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कहानी

अमरीखान के लमडे
प्रज्ञा


दिल्ली में रहते हुए भी भाई-भाभियों से बात हुए अरसा बीत जाता है। सब मसरूफ हैं अपनी जिंदगियों में और मैं खुद भी तो ...फुर्सत ही कहाँ है मुझे घर, नौकरी और बाल-बच्चों से। इधर मँझले भैया से भी लगातार बात हो जाने की वजह ये है कि माँ आजकल उन्हीं के घर हैं। इसलिए कभी फोन पर बात हो जाती है और महीने में दो-एक बार घर हो ही आता हूँ। माँ की आदत है कि मोबाइल रखती नहीं और अपने से फोन भी नहीं करतीं। हम खुद ही उनके हालचाल पूछ लेते हैं। हाँ देर से फोन करने पर आज भी बचपन वाली सख्त डाँट का डर बना रहता है। मैं ये सोच ही रहा था कि कल-परसों में माँ से मिलने जरूर जाना है कि इतने में भैया का फोन आ गया।

"कैसा है?" माँ की आवाज से मैं चौंक गया। कोई खास बात ही है जो माँ फोन कर रही हैं। माँ ने ज्यादा इंतजार न कराते हुए सूचना दी "तेरे टिल्लू भैया भी गुजर गए राजकुमार। सब चले गए एक-एक करके। लगता है मैं ही सबके नाम की उमर लिखवाकर आई हूँ। महीना भर हो गया उसे गुजरे। मुझे भी कल ही पता चला सोचा तुझे बता दूँ। उसके लड़के ने सेवा तो बहुत की पर शराब से बिगड़े शरीर को आखिर कब तक सँभालता?" माँ देर तक उनकी बातें करती रही और मैं चुपचाप सुनता रहा। अभी उम्र ही क्या थीं उनकी? होंगे मुझसे कोई सात-आठ साल बड़े। बचपन से लेकर आज तक के जीवन के बारे में सोचते हुए मेरे दिमाग में यही घुमड़ता रहा कि एक इनसान विदा हो गया और किसी को खबर भी नहीं हुई। मैं तो व्यस्तता के बहाने उनकी तरफ से निश्चिंत था।

हनुमान को तो मैंने नहीं देखा पर टिल्लू भैया के रूप में मैंने सच्चे सेवक को देखा था और मेरे मन में उनके लिए गहरा आदर था। अफसोस तो मुझे प्रेमी चाचाजी के गुजरने का भी हुआ था पर टिल्लू भैया के न रहने पर एक टीस-सी उठ रही थी। चंद साल पहले की एक मुलाकात में उन्होंने मेरा सारा बचपन मुझे याद दिला दिया था। एक इनसान जिसे किसी समय रोज घर-गली में देखने की आदत थी, जिसके न दिखने पर एक बेचैनी-सी महसूस होती थी और दिन पूरा नहीं होता था। वो इनसान जिसने हमारे घर को हमेशा अपना समझा आज हमें बताए बिना चल दिया। तो अब भाईजी की तिकड़ी का आखिरी सिरा भी खत्म हुआ। जैसे एक युग का अंत हो गया। भाईजी, प्रेमी चाचाजी और टिल्लू भैया की तिकड़ी जान थी हमारे मोहल्ले की। राजकपूर, देवानंद और दिलीप साहब की तिकड़ी की तरह, जिन्होंने एक साथ काम करते हुए राज किया था मुंबई पर। हाँ ये जरूर है कि इन सितारों के आपसी संबंध भाईजी की तिकड़ी की तरह नहीं थे और फिर भाईजी की तिकड़ी ही कहाँ इन रोशन सितारों की मानिंद जगमगाती थी पर हमारे लिए तो ये साक्षात सितारों से कम नहीं थे और तिकड़ी में सबसे ऊपर थे भाईजी खुद।

वैसे तो भाईजी रिश्ते में मेरे ताऊजी लगते थे पर चूँकि संयुक्त परिवारों में बच्चे अधिकतर वही संबोधन आसानी से स्वीकार कर लेते हैं जिनका प्रयोग माँ-पिता करते हैं तो मेरे भाइयों और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पिताजी उन्हें भाईजी बुलाया करते थे। बड़े भाइयों ने भी यही संबोधन अपना लिया और मैंने भी एक फर्माबरदार बेटे और भाई की तरह इस विरासत का दामन थाम लिया। भाईजी को कोई आपत्ति भी नहीं थी। होती भी कैसे आखिर हम उन्हें एक नई पीढ़ी से जोड़े हुए थे और उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं करते थे। पर असली बात थी भाईजी की ठसक, अगर उसे ठेस लगती तो भाईजी का पारा चढ़ जाता और फिर किसी की खैर नहीं। केवल घर में ही नहीं पूरी गली और उसके विस्तार में जाएँ तो पूरे मोहल्ले में भाईजी का धाक जमी हुई थी। शरीर भले ही नाटा था पर एकदम गठा हुआ। अपने नाटेपन को वो अपनी ठसक, अपने तेवर, पहनने-ओढ़ने के ढंग, रूआब और मजबूत आवाज से संतुलित किया करते थे। रुपया-पैसा भी ठीक जोड़ा था उन्होंने और आय के साधन स्वरूप एक अच्छी चलती दुकान थी ही जिस पर दो-तीन नौकर खादी-भंडार से लाए कपड़े धोने, प्रेस करने के काम को सँभालते थे। आगे प्रेस का काम चलता और पीछे धुलाई, कलफ, वगैरह। इस समृद्धि के जरिए उनका रोब-दाब कायम था। ऐसे में हमारे हीरो भाईजी के निकट जो भी होता उसकी तकदीर और इज्जत भाईजी रूपी पारस का स्पर्श पाकर जगमगाने लगती। यों उनकी नजदीकी पाना कोई हँसी-खेल नहीं था। भाईजी बड़ी पारखी नजर रखते थे। ऐरों-गैरों को पास फटकने भी नहीं देते थे और गली में रुपये धेले से कोई उनकी बराबरी कर ही नहीं सकता था। ज्यादा बोलने वाले उन्हें सख्त नापसंद थे। तेजी दिखाने वाले का पत्ता तो पहली दफा में ही कटा समझो। इस तरह बरसों की आजमाइश के बाद ये मौका दो ही लोगों को मिला-टिल्लू भैया उर्फ प्रेमकुमार शर्मा और प्रेमी चाचाजी जो सिर्फ प्रेमी ही थे पर केवल नाम के। दोनों के नाम में प्रेम का होना महज एक इत्तफाक है भाईजी की कहानी में इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उम्र और अक्ल में तिकड़ी का हिस्सा न होते हुए भी मैं तिकड़ी के बेहद करीब था। वो इसलिए कि दिखने में आकर्षक, पढ़ने-लिखने में तेज और सेवा-टहल का पक्का था मैं। वैसे मेरा विनीत और आज्ञाकारी होना ही वो असली मानदंड था जिसके कारण मैं भाईजी के नजदीक था और उनका दुलारा भी। इसका एक कारण मेरा स्कूल भी था जो दोपहर की पाली में लगता था। सुबह जब मेरे भाई और कई बच्चे स्कूल जाते मैं अकेला होता। इस अकेलेपन को भरने का सबसे ब बढ़िया उपाय भाईजी की दुकान थी जिस पर हरदम मजमा-सा जुटा रहता। मैं समय बिताने के चक्कर में उनके करीब आ गया। कहने का आशय केवल इतना है कि मुझे भी पारस का स्पर्श मिला गया था जो न मेंरे भाइयों को मिला था न ही भाईजी के दोनों बेटों को।

