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कहानी

आश्रय
शर्मिला बोहरा जालान


मैं एक बात को बार, तीन बार, कभी-कभी तो चार बार बोलता हूँ। चार बार ही क्यों शायद चार बार से ज्यादा। बार-बार बोलता हूँ। बार-बार बोलता हूँ फिर भी लगता है एक बार और बोलूँ। मेरी पत्नी नेहा कहती है, "समझ गई, बार-बार क्यों कहते हो।" झुँझला जाती है। वह बेचारी भी क्या करे। कितना सुने। मेरी माँ भी तो एक बात को अनेक बार बोलती है। मैं नेहा को समझा नहीं पाता कि एक बात को बार-बार बोलकर मैं उस बात को बार-बार समझता हूँ। बार-बार उसमें नई बात नया रंग देखता हूँ, वैसे ही जैसे कोई गायक अपनी एक पंक्ति को कई बार कई ढंग से कई रंग में गाता है। वह खीझती है, उकता जाती है। मैं उसे समझा नहीं पता और माँ को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। तभी तो मैं और माँ जब बात करने बैठते हैं, पता ही नहीं चलता समय कहाँ से कहाँ जा भागता है।

मैं माँ से सब बात करता हूँ। मुझे उससे बात करना अच्छा लगता है। वह मेरी बहुत सारी बात बिना बोले ही समझ जाती है। नेहा कहती है, "माँ से भी क्या कोई बहुत बात कर सकता है। माँ बहुत बोर करती है।" उसका इशारा मेरी माँ की तरफ न होकर दुनिया भर की उन माँओं की तरफ होता है, जिन्होंने सिर्फ पारिवारिक जीवन गुजारा है। जो हर विषय पर बात नहीं कर सकतीं। वैसे नेहा भी अपनी माँ से खूब बात करती है, फिर भी कहती है, "उफ, माँएँ कुछ नहीं समझतीं।" उसका यह भी कहना है कि जितना माँ समझती है उतना कोई और इनसान नहीं समझता, पर वह बिंदु भी आता है जब माँ का बातों को समझना खत्म हो जाता है। यह नेहा की सोच है। यह समझ उसे अपनी माँ को देखकर मिली है। पर मेरी माँ मेरी माँ है। माँ एक ऐसा वृक्ष है, जिसकी नीचे बैठकर मेरी सारी थकान दूर हो जाती है। वह एक नदी है, जिसका जल पीकर मैं तृप्त हो जाता हूँ। यह बात मेरी नहीं है, किसी लेखिका ने अपनी माँ के लिए कही है। पर यह बात मुझे अपनी बात लगती है।

मैं और मेरी माँ एक बात को बार-बार दुहराते हैं। दुहराना जाप है। निरंतर समान गति चलता हुआ। माँ का बार-बार कहना, 'खा ले' मेरा जवाब देना, 'भूख नहीं है।' यह जबरदस्ती नहीं है। मनुहार है, जिसे नेहा एक बार पूछकर, यह मान कर छोड़ देती है कि भूख लगेगी तो खा लूँगा।

मेरी माँ बीमार है। वह कई दिनों से बीमार है। वह वर्षों से बीमार है।

मैं कहता हूँ, "मा!"

वह कहती है, "माँ!"

मैं फिर कहता हूँ, "माँ!"

वह फिर कहती है, "हाँ बेटा।" ना ही मैं 'माँ' के आगे कुछ कहता हूँ ना ही वह 'हाँ बेटा' के बाद कुछ बोलती है।

हमारा यह खेल चलता रहता है। नहीं, यह खेल नहीं है। यह तो माँ को पुकारना है, टोहना है, जाँचना है। यह देखना कि माँ ठीक तो है ना! माँ सुन तो रही है ना! इतनी बीमारी के बाद माँ में कुछ बचा हुआ तो है ना! पर वह माँ है। उसमें सब कुछ बचा हुआ है। कैंसर ने शरीर को कष्ट-विक्षत किया है। घायल तो मन भी हुआ है, पर वह मन जो बेटे की आवाज सुनता है, जो बेटे को देखता है, एकदम स्वस्थ है। पहले से ज्यादा सजग और बलवान।

मैं माँ से कहता हूँ, "ये नेहा जब देखो तब उकताई रहती है।"

माँ हँसती है। कहती है, "अभी माँ नहीं बनी ना!"

