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कहानी

नागपाश
योगिता यादव


''कृष्ण पक्ष समाप्त हुआ, अब चाँद के घटते जाने की पीड़ा से निजात मिलेगी 'परी'। नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ।"

मेरी जानी पहचानी आवाज ने मुझसे फोन पर बस इतना कहा और यह कहकर फोन रख दिया कि वह एयरपोर्ट पर मेरा इंतजार कर रहा है।

सोडा वाटर की बोतल की तरह मेरे मन में भी नन्हें बुलबुले उठने-फूटने लगे। एक साल से जिसकी सिर्फ आवाज सुन रही थी वही आज सशरीर मेरे सामने उपस्थित होने वाला था। अद्भुत है आवाज का भी जादू।

नौवीं क्लास के फाइनल एग्जाम चल रहे थे। जब मैथ्स का पेपर और एफएम पर आमिर खान का इंटरव्यू दोनों एक ही दिन थे। मजबूरन इंटरव्यू आधा ही छोड़ना पड़ा था। रात साढ़े दस बजे स्लो वॉल्यूम में मैंने एफएम फिर से ऑन कर दिया था, वही इंटरव्यू दोबारा सुनने की कोशिश में। 11 बजे तक चला था इंटरव्यू। इसके खत्म होते ही एफएम पर सांप की तरह मन को जकड़ती एक आवाज ने दस्तक दी।

''मैं हूँ आपका दोस्त, आपका हमदर्द असद इकबाल।" सांत्वना से लबरेज इस आवाज से यह मेरा पहला परिचय था। वह कुछ लम्हों को याद करते हुए उनका दर्द बयाँ करता और फिर उसी से मिलता-जुलता गीत एफएम पर बजा देता। दुखते दिलों को मिलने वाली यह सांत्वना 'यादों के झरोखे से' भली सी लगी थी। अगले दिन मैंने एफएम साढ़े दस बजे नहीं रात ग्यारह बजे ऑन किया।

फिर तो यह मेरा फेवरिट प्रोग्राम बन गया। हर रोज रात को मुझे असद इकबाल की आवाज और यादों के झरोखे से में सुनाए जाने वाले गीतों का इंतजार रहता। माँ के डाँटने पर ईयर फोन लगाकर चुपके-चुपके बिस्तर में असद इकबाल को सुनती। उन दिनों उसकी सांत्वना माँ की थपकियों से भी ज्यादा अच्छी लगने लगीं थीं। उन्हीं थपकियों के सहारे मुझे नींद भी आ जाती। कई बार तो ईयर फोन सुबह के भक्ति गीतों के मंजीरे की आवाज के बाद कान से हटता। तब अपनी बेवकूफी और असद इकबाल की आवाज, मैं दोनों पर फिदा हो जाती।

शहर छूटा तो ये आवाज भी छूट गई। तब जब मुझे सांत्वना और थपकियों की सबसे ज्यादा जरूरत थी दोनों ही मुझसे दूर हो चुके थे। मेरी सिसकियाँ थपकियों का इंतजार करती रह गईं और उन्माद जकड़न के बिछोह में कुम्हलाने लगा। जो गीत असद इकबाल ने सुनाए थे इस नए घर, नए शहर में भी एक बार नहीं कई बार सुने पर उनके बीच से वह जकड़ती हुई आवाज गायब थी जो मुझे जकड़ कर अपने साथ रात से सुबह तक की निर्बांध यात्रा पर ले जाया करती थी।

फिर एक रोज वही आवाज छन्न... से आ गिरी।

मेरी व्यस्त और खुशहाल दिनचर्या में। मेरे भीतर का पानी छलक कर बाहर आने को आतुर हो गया। यह अनुभव की आवाज थी। हू ब हू असद इकबाल जैसी। फोन मैंने ही किया था, उसके उपन्यास पर उसे मुबारकबाद देने के लिए। पर बात कहाँ कर पाई थी। अरसे बाद किसी आवाज ने मुझे फिर से अपनी जकड़ में ले लिया था।

तमाम रेडियो जॉकी से उलट उसकी आवाज शब्दों को चबाती नहीं थी, उन्हें भरपूर खिलने और खेलने का मौका देती थी। किसी दार्शनिक की तरह। शब्दों के बीच में पिरोई चुप्पियाँ सुनने वाले को पर्याप्त धैर्य और सोचने का मौका देतीं।

मैं उसकी आवाज सुनती और फिर घंटों हर शब्द पर सोचती। जादू सिर्फ आवाज का ही नहीं बात का भी था। जादू मेरे सिर चढ़ चुका था।

फिर तो फोन का, एसएमएस का सिलसिला चल पड़ा। पहले छठे-चौमासे, फिर हर महीने, हर हफ्ते, हर रोज और अब तो एक ही दिन में कई-कई बार हमारी फोन पर बात हो जाती या एसएमएस बाजी। वही आवाज थी जो आज मुझसे मिलने आ रही थी। बुक फ्लैप पर उसकी छोटी सी तसवीर भी छपी हुई थी। पर मुझे वह कभी अच्छी नहीं लगी। मेरे कानों के रास्ते जो आवाज मेरे मन की बावड़ी में सीढ़ी दर सीढ़ी उतर गई थी वह बुक फ्लैप पर छपी उस तसवीर से लाख गुना बेहतर थी।

'वो आखिर आ ही रहा है, आज मुझसे मिलने।'

मैंने अपने आप को फिर से यकीन दिलाया। मिले बिना ही हम कितना जानने लगे थे एक दूसरे को। इस बीच कितनी बार उसने मुझसे मिलने के लिए कहा, पर मैं हर बार टाल गई। मुझे कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई उससे मिलने की। मेरी आत्मा को तो उसकी आवाज ठग ले गई थी, चेहरा देखकर 'अगर मैं उस ठगी से बच जाती तो...' अनिष्ट की यही संभावना मुझे उससे मिलने से हर बार रोक लेती। मेरी खोई हुई जकड़ और थपकियाँ फिर वापस आ गईं थी इस आवाज के साथ।

''हमें दूसरों की इच्छा का भी सम्मान करना चाहिए।" आज भी यही सोचकर मैं चली आई थी घर से उस जानी-पहचानी आवाज के आकार से मिलने। सिर्फ इसी सम्मान की खातिर मैं एयरपोर्ट पहुँची हूँ, ऐसा भी नहीं है। उसे देखने की एक स्वाभाविक उत्सुकता मेरे भीतर भी उमड़-घुमड़ रही थी।

हर अंदाज कितना लाजवाब है उसका। चाँद के प्रति मेरे मोह को कितना जान चुका है वह और फिर दस्तक भी किस अंदाज में दी उसने

''चाँद के घटते रहने की पीड़ा से निजात मिलेगी परी।"

'परी' कितना सुंदर संबोधन है। जानती हूँ परी नहीं हूँ, 'परी जैसी' तो बिल्कुल नहीं हूँ, पर सुनने में अच्छा लगता है। झूठा ही सही।

अब तक मैं एयरपोर्ट पहुँच चुकी थी। पार्किंग से लेकर वेटिंग हॉल तक पहुँचते हुए कभी घबराहट, कभी उत्सुकता, कभी खुशी बारी-बारी से मुझ पर चढ़ती और उतरती रहीं। छोटा सा यह रास्ता मैंने इसी उधेड़बुन में तय किया।

वेटिंग हॉल में अकेला बैठा था वह और मैं भी अकेली थी। जितना सोच रहे थे पहचानने में उतनी मुश्किल हुई नहीं।

''जी नमस्कार... कैसे हैं आप... सॉरी मुझे आने में थोड़ी देर हो गई। आप भी अजीब हैं, अगर पहले अपने आने की खबर दे दी होती तो इतना इंतजार तो न करना पड़ता।" मैंने एक ही साँस में कई शब्द उस पर उड़ेल दिए। शब्दों में और बातों में, मैं उसकी तरह अभ्यस्त नहीं थी।

''मैंने सोचा तुम्हें सरप्राइज देना चाहिए।"

''अच्छा सरप्राइज है..."