आज जब याद करने बैठा हूँ तो फिल्म की तरह सारी रील अपने संपूर्ण दृश्यों और किरदारों को लिए मेंरी आँखों के सामने है। अपने भरे-पूरे संयुक्त परिवार में भाईजी का डंका पिटता था। भाई-बहन न भी समझें पर भाईजी खुद को उनका खुदा ही समझते थे और जो उनकी राय के विरुद्ध गया वो समझो गया। भाईजी का उससे छत्तीस का आँकड़ा हो जाता। इस मामले में वे बड़े ही समाजवादी थे। सबको एक ही निगाह से तौलते चाहे आदमी घर का हो या बाहर का। भाईजी के दाहिने हाथ थे टिल्लू भैया। उनके सामने एकदम बच्चा पर शरीफ और गजब के मेहनती। उनमें वे सारी खूबियाँ शामिल थीं जिनके चलते उम्र में बहुत छोटे होने पर भी उन्होंने भाईजी के दिल में जगह बनाई थी। हम उन्हें भाईजी का डिप्टी कहा करते थे। प्रेमी चाचाजी टिल्लू भैया की तरह तो नहीं थे पर उनका-सा स्वाँग रचने में माहिर थे। बतरस उन्हें खूब था और लगाने-बुझाने की आदत भी कम न थी। यों भाईजी भी खरे-खोटे का फर्क बखूबी जानते थे पर प्रेमी चाचाजी सभी खोटों में सबसे कम खोटे थे और फिर भाईजी को भी अपनी ठसक दिखाने के लिए अपने दो-एक खास लोगों की जरूरत भी थी। इस तरह ये तिकड़ी निर्मित हुई जरूर, हुई पर समानता के सिद्धांत पर नहीं भाईजी के मालिकाना हक के मातहत। तिकड़ी के बावजूद वो दोनों भाईजी के चाकर ही थे। इस तिकड़ी मे सेंध लगाने की भरसक कोशिश करने वाला एक और शख्स था - नानक। नानक को भाईजी का परमानेंट प्रशंसक समझ लीजिए। पर शायद भाईजी को शेर याद था - हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो, तो वो नानक को जरा दूर ही रखा करते।

भाईजी के रोब-दाब की मुख्य वजह उनकी दुकान भी थी। दुकान बहुत मौके की जगह पर थी। गली से एकदम सटी हुई और मोहल्ले के नुक्कड़ पर। तीन तरफ का पूरा नजारा वहाँ बैठकर लिया जा सकता था और गली में आने-जाने वालों, सब पर नजर रहती थी। दुकान के साथ ही एक पेड़ लगा था और उसके नीचे चबूतरा था। इस तरह अड्डेबाजी का पूरा प्रबंध था वहाँ। सुबह का अखबार बाँचने से लेकर देर रात दुकान की ओट में नशा करने तक के बीच दोस्तियाँ, दुश्मनियाँ निभाना, पारिवारिक समस्याओं से लेकर समाज और देश-विदेश की समस्याओं पर बेबाक टिप्पणियों, हँसी-ठठ्ठे से लेकर मार-कुटाई और गाली-गलौज की उपयुक्त जगह। आज सोचता हूँ गली-मोहल्ले में दुकानें तो कई हैं पर उन पर ऐसे रौनकदार मजमे कहाँ? नौकरों को आदेश देकर दुकान के बाहर बैठे भाईजी एक तरफ दुकान की निगरानी भी करते रहते और दूसरी तरफ पूरे दिन बतरस का आनंद भी लेते। टिल्लू भैया अपना खोमचा वहीं दुकान के आगे लगा लिया करते। चटपटी मटर और मोठ बनाने में उनकी मास्टरी थी। प्याज, टमाटर हरा धनिया काटकर, मसाले और नींबू का रस डालकर जब दो-चार बार दोने में सबको उछालते तब मटर और मोठ को दिव्य बना देते। अक्सर दोपहर में अपने पसंद की सब्जी न बनने पर लोग कहा करते - "जा भाग के टिल्लू से एक दोना मटर ले आ, खाने का मजा तो आए।" प्रेमी चाचाजी किसी दुकान पर काम करते थे। सुबह देर से जाते थे इसलिए सुबह का उनका समय दुकान पर ही बीतता।

मुझे अच्छी तरह याद है वो दिन। भाईजी आज उपदेश के पूरे मूड में थे। "देख भाई टिल्लू मोट-मटर बनाने का तुर्जुबा तुझे है ही और सबको पसंद भी आता है तो ऐसा कर ले दुकान के एक कोने में छोले-भठूरे की दुकान कर लेते हैं। अरे जब वो मुकंदी का छोकरा चला रा है तो क्या हम उससे भी गए-गुजरे हैं? फिर दुकान मौके की जगह है। बिजनिस अच्छा चलेगा। ...गधे की तरह चुप क्यों है? बोल न।"

अच्छे-भले इनसान को पशु-पक्षी बनाने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता था। टिल्लू भैया कोई रिस्क लेना नहीं चाहते थे। अपने खोमचे और आमदनी से वे पूरी तरह संतुष्ट थे। पर भाईजी का स्वभाव वह जानते थे। भाईजी बड़े ही उद्यमशील इनसान थे। एक मर्तबा जो सोच लिया वो पत्थर की लकीर। अनमने अंदाज में कह ही दिया - "देख लो ठाकुर जी फिर कोई ऊँच-नीच न हो जाए। तुम भी नाहक परेशान होओ और मैं भी पुराने धंधे से हाथ धो बैठूँ।" टिल्लू भैया के बेमन से कही हाँ को भाईजी ने सहर्ष समर्थन वाले भाव की तरह लिया और लगे योजना बनाने में।

