो हम अपने बुटीक का उद्घाटन काका जी से ही करवाएँगे। कितनी मदद की है उन्होंने हमारी।

अना...! ये क्या नाम हुआ? कहते, कहते साहिल ने शीतल की खुशी का बिस्तरा गोल कर दिया।

अना यानी कि मेरी अना, सेल्फ रेस्पेक्ट...

ओह तो तुम सेल्फ रेस्पेक्ट का झंडा गाड़ना चाहती हो? और ये अना, टना नाम रखा न, तो आ गए काका जी तुम्हारे बुटीक का उद्घाटन करने। क्या तुम जानती नहीं उन्हें मुस्लिम नाम से भी चिढ़ है?

चिढ़ है! तो फिर मैं...? और फिर इसमें झंडा गाड़ने वाली कौन सी बात हो गई?

तुम शीतल हो, शीतल।

लेकिन मैं तो शबनम...

ठीक है तुम शबनम भी थी पर अब तुम शीतल हो, देखो बात की व्यवहारिकता को समझो। नाम से भला तुम्हें क्या फर्क पड़ता है। नीना, मीना कुछ भी रख लो... और तुम जानती हो काका जी के कितने अहसान हैं हम पर। उन्होंने ही तो हमारे प्यार को... कहते हुए साहिल शीतल को अपने पास ले आया।

'ईना, मीना, टीना... और मेरी अना साहिल के लिए सब कुछ एक बराबर है!' मनों की दूरी का यह अहसास शबनम ने तब किया जब साहिल ने विवाद का अंत करने की कोशिश में उसे अपने सीने से बिल्कुल सटा लिया था।

साहिल की कोई भी बात मानने का इस बार शबनम का मन न हुआ। मन ने फिर पटखनी दी। बुटीक का नाम उसे आत्म स्वाभिमान का प्रतीक लगने लगा था। और वह उस प्रतीक को आकार लेते देखना चाहती थी।

बुटीक और बुटीक का उद्घाटन उसके लिए गौण होते जा रहे थे।

परिस्थितियाँ कितनी जल्दी बदल जाती हैं। आज से ढाई वर्ष पहले जब उसकी गोद में नन्हीं बेटी आई थी तब उसे देखकर उसके लिए उसका नाम गौण हो गया था और अब जब बुटीक की बारी है तो उसके लिए नाम ही प्रमुख हो गया और बुटीक गौण? यह सजीव और निर्जीव के बीच का भेद है या फिर प्रतिभिज्ञा का!

सोचने लगी तुम्हारे धार्मिक तुष्टिकरण से मैं कब तक संतुष्ट होऊँ।

आखिर मेरा भी कोई वजूद है। मेरा वजूद कब तक समाज सुधार का उदाहरण बनकर पेश होता रहे। मैं जिऊँगी साधारण जिंदगी। आम औरत की आम जिंदगी।

एक तरफ स्वाभिमान का प्रतीक था, दूसरी तरफ अपने प्रिय की अनिच्छा का सम्मान।

स्वाभिमानी स्त्री भी आखिर होती तो स्त्री ही है। फिर अचानक एक मध्यमार्गी विचार ने उसके मस्तिष्क में प्रवेश किया, क्या बिना साईन बोर्ड के बुटीक नहीं चल सकता...

अब बुटीक किसी दुकान में नहीं इसी घर के एक कमरे में खुलेगा। बजट भी घटेगा और विवाद भी।

बुटीक की तैयारियाँ होने लगीं, मास्टर ढूँढ़ लिए गए, मशीनें खरीद ली गईं... देखते ही देखते उस घर के ही एक कमरे में ग्राहकों का ताँता लगने लगा। शीतल ने एक तरफ की दीवार पर लकड़ी के रैक बनवा लिए और दूसरी तरफ हेंगर टाँग दिए। बिना सिले कपड़े रैक में रहा करते और तैयार कपड़े हेंगर में इठलाने लगे।

शीतल का आत्मनिर्भरता का सपना पूरा होकर दिनों दिन बढ़ने लगा था। अब वह साहिल के लिए बुटीक बंद होने के बाद ही समय निकाल पाती थी। ऐसे में उसकी कोई भी बात अब उसे न तो बहुत ज्यादा हर्षाती थी और न ही बहुत ज्यादा चुभती थी। वह अपने काम में मसरूफ थी। इधर काका जी समाज सुधार के निमित्त डोडा प्रवास पर थे।

शीतल के बुटीक से तैयार कपड़ों के चर्चे दूर-दूर तक थे। काम बढ़ता देख उसने घर के साथ लगते एक और घर के दो कमरे और खरीद लिए थे। एक कमरे से शुरू हुई कपड़े सिलने की दुकान तीन कमरों का शानदार बुटीक में तब्दील हो चुकी थी। हेंगर पर टँगे कपड़े अब केशहीन डमियों ने पहन लिए थे।

इस व्यस्तता में कोई पूछता ही नहीं था कि इस बुटीक पर साईन बोर्ड क्यों नहीं है? न शबनम, न शीतल...


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