पहली मुलाकात की औपचारिकता का लिहाज किए बिना ही उसने अपने अंदाज में मेरे सामने खुद का स्वागत करने की पेशकश की -

''तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला... गुनगुनाएँगी नहीं मेरे लिए यह गीत।"

''शटअप, दिन में चाँद नहीं निकलता। अभी निकला कहाँ है, जब निकलेगा तब गुनगुना लेंगे।"

मैंने मित्रता के पूरे अधिकार के साथ उसे झिड़क दिया।

स्त्रियों का सबकुछ चाँद से बंधा होता है। यह उसी का असर था शायद। पिछले एक साल में कितनी ही बार रंग बदल चुकी थी मैं। शुक्ल पक्ष में चाँद का आकार जब बढ़ने लगता तो मेरी आत्मीयता और मोह भी बढ़ता चला जाता। कृष्ण पक्ष के दौरान चाँद को क्षय रोग घेर लेता, मेरा मोह भी इस रोग की गिरफ्त में आ जाता और मैं मन को आहत करने वाली कोई न कोई बात उससे कह ही देती। फिर खुद भी बहुत दुखी होती।

उन पीले दिनों और काली रातों में यही एक शेर बार-बार मैं खुद को सुनाया करती।

             ''तू बड़ा रहीमो करीम है
                 एक सिफत अता कर
                 उसे भूल जाने की दुआ करूँ
                 और दुआओं में असर न हो।"

यह उलाहना मेरी उसी आदत पर दिया जा रहा था। अमावस्या अपनी कालिमा के साथ बीत गई थी और आज शुक्ल पक्ष अपना चाँद लेकर उदित हो रहा था।

''शुक्र है किसी बात पर तो राजी हुईं आप। वरना मुझे लग रहा था कि यहाँ भी मुझे धर्म शास्त्र पर लंबा लेक्चर पिला दिया जाएगा।"

''छोड़िए धर्म शास्त्र की व्याख्या और चलिए मेरे साथ... पहले घर चलते हैं। फिर कहीं घूमने चलेंगे।"

मेरे स्नेह और अधिकारभाव ने उसे बाजू से पकड़कर अपने साथ लगभग घसीट लिया।

''अपने पति देव से पिटवाएँगी मुझे घर ले जाकर, भई इतना बड़ा गुनाह नहीं किया है मैंने। आपको अभी तक सिर्फ परी कहा है, प्रिया नहीं।" मेरे अधिकार पूर्वक घसीटने का विरोध करते हुए उसने कूटनीतिक जुमला उछाल दिया।

''कैसी बातें करते हैं आप?" मैंने उसे झिड़क तो दिया पर उसकी इस बात पर मेरे भीतर क्रोध और उपेक्षा का एक अंश भी जागा। फिर भी स्थिति सँभालते हुए मैंने कहा, ''मेरे सभी मित्रों का वे बहुत सम्मान करते हैं, उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा आपके मेरे साथ घर चलने पर। इतनी छोटी मानसिकता नहीं है उनकी। जरा रुकिए मैं उन्हें फोन कर देती हूँ।"

''फिर भी मेरी इच्छा नहीं है तुम्हारे घर जाने की। मैं यहाँ बस तुमसे मिलने आया था, सो मिल लिया। अब मुझे लौटना है।" मेरे बहुत आग्रह करने पर उसने टका सा जवाब दे दिया।

इतने लंबे इंतजार के बाद इतनी छोटी सी मुलाकात से मैं संतुष्ट नहीं थी। और चाहती थी कि हम ढेर सारी बातें करें।

''अजीब हैं आप भी, इतनी दूर से सिर्फ एयरपोर्ट के दर्शन करने आए थे क्या, अच्छा छोड़ो घर नहीं जाते, कहीं बैठकर कॉफी पीते हैं। बहुत सुंदर शहर है हमारा, अगर देखने की इच्छा हो तो कॉफी के बाद घूमा जा सकता है।" इस बात पर वह राजी हो गया।

''अरे मैं आपको एक चीज देना तो भूल ही गया, जरा एक मिनट रुकिए।"

कहते हुए अनुभव ने अपना ब्रीफकेस खोला और उसमें से रजनीगंधा के ढेर सारे फूल निकालकर मेरी दोनों हथेलियाँ भर दीं।

असद इकबाल की आवाज, बच्चों की गुलाबी अँगुलियाँ, शाम की नारंगी छटा और पत्तियों पर ठहरी हरी ओस की बूँदों के अलावा यह वही चीज थी जो मुझे बहुत पसंद थी। रजनीगंधा के फूल।

फूलों की मादक गंध और छुअन मेरे भीतर उतरती चली गई। एक अलग मोहपाश में बंधी मैं और अनुभव, दोनों कैफेटेरिया की तरफ चल पड़े।

***

बातें बहुत थीं। एक कप की बजाए हमने दो-दो कप कॉफी पी। कॉफी अनुभव की थकान उतार रही थी और मुझे इसी बहाने उसके हाव भाव पढ़ने का मौका मिल रहा था। बची-खुची औपचारिकताएँ भी अब लगभग समाप्त होने लगीं थीं।

''यूँ तो यह मंदिरों का शहर है, पर आपका भी तो कोई आग्रह होगा। अच्छा बताओ कहाँ चला जाए, क्या देखना पसंद करेंगे?" मैंने आगंतुक की इच्छा का सम्मान करते हुए हॉस्पिटेलिटी दिखाने की कोशिश की।

''परी, मेरा 'तुम्हारे' अलावा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। मैं तो यहाँ सिर्फ 'तुमसे' मिलने आया हूँ, जो 'तुम्हें' पसंद हो वही दिखाओ...।" तुम्हारे, तुमसे और तुम्हें शब्दों पर अतिरिक्त जोर देते हुए उसने कहा।

''मुझे शाम बहुत पसंद है, पर शाम में अभी देरी है। उसके अलावा... उसके अलावा मुझे जल राशि बहुत पसंद है। (मैंने थोड़ा सोचते हुए जवाब दिया)

फिर चाहे वह कच्ची पक्की सीमाओं में बंधी तालाबों की नियंत्रित जल राशि हो या पहाड़ों से मुक्त होने को संघर्ष करती झरनों की अनियंत्रित जल राशि। नदियाँ तो मेरी आराध्य हैं।" गंध और छुअन के मोहपाश और उसके आग्रह को ग्रहण करते हुए मैंने किसी सूत्रधार की तरह अपनी बात आगे बढ़ाई।

''तब तो यहाँ की नदी से ही मिला जाए..." वह मेरा रुख समझ चुका था।

मैंने गाड़ी स्टार्ट की और सर्कुलर रोड से होते हुए हम पीरखोह मंदिर के पास पहुँच गए। यहाँ पहुँचकर मैंने गाड़ी रोक दी। और एक रचनाकार की सौंदर्य दृष्टि उसमें खोजने की कोशिश करते हुए सवाल किया।

''आपको नदी सिर्फ देखनी है या उससे मिलना भी है..."

