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कहानी

‘बरबाद’ ...नहीं आबाद
प्रज्ञा


"क्या नाम लेती हो तुम अपने गाँव का... हाँ याद आया गन्नौर न। सुनो आज गन्नौर में दो प्यार करने वालों ने जान दे दी ट्रेन से कटकर।"

"हे मेरे मालिक क्या खबर सुणाई सबेरे-सबेरे म्हारे मायके की। जी भाग गए होंगे दोनों। न दी होगी मंजूरी घरवालों ने। आह भरकर सुनीता काम में लग गई। सात बज चुके थे और अभी चार घरों का काम बाकी था। सवा सात से पहले उसे हर हालत में डिंपल के घर पहुँचना था क्योंकि स्कूल के लिए निकलने से पहले उसका माई से बर्तन मँजवाना जरूरी है। यों तो डिंपल का पति दस बजे दुकान के लिए निकलता है पर माई से काम करवाना उसकी शान के खिलाफ है।

पचास साल की उम्र की सुनीता अपने से दस-पंद्रह साल छोटी मालकिनों को भाभी शब्द से संबोधित करती है पर गुस्से में कभी-कभी भाभी डिंपल को डिंपल मैडम कहती है।

"सुन लो भाभी, आज डिंपल मैडम ने एक साथ चार चादर डाल दीं धोने ने के लिए। सब पता है मुझे, कल नहीं आई थी न काम पर। सुबह से ही मुँह बना रक्खा है। उसी का बदला है और क्या? डाल दो। मैंने भी मसीन में डाली और दो पानी से निकाली। एक उसी का काम करती रही तो कमा लिए मैंने चार हजार रुपये महीना। और अभी तनखा बढ़ाने को कहूँ तो रोने लगेगी।"

अर्से से उसकी ऐसी बातें सुनने की आदी हो चुकी हूँ। अपना काम करती जाएगी और मुझे खड़ा कर लेगी श्रोता बनाकर। कई बार मैं न भी खड़ी हों तो भी तेज आवाज में अपनी बात सुनाती ही चली जाती है। उसकी हरियाणवी दिल्ली के पानी में सराबोर है। कुछ ठेठ शब्दों के साथ काम के बीच-बीच में पूछती रहती है सुन रही हो न भाभी? मुझे अपनी बात में शामिल करने का उसका अपना तरीका है-"अब तुम बताओ मैं क्या करूँ?" यही उसका रामबाण है। मर्जी न मर्जी बात में शामिल होना ही होगा क्योंकि सुनीता के लिए आपकी राय बड़े मायने रखती है। उसे लोगों का मनोविज्ञान पढ़ना बखूबी आता है इसलिए सबके सामने अपनी राम कहानी नहीं कहती। अपने सुधि श्रोता उसने चुन रखे हैं। पड़ोस की मानसी को भी शुरू-शुरू में अपनी कहानी सुनाने लगी थी पर जल्दी ही उसने महसूस किया कि जिस दिन वो कहानी सुनाती उसी दिन मानसी कभी उससे बालों में मेहँदी लगवाती, पैर की मालिश करवाती या खिड़की-कूलर साफ करवाती थी। इस अतिरिक्त श्रम का कोई भुगतान न किया जाता। भुगतान स्वरूप कहानी सुन ली यही क्या कम है? मानसी को शुरू से उसकी तंगदिली के कारण सुनीता आँखें तिरछी करके नाम लेने या भाभी कहने की बजाय 'वो' संबोधन ही दिया करती है।

मैं अब तक उसे जितना भी जान पाई थी उसका कुल निचोड़ ये है कि सुनीता एक मेहनती औरत है। अच्छों के साथ बहुत अच्छी और बुरों के साथ बुरी नहीं पर अपने काम से काम रखने वाली। पर बात केवल इतनी सीधी भी नहीं है। उसका एक विलक्षण गुण ये भी है कि वह अच्छी-तटस्थ और तटस्थ-अच्छी एक साथ भी हो सकती थी बशर्ते कोई बात उसे छू जाए। उसकी दरियादिली की कोई सीमा नहीं थी बस कोई उसे दीदी कह दे तो सब कुछ निछावर कर दे। पिछले पाँच साल से डिंपल मैडम का काम इसी कारण चल रहा था। सुबह डिंपल मैडम पर गुस्साने-खीजने वाली सुनीता शाम तक डिंपल भाभी की तरफदारी करने लगती।" आखिर कौण है जी उसका? बिचारी दुख-दर्द कह-सुन लेती है मेरे ते। जी हल्का कर लेती है। मैं तो वैसे भी दुखिया की संगी हूँ। जी आदमी की तरफ से घणी परेशान हो रक्खी है। सही बात है जी आदमी ढंग का न हो तो सब सुख बराबाद हैं।"