"यार टिल्लू छोले तरी वाले बनने हैं। मसाला जरा जमके गेरिओ। छोले तेल में तैंरे और मिर्च का छौंक ऊपर से छोड़ियो। अदरक, आलू, मिर्च सजा दीयो कि सूरत देखते ही मन ललचाए। रंगत जबरदस्त हो।" भाईजी को खाने में रोनी सूरत वाली कोई भी चीज पसंद नहीं थी। स्वाद चटपटा और रंगत आला, खाने को लेकर ये दो कसौटियाँ उनकी तय थीं। उस शाम प्रेमी चाचाजी ने भी छोलों के संदर्भ में अपना सारा ज्ञान उँड़ेलकर रख दिया। छोले कितनी आँच पर उबलेंगे, काबुली या कौन-सी किस्म बेहतर रहेगी। छोले बनाने की विधि को लेकर भी खासी रिसर्च की गई। सब कुछ तय करने के बाद दुकान का सामान सरकाकर एक कोना खाली किया गया। दो-एक दिन में उस कोने में लोहे का एक स्टैंड फिट कराया गया जिस पर एक तरफ अँगीठी और दूसरी तरफ छोलों का पतीला रखा गया। बीच में मैदे की परात और बेलने की जगह थी। एक छोटी सी अचार की बरनी भी रख दी गई थी। दुकान शुरू करने से पहले एक और निर्णय भी भाईजी ने किया - "देख टिल्लू! छोले-भठूरे का काम तो दो-तीन बजे तक चलता है। क्यों न शाम को यहाँ गर्मागरम समोसे भी बनें तो काम खूब चलेगा। अरे फुर्सत नहीं मिलेगी कमाई से।" भाईजी को अपने निर्णय पर अगाध विश्वास था। नए प्रयोगों के धुनी भी थे तो काम शुरू हो गया। टिल्लू भैया को छोले उबालने का खासा अनुभव था पर तरी वाले छोले उन्होंने कभी बनाए नहीं थे। राम-राम करके छोले तो बना डाले पर रंगत के चक्कर में ढेर सारी मिर्च झोंक दी। इधर छोले के जोड़ीदार भठूरे की हालत भी बुरी थी। जो भी भठूरा बेलकर तलते, वही पलटते ही सिकुड़ जाता और कढ़ाई का तेल न जाने किस रास्ते उसके पेट में समा जाता। हर भठूरा तलते हुए आस जगती "अब फूला तब फूला" पर सबका एक-सा अंजाम। पहला दिन था तो शर्मा-शर्मी में लोगों ने पैसा दे दिया और बेस्वाद छोले और तेलपिए भठूरे खा लिए। जैसे-तैसे दिन गुजरा शाम का समय निकट था और टिल्लू भैया अपने जीवन के पहले समोसे बनाने को तैयार थे। भाईजी निरंतर उत्साह बढ़ा रहे थे - "देखियो टिल्लू! आज से तू टिल्लू समोसेवाले के नाम से मशहूर होने वाला है। लोग समोसों के साथ उँगलियाँ खा जाएँगे बस चटनी ऐसी बना दे कि स्वाद रह जाए जबान पर।" न जाने उस घड़ी सरस्वती विराजमान थीं भाईजी की जबान पर। टिल्लू भैया ने अपना सारा ध्यान वाक्य के दूसरे अंश पर लगाकर चटनी में प्राण फूँक दिए। चटनी लाजवाब थी पर समोसे जो उन्हें ऑन द जॉब सीखने थे, उनका हाल भठूरों से भी बुरा हो गया। सारे समोसे न केवल तेल पी गए बल्कि फट भी गए। आलू ज्यादा मसलने के कारण समोसा फटते ही अंदर का आलू भागने लगा और थोड़ी देर बाद काला होकर तेल में नाचने लगा फिर हाँफकर बाकी समोसों और कढ़ाई पर चिपक गया। भाईजी की भविष्यवाणी सच हुई। टिल्लू भैया वाकई टिल्लू समोसेवाले के रूप में ख्यात हो गए अंतर केवल यही था कि नकारात्मक अर्थ में। ख्यात का तो कुछ नहीं बिगड़ा पर उसके आगे 'कु' लग गया।

भाईजी ने जल्दी हार नहीं मानी। कैसे मानते कोई खेल नहीं था उन्हें हराना। फिर दुकान चलती जगह पर थी। ट्रक वाले, पनवाड़ी, कारीगर, मोटर सुधारने वाले कितने ही लोगों की आमदरफ्त थी उस रस्ते पर। पहला दिन खराब जाने का मतलब सब धंधा चौपट हो जाना नहीं था। भाईजी टिल्लू भैया का मनोबल बढ़ाते रहते और शाम को प्रेमी चाचाजी भी कुछ मुर्गे फाँस लाते। पर वो मजा नहीं आ सका जिसकी भाईजी ने कल्पना की थी। टिल्लू भैया हर दिन नई कोशिश करते। छोले-भठूरों में तो फिर भी सुधार था पर समोसे के तेल के गर्म होने का अंदाज न लगा पाने के कारण तेल में छोड़ते ही समोसे लाल और काली रंगत के से हो जाते। फिर उन्हें जल्दी निकालने के चक्कर में समोसों की चमड़ी ठोस होकर अजीब-सी हो जाया करती और भीतर का मसाला स्वादहीन। एक दिन समोसों को रोज की तरह परात में सजाकर रखा ही गया था कि न जाने कहाँ से नानक आ गया। "वाह ठाकुरजी आज तो पूरी गली महक रही है समोसों से। क्या समोसे हैं तुम्हारे।" समोसों की असलियत से वाकिफ भाईजी सोचने लगे "शायद मैं ही अपने माल को कमतर आँक रहा हूँ।" और ये सुनते ही नए जोश में भरकर भाईजी ने नानक को बड़े सम्मान से बिठाया और कहा - "नानक आ बैठ। आज तू खा समोसे जितना तेरा मन चाहे।" भाईजी जानते थे दो-तीन से ज्यादा कोई खाने से रहा और बाद में फेंकने से अच्छा है इसके पेट में ही चले जाएँ। प्लेट साफ कर नानक फिर से समोसों की शान में कसीदे पढ़कर चला गया। मैं गली के अंदर दोस्तों के साथ खेल रहा था। मैंने उसे पड़ोसी से कहते हुए सुना "ऐसे समोसे हैं कि कुत्ते के आगे धर दो तो वो भी मुँह न मारे।" मन तो किया सारी असलियत खोल डालूँ पर भाईजी के दुख को और बढ़ाने की मेरी इच्छा न थी।