''मैं जीवन को समग्रता में जीना चाहता हूँ, इस लिहाज से नदी से मिलना ही उचित रहेगा। देखना तो कभी भी हो सकता है।" किसी दार्शनिक की तरह उसने भी जवाब दिया।

''तो फिर तैयार हो जाइए आगे का सफर पैदल ही तय करना पड़ेगा।" गाड़ी से उतरते हुए मैंने उसे आगे की राह के लिए तैयार किया।

कुछ रास्ता पक्की सड़क का था और आगे कच्ची पगडंडी शुरू हो चुकी थी। तवी से पत्थर ढोने वाले खच्चरों के पैरों के निशान से पगडंडी अलग पहचानी जा रही थी। यहाँ से होते हुए हम दोनों तवी के किनारे पहुँच गए।

मौसम बसंत का था पर तवी पर उदासी छाई हुई थी। उसे भी किसी का इंतजार था शायद... किनारे उससे दूर होते जा रहे थे।

''परी... यही नदी है तुम्हारे पास?" अब तक उसका मेरे लिए संबोधन 'आप' से बदलकर 'तुम' हो चुका था।

''क्यों.. क्या आपको यह अच्छी नहीं लगी। एक्चुअली बारिश नहीं हुई है न बहुत दिनों से... आपको नहीं पता, यह हमारे शहर की लाइफ लाइन है।" मैंने हैरान और लगभग आहत होते हुए अपनी और नदी की स्थिति स्पष्ट करनी चाही। परंतु वह पत्थरों से अटे उसे थोड़े से पानी को नदी मानने को तैयार नहीं था।

''होगी, जरूर होगी, परंतु हे देवी, मेरी आत्मा नहीं मानती कि मैं इसे नदी कहूँ..." उसने मजाक किया पर मुझे चुभ गया।

''नदियाँ सिर्फ देखने के लिए नहीं होतीं अनुभव, वे मानने के लिए भी होती हैं। एक ही नजर में तुम इसके होने और न होने का फैसला कैसे कर सकते हो। अभी तो तुम्हारी इससे पहली ही मुलाकात है...।

मैं किसी परदेसी को यह अधिकार भी नहीं देती कि वह मेरी नदी का मजाक उड़ाए।"

''तुम नाराज क्यों हो रही हो, पर सच मानो अगर यह वाकई नदी है तो इसकी हालत बहुत दयनीय हो गई है। यह सूखने लगी है, इसे नए जीवन की जरूरत है। अगर लाइफ लाइन है तो कुछ सोचो इसके बारे में।"

''जानते हो अनुभव प्रीत और नदी कभी नहीं सूखते। ये तो बस कुछ एनवायरमेंटल इफैक्ट्स होते हैं जिससे वह सूखी हुई दिखने लगती है। घटाओं के पहाड़ों से टकराने भर की देर है, कि नदियाँ मदमस्त हो जाती हैं। मतवाली लहरें मिलन का वह संदेसा दूर-दूर तक पहुँचा आती हैं। तभी तो सारी सभ्यताएँ नदियों के ही किनारे फली- फूलीं।" मुझ पर दर्शन और आत्मीयता हावी होने लगी थी।

''पर मुझे लगता है कि प्रीत में स्थायित्व भी होना चाहिए। तुम्हारे पास कोई ऐसी नदी नहीं है जो स्थायी हो... जो अब तक सूख न पाई हो, वो तुम्हारे बताए एनवायरमेंटल इफैक्ट्स के कारण।"

तुम्हारे पास सौंदर्य दृष्टि तो है अनुभव पर आत्मिक अनुभूति नहीं है। मैंने उसकी अब तक की तमाम भावनात्मक रचनाओं को धता बताने की कोशिश की। सहसा मेरे भीतर के मेहमाननवाज ने मुझे रोक लिया।

''खैर छोड़ो, चलो तो तुम्हें प्रेम के अमर प्रतीक के पास लिए चलते हैं। कितनी ही पीढ़ियाँ गुजर गईं, पर वह अब तक नहीं सूखी। लेकिन पहले कुछ खा लिया जाए। वहाँ पहुँचने में थोड़ी देर लगेगी।" हम दोनों अभी एक दूसरे के साथ और समय बिताना चाहते थे। तवी और उस पर पसरी उदासी को पीछे छोड़ते हुए हम दोनों आगे बढ़ गए।

***

हम दोनों ने पहले लंच किया और फिर हम अखनूर की तरफ निकल गए। दोनों तरफ पेड़ों से घिरा रास्ता अनुभव को भला लग रहा था। ठंडी शीतल बयार उसे सुखद अनुभूति का निमंत्रण दे रही थी।

''वाह... इसे कहते हैं नदी..." दूर पुल पर से चिनाब की लहरें देखते ही वह अभिभूत हो गया। 'कौन सी नदी है ये?"

''चिनाब... दरिया चिनाब..." मैंने पुरजोर गंभीरता, आत्मीयता और बड़प्पन से जवाब दिया। जैसे कोई अपनी सयानी हो रही बेटी की प्रशंसा सुनकर उसका नाम बताता है।

मेरे बाल बार-बार उड़कर मेरे गालों पर आ रहे थे। चिनाब की लहरें मेरे पास रखे रजनीगंधा की खुशबू और छुअन से जल्द से जल्द मिलने को आतुर हो रहीं थीं। मैंने उन्हें नजरों में भरकर गुनगुनाना शुरु किया,

''सोहनी चिनाब दे किनारे ते पुकारे तेरा नाम... आजा... आजा..."

मेरा गला बहुत अच्छा नहीं था पर फिर भी गुनगुनाते हुए इस सुंदर दृश्य में सुर की संगत बन पड़ी।

''क्यों है न खूबसूरत..."

''सचमुच बहुत खूबसूरत है। ऐसा दरिया सामने हो तो कौन न डूब जाए।"

''शुभ-शुभ बोलो, डूबने-वूबने की बातें न करो। इसकी इन्हीं आकर्षक लहरों में ही कहीं शोक भी डूबा है।" मैंने पिछले दिनों हुई ट्रक और बस दुर्घटनाओं के बारे में बताते हुए उसे चिनाब से सावधान रहने की भी हिदायत दी।

किनारे तक पहुँचते हुए शाम घिर आई थी। चिनाब की सुरमई लहरें शाम को आईना दिखा रहीं थीं। चिड़ियों के कलरव ने मेरा साथ दिया और दृश्य अपने पूरे शबाब पर नव आगंतुक को रिझाने लगा। ऐसे माहौल में कविता से बेहतर और क्या हो सकता था-

          शाम जरा तुम ऐसे ढलको
               कि रातें गजल हो जाएँ
               रोम रोम सब शीशमहल
               और हम तुम अवध हो जाएँ
               लिख दूँ होंठों पर कविताएँ
               मिलना तेरा निबंध हो जाए।

दुपट्टे को सँभालते हुए, उड़ रहे बालों को कानों के पीछे करते हुए मैंने शायराना मूड में कहा।

''वाह...वाह... वाह...वाह... तो शायरी भी कर लेती हैं आप।" मेरी टूटी-फूटी पंक्तियों पर दाद देते हुए उसने एक काबिल श्रोता होने का फर्ज अदा किया।

''वाकई बहुत आकर्षक है।"

''क्या?", मैंने सकुचाने और इठलाने के मिश्रित भाव के साथ सवाल किया।

''दरिया भी और आपकी शायरी भी। नदी और प्रीत के तमाम तत्व हैं इन दोनों में, पढ़ने के साथ-साथ लिखने का भी शौक है आपको।"

''अरे नहीं, यूँ ही कहीं किसी किताब में पढ़ीं थीं।" अपनी ही पंक्तियों को चुराया हुआ बताकर मैंने बचने की कोशिश की।

''वो भूरी दीवारों का खंडहर कैसा है...?" शाम और हमारी मुलाकात दोनों एक दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ रहे थे।

''उसे अखनूर का किला कहते हैं। कहते हैं कि कभी राजा विराट की नगरी हुआ करती थी अखनूर। और अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहाँ शरण ली थी। यहीं पर तो अर्जुन उत्तरा को नृत्य सिखाया करते थे।"

''और अब कोई उत्तरा आती है यहाँ पर पायल की रुनझुन लिए..."

