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कहानी

एक अतिपरिचित प्रलाप
शर्मिला बोहरा जालान


मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ। मुझे कोई अच्छा नहीं कहता। सब कहते हैं, मैंने अपने बच्चों को कभी भी अपना नहीं समझा। मैंने राधिका और मुरारी का घर बसने नहीं दिया। मैंने अपनी पत्नी माया को कभी कुछ नहीं समझा। सब कहते हैं, मैं गाली-गलौज करता रहा हूँ। पूरा जीवन मैंने गालियों में निकाल दिया। हाँ, मैं गाली देता हूँ। मैं अपनी पत्नी को कहता था कि वह साली कुत्ती है। मैं राधिका को कहता था कि वह चुड़ैल मेरे घर में पैदा क्यों हो गई। मैं मुरारी को हरामी कहता था। पर मैं आपसे सच कहता हूँ ऐसा मैं इसलिए कहता था कि मुझे वैसा कहना अच्छा लगता था। बात यह भी है कि गालियाँ खुद-ब-खुद मेरे मुँह से निकल जाया करतीं। मेरे मुँह से ही क्यों, वह आपके मुँह से भी निकलती हैं। अगर आप नहीं कहते हैं तो, आप एकदम झूठ बोल रहे हैं। ऐसा मैं मान ही नहीं सकता कि पुरुष होकर आप गाली नहीं देते, ऊपर से आप हिंदुस्तानी भी हैं। फिर आप उस परिवार में पैदा हुए हैं जहाँ स्त्री को कहा तो जाता है घर की लक्ष्मी, पर सभी उसे जूती बनाकर रखते हैं। आप एक बार मेरे साथ गाली देकर देखिए। अपनी पत्नी को, अपने बेटे, बेटी को। ठीक है, आप अपनी पत्नी को नहीं देना चाहते न दीजिए। बेटे-बेटी को नहीं देना चाहते, न दीजिए। रिश्तेदारों को भी नहीं देना चाहते न दीजिए। खुद को ही दीजिए। देकर तो देखिए। कैसा लगता है!

परम शांति का अनुभव हुआ ना? ऐसी ठंडक कि बस पूछिए मत। मैं आपसे अपने मन की एक बात कहूँ? यही कि गालियाँ हैं 'रामबाण औषधि।' अगर आप न मानें तो मत मानिए। मैं मनवाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ पर एक बार दर्पण के सामने बैठकर जी भरकर आप अपने को गालियाँ दीजिए। वे गालियाँ जो आपने बचपन में सुनीं। वे गालियाँ जो आपने अपने दोस्तों के बीच बकीं। वे गालियाँ जो आपने सड़क पार करते हुए सामने से कुचल देने के अंदाज से आनेवाली गाड़ी के ड्राईवर को दी। वे गालियाँ जो आपके पिता दिया करते थे और वे जो आपके पिता के पिता देते थे और वे भी जो पुश्त दर पुश्त आपकी नसों में बसी हुई हैं। गालियाँ दिए बिना भी कोई जीवन होता है? मैं तो इस बात को कभी नहीं मान सकता कि किसी ने अपने पूरे जीवन में गाली नहीं दी। खैर, मैं यहाँ आपसे वह गाली जो आपके अंदर कहीं दुबकी पड़ी है उसे निकलवाने नहीं बैठा। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मैं एक अच्छा आदमी नहीं हूँ। आज जब मैं छियासठ वर्ष का हो गया हूँ मेरे पास एक भी आदमी नहीं है जो कम से कम मुझे एक गिलास पीने का पानी भी पकड़ा दे। मैं अपने घर में एकदम अकेला रह गया हूँ। लोग कहते हैं - कैसा भरा पूरा घर था पर उजड़ गया। क्यों न उजड़े, आदमी ही ऐसा था। राधिका पानी का गिलास लाकर देती तो पानी को ध्यान से देखता फिर गिलास फेंक देता। चीखता कि क्या यह पानी है? ध्यान से देखो, कितना गंदा है। राधिका बेचारी सहम जाती। देखते ही घर के किसी ऐसे कोने में घुसना चाहती जहाँ से उसकी छाया भी दिखलाई न पड़े। ये बातें अब अड़ोसी-पड़ोसी कहते हैं तो मैं यह कहता हूँ कि वे बिलकुल ठीक कहते हैं। मैं राधिका पर चिल्लाता था कि इतनी बड़ी होकर खाना परोसना भी तुमने नहीं सीखा। मैं तड़ाक से थप्पड़ जड़ देता। क्या मुझे ऐसा करना चाहिए था? मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता? यह सब कुछ अपने आप ही होता। मुझे राधिका पर गुस्सा आता। मैं उसके कपड़े उठाकर फेंक देता। मैं माया के पास रसोईघर में जाता, उसके बाल पकड़ लेता। राधिका और मुरारी डर जाते। पाँव पकड़ लेते, कहते - अब हम पानी ठीक से देखकर देंगे। आपके कपड़ों में अच्छी तरह इस्त्री करेंगे। मुझे उस समय ऐसा लगता कि इसी तरह कभी राधिका तो कभी माया को पीट डालूँ। मैंने मुरारी की जब बेल्ट से खूब धुनाई की तो मुझे कुछ नहीं हुआ। मुझे कभी कुछ क्यों नहीं होता था? मेरे मन में कहाँ कुछ होता। मार दिया तो क्या हुआ। मार खाने लायक ही हैं ये कुत्ते की औलाद।