खाने की दुकान से धीरे-धीरे मायूस होकर जब मुफ्त में गली के घरों में भेजे गए समोसे भी ठुकराए जाने लगे या बेआबरू होकर कूड़ेदान में पड़े दिखाई दिए तो भाईजी का मन उचाट हो गया। टिल्लू भैया ढूँढ़-ढाँढ़कर अपना खोमचा ले आए और भाईजी ने प्रेमी चाचाजी की मदद से एक मेज रखवाकर चाय का काम भी उनके लिए शुरू करवा दिया। कुछ दिन बाद सब अपनी जिंदगियों में रम गए पर भाईजी की टीस न मिट सकी। एक दुकान के भीतर दो सफल दुकानों को चला पाने का उनका मंसूबा अधूरा था। एक दिन नशे में टिल्लू भैया को एक तमाचा रसीद कर दिया - "साले तूने कर दी धंधे की ऐसी-तैसी। पैसा डुबो दिया और नाम भी। जरा मन नहीं लगाया काम में। खर्चा करवाया सो अलग। नालायक, गलती की कि तुझपे भरोसा किया।" टिल्लू भैया ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। बस माँ के आगे ही रोए - "चाची क्या मैंने जान-बूझकर किया? तुम बताओ मेरी गलती? बिना गलती के मार लगाई उनने मुझे।" माँ ने तब भी भाईजी की तरफ से उनका मन मैला नहीं होने दिया जबकि लंबी बीमारी और छोटी उम्र में मेरे पिताजी के गुजर जाने से भाईजी का व्यवहार माँ से ठीक नहीं था। माँ के दुख को समझे बिना भाईजी ने मेरे सभी भाइयों को दिहाड़ी पर रुपया कमाने की सलाह दी थी। शायद कहीं बात भी पक्की कर ली थी पर माँ हमें पढ़ाना चाहती थी। पिताजी खुद दिहाड़ी मजदूर थे इसलिए माँ को ताना मारते हुए भाईजी ने कह भी दिया था - "चूहे के जाए भिट्ट खोदेगें लाट-अफसर नहीं बनेंगे।'

अगले दिन भाईजी काफी देर तक अपनी सफल और असफल दोनों दुकानों के आगे बैठे रहे। दरअसल वो बैठे नहीं थे टिल्लू भैया का इंतजार कर रहे थे। आज टिल्लू भैया तय समय गुजर जाने के बाद भी नहीं आए। भाईजी की बैचेनी बढ़ती ही जा रही थी। प्रेमी चाचाजी की लाई पाँच सौ दो नंबर की कितनी बीड़ियाँ उन्होंने राख कर दी थीं और अब नई सुलगाकर तेजी से चहलकदमी करते हुए कश पे कश फूँक रहे थे। जब बात बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उन्होंने अपने बेटों को दहाड़ते हुए पुकारा - "सूअर के बच्चों, सालों सोते रहोगे? जाओ लपक के टिल्लू के घर और उसे यहाँ लाकर ही मरना।" प्रेमी चाचाजी ने चुप रहने में ही भलाई समझी। जब तक टिल्लू भैया नहीं आए हम सब दम साधे रहे। उनके आने पर भाईजी का स्वर एकदम बदल गया - "आ गया तू... अरे नाराज मत हो भैया। हो जाता है कभी-कभी। और तू मुझसे नाराज हो गया... मुझसे। चल अब औरतों की तरह रूसना छोड़।" प्रेमी चाचाजी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यारी-दोस्ती का हवाला दिया और भाईजी ने भी आगे बढ़कर बिना माफी माँगे उन्हें गले लगाया। अभी मामला ठंडा हुआ ही था कि भाईजी ने नया बम फोड़ दिया - "देख बे टिल्लू! जो बीती वो बात गई। मेरे दिमाग में नई बात आई है। दुकान के इस हिस्से में मसाला पीसने की मशीन लगाते हैं। खूब चलेगी देख लियो।" टिल्लू भैया की जान साँसत में आ गई। अभी जख्म ताजा थे और उनके शरीर में नए घाव झेलने की ताकत न थी। वो इनकार कर ही देते कि न जाने कहाँ से नानक प्रकट हो गया और उसने भाईजी की बात सुनकर उस आइडिया की दाद दे डाली - "वाह ठाकुरजी क्या दिमाग पाया है आपने। खाली तो आप बैठ नहीं सकते न। मोहल्ले में एक कालिया की ही दुकान है मसाले की, एक आपकी भी हो जाएगी। बीस ही ठहरेगी कालिया से लिखवा लो। हर घर में रोज मसालों की जरूरत है। और मसाला पीसना कौन-सा मुश्किल काम है? समोसे तलने से तो आसान ही है।" प्रशंसा के रैपर में जी जलाने वाली गोली को चुपके से लपेटना नानक को बखूबी आता था। पर भाईजी आज किसी और ही मूड में थे। "चल टिल्लू चलके बात करते हैं साजिद से। मशीन बन ही जाएगी और जल्दी काम शुरू हो जाएगा। देखियो तेरे मटर-मोठ से ज्यादा नफे का होगा और चाय की दुकान की खिटपिट भी बंद हो जाएगी।"

टिल्लू भैया बेमन से साथ तो हो लिए पर शंका उनके साथ चली। साजिद खरादिए ने दूर से ही भाईजी को देखकर एक भद्दी सी गाली दे डाली और पास आते ही सत्कार में लग गया। भाईजी का प्रस्ताव सुनकर साजिद के मन ने कड़ाई से 'ना' कहा। उसने कहाँ बनाई थी ऐसी मशीन। कुछ ऊँच-नीच हो गई तो कौन खाए भाईजी की डाँट और मार, पर उसे भाईजी की उधारी भी चुकानी थी। पैसे थे नहीं पर एक पुरानी मोटर कब से उसके यहाँ धूल फाँक रही थी। उसका ध्यान आते ही साजिद की न हाँ में बदल गई। जैसे-तैसे करके मशीन तैयार हो गई। इधर इस बार भाईजी ने ढेर सारा खड़ा मसाला खरीद लिया। साबुत लाल मिर्च, धनिया, हल्दी, काली मिर्च, सौंफ। कुछ थैलों में बड़ी इलायची, तेज पत्ता, लौंग, दालचीनी जैसे मसाले भी झाँक रहे थे। कुछ दिन बाद ठीक समय पर साजिद रिक्शे में मशीन को बड़े प्यार से बिठाए ले आया। प्रेमी चाचाजी ने दुकान को फिर से सँवार दिया था। पतीला, अँगीठी, परात, चकला-बेलन, कड़ाही, अचार की बरनी और वो हर मनहूस सामान जिसने पुरानी दुकान बंद करवा दी थी उसे बाहर निकाल दिया गया जिसे भाईजी की छोटी बहू समेटकर ले गई थी। इस बार भाईजी ने विधि-विधान के टोटके भी कर डाले। मशीन पर गेंदे के फूल की माला चढ़ाई गई। गली के तमाशबीन लोगों को लड्डू भी बँटे। और नारियल टिल्लू भैया ने फोड़ा।