उसने फिर मुझे बहलाने की कोशिश की और मैंने हल्की मुस्कान के साथ बात टालने की।

हम फिर चिनाब की तरफ आ रहे थे।

''क्या हम इसके किनारों तक जा सकते हैं, बहुत विशाल लगती है ये"

''विशाल है और खतरनाक भी, जो इसमें डूबा आज तक नहीं मिला"

''पर कच्चे घड़े पर टिका विश्वास तो पक्का था।"

''इसलिए तो अमर हो गया।"

हम और हमारे सवाल-जवाब चलते हुए चिनाब के किनारे तक पहुँच गए। यह जिया पोत्ता घाट था।

''क्या यहीं सोहनी-महिवाल एक हुए थे?"

''नहीं वह हिस्सा अब पाकिस्तान में है। सरहदों ने सब कुछ बाँट लिया, पर नदियाँ कहाँ बँटेंगी।

चलो घाट पर कुछ देर बैठते हैं। शाम होने लगी थी, चिनाब के किनारे ठंडी हल्की बयार में हम दोनों ने ढेरों बातें कीं। रजनीगंधा के फूल इन बातों में महक घोल रहे थे।

''मैं तुम्हारे लिए अपनी किताब भी लेकर आया हूँ। तुम इसे पढ़ना, मुझे जानने में तुम्हें और मदद मिलेगी।"

''इतना ज्यादा जानकर भी क्या करना है", मैंने अपने आप से ही सवाल किया। फिर सँभलते हुए उसे वापस दृश्य में खींच लाई।

''जानते हो इस घाट का नाम जिया पोत्ता घाट है। यहीं महाराजा रणजीत सिंह ने जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह का राजतिलक किया था। वह राजतिलक भी बड़ा अनूठा था।

महाराजा रणजीत सिंह ने महाराजा गुलाब सिंह के माथे पर नीचे से ऊपर की ओर नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे की ओर तिलक किया था।"

''उल्टा तिलक, पर क्यों?" यह पूछते हुए उसकी आँखों में बच्चों जैसी उत्सुकता थी। मैंने उनमें गुलाबी अँगुलियाँ ढूँढ़नी चाहीं, पर उनमें चिनाब में डूबता नारंगी सूरज नजर आ रहा था।

डूबते सूरज को उसकी आँखों में देखकर मैंने जवाब दिया, ''इस तिलक के साथ ही उन्होंने महाराजा गुलाब सिंह को यह संदेश दिया कि तुम एक पहाड़ी राज्य के राजा हो। तुम्हारा साम्राज्य इतना विस्तार पाए कि वह पहाड़ से पाताल तक जाना जाए।"

''अरे वाह, इंटेलीजेंट महाराजा थे रणजीत सिंह"

''हाँ और महाराजा गुलाब सिंह ने यह कर दिखाया।"

''तब तो मेरा राजतिलक भी यहीं होना चाहिए..." कहते हुए अनुभव खिलखिला कर हँस पड़ा। उसकी हँसी लहरों की तरह अनुशासनहीन थी।

''छोड़ो राजतिलक, तुम्हें उससे क्या। तुम तो शब्दों के बाजीगर हो, उसी में कमाल दिखाना। वो अपनी किताब तो दो जरा..."

''क्यों क्या अभी पढ़ने का इरादा है, मैं बहुत बोर कर रहा हूँ क्या?"

''दो ना..., तुम सवाल बहुत पूछते हो।"

''वह ब्रीफकेस में है, उसके लिए वापस गाड़ी तक जाना पड़ेगा।"

''तो जल्दी जाओ। ये लो चाबी, मैं तुम्हारा यहीं इंतजार करती हूँ।"

थोड़ी ही देर में अनुभव ने किताब लाकर मेरे हाथ में पकड़ा दी।

मैंने किताब को पहले माथे से छुआ, फिर उसके हाथों से और फिर घाट की कुछ और सीढ़ियाँ उतर कर उसे चिनाब में प्रवाहित कर दिया।

''ये क्या किया परी?" उसने अचंभित दृष्टि से मेरी ओर फिर उस बहती हुई किताब की तरफ देखा।

''तुम लेखक हों न, तख्तो ताज का क्या करोगे? मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी सृजनात्मकता दूर-दूर तक फैले। चिनाब की लहरों की तरह, देश और युगों की सीमाएँ तोड़ती जाए।

इसलिए मैंने तुम्हारी रचनाएँ चिनाब को समर्पित कर दीं हैं। अब इसकी लहरें जहाँ भी जाएँगी तुम्हारी रचनाओं की खुशबू वहाँ तक फैल जाएगी।"

295 पेज की वह सुनहरी किताब जलपाखी की तरह तैरती हुई दूर निकल गई।

''वाह... कमाल हो परी, मुझे कभी ये आइडिया क्यों नहीं आया।" तैरता हुआ जलपाखी अपने साथ लेखकीय डेकोरम भी बहा ले गया। उसके हृदय का हल्कापन उसकी आँखों से बाहर आ गया और वह कुछ ही क्षणों में उसके पूरे चेहरे पर फैल गया।

''चलो हम दोनों भी इसमें कूद जाते हैं, फिर हम भी अमर हो जाएँगे।"

''दिमाग खराब है क्या तुम्हारा, अगर ये मजाक है तो दोबारा मत करना।" मैं चिनाब की लहरों से जितना प्यार करती थी उनसे खौफजदा भी उतनी ही थी।

''मजाक नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ परी और तुम सीमाओं में बंधी हो, सच बताओ क्या तुम्हारा कभी मन नहीं करता कि एक बार मेरे गले लग जाओ..."

अनुभव के इस सवाल के साथ ही आसपास के सभी दृश्य थम गए।

''...चुप, फिर वही चुप... कुछ तो जवाब दो।"

''मेरे पास कुछ नहीं है अनुभव तुम्हें देने के लिए।" सात दरवाजों के भीतर से ये कुछ शब्द बाहर आ गिरे।

''देना... देना... देना... जाने औरतों को क्या आदत होती है सिर्फ देते रहने की, जैसे उन्हें तो कुछ लेना ही नहीं होता।"

''मतलब...? " सवाल था या ताना, पर जो भी था मेरे दिल में नश्तर उतार गया।

''मतलब कुछ नहीं। जाओ कुछ नहीं चाहिए तुमसे। तुम बँटी हुई हो, अभी मुक्त नहीं हो पाओगी।"

''नहीं कुछ तो है, तुम कुछ तो कह रहे थे। बहुत आसान होता है तुम्हारे लिए कुछ भी कह लेना। पर मेरे लिए नहीं... मैं सीमाएँ नहीं लाँघती अनुभव। तुम मेरी भावुकता का गलत अर्थ लगा रहे हो।"

''तुम मुझे नहीं समझ पाए, नदी को क्या समझोगे", कहते हुए चिनाब की लहरें मेरी आँखों से बहने लगीं।

हम दोनों के बीच खामोशी पसर गई।

तभी मोबाइल बजने लगा

...मोबाइल की रिंग टोन ने माहौल कुछ बदला। फिर भी मैं फोन सुनने की स्थिति में नहीं थी। पहले मैंने उसे काट देना चाहा पर फोन वैभव का था।

आँसुओं का खारापन अपनी आवाज से छिटकाते हुए मैंने सामान्य होने की कोशिश की और कॉल रिसीव की

''हाँ, हैलो"

''...कहाँ हो सीमा, माँ कह रही थी कि कोई तुमसे मिलने आया है, दोपहर तक लौट आओगी। अब शाम होने लगी है। कहाँ हो तुम?"