मैं कहती हूँ, "क्या बात करती हो! नौ महीने का हो चला मुन्ना और यह माँ नहीं बनी?"

माँ कहती है, "मुन्ने ने माँ बोलना कहाँ शुरू किया!"

मैं कहता हूँ, "माँ तुम भी...।"

माँ मेरी बात सुने बिना ही कहती है, "धीरे-धीरे समझेगी।"

मैं जोश में आ जाता हूँ। कहता हूँ, " उसे मेहतर को देख लो। वही जो रोज हमारे घरों का पाखाना साफ करता है। कूड़ा उठाता है। कितना दुर्गंध भरा काम है। पर जब देखो तब प्रसन्न रहता है। क्या गला पाया है उसने। कितना अच्छा गाता है। हर वक्त गाता रहता है, एक से बढ़कर एक पुराने सदाबहार गाने।"

माँ हँसने लगती है। कहती है, "नेहा गाती नहीं ना!"

मैं कहता हूँ, "माँ, उसे छेड़ूँ?" देखो, अभी कहता हूँ, "नेहा, तुम्हारी माँ ने तुम्हें गाना नहीं सिखाया?" वह समझ जाएगी, कहेगी, "सिखाया तो खूब है, पर गाने लगूँ तो काम कौन करेगा? आपके यहाँ काम भी तो कम नहीं।" फिर कहेगी, "मुझसे भला मेहतर लगने लगा!" मैं और माँ दोनों हँसने लगते हैं।

मैं माँ से दूसरी बात करने लगता हूँ। कहता हूँ, "जानती हो माँ, कल जब मैं मेट्रो स्टेशन में खड़ा था मुझे विजया राय दिखीं। वही जो हमें स्कूल में हिंदी पढ़ाती थीं। बात सोलह-सत्रह वर्ष पुरानी है या उससे और ज्यादा। माँ वह अब अजीब लगने लगी हैं। बूढ़ी और कुछ-कुछ डरावनी। उनकी बड़ी-बड़ी आँखें बाहर की तरफ इस तरह लटक गईं है कि लगता है अभी गिर पड़ेंगी। शायद कक्षा ग्यारह में मैं उनसे पढ़ा हूँ। उन दिनों वह सुंदर लगती थीं। दमकता था उनका चेहरा। इन सालों में कितना बदल गया है। कितनी बूढ़ी हो गई हैं! मैंने एक और टीचर को भी देखा था। इतिहास पढ़ाने वाली इला सिंह को। उनका अच्छा लगना इतिहास बन गया था। वह भी बदसूरत लगने लगी हैं। माँ, क्या पूरा का पूरा स्टाफ रूम बूढ़ा हो गया है! मैं अचानक माँ को देखता हूँ। कहता हूँ, "माँ, तुम एकदम बूढ़ी नहीं लगतीं।"

"तुम्हें नहीं लगती, पर हो तो गई हूँ।"

"नहीं माँ, तुम कभी भी ऐसा मत कहना।"

"ठीक है जवान बेटे की जवान माँ। हाँ।"

तभी मैं देखता हूँ - माँ नाक का काँटा जो वह हमेशा पहने रहती है घुमा रही है। मुझे पता है काँटे को घुमाते-घुमाते वह उसे खोल लेगी, उसमें अपनी जीभ लगाएगी, और फिर उसे पहन लेगी। ऐसा माँ तब से करती आ रही है जब से मैंने माँ को देखना शुरू किया है। मुझे उसका ऐसा करना अच्छा नहीं लगता।