अब बारी आई मशीन चलाने की। तो कौन करे ये शुभ काम? ये काम तो भाई जी के ही जिम्मे था। उनके दोनों बेलदारों ने अपने काम कर डाले थे अब मिस्त्री का काम तो भाईजी ही करेंगे। और करना भी क्या था एक मामूली स्विच ही तो ऑन करना था। मशीन के ऊपर मसाला डालने वाले हिस्से को टिल्लू भैया ने साबुत मिर्चों से ठसाठस भर दिया था। निकासी की जगह पर चमचमाता, स्टील का ड्रम रख दिया गया। सभी लोग गली के इस नए काम पर निगाहें जमाए थे। कुछ काम पर देरी होने के बावजूद भाईजी के लिहाज से रुके हुए थे। माँओं के साथ उनके लाड़ले भी चिपके-चिमटे खड़े थे। आस-पास के राहगीरों और दुकानदारों के लिए तमाशा शुरू होने वाला था तो कुछ नदीरे बचे हुए लड्डुओं पर निगाहें लगाए हुए थे। आखिर इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुईं और भाई जी ने मशीन चला दी। घड्ड-घड्ड की आवाज से मशीन शुरू हो गई तो साजिद की जान में जान आई। मसाला पिसना शुरू हो गया अब मिर्च को पाउडर रूप लेकर निकलना था। पर ये क्या? निकासी की जगह से भप्प-भप्प की एक अजीब सी आवाज हुई और तेज मिर्चों का पाउडर मसाला डालने की ऊपर वाली जगह से और ऊपर उठकर हवा में बिखरने लगा। आस-पास खड़े लोगों की आँखें खुशी से नहीं मसाला लगने से पनियाने लगीं। नाक और मुँह के जरिए मसाला की धसक भीतर जाते ही चारों तरफ से छींकने, खाँसने की आवाजें एकताल से होती हुईं तिगुन तक पहुँच गई। चारों तरफ हाहाकार मच गया - "अरे बंद करो इसने... मशीन को रोको कोई।" इस दृश्य से सन्न और हक्के-बक्के भाईजी कैसे एकदम से स्विच को बंद कर पाते। उनकी तो सारी इंद्रियाँ गहरे सन्नाटे में कैद हो रही थीं। कुछ भी समझ न पाने की स्थिति में खाँसते हुए कुछ शब्द ही निकल पाए उनके रुँधे गले से जिसका अर्थ था - "अबे टिल्लू बंद कर इस ससुरी को।" उम्मीद का आईना आँखों के आगे चूर-चूर होता देख भी टिल्लू भैया आँखों को मिचमिचाते और नाक-मुँह को हाथ से दबाते किसी तरह मशीन के पास पहुँच ही गए और स्विच बंद कर दिया। एक बार फिर घड्ड-घड्ड का स्वर गूँजा और मशीन रुकी। उसके रुकने से पहले ही लोग जल्दी-जल्दी भाग चुके थे। कुछ मिर्चीले धुएँ से बचने के लिए दरवाजों की ओट में समा गए थे। माँएँ अपने लाड़लों के साथ भाग खड़ी हुईं थीं पर किसी चमत्कार की आस में भाईजी, टिल्लू भैया और प्रेमी चाचाजी ही न भाग सके और मशीन का शिकार बन गए।

उस दिन भाईजी ने जितनी गालियाँ मशीन को दीं उससे ज्यादा साजिद को दे डालीं। पर पूरे मोहल्ले में आँख, गले, नाक की जलन से बौराए लोग भाईजी को इससे भी चौगुनी गालियों से नवाज रहे थे। धीरे-धीरे जलन दूर होने पर लोगों का गुस्सा भाईजी के नए प्रयोग की छीछालेदर करने वाली हँसी और बाद में मजेदार ठहाकों में बदल गया। नानक तो हर सेकेंड में दस-दस ताली मारकर भाईजी की हँसी उड़ाने वालों का सरताज बना हुआ था। हँसी तो प्रेमी चाचाजी की भी नहीं रुक रही थी। मेरा मन किया सर फोड़ दूँ नानक का। कैसा भक्त बनता है भाईजी का! शाम को मशीन के रिव्यू की एक गंभीर बैठक हुई। मेरा काम रोज की तरह अड्डे पर पानी का छिड़काव करना था। भाईजी की तिकड़ी गमगीन थी - "अरे साजिद कह रहा था कि मशीन तो फसकलास है तो फिर गड़बड़ कहाँ हुई?" भाईजी की बात का जवाब देते हुए प्रेमी चाचाजी ने कहा भी - "बात तो सही है। मिर्चें तो पीसी थीं मशीन ने पर वो बिखरी क्यों?" सुबह से निष्कर्ष की उधेड़बुन में लगे भाईजी को जब कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने कहा - "जाइयो टिल्लू जरा कालिए की दुकान पर और देख के आ उसकी मशीन कैसे काम करती है?" टिल्लू भैया के लौटने पर साजिद और मशीन दोनों निर्दोष पाए गए। मशीन में कोई एब नहीं था पर एक भयानक गलती कर दी थी भाईजी ने। "भाईजी मसाला निकालने की जगह पर कपड़ा तो हमने लगाया ही नहीं। कालिए के यहाँ मारकीन का कपड़ा लगा है मशीन के मुँह पर।" टिल्लू भैया के कहते ही भाईजी को अपनी गलती समझ में आ गई। वे तो समझ रहे थे कि मशीन नलके की तरह काम करेगी। ऊपर से मसाला पिसेगा और निकासी की जगह से होता हुआ झरझर करता ड्रम के पेट में समा जाएगा। भाईजी गलती का एहसास कर ही रहे थे कि सामने से नानक के दर्शन हो गए - "उल्लू के पट्ठे तू तो कालिया की मशीन देखके आया था बता नहीं सकता था कि कपड़ा चढ़ाना होता है उस पर।" ऊपर से भोले बनने का नाटक करते हुए और अपना अपराध कुबूलने के दौरान भी नानक का मन कह रहा था - "बता ही देता तो बरसों-बरस याद रहने वाला ये किस्सा कहाँ से बनता ठाकुर जी!"

अगले दिन टिल्लू भैया मारकीन भी ले आए पर इतनी जगहँसाई के बाद भाईजी का मन स्थिर न हो सका। मशीन का बटन दबते ही उस दिन का समूचा दृश्य उनके रोंगटे खड़े कर देता। फिर श्रीगणेश गलत होने को अपशकुन मानकर लोग कालिया के मसाले ही लाने लगे। कुल मिलाकर कालिया का एक दिन का भी नुकसान नहीं हुआ। कुछ दिन के बाद लोगों ने देखा भाईजी मशीन को रिक्शे पर लादकर कहीं ले जा रहे थे। पता चला साजिद को औने-पौने या मुफ्त में ही वो मशीन लौटानी पड़ी। चाँदी साजिद ने ही काटी।