''हाँ, बस उन्हीं के साथ हूँ, थोड़ी देर में पहुँचती हूँ।"

''माली आया है, तुमने उससे रजनीगंधा का कोई पौधा मँगवाया था क्या?"

''हाँ मँगाया था, क्या ले आया...?"

''लाया तो है, पर कहाँ लगवाना है, लॉन में तो कोई जगह खाली है ही नहीं।"

''एक गमला है न खाली, वहीं रखा है, उसमें लगवा दीजिए। मैं बस थोड़ी देर में पहुँचती हूँ।"

''गमले के लिए तो उसने पहले ही मना कर दिया... कह रहा है गमले में नहीं हो पाएगा। इसे रखरखाव चाहिए। अगर लगाया भी तो फूल बहुत छोटे आएँगे।"

''कैसा माली है ये, क्या जिनके पास लॉन नहीं होता, वो फूलों का शौक नहीं रख सकते। उससे कहो, ले जाए वापस अपना रजनीगंधा, मुझे नहीं चाहिए।"

''उसे तो कह दूँगा, पर तुम कब आओगी। शाम हो गई है, मंदिर में जोत भी करनी है। माँ नाराज हो रही है।"

''हाँ बस थोड़ी देर में पहुँच रही हूँ।" कहते हुए मैंने फोन काट दिया।

''सॉरी, वो उनका फोन था।" घर के लॉन से वापस चिनाब के किनारे पर लौटते हुए मैंने कहा।

''नो इट्स ओके।"

''अब मन ठीक है न आपका?"

''हाँ, बिल्कुल। पर सचमुच मेरे पास कुछ नहीं है तुम्हें देने के लिए।"

''अरे कहा न कुछ नहीं चाहिए तुमसे।"

''पर मुझे कुछ चाहिए तुमसे।", कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी छुअन गुनगुनी थी।

''कहो, क्या चाहिए।" उसने सहलाते हुए सवाल किया।

''कुछ नहीं, बस तुम्हारी मित्रता चाहती हूँ। मैं नहीं चाहती कि हमारा संबंध कोई कटु मोड़ लेकर खत्म हो। मैं चाहती हूँ कि आप हमेशा मेरे मित्र बने रहें।"

मेरे हाथों को और मजबूती से पकड़ते हुए उसने लंबी साँस ली और कहा -

''जाओ किया वादा, अनुभव एक बार जिससे वादा करता है, जीवन भर उसकी कलाई नहीं छोड़ता।

तुम भले न आओ, पर जब भी मुश्किल में होगी मुझे अपने सामने खड़ा पाओगी।"

''अब तुम लौट जाओ अनुभव। मेरे पास तुम्हें देने के लिए ही नहीं, तुम्हारा दिया कुछ सहेजने की भी जगह नहीं है।" कहते हुए मैंने रजनीगंधा के फूल वापस अनुभव के हाथों में थमा दिए।

''घर चलने को कहूँगी तो तुम मानोगे नहीं, यहाँ चिनाब के किनारे पर पास ही में एक फकीर की कुटिया है, तुम चाहो तो रात वहाँ गुजार सकते हो। सुबह तुम्हारे जाने का सब बंदोबस्त हो जाएगा। और कुछ दिन ठहरना चाहो तो... मना नहीं करेगा फकीर... लहरों की भाषा पढ़ने में माहिर वह तुम्हारे मन को कुछ शांति देगा। अब मुझे इजाजत दो... मुझे अपने मंदिर में जोत जगानी है। मेरा परिवार मेरा इंतजार कर रहा है।"

''जा रही हो परी? जाते-जाते मुझ पर एक अहसान करोगी?" सब कुछ जानते हुए भी उसने सवालों का एक जोड़ा मेरी तरफ बढ़ा दिया।

''हाँ कहो न, मेरे वश में हुआ तो जरूर करूँगी।" हारे हुए योद्धा की तरह मैंने फिर से अपने आप को सँभालते हुए कहा

''ये फूल, ये खुशबू मैं तुम्हारे लिए लाया था, तुम्हारे बिना मेरे लिए इनका कोई अर्थ नहीं। इन्हें भी यहीं चिनाब में बहा दो, मैं मान लूँगा कि मेरा प्यार अमर हो गया। और यह मुलाकात भी।"

***

मैंने इस मुलाकात की उसकी अंतिम इच्छा का पूरे हृदय से सम्मान किया। रजनीगंधा के फूल चिनाब में बहाकर मैं अपने घर लौट आई। घर आकर मंदिर में जोत जगाई। पीले दिन, पीली उदासी और आते हुए उसके चेहरे का पीलापन सब जोत में उतर आया। माता की लाल ओढ़नी पर लगा पीला गोटा मुझे आज से पहले कभी इतना पीला नहीं लगा था। लगा कि ये मेरे जीवन की लालिमा ही निगल लेगा।

मैंने पीले पन को चुनौती देते हुए आरती की थाली में रखी रोली में अँगुली डुबोई। माँ दुर्गा की मूर्ति के ममतामयी चेहरे को निहारते हुए उसके माथे पर रोली से लाल टीका लगाया। मुझे याद आया शून्य मस्तक से पूजा नहीं करनी चाहिए, आज मैं जल्दबाजी में बिंदी लगाना ही भूल गई थी। एक और अँगुली डुबोकर रोली से मैंने अपने माथे पर गोल बिंदी बनाई और बची हुई रोली को माँग में जगह दे दी।

***

जीवन का चरखा अपनी उसी ताल से दिन रात कात रहा था। जकड़न भरी आवाज से मैंने यथासंभव दूरी बना ली। कभी कभार अनुभव का फोन आता, पर दोनों ओर से औपचारिकता का अंश अधिक रहता। मित्रता का भाव दर्शाते हुए वह मेरे परिवार, मेरी दिनचर्या के बारे में भी एक आध सवाल पूछ लेता। और मैं भी उसी भाव से उनका एक आधा उत्तर दे देती।

हमारी शादी को तीन साल हो चुके थे। आज उसी की पार्टी थी। कितने खुशनुमा थे ये तीन साल। वैभव ने कभी किसी चीज की कमी महसूस ही नहीं होने दी। फिर भी इन्हीं खुशनुमा दिनों की यादों में एक याद चिनाब के किनारे की शाम की भी थी। नारंगी सूरज के ढलने के बाद अनुभव के चेहरे पर उतरे पीलेपन की भी थी। उसी याद में एक अंश रजनीगंधा के फूलों का भी था। मेरे घर के लॉन में आज भी रजनीगंधा का कोई पौधा नहीं था।

क्या माली ने सोच-समझकर कहा था, या उसके अनुभव ने उससे यह अनायास ही कहलवा दिया था, ''बड़ा रखरखाव चाहता है, गमले में पूरा नहीं खिल पाएगा यह फूल।"

और मेरे पास कोई खाली जगह नहीं थी। लॉन की तरफ निहारते हुए मैंने अपने आपसे कई सवाल किए और खुद ही खुद को असद इकबाल की तरह दिलासा दी।

मैं भी पता नहीं बैठे-बैठे क्या सोचती रहती हूँ, खाली दिमाग शैतान का घर। आज हमारी वेडिंग एनीवर्सिरी है और मैं आज भी न जाने क्या-क्या सोच रही हूँ। शाम की पार्टी की तैयारी करते हैं।

तभी मोबाइल की घंटी बजने लगी, स्क्रीन पर अनुभव का नाम टिमटिमा रहा था।

''हैलो"

''जी नमस्कार।"

''नमस्कार, कैसी हैं आप?"