"अरे सुबह तक तो तुम उससे बड़ी नाराज थीं। अब क्या हो गया?" शुरू में उसके स्वभाव से वाकिफ न होने के कारण मैं सवाल कर बैठती।

"क्या करे भाभी तुम्हारे जैसों के धोरे मैं भी अपने दुख बाँट लेती हूँ और सुन भी लेती हूँ। और नराजगी कैसी? तुम लोगों की दुआ से खिंच रही है गाड़ी। टैम पास हो लेगा मेरा भी।"

धीरे-धीरे उसके स्वभाव को जानकर मैंने इस तरह के सवाल करने छोड़ दिए। और जान लिया ये औरत किसी का बुरा करना तो दूर बुरा सोच भी नहीं सकती। सुनीता वाचाल नहीं है पर चुप रहना उसे पसंद नहीं। वह कहती भी है अक्सर "बोलते-बतियाते टैम पास हो जाता है मेरी जैसियों का। चुप रहने वाली घुन्नी होती हैं।" मैं महसूस करती हूँ उसके घर में आते ही रौनक-सी आ जाती है। "जी नमस्ते" से घर में कदम बढ़ाने वाली सुनीता काम के दौरान सारे समाचार ले-दे लेती है। मिलनसार और खुशमिजाज सुनीता का मानना है - "जी सबसे राम-रमी रखने में कैसी बुराई। दो बोल प्यार से बोल लो और क्या धरा है जिनगी में।"

प्यार के बोलों पर तो जान झिड़कती है। प्रेस के कपड़े लेने आए महेश से हमेशा उसकी लड़की का हालचाल पूछना, मेरी पड़ोसन के सर्वाइकल के दर्द से पीड़ित होते ही दुख व्यक्त करना जैसी कई बातें उसकी आदत में शामिल हैं। एक दिन देखा कि बड़े सारे पत्ते लेकर आई है।

"ये किसलिए लाई हो? इनका क्या होगा सुनीता?"

"जी आप न जानोगे इसे। देसी इलाज के लिए हैं। अंडुए के पत्ते हैं। इन्हें सरसों का तेल लगाकर तवे पर हल्का-सा गरम कर लो और चोट पर बाँध लो। बस हवा न लगनी चाहिए। कसम से पुरानी से पुरानी चोट और दरद दूर हो जाता है। नीचे एक भाभी के आदमी के हाथ में चोट लगी है। बीर-मरद कब से परेशान थे। कई महीने हो लिए दवाएँ खाते। मुझे पता लगा तो मैं लेती आई।"

फौज में रहे अपने पिता के इस हुनर को जितना भी जानती थी सबको बताती रहती। कमाल की बात तो ये थी कि अधिकांश शहराती जो आधुनिक सुविधओं और वस्तुओं के बीच जी रहे थे वे भी उसके देसी नुस्खों पर अमल करते थे। इस सबके पीछे उसका सलीके से रहना-बोलना, उम्र और अनुभव, बोली का जादू और आँखों से झलकता ढेर सारा भरोसा ही तो था जो इनसान को उसकी बातों पर अमल करने पर मजबूर कर देता। प्यार और अपनेपन की भूखी है सुनीता, पर इतनी बेवकूपफ नहीं कि असली और नकली का फर्क ही न जान सके। नीचे वाली मद्रासी आंटी की बेटी जब उसे सुनीता आंटी कह देती तो ढेर-ढेर आशीषों की बारिश कर देती। और जिससे मन खट्टा हो जाता फिर उसकी कोई चर्चा ही जुबान पर नहीं लाती। हर समय उसकी कोशिश यही रहती कि कोई लड़ाई-झगड़ा न हो। अपनी तरफ से वह हर संभव कोशिश करती है सबको खुश रखने की। चाहे कोई खराब व्यवहार भी करे तो भी उसका उसूल है "चुप रहो और निभाते चलो।" मैं कई बार सोचती हूँ कि ये औरत यहाँ रहती भी नहीं फिर भी हमसे ज्यादा लोगों को जानती है। जिन्हें हम रोज मिलकर हँसते-मुस्कुराते आगे बढ़ जाते हैं, इसे उनके दुखों का पता है। नाम लेने भर की देर है वह उनकी तकलीफों का बयान कर देगी। ऐसा नहीं है कि उसमें भेद लेने की जन्मजात प्रवृत्ति है बल्कि ये तो उसके अनूठे स्वभाव का हिस्सा है।

आज नमस्ते करने के बाद सुनीता अपने स्वभाव के विपरीत न 'बोल-बतिया' रही थी न ही मेरी बातों का सही ढंग से जवाब दे रही थी।

"क्या बात है आज तबीयत खराब है?"