उबकाई आती है। कई बार मैंने टोका भी। वह हँस देती है और फिर करने लगती है। नेहा कह रही थी, "माँ आजकल उसे हर समय अपने पाखाने का हिसाब-किताब देती है।" बताती है कि उसे कब किस रंग का हुआ और कड़ा हुआ या पतला। नेहा मुँह बनाकर कहती है, "माँ यह सब मुझे क्यों कहती हैं। मैं उनकी डॉक्टर हूँ क्या? मुझे मितली आती नहीं, बाकी कुछ बचता नहीं। मैं नेहा से कहता हूँ - तुम भी तो ऐसा ही करती हो, जब कभी सर्दी हो जाती है, खँखार कर थूकती हो। थूक को ध्यान से देखती हो और विस्तार से मुझे उसके रंग और गाढ़ेपन के बारे में बताती हो। नेहा कहती है, "सिर्फ थूक के बारे में बताती हूँ, नेहा यह भी कहती है कि आजकल माँ को कुछ भी खाने दो। माँ एकदम बच्चों की तरह करती हैं। कभी कहेंगी - गरम है, कभी कच्चा तो कभी जला हुआ। ऐसा कहने के तुरंत बाद नेहा यह भी कहती है, "जब मुझे मलेरिया हुआ था, मैंने तो खाना ही छोड़ दिया था।" माँ खा तो लेती हैं। नेहा समझती है कि माँ बीमार है। माँ को पूरे-पूरे दिन दूध, फल, सब्जियों का सूप वगैरह देना बहुत जरूरी है। माँ नहीं पीएगी यह भी एक दिक्कत है। नेहा कहती है, "जानते हो। माँ की तबीयत खराब क्यों हुई?" मैं जनता हूँ नेहा क्या कहने वाली है। मैं उसकी बात अनसुनी कर देता हूँ। मैं उसकी बात कई बार सुन चुका हूँ। हमारी लंबी बहस हो चुकी है। ऐसी बहस जो अनंत है, जो हमेशा उद्वेलित कर देती है। मैं व्याकुल हो जाता हूँ। वह एक ही बात को कई तरह से बताती है। वह कहती है, माँ ने कभी भी अपनी परवाह नहीं की। घर की परवाह करती रही। जिसने सबकी परवाह की, उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। धीरे-धीरे बीमारी शरीर में पलने लगी। पकने लगी, माँ उसे टालती गई। समय टलता गया। नेहा का चेहरा बदल जाता है, वह जोर-जोर से कहने लगती है, "यह जो व्यवस्था है न, जिसमें पुरुषों की चलती है, माँओं की यही दशा होती है। क्या कभी किसी ने माँ से पूछा कि माँ, तुम्हारा मन भी तो होता होगा घर से बाहर निकलने का। कोई काम न हो तो भी सड़क पर चलने का। चलते हुए लोगों को देखने का। कुछ खरीदना ना हो तो भी चीजों के भाव पूछने का।" मैं नेहा की ये बातें सुन नहीं पाता। मैं उसे कहता हूँ - इतना कड़ा मत बोला करो। मैं घर से निकल जाता हूँ। मैं उसकी बातें भूलने की कोशिश करता हूँ। मैं उसका कहा भूल जाता हूँ। मैं घर लौट आटा हूँ। मैं माँ के पास जा बैठता हूँ। देखता हूँ माँ अपने गद्दे पर नहीं है। माँ। माँ, कहाँ गई! माँ चली गई! माँ घूमने चली गई। मैं माँ को आवाज देता हूँ। मैं जोर-जोर से माँ को पुकारने लगता हूँ। मैं प्रलाप करने लगता हूँ। माँ, मेरी माँ घर पर नहीं है। वह आज घर से बाहर निकली है। घूमने निकली है। उसका भी तो मन है। वह भी तो बेरोकटोक घूमना-फिरना चाहती है। तभी माँ स्नान घर से निकल कर सामने प्रकट होती है। मुझे ध्यान से देखती है। धीरे से कहती है, "क्या हुआ? ये क्या बोले जा रहा है? जानता तो है कि घर से मैं कितना काम निकलती हूँ और अब तो यह बीमारी आ गई। कहाँ जाऊँगी?" "नहीं माँ, तुम जाओ। तुम जहाँ जाना चाहती हो जाओ। बोलो, कहाँ जाने का मन है। मैं ले जाऊँगा।" "मुझे कहीं नहीं जाना। बस, तू मेरे पास बैठा रह।" "तो क्या माँ तुम्हारे मन में कोई इच्छा नहीं?" "इच्छा थी ही नहीं या मर गई?" माँ मुझे एकदम बच्चों की तरह पुचकारते हुए पूछती है, "नेहा से बहस हो गई?" मैं माँ के और करीब आ जाता हूँ। कहता हूँ, "माँ।" माँ हँस देती है। कहती है, "पढ़ी-लिखी है नेहा। आजकल के बच्चे सब चीजों का कारण खोजने में लगे रहते हैं। यह है तो इसीलिए है। व्यवस्था में दोष निकालना।" "पर माँ, सब लोग खूब बाहर आते-जाते थे, तुम घर से सबसे काम निकलती थी क्यों?" "तेरे पिताजी को पसंद नहीं था। फिर तेरी दादी को क्या पसंद आता?" मैं माँ का हाथ अपने हाथ में ले लेता हूँ। पूछता हूँ, "तुम खुश हैं ना! मन मेरे गाल पे हलके से चपत लगाती है, कहती है, "ये क्या पूछ रहा है। तुम्हें लगता है मैं खुश नहीं हूँ। ठाकुर जी ने जैसे रखा वैसे रही। जितनी उम्र लिखवा कर आई हूँ, उतनी ही तो जीऊँगी न!" मैं माँ को टोकता हूँ कि तुम ऐसा क्यों कहती हो, तुम बहुत जिओगी। मुन्ने की शादी देखोगी। माँ इस बात पर मुस्कुरा देती है। मैं माँ को फिर देखने लगता हूँ।