''अगर मैं गलत नहीं हूँ तो शायद आज आपकी वेडिंग एनीवर्सिरी है?" उसने शंका दूर करने की चेष्टा से सवाल किया। पर उसे कैसे मालूम, मुझे संदेह हुआ। उससे बात करते हुए मैंने उसे न जाने क्या-क्या बता दिया था मुझे खुद याद नहीं था।

''जी नहीं आप बिल्कुल गलत नहीं हैं। आज ही हमारी वेडिंग एनीवर्सिरी है।"

''हमारी तरफ से आपको और वैभव जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मैंने सोचा था कि आप दोनों के लिए कोई तोहफा खरीदूँ, पर फिर लगा पता नहीं आप लेंगी भी या नहीं, हमारी दी हुई चीजों के लिए तो आपके पास जगह ही नहीं होती।" इस बार उसके ताने में बच्चों जैसा खिलंदड़पन नहीं था। उसमें मातमी गंभीरता थी।

''नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, तोहफे की भला क्या जरूरत। दोस्तों की शुभकामनाएँ ही बहुत होती हैं।

थैंक यू सो मच।" कहते हुए मैंने फोन रख दिया। फोन तो रख दिया पर उसकी मातमी आवाज का ताना मेरी देह से चिपक गया। इससे छूटने का जब कोई जतन मुझे न सूझा तो मैंने बाथरूम में जाकर शावर लेना ही बेहतर समझा। शॉवर की नन्हीं बूँदें बेरोकटोक मुझ पर बरसने लगीं। मैं आँखें बंद किए उनमें डूब जाने की कोशिश कर रही थी। मेरी आँखों के सामने फिर जलपाखी की तरह लहरों पर सवार उसकी किताब तैरने लगी। मैंने चेहरे को झटकते हुए शावर बंद कर दिया और खुद को टावल से पोंछते हुए नाइटी पहन ली। नाइटी का सलेटी रंग मुझे बार-बार न जाने क्यों तवी के उदास पत्थरों की याद दिला रहा था।

माँ ने कितनी बार टोका था मुझे इस तरह के रंग खरीदने पर। उनका मानना था कि खूबसूरत रंग पहनने से मन खिला खिला रहता है। और सौभाग्यवती स्त्रियों को इन उदास रंगों से दूर ही रहना चाहिए।

सासू माँ की सलाह याद आई और अब तक शाम भी हो चुकी थी। पार्टी के लिए तैयार होना था। मैंने अपना ध्यान वैभव की दी हुई खुशियों की तरफ लगाने की कोशिश की। याद आया उनका दिया तोहफा तो मैंने अब तक खोला ही नहीं। कितनी लापरवाह हो गई हूँ मैं। सोचते हुए पैकेट खोला तो उसमें से एक खूबसूरत साड़ी निकली। साड़ी पर लगे सितारों की जगमगाहट मुझे वैभव के प्रेम में डुबाने-उतराने लगी।

मुझे और वैभव दोनों को ही सादगी बहुत पसंद थी, फिर भी मैं आज खूब मन लगाकर तैयार हुई।

घर के बाहर से वैभव ने गाड़ी का हॉर्न बजाना शुरू किया, मैं झट से पर्स उठाकर गेट से बाहर आ गई। और कार का दरवाजा खोलते हुए वैभव के साथ वाली अगली सीट पर बैठ गई।

वैभव ने नजर भरकर मुझे देखा, ''लुकिंग स्मार्ट..., नारंगी रंग वाकई तुम पर बहुत खिलता है।"

दुर्घटना से बचने के लिए जैसे अचानक ब्रेक लगता है मेरी तंद्रा उसी वेग के साथ टूटी, ''क्या ये साड़ी नारंगी रंग की है?" गाड़ी के शीशे में देखते हुए मैंने अपने आप से सवाल किया। वहाँ मुझे अनुभव की आँखों में डूबता हुआ नारंगी सूरज दिख रहा था।

***

सूरज डूब चुका था। शहर के सबसे शानदार पार्टी लॉन में रखी थी वैभव ने मेरे लिए पार्टी।

तामझाम के हिसाब से बड़ी शानदार पार्टी कही जा सकती थी। किसी को भी बाँध लेने के तमाम इंतजाम थे इस पार्टी में, पर मुझे यहाँ मौजूद हर रंग चिनाब की शाम की तरफ धकेल रहा था। और डूबता हुआ नारंगी सूरज तो मुझसे बिल्कुल लिपटा हुआ था।

सुनहरी रोशनी में हजारों हजार जलपाखी तैरते मालूम हो रहे थे। ये कौन सा चक्र था जो मेरे आसपास घिर आया था। मैं इससे बाहर क्यों नहीं हो पा रही थी? सोचते सोचते चिनाब के किनारे के उस फकीर के शब्द बार-बार मेरे मन के दरवाजे पर दस्तक देने लगे -

                ''सुन्ने दी पालकी इच तुस इन्ने दुआस की
                    चेते ते नेईं आवें करदे कन्ने दे ओ कोकलू"

मैंने पर्स से मोबाइल निकाला, अनुभव का नंबर डायल किया। लगातार रिंग जाती रही, पर उसने कॉल रिसीव नहीं की। फोन कट गया।

मैंने नंबर रिडायल किया, फिर वही रिंग जाने का लंबा सिलसिला, फिर किसी ने कॉल रिसीव नहीं की। फिर फोन कट गया। मैंने झुँझलाकर मोबाइल वापस पर्स में रख लिया।

मेरे भीतर के जल थल की हलचल से अनजान वैभव ने मेरा हाथ पकड़कर डांसिंग फ्लोर पर खींच लिया... और हम खूब नाचे।

एक अजब बीमारी ने मुझे घेर लिया था। मेरे चारों तरफ सिर्फ एक ही शख्स था, हर तरफ उसी की गंध और उसी के रंग थे। जिन्हें छू पाना मुश्किल था, और उनसे बच पाना और भी ज्यादा मुश्किल।

मेरी और वैभव की दुनिया में अनुभव ने खामखाह डेरा डाल लिया था। जैसे सविनय अवज्ञा आंदोलन पर हो।

रसोई में जाकर कुछ बनाने लगती तो उसका दो अँगुलियाँ चाटते हुए चटखारे लेना याद आ जाता। फिर वही बनाती जो उसे पसंद था। आटा गूँथते हुए उसकी हथेलियों की गुनगुनी पकड़ याद आ जाती।

वैभव के लिए खाना परोसती तो अनुभव का चेहरा सामने आ जाता।

'पता नहीं उसने अब तक कुछ खाया भी होगा या नहीं।'

खाली वक्त मिलते ही अनुभव की लिखी किताबें पढ़ना शुरू कर देती। उसकी किताबों के सब चरित्र मुझे अपने से जान पड़ते, किसी का प्रेम मुझ जैसा लगता, किसी का अहंकार। किसी के भाव मुझ जैसे लगते तो किसी का अंदाज। कई बार तो उन्हीं की तरह मैं व्यवहार भी करती।

शाम को लैपटॉप पर उसकी साइट देखती, फेसबुक पर उसका चेहरा देखकर उसके फेन्स की लिस्ट और कमेंट पढ़ती।

अजब सतरंगी दुनिया थी, खुद की बुनी गुनी।

आज भी पूरी शाम मैंने अनुभव को खूब याद किया। इतना कि मुझे पता ही नहीं चला कि रात कब हो गई। सातवीं बार उसका उपन्यास पढ़ने की कोशिश कर रही थी। तब जबकि मुझे याद हो चुका था कि कब, कौन सा पात्र क्या कहेगा और क्या करेगा। पात्र जब किताबों से निकल कर मेरे दिमाग पर चढ़ बैठते तो मैं क्षितिज में निहारने लगती और घंटो निहारती ही रहती...