"नही तो..."

"ऐसे तो तुम चुप नहीं रहतीं?" आत्मीय शब्दों का सहारा पाकर उसके मन की गाँठ खुलने लगी।

"क्या करोगे जी इस गरीबनी का दुख जानकर? क्या कहूँ... आदमी चला गया, ससुरालवालों ने धोखा कर दिया और छोड़ दी मैं भटकने को। घरों में काम करके बेटे-बेटी पाले। सादियाँ कर दीं। अब छोटे की बाकी है। लाख है मेरा बेटा। नसीब वाली होगी उसकी औरत पर तकदीर में जाने क्या लिखा है। दो साल पहले जब बड़े की सादी की थी तो इसे उसकी साली पसंद आ गई थी। जी लड़की भी चाहे थी इसे, मैंने बात भी चलाई पर बहू की माँ नाट गई - एक घर में दोनों बेटी न देगी।"

"तुमने कुछ समझाया नहीं उसे?" मैंने पूछा।

"भतेरी समझाई पर चक्कर दूसरा था। मैं ठहरी गरीब। समधिन पीछे एक बेटी देकर पछता रही थी। सबके सामने बोल नहीं सकती थी। मेरे ते बहू ने बताई कि माँ तो अच्छा घर देख रही है। और जी बहू की भैन हमारे घर भी आती थी और मेरे प्रिंस ते खूब बोले-चाले थी। पर सादी कर दी उसकी। वो मुंबई चली गई। सवा साल बाद वापस आई है तबसे प्रिंस को फोन करे जा रही है कि मेरी बहन को मुझसे मिलाने ले आ। मुझे ले जा कुछ दिन के लिए मौसी से मिलाने।"

"आखिर बात क्या हुई?"

"वो कैसे बताउँ... वो... जी बस बच्ची बहुत तंग हो ली वहाँ... आदमी संग खुस न रह सकी।"

"क्या मारता-पीटता था?"

"जी वो भी... बस समझ लो लड़की ने वहाँ सुख जाना ही नहीं... आदमी नामरद निकला।"

दरअसल सुनीता की समधिन मेहतरानी थी पर उसकी नौकरी सरकारी थी। समधी ने भैंस पाल रखी थीं तो आमदनी अच्छी थी। फिर दूसरी लड़की सुंदर भी बहुत थी तो उनका मन था अपने से अच्छी कमाई वाले घर में ही उसका रिश्ता करेंगे। इत्तफाक से लड़का भी मिल गया, वो भी सरकारी नौकरी वाला। सुनीता के बहुत आग्रह और लड़का-लड़की के एक-दूसरे को चाहने के बाद भी लड़की की शादी वहीं कर दी। सुनीता और उसके लड़के ने दिल पर पत्थर रख लिया। साल भर बाद अब जब फिर लड़के की कहीं बात चलाने की सोच ही रही थी कि ये खबर मिल गई। जितना मुझे बताया उससे तो ऐसा ही लगा कि अब लड़की दोबारा मुंबई तो नहीं जाएगी। और ये भी पता चला कि सुनीता कुछ दिन के लिए उसे अपने घर भी बुलाना चाह रही है ताकि वो बहन से मन की बातें कर ले। पर उस दिन लगा कि सुनीता के मन में और भी कुछ था जिसे बताते-बताते वो हिचक गई थी। ऐसा लगा कि जितना उसने बताया ये तो केवल भूमिका है आख्यान कुछ और ही है। इस बात को हुए कुछ दिन गुजर गए। मैं भी व्यस्त थी और सुनीता ने भी कोई चर्चा नहीं छेड़ी। उस दिन शुक्रवार था। अगले दो दिन के अवकाश से मन राहत और खुशी से भरा था। आज कुछ मीठा बनाने का दिल था। काम के दौरान सुनीता भी आ गई।

"कुछ बना रही हूँ खाकर जाना।"

"ओहो तो आज बड़े खुस लग रहे हो। कल सबकी छुट्टी जो है। चलो मैं भी कल देर से आऊँगी। कल वो पूजा आ रही है।"

"कौन पूजा?"

"जी बहू की भैन की बताई थी न आपको... वही।"

"तो अब क्या हो रहा है उसका?"