मैं माँ से पूछता हूँ, "माँ, मैं बदल गया हूँ?" माँ कहती है, "बिलकुल नहीं। किसने कहा?" "नेहा कह रही थी। कह रही थी, मैं सबमें बुराई खोज लेता हूँ। मुझे कोई अच्छा नहीं लगता।" माँ मुझसे पूछती है, "तू ऐसा करता है क्या?" "मुझे नहीं मालूम। पर माँ, सब अच्छे हैं और हमेशा अच्छे बने रहेंगे, यह सच तो नहीं है। लोग बुरे भी तो हैं। अब मुझे वे बुरे लगने लगे जो पहले अच्छे लगते थे तो मैं क्या करूँ?" माँ चुप रहती है। माँ जानती है मैं ऐसा कैसे हो गया। माँ के बीमार होने से मैं बदलने लगा। नेहा यह सब नहीं समझेगी। मैं नेहा से कहता हूँ, सब लोग बस ऐसे ही हैं। ऐसी ही से मेरा मतलब, "समझ तो गई, बार-बार क्यों कहते हो?" उफ, तुम कुछ नहीं समझती। तुम कुछ नहीं समझोगी। मैं गुस्से से नेहा के पास से उठकर माँ के पास चला जाता हूँ। क्या मैं मानसिक रोगी होता जा रहा हूँ। मुझे माँ के अलावा किसी के पास जाना, बैठना, बात करना अच्छा नहीं लगता। मुझे माँ के पास बैठना भी अच्छा नहीं लगता। मुझे आजकल कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता? मेरा मन कहीं नहीं लगता। यह सब पहले नहीं था। मैं कैसे ठीक होऊँगा? मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूँ कि मैं सही नहीं हूँ। माँ भी ठीक हो जाएगी।