''अरे आप आ गए..." वैभव ने मेरे कंधे को हिलाते हुए मेरा ध्यान भंग करने की कोशिश की तो मैंने चौंकते हुए कहा।

वैभव के घर पहुँचने पर मैं हैरान रह गई और मुझे अंदाजा हुआ कि मैं कितनी देरे से यूँ ही अनुभव की किताब हाथ में लिए बैठी हूँ। शाम की चाय भी ठंडी होकर पानी हो चुकी थी।

''पानी" मुझे याद आया घर लौटते ही वैभव सबसे पहले नींबू पानी पीते हैं। मैं झट से रसोई में वैभव के लिए नींबू पानी बनाने चली गई।

'समय का चरखा आजकल दिन कातता नहीं था, चबा रहा था। पता ही नहीं चलता था कि कब दिन ढला और कब रात हो गई।' काम खत्म करने के बाद बैडरूम में आते हुए मैंने महसूस किया।

जाने क्यों आज अनुभव बड़ी शिद्दत से मुझे याद आ रहा था।

मैं बार-बार मोबाइल देखती, इस लालसा के साथ कि वह फोन करेगा और पूछेगा 'कैसी हो परी...' इधर चिनाब वाली शाम के बाद से उसने मुझे एक बार भी 'परी' नहीं कहा था। जाने क्या समझा दिया चिनाब किनारे के फकीर ने उसे।

बत्ती बुझाकर मैं तकिया खींचते हुए वैभव की बगल में लेट गई। आँखे बंद की तो रजनीगंधा के फूल चाँद की तरह टिमटिमाने लगे। आँखें खोली तो कमरे में वहीं घुप्प अँधेरा ठहरा हुआ था। मैंने फिर आँखें मूँद ली। रजनीगंधा के फूल फिर खिलखिलाने लगे।

वैभव ने प्यार से मेरा गाल सहलाया, मुझे उनमें वही गुनगुनी छुअन महसूस हुई जो अनुभव का हाथ पकड़ने के बाद से अकसर आटा गूँथते वक्त महसूस हुआ करती थी। मैंने फिर आँखें खोलीं, अँधेरे में वैभव की आँखें चमक रहीं थीं। मैंने फिर आँखें मूँद लीं। अब उनमें डूबता हुआ नारंगी सूरज दिखाई दे रहा था।

वैभव की दोनों बाँहें मुझे चिनाब के किनारे सी लग रही थीं, जिनके बीच मैं रजनीगंधा के फूलों की तरह बही जा रही थी, साथ में थी अनुभव से मुलाकात की गंध, उस गंध का प्रेम और उस प्रेम का रस।

उसके चारों तरफ अनुभव के अलावा और कुछ नहीं था, न वैभव, न अँधेरा, न कोई इनकार।

''क्या तुम्हारा कभी मन नहीं करता कि एक बार मेरे गले लग जाओ।" सात तालों में बंद, सात रंगों की सात तहों में, सात सूतों में उलझा वह एक सवाल हौले से मेरी देह में सिहरन पैदा कर गया।

वैभव को अपनी बाँहों में जकड़ते हुए मैं भरपूर वेग के साथ अनुभव के गले लग गई।

***

इसी सतरंगी दुनिया में एक रंग मेरे भीतर भी पनपने लगा था। यह किसलयों पर ठहरी ओस की बूँदों की तरह हरा हो सकता था, इसकी हलचल मैं महसूस कर रही थी।

कुछ ही महीनों में मेरे शरीर के भीतर ही भीतर उभरता उसका आकार वैभव, माँ और मिलने-जुलने वाले और लोग भी महसूस करने लगे थे। सब खुश थे, हमें शुभकामनाएँ दे रहे थे पर मेरा मन अशांत था। चिनाब की लहरें मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहीं थीं। अकसर रात में वो मुझे अपने साथ उसी शाम की सैर पर ले जातीं, जहाँ मैंने रजनीगंधा के फूल और वह सुनहरा जलपाखी प्रवाहित किया था।

सब कुछ कहाँ बह पाया था उस शाम, मेरे बहुत सारे रंग अब भी वहीं ठहरे थे। उन्हीं रंगों से मिलने मैं भी अकसर रात में चिनाब की लहरों के बुलावे पर उठ खड़ी होती थी।

वैभव को यह बीमारी लग रही थी। माँ को कोई 'शाय बला'। माँ ने मेरे बिस्तर में 'सैंती सरिये' के सुनहरे दाने बिखरे दिये। कलाई में दानों की पोटली बनाकर बाँध दी। इनका रंग भी जलपाखी की तरह सुनहरा था, मुझे ये भले लगने लगे।

खाने-पीने और खुद से ज्यादा मुझे इन सुनहरी दानों के साथ रहना अच्छा लगता था। इस पर माँ और विचलित हो गई। मेरे लिए भी और मेरे भीतर बढ़ते उस नन्हें बीज के लिए भी।

वैभव मुझे खाना खिलाने की कोशिश करते। पर मैं बहुत कोशिश करने पर भी दो अँगुलियों को चाटते हुए चटखारे नहीं लगा पाती। मेरे निवालों से स्वाद भी गायब होने लगा था। मुझे खाने से विरक्ति हो गई।

वैभव मुझे डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने मुझसे बहुत देर तक बात करने की कोशिश की। पर मेरे सुनहरे जल पाखी बिस्तर में रह गए थे, मैं नाराज थी, मैंने डॉक्टर से कोई बात नहीं की।

वैभव ने डाक्टर को बताया कि मुझे पढ़ने और थोड़ा बहुत लिखने का शौक है। डॉक्टर ने मुझे पाँच-छह अलग-अलग तस्वीरें दी और उन पर कुछ लिखने को कहा।

इनमें से एक माँ का आँचल पकड़ते किशोर की थी
    दूसरी खिड़की पर कोहनी टिकाए बैठी औरत की
    तीसरी चार बच्चों की
    चौथी,
    पाँचवी
    और छठी।

पर वे सारी तस्वीरें ब्लैक एंड व्हाईट थीं। उनमें कोई रंग नहीं था, न सुनहरा, न हरा, न नारंगी, न गुलाबी। मैं क्या लिखती। मैंने कुछ नहीं लिखा। एक शब्द भी नहीं। मैंने तस्वीरें वापस टेबल पर फेंक दीं।

डाक्टर को सूत्र मिल गया। उसने मुझमें डिप्रेशन खोज निकाला और उससे बचने और लड़ने के लिए ढेर सारी गोलियाँ दे दीं।

इनमें एक गोली नारंगी रंग की भी थी, बिल्कुल उन आँखों में डूबते सूरज जैसी। सैंती सरिये के दानों के साथ मैंने नारंगी रंग की गोलियों को भी अपना दोस्त बना लिया। अब वे भी मेरी सतरंगी दुनिया में शामिल थी। नारंगी गोलियों की एक खासियत और थी। इन्हें खाने के बाद मुझे झट से नींद आ जाती और मेरी सतरंगी दुनिया मेरे सामने अपने सारे रंग उडेल कर सज जाती।

मेरी दुनिया में लहरों की हलचल अब ज्यादा बढ़ने लगी थी। ये कभी चिनाब की लहरों जैसी लगती तो कभी नन्हीं टाँगों जैसी। मेरे भीतर कुछ बड़ा 'भला सा' चल रहा था। मैं उसे लेकर दिन-दिन भर सोई रहती।

एक रात चिनाब की लहरों में से एक मगरमच्छ अपने अगले पैरों को जल्दी-जल्दी चलाता हुआ निकला उसके पिछले सभी पैर आगे वाले पैरों की संगत कर रहे थे। सभी पैरों ने मिलकर मगरमच्छ को मेरी तरफ धकेल दिया और मगरमच्छ ने अपना पूरा जबड़ा खोलकर मेरी दोनों हथेलियों को अपनी ओर खींच लिया।

मैं चीख रही थी, चिल्ला रही थी, मगरमच्छ का जबड़ा मुझे छोड़ने को तैयार नहीं था।

''जय बावे दी...
     जय बावे दी...
     जय बावे दी...