"जी आए हुए भी हफ्ता हो लिया, घरवाले ने फोन भी नहीं किया। न ससुराल में से किसी ने खबर ली। लड़की मरी कि जिंदा है। जी इसकी माँ तो कह रही है कि हमें भी न भेजनी लड़की। सच में जी क्या करेगी वहाँ जाकर। देखो सादी में हजार-हजार के सूट चढ़ा दिए। सोने की दो-तीन टूमें-टामें दे दीं उससे क्या बन गया सब? जब लड़की खुस न रही तो फिर मिट्टी हो लिया न सब।"

"तलाक दिलवा के दूसरी शादी कर दें उसकी।"

"जी हमारे में कहाँ होते हैं तलाक। कौन काटे कोरट-फोरट के चक्कर। फिर औरत की दूसरी सादी कौन-सी आसान है। दुनिया तो उसी में दोस काड़ देगी। बाल-बच्चा न हो तो दोस उसी का, तलाक में तो उसका। विधवा हो जाए तो भी उसी का। सुंदर हो तो उसका। जी जब आदमी गुजरा मेरा, ससुराल वालों ने मुँह फेर लिया। एक रुपये की मदद न की। पता नहीं कौन-से कागजों पर अँगूठा लेके हमारा हिस्सा भी अपने नाम कर लिया। उन्होंने सोचा था मर-मरा जाएगी पर जी मेरे आगे तीन बालक थे। खुद को देखती या उनको। मन कड़ा करके काम करती गई। बड़े डोब लेके पाले हैं जी अपने बच्चे, पर अपनी ज्योति को न डाला इस काम में। घणी कही लोगों ने ले आ काम पर दो पैसे कमाएगी पर जी नहीं मैं अकेली काफी थी झूठन माँजने का और गंदगी साफ करने को।"

अगले कुछ दिन तो सुनीता की हँसी देखते ही बनती थी। उसकी बातें पूजा से शुरू हो रही थीं और पूजा पर खत्म। आज उसने ये किया। आज ये बनाया। आज घर साफ कर दिया जी। अपने भतीजे का बड़ा ख्याल रखती है। पूजा के आने से जैसे उसके घर में बहार आ गई थी। सुनीता की कोशिश यही रहती जितने दिन को आई है खूब खुश रहे। यों भी उससे किसी का दुख देखा नहीं जाता था। उसका बचपन बड़े सुख में बीता था। पिता फौज में थे। अपना घर था। माँ ने हमेशा लाड़ से रखा। माँ के मरने के बाद जैसे सब कुछ बदल गया। पिता ने जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए सुनीता की शादी कर दी। शादी के बाद पता चला कि उसके साथ धोखा हुआ है। जो पक्का घर दिखाकर शादी की गई थी वो किसी और का निकला। सुनीता का पति जोगेश्वर बैंड पार्टी में बाजा बजाता था। कमाई का कोई ठीक था नहीं क्योंकि उसे नशे की लत थी। नशे में रात-रात भर सुनीता को मारा करता और दिन में नशा उतरने पर उसे सहलाने-दुलराने लगता। सुनीता इसी प्यार की भूखी थी। प्यार मिलते ही कोई गिला-शिकवा नहीं करती। अक्सर बताती है - "न था जी हमारे पास कोई पैसा, ज्योति का बाप भी बहुत मारा करे था। पर उसने प्यार भी कम नहीं दिया। कोई एक टाफी भी दे देता तो खुद न खाता मेरे लिए बचा के रखता। रात चाहे कितना कलेस करे खाना हम साथ खाकर ही सोते। जी भले मारे था पर उसके साथ ही ओढ़ने-पहनने के सारे सुख गए मेरे तो।"

"क्यों अब भी पहनो न जो मन करे?"

"दुनिया नहीं जीने देगी मेरे मालिक। बाप के मरने के कई दिन बाद एक अच्छा सूट पहन लिया था तो जी बड़े बेटे ने कह दी, माँ छोरी-सी बन के कहाँ जा रही है आज?" बड़ा तो जी अपने बाप का भी बाप है। पीने में उसते आगे, गंदी जबान और बीवी-बच्चों की कोई परवाह नहीं। उसका घर मैं ही चला रही हूँ। पैसे पर जान देता है। सालों बीत गए दुख न कटा। बड़ा बेटा अपने सगे भाई से जलता है। जी कहीं मेरे प्रिंस के साथ वैसा ही न करे जैसे बाप के भाइयों ने उसके साथ किया।" सगे भाइयों ने जोगेश्वर से मुँह मोड़ लिया था। रिश्ते की एक नंद दोनों को दिल्ली ले आई। यहाँ आकर सुनीता ने घरों में काम करना शुरू किया। मुँह अँधेरे काम पर निकलती। कहीं चाय-वाय मिल गई तो ठीक नहीं तो भूखे पेट ही दो बजे तक काम निपटाती। घर आकर घर का काम और फिर शाम को घरों में बर्तन का काम। रात में अपना घर। बस फिर अर्से से सुनीता दिल्ली की ही हो गई। तमाम दुखों में इस औरत ने हार नहीं मानी। हौसला करके आगे बढ़ती गई। तीन बच्चों को जन्म दिया पर घर के हालात और लड़ाई-झगड़े में उन्हें पढ़ा न सकी। कच्ची बस्ती में जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी उसका हो गया। कच्चा-पक्का घर भी बना लिया था। दो बच्चों की शादी के बाद अब उसे प्रिंस की ही चिंता थी।