इस हादसे के बाद भाईजी अपनी गिरती साख के प्रति चिंतित हो गए। उन्हें लगा अगर ऐसे ही चला तो गली-मोहल्ले में बरसों-बरस बनाई इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। जो लोग पीठ-पीछे हँसी-ठट्ठा कर रहे हैं वे सामने भी लिहाज नहीं करेंगे। यही सब सोचकर भाईजी अपने रोब-दाब को लौटाने-बनाने की कवायद में लग गए। सबसे पहले तो उन्होंने पहले से चली आ रही कमेटी के सदस्यों की संख्या बढ़ाई। वैसे भी हमारा मोहल्ला धन की दृष्टि से पिछड़ा ही था फिर सौ रुपये मासिक की कमेटी पर लोगों की आस लगी रहती। इसके चलते उनके बहुत से काम सँवर जाते और आड़े वक्त में मदद हो जाती। चूँकि कमेटी के सर्वेसर्वा भाईजी खुद थे तो पहली कमेटी पर उनका ही हक होता। पाँच हजार की बूटी वाली कमेटी के लिए बोली लगती। इसका कारण ये था कि अधिक बोली लगाने वाले की कमेटी खुल जाती पर बोली लगाने का रुपया उसकी कमेटी के रुपयों में से काटकर अन्य सदस्यों में पैसा बाँट दिया जाता। भाईजी इस बंदिश से मुक्त थे। महीने के जिस दिन कमेटी खुलती पूरे मोहल्ले में उत्सव का सा माहौल होता। हम बच्चों को साफ-सफाई और कुर्सी लगाने, दरी बिछाने के इंतजाम में लगना होता। आगे एक बड़ी टेबल सजाने की जिम्मेदारी मेरी होती। चाय-पानी का इंतजाम होता। पूरी गली लोगों से और बीड़ी के धुएँ से भर जाती। लगे हाथ भाईजी कमेटी के लाभ गिनाते हुए एक भाषण भी लोगों को पिला देते। वे सोच-समझकर भाषण देने का समय तय करते। कमेटी निकलने से पहले का समय उनके अनुसार एकदम सही था। कमेटी खुलने के लालच में कोई कहीं भागता नहीं था और मर्जी न मर्जी उसे भाषण सुनना ही पड़ता था। पर कमेटी के काम से भाईजी ने बड़ी ही इज्जत कमाई और सदस्यों की संख्या का आँकड़ा पचास तक पहुँचा दिया।

भाईजी के नाकामी के किस्सों पर कुछ धूल-सी पड़ने लगी थी। इसी बीच तिरासी का वर्ल्ड कप शुरू हाने वाला था। टिल्लू भैया क्रिकेट के शौकीन थे और प्रेमी चाचाजी भी खेल के जरिए गली के नौजवान लड़कों में खुद को एक स्टार की तरह देखना पसंद करते थे। "ठाकुरजी ये मौका हाथ से न जाने दो। सारे लोग मान जाएँगे तुम्हारा लोहा।" एक गुदगुदी भाईजी के मन में होने लगी। फिर क्या था वर्ल्ड कप फाइनल का प्रसारण भाईजी की दुकान के बाहर दिखाया जाना तय हुआ। देर रात सीधे प्रसारण के लिए दुकान के आगे टीवी, वीसीआर वाले की दुकान से कलर टीवी किराए पर मँगवाकर एक लंबे से स्टूल पर सजाया गया। दरियाँ बिछीं। गली और मोहल्ले की जबरदस्त भीड़ उनकी दुकान के सामने जमा हो गई। क्या लड़के, क्या आदमी, क्या अधेड़ और क्या बूढ़े, क्या बच्चे-सभी झूमने लगे। अधिकांश घरों में टीवी नहीं था, उनके लिए बाकायदा मैच देखने का इंतजाम कराने के चलते भाईजी का डंका पिटने लगा। टिल्लू भैया और प्रेमी चाचाजी ने भाईजी को सुपरहिट करा दिया। इधर इंडिया की टीम ने भी जीतकर उनकी किस्मत चमका दी। हर किसी की जुबान पर भाईजी की मेहरबानी से इंडिया का मैच और शानदार जीत का किस्सा था। भाईजी का रुपया जरूर खर्च हुआ था पर रोब पहले से भी ज्यादा चमक गया था।

भाईजी पूरी फॉर्म में आ गए थे। गली के लड़के भविष्य में मिलने वाले मैच के मजे की सोचकर अब उनकी बड़ी पूछ करने लगे थे और भाईजी सातवें आसमान पर बैठकर झूम रहे थे। लड़कों को अपनी बादशाहत तले देखकर उन्हें नशा होता। कई बार प्यार में तो कई बार गुस्से में उन्हें बेरोक-टोक गरियाने लगे थे। नए लड़कों के फैशन उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं थे। "अबे अमरीखान के लमडे... सँभलकर। आधी कमीज पेंट में और आधी बाहर क्यों निकल रइ है तेरी? ...और कालर उठा रखे हैं बताऊँ अभी... बाल काढ़े नहीं हैं और सीधे तरिया क्यों नहीं चलता बे। बटन बंद करले, बहुत देखे सीने वाले तेरे जैसे कबूतर। कौन सा तीर मारा है बे तूने?" 'अमरीखान के लमडे' यानी अमरीकी लड़कों के नकलची, उनकी नजर में तुच्छ, आवारा, हिप्पी जैसे, जिनको सुधारने का जिम्मा उन्होंने बिना किसी के दिए ही खुद ले लिया था। इस मामले में वे पूरे तरह स्वदेशी के भक्त थे। अमरीका के बारे में ज्ञान न होने पर भी उसे लज्जित करने का कोई मौका न चूकते। शुक्र है आज ओबामा को उनकी ये अनूठी गाली सुनने को नहीं मिली नहीं तो महाबली का सारा अभिमान चूर-चूर हो जाता। चूँकि मोहल्ले के तमाम छोकरे ऐसे आड़े-तिरछे फैशन में कई-कई बार दिखते तो भाईजी की जुबान हंटर की तरह 'अमरीखान के लमडे' फटकारती रहती। लड़के जो बचपन से ही भाईजी का रोब देखते पले थे इन बातों का बुरा नहीं मानते। भाईजी का आत्मविश्वास इतना बढ़ चला था कि अब तो कोई औरत-आदमी उनके कमेंट सुने बिना गली से गुजर नहीं सकता था। कई बार मुझे लगता कि वे गली की मक्खियों तक पर छींटाकशी कर रहे हैं।

रात में, शान से गली में सोते। अधिकतर मैं ही उनका बिस्तर किया करता। खाट पर गद्दा-चादर लगा देता और उनका बेटा यानी बड़े भैया घिया रंग का उनका चमचमाता टेबलफैन स्टूल पर लगा देते। साथ में पानी का गिलास ढककर रखा जाता। कहना न होगा कि भाईजी के ठाठ निराले थे। गर्मी में कमरे के भीतर सोना उन्हें पसंद न था। ताई के गुजरने के बाद कई बार घर में बनी बाजरे की खिचड़ी, साग, हलवा जैसा तर माल और कम बनने वाली मटन की सब्जी माँ उनके लिए भिजवा देती। चिकन-मटन के तो जबरदस्त शौकीन थे। वैसे बहुएँ भी उनके बेटों की तरह उनसे दबती-डरती थीं इसलिए सेवा में कमी नहीं छोड़ती थीं। बेटे पढ़ नहीं पाए पर भाईजी के रुपये-पैसों से अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे थे। बड़े लड़के को तो फिर भी कहीं छोटी-मोटी नौकरी मिल गई पर छोटे को कोई काम न मिलने से भाईजी ने उन्हें दुकान पर बिठवा दिया। बिन माँगे मोती मिलने पर भी छोटे भैया ने अपनी तरफ से आगे बढ़कर न ही कोई उत्साह दिखाया न कोई लगन। हाँ जुआ खेलने का ऐब जरूर पाल लिया जिसके कारण बाल-बच्चेदार होने पर भी वे भाईजी से पिटा करते। ऐसे लड़के पर भी उन्हें कम गुमान नहीं था। धमधूसर और आलसी लड़के की सारी असलियत जानने वालों के सामने भी अक्सर कहा करते थे - "ऐसा लड़का है जी... के जमीन में पैर मारे तो पानी निकाल दे।" उनके वफादार टिल्लू भैया इस झूठ पर भी अपना सिर हिलाते रहते।