माँ को ऐसी बीमारी क्यों हो गई? कैसे हो गई? दादी कहती हैं, सब पिछले जन्म का चक्कर है। दादी की यह बात मुझे अच्छी नहीं लगती। इस तरह की बात कहकर दादी, माँ का मन खराब कर देती हैं। माँ का मन खराब नहीं होता। मेरा हो जाता है। कोई कभी दादी का मन ऐसी-वैसी बात कहकर खराब क्यों नहीं करता? सभी दादी से डरते हैं। जो जिससे डरता है उसके मुँह पर कुछ नहीं कहता, पर पीछे से सब कुछ कहता है। माँ दादी के सामने कुछ नहीं कहती। माँ ने दादी के सामने कभी, उसकी किसी बात को लेकर कुछ भी नहीं कहा। तो क्या माँ, दादी के पीछे से दादी को बुरा-भला कहती है? मन ही मन उसे गालियाँ देती है? मुझे नहीं मालूम। मैं नहीं जानता। मैं माँ के मन को नहीं जानता? मैं माँ को क्यों नहीं जानता? मैं तो माँ के बहुत पास था। माँ के गर्भ में। नाल से बँधा। माँ का अंश हूँ। माँ मुझमें बसी हुई है। मन की एक-एक बात मुझमें है। माँ बताती रहती है कि मैं बचपन में ही माँ की तरह था। मैं सब-कुछ माँ के साथ करता। माँ सोती तो मैं सोता। माँ किसी कारन जाग जाती तो मैं भी जाग जाता। माँ खाती तो मैं खाता। माँ नहाती तो संग-संग मैं नहाता। यहाँ तक कि माँ पाखाना जाती तो मुझे भी पाखाना आने लगता। माँ परेशान हो जाती। माँ मुझसे तंग आ जाती। माँ मुझे अपने से दूर रखती। कभी पिताजी के साथ कभी चाचाजी के साथ, तो कभी हमारे घर में काम करनेवाले रामू के साथ नीचे भेज देती। मुझे बाहर ही रखती, होता हवाता नहीं। मैं जब घूम-फिर कर आता तो माँ से और चिपक जाता। माँ को काम करने नहीं देता। माँ बहुत सुंदर लगती थी। जितनी अच्छी तरह माँ साड़ी पहनती नेहा कभी नहीं पहन सकती। कलफदार खड़ी-खड़ी साड़ी। आजकल माँ को कड़ी-साड़ी सुहाती नहीं है। ढीले-ढाले मुलायम कपड़े अच्छे लगते हैं। बिना कलफ की साड़ी में माँ ढीली लगती है। माँ ढीली हो गई है। नेहा ने माँ को ऐसे ही देखा है। मैं उसे कहता हूँ, माँ कभी भी ढीली नहीं थी। मैं उसे बार-बार कहता हूँ माँ कभी ढीली पड़ी ही नहीं। नेहा मुझे देखती है। मैं नेहा को देखता हूँ। यह देखता हूँ कि नेहा मेरी बात पर यकीन कर रही है या नहीं। कहीं नेहा यह तो नहीं सोच रही कि जिस माँ को मैं चुस्त और सुंदर कह रहा हूँ, आज उसे देखकर लगता तो नहीं कि वह वैसी रही होगी। नहीं, नहीं, नेहा ऐसा नहीं सोच सकती। नेहा इतनी क्रूर नहीं हो सकती। मुझे नेहा के बारे में ऐसा नहीं सोचना चाहिए। ना जाने मैं आजकल सबके बारे में ऐसा क्यों सोचता हूँ। मैं लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि मेरी माँ दुनिया की सबसे अच्छी माँ है और मुझे लगता है सब मुझ पर हँस रहे हैं। मुझे ऐसा क्यों लगता है?

नेहा जरूर यह सोचती है कि माँ का कोई केरियर होता तो समझ में आता कि माँ सचमुच कैसी माँ है। नेहा की एक सहेली है, सुमन। उसकी सास व्यवसाय करती है। पूरा घर चलाती है। वह सुमन को अपने काम से अलग रखती है। सुमन को उस तरफ की आजादी भी नहीं मिली हुई जिससे वह अपना कोई केरियर बना सके। सुमन का पति कहता है, उसकी माँ बहुत अच्छी है। दुनिया में उसकी माँ से ज्यादा समझदार माँ कोई भी नहीं।