इधर जिस दिन से पूजा उसके घर आई थी उसी दिन से खाने-पीने का छोटा-मोटा सामान उसके लिए खरीदकर ले जाती। शाम को उसके लंबे बाल सँवारती और अगले दिन उन बालों का गुण-गान करती थी। आखिर एक दिन संकोच से भरकर मुझसे बोली - "जी मन में एक बात है। क्या पूजा को अपने घर ले आऊ, प्रिंस के लिए?"

"क्या सबसे बात कर ली? सास-ससुर, बेटे से और फिर प्रिंस से? क्या प्रिंस तैयार है?" मैंने पूछा।

"मैं मना लूँगी उसे। देखो प्रिंस की ही थी तभी तो आई न वापस। और उसका क्या कसूर है? कमी तो आदमी की थी। वो तो प्रिंस को ही चाहती थी न। और सास-ससुर और बेटा मेरे लिए क्या कर रहे हैं जो उनसे कुछ पूछूँ?"

"पहले प्रिंस से ही बात करो। कहीं ऐसा न हो शादी की बात पूजा के कान में डाल दो और प्रिंस तैयार न हो और फिर तैयार हो भी जाए तो कहीं जीवन भर उसे ताना न मारता रहे। दुखी रखे... समझ रही हो न?"

"जी मैंने ज्योति ते और डिंपल भाभी ते बात की है।"

"क्या कहा दोनों ने?"

"जी डिंपल भाभी ने तो थोड़ी ही न-नुकुर की पर राजी हो गई, पर जी मेरी ज्योति तो नराज हो गई। बोली 'मेरे भाई के लिए दुनिया में यही लड़की रै गई है? हमें न करनी इससे सादी। मेरा भाई तो कुँवारा है। माँ तू भाई की जिनगी न खराब कर।' ...अब आप ही बताओ जी जीवन में इतने दुख उठाकर भी क्या उस दुखियारी का दुख देखे जाऊँ तो क्या सीख ली जिनगी से मैंने?"

मैं अवाक रह गई उसकी बात सुनकर। एकाएक उसका कद कितना बढ़ गया था। मुझे लगा मेरे आस-पास शायद ही इतनी साहसी और सुलझे विचारों की कोई महिला होगी। इतने कष्ट सहने के बाद जब हम बेहतर स्थिति में होते हैं तो पिछला सब भूल जाते हैं। पर सुनीता सबसे टकराकर पूजा को अपनाने का मन बना चुकी थी। और अब चाहे किसी से लड़ना पड़े या मनाना पड़े। मैं जानती हूँ एक बार निर्णय करके वो उसी दिशा में आगे ही बढ़ेगी। उसने बेटे को मुश्किल से ही सही पर मना लिया, बेटी ने भी देर-सबेर जिद छोड़ दी। अब बस पूजा के माँ-बाप से बात करनी बाकी थी। पूजा अपने घर लौट गई थी। सुनीता महीना खत्म होने के इंतजार में थी। तनख्वाह मिले तो पूजा के लिए कुछ खरीदकर सोनीपत जाए। सब घरों से उसने महीने के पहले शनिवार की छुट्टी भी माँग ली थी। रोज ही नए-नए मंसूबे बनाती - "जी सोने की तो नई चाँदी की दो-एक टूमें बनवा लूँगी। ऐसे कपड़े लूँगी। पर जी ज्यादा दिखावा नहीं सादी तरीके से कर लेंगे सब... बस पूजा की माँ को मना लूँ... वो भी मान जाएगी देखना तुम।"

इतवार की सुबह मुझे इंतजार था सुनीता के आने का। इस बात का कि आखिर क्या हुआ? सुनीता आई, मुस्कुराई "लगता है बात बन गई।" मैंने कहा।

"नहीं जी सब उल्टा-पुल्टा हो गया... हम घर गए तो पता चला पूजा तो अपने घरवाले के साथ चली गई। जी न जाने कैसा हो आया था हम माँ-बेटे का। सब कुछ जानते-बूझते भी लड़की ढकेल दी नाले में। जी बताते हैं पूजा भी मरजी से चली गई। धमकाई होगी जी। फिर उसे भरोसा न होगा जी कि शादी के बाद भी कोई उसे अपना लेगा?"