काफी समय ऐसा चलने से भाईजी के जीवन में उकताहट-सी भर रही थी। वो फिर से कुछ नया करने की फिराक में थे। उनकी मौत के बाद जब मैंने उनकी इस उकताहट पर ठहरकर विचार किया तो समझ सका कि जीवन में हरदम एक नए काम की तलाश दरअसल उनके मन का एक खालीपन था। एक ऐसा खालीपन जो सही काम और सही मुकाम न मिलने के कारण पैदा हुआ था। कम पढ़े-लिखे होने को तो उन्होंने अपने रोब और रुपये से ढक दिया था पर उस खालीपन को कभी न भर पाए। उनके जैसे लोग अक्सर अपने हालात से समझौता कर लेते हैं पर भाईजी ने ये मिजाज पाया नहीं था। अति आत्मविश्वास और उत्साह का सागर उनके मन में छलकता रहता था। इसी उद्यमशीलता ने फिर से प्रेरित किया और फिर टिल्लू भैया के धंधे पर खतरा मँडराने लगा। हो भी क्यों नहीं अब नए खतरे उठाने से मन डरता था और मन की सुनते तो बहुत पहले ही भाईजी से अलग हो चुके होते। उम्र तो भाईजी की उनसे अधिक थी पर जोश नौजवानों का था। इस बार बहुत दिन बाद हूक उठी थी उन्हें। सोचा कि दुकान के कोने को फिर आबाद किया जाए। पर इस बार मुँह छोटे बेटे और बहू ने बिचकाया। कारण था कि दुकान को समेटने से छोटे बेटे का धंधा मंदा पड़ने का खतरा था। उसका परचून का शुरू किया धंधा अभी जमा नहीं था और फिर भाईजी का जोड़ा रुपया कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं कि बढ़ता ही जाता। धंधा मंदा होने से भाई जी के नौकर भी कबके विदा हो चले थे। दोनों भाइयों ने पत्नियों संग सलाह की, कि भाईजी को रोका जाए पर उनकी दबंगई के आगे मुँह कौन खोले? तमाम मुसीबतों को पार करके भाईजी ने फिर टिल्लू भैया को मना लिया - "देखियो टिल्लू हमारी पिट्ठी-चटनी की दुकान खूब चलेगी। शादी-ब्याह में सबको दाल की पिट्ठी चाहिए ही। मूँग हल्वे की, दही-वड़े की, पकौड़ों की पिट्ठी की माँग कभी खत्म न होगी। हल्वाइयों से प्रेमी बात कर रहा है। बुढ़ापे का सहारा हो जाएगा। राज करेंगे राज।"

दुकान का अभिशप्त कोना फिर आबाद हो गया। पैसा और दाँव खेलकर मशीन आ गई। दाल की पिट्ठी बनाने की बड़ी-सी मशीन लोहे के पुराने स्टैंड पर धर दी गई। नानक और नानक जैसे कई लोग ताक में थे कि इस बार फिर से अरसे तक चटखारे लेकर सुनाने वाला किस्सा हाथ लगने वाला है। दिल तो टिल्लू भैया का रात ही से बैठ गया था जब वो सुबह पीसी जाने वाली दालें भिगो रहे थे। जाने क्या बड़बड़ा रहे थे लगता था कोई मनौती-सी माँग रहे हैं। सुबह दाल पिसी और कमाल की बात ये रही इस बार कोई गड़बड़ नहीं हुई। तमाशबीनों का दिन खाक हुआ क्योंकि दाल कुछ देर भगौनों में प्रतीक्षा करने के बाद ग्राहकों के घर भी पहुँच गईं। भाईजी एक अचंभित हँसी-हँस रहे थे। कमाई और मुनाफे का गणित आज कुछ ज्यादा न बैठा था पर संतोष और आत्मविश्वास का समीकरण हल होता दिख रहा था। इस बार भाईजी की तिकड़ी हर दिन जोश पकड़ रही थी। प्रेमी चाचाजी भी इस बार मन लगा रहे थे। कई बार पिट्ठी में कोई कमी आ भी जाती तो टिल्लू भैया अपने जीवन का पूरा अनुभव निचोड़कर उसे सुधार देते। ग्राहकों को पटाने का जिम्मा प्रेमी चाचाजी का था ही। बस भाईजी की आवाज फिर गूँज उठी। गली के लड़कों के फैशन पर फिर से छींटाकशी होने लगी और अमरीका फिर से लज्जित होने लगा। अमरीखान के लमडे गली में घुसते-निकलते समय भयभीत रहने लगे।

सब कुछ ठीक चलने पर भाईजी खाने की नित नई चीजें बनाने, बेचने की प्लानिंग करने लगे। कभी मटके पर रोटी सेंकने के निराले काम के बारे में सोचते तो कभी मटन पुलाव बनाने के बारे में। गजब का आत्मविश्वास उन्हें दृढ़ता देता कि वो जो भी बनाएँगे अव्वल दर्जे का होगा। उनकी अनंत इच्छाएँ मुक्त आकाश में विचर ही रही थीं कि एक दिन पिट्ठी पीसते हुए मशीन धोखा दे गई। आवाज पूरी हो रही थी पर मशीन की बेल्ट ने घूमना बंद कर दिया। भाईजी ने फुर्ती दिखाने के चक्कर में रुकी हुई बेल्ट को अपनी उँगली से घुमाना चाहा कि अचानक बेल्ट तेजी के साथ उनकी उँगली घसीटती घिर्रीदार ब्लेड में ले गई और खट्ट से उनकी उँगली का ऊपरी हिस्सा मशीन में कट गया। भाईजी का हाथ खून से लथपथ हो गया। मशीन तो चल पड़ी पर भाईजी का धंधा ठप्प हो गया। उँगली का जाना एक अभिशाप की तरह भाईजी के जीवन में उतरा। उन्हीं दिनों भाईजी की कमाई और पुराने जेवर चोरी हो गए। हमेशा लोगों से भरी गली में चोर कब आया कब गया किसी को पता ही नहीं चला पर बाद में पूरी गली में ये चर्चा गर्म रही कि छोटे भैया ने जुए में बहुत कुछ गँवा दिया है।