नेहा ने ये बातें मुझे कई बार कई तरह से कही हैं। यह सब कहकर नेहा क्या कहना चाहती है? मैं गुस्से में काँपने लगता हूँ। मैं यह बात अपने मन में नहीं रख पाता। मैं माँ के पास जाता हूँ। मैं माँ से सब कुछ कह देता हूँ। माँ सबी कुछ ध्यान से सुनती है। माँ कुछ नहीं कहती। माँ गंभीर रहती है। मैं माँ को देखता हूँ कि वह कुछ कहे। मैं उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता हूँ।

माँ पूछती है, "कभी नेहा ने तुमसे कहा था कि वह कुछ करना चाहती है?" मैं कहता हूँ, "हाँ। आगे पढ़ने-वढ़ने की बात कहती रहती है।" माँ मुझे डाँटते हुए कहती है, "तो कभी बताया क्यों नहीं? कैसे होगा?" "तुम्हारी बीमारी..." माँ आँखें बड़ी कर मुझे देखती है। एक-एक शब्द पर जोर देकर कहती हैं, "वह आगे पढ़ेगी।" मैं माँ की बात समझ जाता हूँ।

मैं कहता हूँ, "माँ", माँ जवाब देती है, "हाँ।" मैं एक बार फिर कहता हूँ, "माँ।" माँ एक बार फिर उत्तर देती है, "हाँ।" मैं कहता हूँ, "नेहा एम.ए., बी.एड कर टीचर बनना चाहती है। वह भी वैसी हो जाएगी जैसी, विजया राय। एकदम बूढ़ी। उसे देखकर लगेगा कि उसकी आँखें अभी गिर पड़ेंगी।" माँ हँस देती है। मैं भी हँस देता हूँ। मैं माँ को देखने लगता हूँ। पूरे-पूरे दिन मैं माँ को कई बार देखता हूँ।

इस बार की कीमोथेरेपी में माँ के बाल चले गए हैं। माँ की बीमारी बढ़ गई है। फेफड़ों में फैल गई है। कैसी सुंदर काया थी, अब कैसी रह गई है। पर माँ काम तेज काम नहीं हुआ। माँ का मन और करुण हो गया। सबके दुख को समझने की अद्भुत क्षमता पैदा हुई है। पर कभी-कभी माँ उलटी दिशा में चलने लगती है। एक-एक कर उन सारे लोगों को याद करती है जिन्होंने उसे कष्ट दिया। बुरा व्यवहार किया। ढेर सारे असंतोष है माँ के जीवन में। जब वह गठरी खुल जाती है तो आँधी चलने लगती है। मैं बहने लगता हूँ। मैं कहता हूँ माँ, तुम मेरी माँ हो। यह तूफान मुझे उड़ा ले जाएगा। माँ अब रुक जाओ। माँ तुम बहना बंद करो। तुम ऐसे नहीं हो सकती। परिवारों में जीवन ऐसा ही हुआ करता है। तुममें पचाने की अद्भुत शक्ति। तुम ऐसी कैसे हो गई? मेरे 'ऐसी' का मतलब 'विरोधी' और 'विद्रोही' है। मैं ऐसे क्यों मान बैठा कि माँ ऐसी नहीं हो सकती! मैं ऐसा क्यों समझता हूँ कि माँ को ऐसा नहीं होना चाहिए। हे भगवान, यह सब कुछ मेरे लिए असहनीय है। मैं रोने-रोने को होता हूँ। तभी माँ लौट आती है। माँ फिर से सीधा रास्ता पकड़ लेती है। वही पुरानी करुणामय माँ बन जाती है।

मैं माँ के करीब जाता हूँ। मैं माँ के बहुत करीब चला जाता हूँ। माँ को पुकारता हूँ, 'माँ।' माँ कहती है, 'हाँ।' मैं फिर कहता हूँ, 'माँ।' माँ फिर कहती है, 'हाँ बेटा।' मैं फिर-फिर कहता हूँ 'माँ।' माँ फिर-फिर कहती है, 'हाँ बेटा।' यह जाप चलता रहता है। निरंतर समान गति से।


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हिंदी समय में शर्मिला बोहरा जालान की रचनाएँ