अब क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इतने में सुनीता बोली, "जी रिस्ता पक्का हो गया मेरे प्रिंस का।"

"तो इतनी देर से मजाक कर रही थीं तुम? जान निकाल दी मेरी। मेरा तो दिल ही बैठ गया था तुम्हारी बातों से कि..."

"कोई झूठ नहीं कै रही... नहीं जी सच। पूजा तो सच में जा ली।"

"तो फिर?"

"जी वो तो पिंकी है। उनके पड़ोस में रहती है। हम तो जी पूजा के जाने की बात सुनके चुप लगा गए थे। एक बार कही भी मैंने - क्यों भेजी उस घर में? पर उसके माँ-बाप बोले - "जैसी तकदीर उसकी" अब फिर क्या कहती उनसे। तभी समधिन ने कहा पड़ोस में एक लड़की है देख के जा प्रिंस के लिए। जी मन नहीं कर रहा था। क्या आस लगा के गए थे और क्या हो गया। घणा दुख था जी लड़की का मुझे... ऐसे में ब्याह-शादी की बात सुहा नहीं रही थी। समधिन ने जिद पकड़ ली। कही, चल चाय पीले वहाँ चलके। छोरी भा जाए तो ठीक न भाए तो ठीक। बस जी लड़की देख के मन खुस हो गया मेरा। कितना मीठा बोल। गोरी ऐसी कि छूने से मैली हो जाए। सच में जी खाली गोरी ही नहीं थी, नैन-नक्स भी चोखे थे। मेरे प्रिंस ने तो सब मुझ पर छोड़ दिया। अच्छा घर था। माँ-बाप ठीक और लड़की का क्या कहना? जी सीधी, एकदम। आजकल जैसी कोई बात ही नहीं। बस जी इस बार घर बस जाए बेटे का।"

सुनीता की कहानी का क्लाइमेक्स लाजवाब था। बात का बनना, फिर बिगड़ना और बिगड़ के फिर बन जाना। तेजी से घटता घटनाक्रम, परिस्थितियों की उथल-पुथल, पर्याप्त नाटकीयता और फिर प्रयोजन भी... यही तो कहानी का आधार है। फिर सुखांत भी हो गई। इससे बेहतर और क्या हो सकता था? चलिए बेटे का घर आबाद भी हो गया। सुनीता के शब्दों में कहूँ तो "बराबाद नहीं गया उसका सोनीपत जाना।" पर सब कुछ होते हुए भी कहानी यहीं खत्म न हो सकी। कुछ दिन सुनीता अपनी कल्पनाओं में ही डूबी रही। फिर से पुरानी बातें कुछ और नएपन के साथ दोहराने लगी - "सोने की नई तो चाँदी की दो-एक टूमें बनवा लूँगी... वैसे सोने का पानी चढ़ी भी देख लूँगी। कुछ अच्छे-से कपड़े ले लूँगी। पर जी सब शादी तरीके से कर लेंगे... पैसा तो न उनके पास है न मेरे। दिखावा क्या करना है? पाँच लोगों की बरात जाएगी। बस इस बार सब ठीक हो ले तुम्हारी दुआ से।" शादी चार महीने बाद तय हो गई थी। सुनीता पैसे जोड़ने में लग गई। कुछ कर्जा लेने की बात भी उसने कहीं कर ली थी। लड़की के विषय में सारे रिश्तेदारों को बता दिया गया। सास-ससुर नाराज हो गए। अकेले ही रिश्ता तय कर आने की बात उन्हें जम नहीं रही थी। पर सुनीता का अपना तर्क था - "जी जब आदमी गया तो न दिया सहारा इन्होंने। बच्चे मैंने अकेले पाले तो रिस्ते भी मैं तै करूँगी। ...मेरा सुख नहीं देखा जा रहा और क्या। कैसे विधवा-गरीबनी को अच्छा घर मिल गया। जी प्रिंस लाया है न मोबाइल से लड़की की फोटो खेंचकर, तभी से छुरियाँ चल रही हैं - "कहाँ ते मिल गई इतनी सुंदर लड़की? इतनी जल्दी क्या पड़ी है? सब देखभाल के चलना चाहिए। अरे पहले से तै कर आई होगी... ये औरत तो बड़ा-छोटा भी न देख रही।" सुनीता यों तो इन तानों की परवाह नहीं कर रही थी पर उसके भीतर बौखलाहट थी। अपने बेटे को लेकर किसी अनजाने-अदृश्य भय से वह परेशान थी। बार-बार उसकी शादी के बनते-बिगड़ते क्रम ने उसे संकट में डाल दिया था। इधर खर्चे की चिंता भी थी। पर इस सबके बीच उसे सच्ची खुशी मिलती जब सोने से पहले प्रिंस उसे पिंकी से हुई बातचीत बताता। उन दोनों के भावी जीवन के सपनों को सुन-सुनकर ही वह खुश हो जाती। बच्चों के बीच पनप रहा प्रेम भाव उसे उत्साहित करता। सुनीता खुद को अपने लड़के के दोस्त जैसा महसूस करने लगी थी।