ये भाईजी के बुरे दिनों की शुरुआत थी। पूरे जी-जान से जिस शान को बढ़ाते-बचाते रहे थे अब उसकी मिट्टी पलीद होने के दिन थे। पूँजी और दुकान हाथ से निकल जाने पर सबने रंग दिखाना शुरू कर दिया। मैं बी.ए. में पढ़ रहा था उन दिनों जब देखा भाईजी खाने को तरस रहे हैं। "देख ले बेटा सूअर के बच्चों ने गत बना दी तेरे भाईजी की। क्या नहीं किया इन सुसरों के लिए। पानी को नहीं पूछते दोनों।" माँ से सुना करता था कि समय साथ न हो तो साया भी साथ छोड़ देता है - भाईजी के केस में मैंने इस बात को सच होते देखा। उम्र, धन और शरीर का खत्म होना आदमी को कितना निरीह और लाचार बना देता है भाईजी इसके प्रमाण बन चुके थे। हर समय बीड़ी-सिगरेट पीने की लत के चलते उन्हें भयानक दमा हो गया। बलगम वाली खाँसी के लंबे दौरे जैसे ही पड़ते बहुएँ गंदी गालियाँ देने लगतीं। राज पलट गया था। कद से नाटे भाईजी बहुत कमजोर से दिखते थे। उनको देखकर गली का नया बच्चा सोच ही नहीं सकता था कि इस आदमी से किसी जमाने में गली-मोहल्ला थर्राता था। प्रेमी चाचाजी तो ये दुर्दिन देखकर जल्दी ही छिटक गए। नानक के संग मिलकर कमेटी के सर्वेसर्वा वही बन गए। सब कुछ एक साथ ही छीन लिया गया भाईजी से। पर टिल्लू भैया आखिरी दम तक अपने खोमचे से उन्हें जैसे-तैसे पालते रहे। वो न जाने कैसे अपना परिवार चला रहे थे। ऊपर से उनकी रोज पीने की लत। पर भाईजी की हुक्मउदूली नहीं की कभी। माँ दिन का खाना दे जातीं तो वो भी छोटी बहू से न देखा जाता। भाईजी को चोरी-छिपे कुछ रुपये देने वाली माँ को जब लालची और घर के भेदी का तमगा मिला तो उनकी उदारता पर ताला लग गया। ढाबे का मिर्चीला खाना भाईजी की जुबान को बेहद तकलीफ पहुँचाता इसीलिए रोज खाने की रस्म निभाने के बाद बचा हुआ खाना टिल्लू भैया से कूड़े में फिकवा देते।

अपने अंतिम दिनों में भाईजी दुकान के पीछे के स्टोरनुमा कमरे में एक ढीली-ढाली खाट पर बिछी चीकट चादर पर पड़े रहते। स्टूल पर पड़े टेबल फैन का चमकदार रंग गायब हो चुका था। कभी भव्यता की कहानी कहने वाले उसके घिया रंग को देखकर अब उबकाई-सी आती थी। भाभियों की सख्ती के बाद भी मैं कई बार लाइट जाने पर उनके कमरे में पंखा झला करता था तो मेरे हाथ को पकड़कर कहते "रहने दे भैया गर्मी की आदत हो गई है अब तो मुझे। तू लिखने-पड़ने वाला लड़का है टैम न खराब किया कर।" मैं गहरे दुख से उनका हाथ परे सरकाता और पंखा झलते हुए स्वरहीन आवाज में मेरे सवाल चिल्लाते - "क्यों पड़े हो इस गंदे ढीले बिस्तर पर? क्यों नहीं फिर से वैसे ही सोते हो गली में शान से? उठो और चीखो अपने लड़कों पर? छीन क्यों नहीं लेते अपनी दुकान? फिर से गालियाँ क्यों नहीं देते, हड़काते क्यों नहीं गली-मोहल्ले के लोगों को? क्यों खाते हो बहू की अपमान से दी हुई रोनी सूरत वाली खिचड़ी? उठो फिर से सोचते क्यों नहीं कोई नया काम? इस कबाड़खाने से भागते क्यों नहीं? भाईजी तुम मेरे हीरो थे, नहीं देखा जाता मुझसे कि कोई तुम्हारा अपमान करे, तरस खाए।" अपने ही अंतिम शब्द मेरा दिल घोंटकर रख देते और मैं मर्दानगी को लात मारता हुआ चीख-चीखकर रोता। मेरा स्वर निःशब्द था पर आँखें रोने की गवाह रहतीं। पर भाईजी वैसे ही अड़ियल और ठीठ बने रहते और मेरी एक न सुनते।

उनके बीमार शरीर को ढोकर कभी मैं और टिल्लू भैया किसी सरकारी अस्पताल तक ले जाते। हर बार लगता भाईजी नहीं रहेंगे पर भाईजी कुछ और साँसे खींचकर गाड़ी आगे बढ़ाते रहे। मैं सोचता बस नौकरी लगने तक भाईजी बचे रहें सब देख लूँगा। किसी की नहीं सुनूँगा। आखिरी बार भाईजी को कुछ-कुछ पुराने भाईजी से मिलते तब देखा जब मेरा एम.ए. का रिजल्ट आया और मुझे प्रथम श्रेणी मिली। हमारे खानदान में मैं पहला एम.ए. पास था। "अबे टिल्लू जा भागके मुकंदी के और लड्डू ला किलो भर। पहला लड़का है खानदान और गली-मोहल्ले का जो एम.ए. पास हुआ है। मजाक नहीं है, कर सके है कोई इसकी बराबरी?" भाईजी के काँपते से शरीर से हँसी फूटी पड़ रही थी। टिल्लू भैया से कहकर उन्होंने गली में लडडू बँटवाए और मुझे ढेर सारे आशीष दिए। मेरा विश्वास बढ़ रहा था कि मैं अपने हीरो को उसके पुराने रूप में लौटा लाऊँगा पर वो बुझने से पहले की आखिरी चमक थी भाईजी के चेहरे पर। और भाईजी चले गए। रूआब, ठसक, आवाज की मजबूती और गठा हुआ शरीर सबको बहुत पहले छोड़ चुके भाईजी जो केवल साँसें ही थामे थे... उन्हें भी छोड़ चले। वर्षों बाद उनकी देह को साफ चादर नसीब हुई थी। चादर में लिपटी उनकी पोटली जैसी देह को अपना अंतिम प्रणाम और दान देने के लिए टिल्लू भैया उनके पास बैठे आँसुओं से बुदबुदा रहे थे - "मेरी भूल-चूक माफ करना तुम... चल दिए न ठाकुर जी मुझे छोड़कर... उठ जाओ हठ न करो अब... देखो अमरीखान के लमडे आज कैसे तुम्हारे सामने मूरत बने खड़े हैं।"


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हिंदी समय में प्रज्ञा की रचनाएँ