जय बावे दी..." माँ और वैभव मेरी दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों से रगड़ते हुए पुकार रहे थे। मैं इस डरावने स्वप्न पर तेजी से चीख पड़ी थी। माँ का 'शाय बला' वाला शक अब यकीन में बदलने लगा था, वे बावा जित्तो से प्रार्थना कर रहीं थीं, कि वे मुझे इस बला से मुक्ति दिलाएँ।

माँ भी चाहती थी कि मुझे मुक्ति मिले
    अनुभव भी चाहता था कि मुझे मुक्ति मिले
    फिर मैं क्यों नहीं चाह पा रही थी कि मुझे मुक्ति मिले
    क्या ये जरूरी हो गया था कि अब मुझे मुक्ति मिले?

''कल झिड़ी का मेला है, बावे के मत्था टिकाएँगे तो सब ठीक हो जाएगा।" एक ही जुमले में माँ ने वैभव को सलाह और निर्देश दोनों दे दिया। अब तक दृश्य बदल चुका था। मुझे निगलने वाला मगरमच्छ दृश्य से बाहर हो चुका था। माँ, वैभव और उनकी प्रार्थनाएँ दृश्य में शामिल हो चुकी थीं। माँ ने सैंती सरेये की धुनी जगाकर मेरे बिस्तर के चारों तरफ घुमाई। नारियल के तेल से मेरे सिर की मालिश की। और मैं सो गई।

अगली सुबह हम सब झिड़ी के लिए निकल पड़े। झिड़ी में लगने वाला कार्तिक पूर्णिमा का यह मेला हर बार की तरह विशाल और शानदार था।

अलग-अलग जगहों से आए हजारों-लाखों लोग साढ़े चार सौ साल पुरानी पीड़ा का प्रायश्चित कर रहे थे। 'बावे के तालाब' पर नहा रहे लोगों ने अपने चेहरे और अपनी देह पर तालाब की काली मिट्टी पोत रखी थी। कुछ लोग लोहे की 'सुंगलों' से अपने आप को पीट रहे थे। उन्हें दुख था कि उनके पूर्वजों ने बावा जित्तो की मेहनत और लहू में डूबी कनक क्यों खाई। सदियाँ गुजर गईं थीं पर ये दुख, ये पीड़ा, ये प्रायश्चित कम होने की बजाए बढ़ता ही जा रहा था। हर बार प्रायश्चित करने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। नहाने के बाद वे बावा जित्तो और 'बुआ कौड़ी' के मंदिर में जाते, नाक रगड़ते और उनसे माफी माँगते।

वैभव और माँ मुझे भी मंदिर में ले गए। मेरे हाथ में मंदिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद और 'बुआ कौड़ी' के लिए खरीदी गई प्लास्टिक की गुलाबी गुड़िया और लाल ओढ़नी थी।

मेरे हाथ जैसी ही ढेरों गुड़ियाँ और ओढ़नियाँ 'बुआ कौड़ी' के कदमों में पड़ीं थीं। और 'बुआ कौड़ी' अपने पिता बावा जित्तो की अँगुली थामे खड़ी थी।

मैं 'बुआ कौड़ी' की तरफ एकटक देख रही थी, ''कितना शौक होगा न उसे गुड़ियों से खेलने का। आठ साल की उम्र तो होती ही है गुड़ियों से खेलने की। पर कोई भी कौड़ी तभी तक गुड़ियों से खेल सकती है जब तक उसके सर पर माँ-बाप का सुरक्षित छत्र रहे। बिन माँ की बच्ची ने अपने पिता की रसोई सँभाल ली। आठ साल की बच्ची के हाथों से बनने वाली छोटी-छोटी रोटियाँ कैसी होती होंगी।" मेरी आँखों के सामने उन रोटियों का आकार और उन्हें पकाने वाले नन्हें हाथों के लिए दुलार उमड़ने लगा।

वो रोटियाँ भी कहाँ खिला पाई थी अपने पिता को। मेरी आँखों के सामने अब वह दृश्य आने लगा जब वह अबोध बच्ची अपने पिता की चिता में कूद गई होगी, जमींदार के अन्याय के विरुद्ध। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। प्लास्टिक की गुलाबी गुड़िया मुझे 'बुआ कौड़ी' लगने लगी। मैंने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया, मैं उसे उसके हिस्से का दुलार देना चाहती थी। पर लेने के लिए वह अब बची कहाँ थी... मैं खूब रोई। वैभव ने और माँ ने मुझे पकड़कर ड्योढ़ी पर बिठा दिया। मैं सुबकती रही, मैं माफी माँगना चाहती थी उस नन्हीं बच्ची से जिसका बचपन लालच और अन्याय ने छीन लिया था। न जानें और कितनी ही कौड़ी ऐसी होंगी जिन्हें उनका बचपन नसीब ही नहीं होता, क्या सभी को जान पाते हैं हम...

मैं रो रही थी,
    रोये जा रही थी।
    मेरा दुख, मेरी पीड़ा,
    अपनी कौम के लिए मेरा प्रायश्चित कम ही नहीं हो रहा था।
    मैं रोते-रोते बेसुध हो गई।
    कौड़ी की गुलाबी गुड़िया मेरे पास ही रह गई।

मुझे जब होश आया मैं हॉस्पिटल में थी। मेरे आसपास खड़े डाक्टरों और नर्सों को देखकर लग रहा था कि मेरी हालत ज्यादा खराब है। बच्चा बेहद कमजोर था, पर उसने अपनी जगह छोड़ दी थी। मुझे दर्द भी नहीं हो रहे थे। पर बच्चे को जन्म देना जरूरी था। मेरी कोख में अब उसे सँभालने की ताकत नहीं रह गई थी। डॉक्टर्स ने ड्रिप लगाई और मुझे 'आर्टिफिशियल पेन' देने की कोशिश की गई। शुरू के दो-तीन घंटे मैं यूँ ही बेसुध क्षितिज में निहारती रही, मेरे आसपास के दृश्य मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डाल पा रहे थे।

...आधी रात होते-होते दवाइयाँ अपना काम कर गईं और मुझे दर्द शुरू हो गए। ये सातवाँ महीना था इसलिए माँ और वैभव अब भी घबराए हुए थे। सुबह के साढ़े चार बजे के बाद मैंने एक बहुत कमजोर पर खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया। बच्ची इतनी कमजोर थी कि उसे कपड़े में लपेटने के लिए रुई की परतों का सहारा लेना पड़ा। मेरी हालत अब भी ठीक नहीं थी।

डाक्टर और नर्सों की आँखें बता रहीं थी कि वे भी चाहते हैं कि मुझे मुक्ति मिले।

मेरी गुलाबी गुड़िया नर्स की गोद में थी, वह उसे कपड़े में लपेट कर मेरे पास ले आई। मैंने उसे ध्यान से देखा, उसकी अँगुलियाँ बिल्कुल गुलाबी थी। उसकी देह से रजनीगंधा के फूलों की खुशबू आ रही थी और उसकी छोटी-छोटी सी आँखों में डूबता हुआ नारंगी सूरज भी मौजूद था। मेरे सब रंग मेरे पास थे। मैंने नजर उठाकर देखा अनुभव मेरे सामने था, वैभव और माँ दृश्य से गायब हो चुके थे। मैंने हाथ बढ़ाया, अनुभव ने अपनी गुनगुनी हथेली मेरे हाथ में दे दी, मैं उसे गुलाबी गुड़िया के माथे तक ले आई। उसने उसका माथा सहलाया और मुझे मुक्ति मिल गई।


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