फिर अचानक एक शाम सुनीता आँसुओं से रोने लगी। किसी बात का कोई जवाब ही नहीं दे रही थी। मुझे लगा सास-ससुर से लड़कर आई है पर लड़ना तो उसके स्वभाव में था ही नहीं। कहीं हमेशा की तरह बड़े बेटे ने तो कुछ नहीं कह दिया? मेरा दिल बैठा जा रहा था। आखिर आँसू पोंछकर उसने पानी माँगा। पानी पीकर आवाज काबू में आई तो पहला वाक्य यही निकला "जी बराबाद हो लिया सब।" मैं क्या अटकल लगाऊँ कुछ समझ नहीं पा रही थी। कुछ क्षण बाद बोली "जी बड़े ने रिस्ता तुड़वा दिया छोटे का, पिंकी के बाप को उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाके। भाई-भाभी चावै हैं कि ये कमाके उनका घर भरता रहै। इसकी शादी हो गई तो ...सुनीता फिर रोने लगी।" कुछ देर बाद मालूम हुआ कि प्रिंस और पिंकी के बीच फोन पर बातचीत बंद हो गईं हैं। दिक्कत पिंकी के पिता को है।" पिंकी के बाप ने मना कर दी कि अब कभी बात नहीं करणी। वो सोतेला बाप है जी।" ऐसा सुनीता ने बताया। और जो बताया वो तो एक बहुत बड़े नाटक का हिस्सा था। पिंकी का सौतेला पिता लड़की पर कोई दोष लगाकर उसे बेचने के मंसूबे बाँध रहा था। पर लड़की में कोई ऐब था ही नहीं। ये सुनहरा मौका उसके हाथ लग गया था। एक बार शादी टूट जाएगी तो दोबारा मुश्किल आएगी, वो इसी का फायदा उठाने की फिराक में था। फिर उसने पूजा-प्रिंस के बारे में अफवाहें उड़ाना भी शुरू कर दिया। इधर सुनीता के बड़े बेटे ने भी मौके का लाभ उठाया। बात का बतंगड़ बनाकर रिश्ता तुड़वा दिया। पर सुनीता का मन बेहद दुखी और चिंतित था और ये चिंता वाजिब भी थी। यहाँ केवल लड़की की बदनामी की बात नहीं थी बदनामी लड़के की भी थी। सबको कहने का मौका मिल रहा था।" अरे कोई खोट ही होगी जो बार-बार रिश्ता टूट रहा है।" लाख देते रहिए सफाइयाँ जिसे ऐसा मानना ही है उसे कुछ सुनना कहाँ?

इधर सुनीता की परेशानी तो कुछ और ही थी। उसे दुख जरूर था कि रिश्ता टूट गया पर असली चिंता भविष्य से जुड़ी थी कि बड़ा बेटा उसके मरने पर छोटे का क्या हाल करेगा। उसकी आँखों में अतीत एक बार फिर से जीवित हो उठा - यही बड़ा बेटा एक दिन अपने पिता को धिक्कारते हुए कह रहा था "बड़ा होने दे भीख मँगवाऊँगा तुझसे। रोटी भी न दूँगा, देख लियो।" आज भी गरम लावे जैसे उसके ये शब्द सुनीता के कानों में खौल रहे थे। उस वक्त भी अपने पति की तरफदारी करते हुए उसने एक पैसा कमाकर न लाने वाले बेटे से कहा था "बाप है तेरा, कैसे बोल रहा है इससे? इसकी फिकर न कर तू। जब तक जीती हूँ खिला लूँगी इसे। मैं अभी बैठी हूँ।" और बाप के मरने पर बड़ा उससे भी आगे निकल गया। शराब पीना, जुआ खेलना, चोरी-चकारी, मार-पीट। यहाँ तक की पत्नी और बच्चों से भी प्यार नहीं। तनख्वाह कहाँ खत्म हो जाती है उसकी पता ही नहीं चलता। सुनीता अपने और प्रिंस के बलबूते ही उसके बीवी-बच्चों का भार उठाती रही। दो बार न्यारा करने पर भी दिल पसीज गया उसका छोटे-छोटे पोता-पोती को देखकर। वो असहाय बहू को चाहती है पर बहू अपने भविष्य से डरती है। डर है कि अगर देवर का ब्याह हो गया तो कौन आर्थिक सहायता करेगा? कैसे चलेगा उसका घर-परिवार?

इन सब परेशानियों के अलावा उसके दिल की सबसे बड़ी कसक वो लड़की थी जिससे रिश्ता तय हुआ था। पता नहीं कुछ देर के मिलने और अपने बेटे से सुनी उसकी बातों से ही सुनीता ने अनुमान लगा लिया था कि रूप-गुण में उसके जैसी लड़की ढूँढ़ पाना उसके लिए असंभव है। उसके चेहरे में जिस अपार धैर्य को उसने परखा था अब वही चेहरा आँखों से हटता नहीं था। सब कुछ खत्म होने के बाद भी जिक्र छिड़ते ही वो ठंडी साँस भरती और गहरे दुख से कहती... "हाय री किस्मत... न जाने किस भागवान को मिलेगी पिंकी?" पर अगले ही क्षण ठिठक जाती कि जाने किस कसाई के पल्ले बँधे गी? न जाने कितनी ही बार तो मुझसे कह चुकी है "जी गाय गार में धँसी है।" यहाँ तक कि वो रुपये देकर लाने को भी तैयार थी पर लड़की का पिता तो कुछ सुनना ही नहीं चाहता था। वो बेटे की चिंता और लड़की के मोह में घुली जा रही थी। बार-बार एक ही बात "बराबाद हो लिया सब।"

कुछ दिन बीतने के बाद एक सुबह पाँच बजे घंटी बजी। दरवाजे पर सुनीता खड़ी थी। "जी कुछ पैसे चाहिए उधार। नरेले जा रही हूँ। आज काम नहीं होगा। आप सबको बता दियो।"

"इतनी सुबह... क्या बात है?"

"जी लड़की की माँ भगा लाई है लड़की को कसाई से छुड़ा के। कहीं नहीं करनी थी शादी उसे लड़की की। अब कहता है मैं रख लूँगा इसे अपने लिए। माँ नाट गई तो रोज मारता-पीटता है। दोनों जनियों की जिंदगी नरक कर रखी थी। लड़की की माँ मौका देखकर भगा लाई है। मेरे पास फोन आया था। प्रिंस के साथ निकलूँगी छह वाली गाड़ी से। देखूँ क्या होता है? जाने क्यों बुलाया है टेसन पर?"

परेशानहाल सुनीता पैसे लेकर चली गई। मैं यही सोचती रही कि जाने अब क्या होगा? कहीं सुनीता के पहुँचने से पहले वो आदमी पहुँच गया तो? क्या सुनीता को लड़की सौंपने के लिए बुलाया है या केवल मदद के लिए? क्या सुनीता का बेटा इस तरह भागी हुई लड़की से शादी करेगा? कहीं पुलिस का चक्कर न हो जाए? जाने कैसे-कैसे ख्याल आते रहे। सारा दिन इसी उधेड़बुन में निकल गया। काम की भी चिंता सता रही थी कि अगर सुनीता फँस गई तो दो-तीन दिन काम कैसे चलेगा? अगले दिन सुबह ठीक समय पर घंटी घनघनाई। सुनीता बाहर खड़ी थी। दरवाजा खोलते हुए मैंने पूछा "क्या कर आईं?"

"वही जो करने गई थी... थारी बहू ले आई।" ताली पीटकर हँसते हुए उसने बताया।

"जी बहू की माँ ने लड़की प्रिंस को सौंप दी। कसम से रो पड़ी दोनों जनियाँ। मैंने भी भाई बुला लिया था अपना। उसने पक्का काम करा डाला। फेरे डलवा दिए। वकील भी भाई की पैचान का था। वकील ने पक्के कागज बना दिए हैं। दोनों बालिग हैं। सादी में दोनों की माँ खड़ी थीं। लड़की ने कह दिया शादी मेरी मरजी से हो रही है। पाँच हजार में काम हो गया। लड़की की माँ के पास तो कुछ नई था पर मेरे पास था। छोटा बेटा बहुत खुस है और वो लड़की को तो यकीन नहीं आया अब तक कि हम शादी कराकर ले आए उसे। जी बड़ा प्यारा जोड़ा है बच्चों का। लड़की की माँ बड़ी हिम्मती निकली जी।"

"और लड़के की माँ क्या कम है?" मैंने कहा।

"बस जी हौसला करके खड़ी हो गई। बच्चों को लेकर घर में बड़ी तो जी मेरा बड़ा बेटा तो देखता रह गया। लड़की के सौतेले बाप को भी धक्का लगेगा। इन दोनों ने बरबाद करने में कोई कमी न छोड़ी थी... बस जी आबाद रहें ये दोनों बच्चे।"


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हिंदी समय में प्रज्ञा की रचनाएँ