मैं उन्हें ही गाली देता, ऐसा नहीं था। अपने को भी देता पर मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि मारने, गाली बकने में ऐसा क्या है जिससे आदमी बुरा बन जाता है। ऐसा करने से तो अच्छा लगता है।

पड़ोसी कहते कि उन्हें मेरे बारे में सब कुछ पता है। उन्हें पता है कि मैंने बीस साल पहले अपने घर में क्या किया। रात के दस बज रहे थे। मेरी माँ अपने कमरे का दरवाजा नहीं खोल रही थी। मैं पगला गया। मैंने अंतिम बार कहा, "खोलो, नहीं तो मैं तोड़ दूंगा।" वह इस बार डर गई और झट से दरवाजा खोल बैठी। खिड़की से बाहर सड़क पर कुछ लोग कीर्तन कर रहे थे। कीर्तन की आवाज 'राधा बोल राधा बोल' कमरे में गूँज रही थी। मैंने जोर से कहा, "दो चाभी।" झपट कर माँ की कमर से उस तिजोरी की चाभी को निकाल लिया जिसमें से गहने चोरी हुए थे। बड़ी भाभी ने किसी के साथ मिलकर माँ के बहुत सारे जेवर उड़ा लिये और बचे हुए मैंने। उस रात मैंने खूब पी। उस दिन मुझे यह पता चला कि घर वाले मुझसे डरने लगे हैं। मैं वर्षों उस 'डर' से जो उनके अंदर मुझे लेकर था आनंद में रहा। किसी को डराकर रखने से खूब आनंद आता है। मैं माया को डराता। कहता, तुम अगर आटा-चक्की से कमाए पैसे मुझे नहीं दोगी तो मैं बिजली की लाइन काट डालूँगा। मुझे पता है, उसके बाद भी वह कुछ पैसे दबा लेती थी। पैसे ग्राहक उसी के हाथ में रखते। जबसे मैंने कपड़े की दुकान को चौपट किया वह आटा पीसने की चक्की बैठाने की जिद करने लगी। मैंने तो काम शुरू न हो इसकी पूरी कोशिश की पर वह साली मोटी खाल की थी। उसने ना जाने किसकी मदद से मशीन बैठा ही ली। मैंने सोचा - छोड़ो, इससे घर में दाल-रोटी पक रही है। पर मैं महीने-पंद्रह दिन में उससे पैसे झपट लेता। जब एक बार वह जिद पर अड़ गई कि नहीं देगी तो मैंने उसे अपना विकराल रूप दिखा दिया। उस दिन के बाद से वह कमजोर पड़ गई। एक बार वह अपनी माँ के घर गई थी। मुझे पक्का पता है कि वह यह सोचकर गई थी कि लौट कर नहीं आएगी। उसने अपने इरादों का पता मुझे लगने नहीं दिया। पर वह जल्दी लौटकर आ गई। उसका चेहरा कई दिनों तक लटका रहा। वह फिर कभी मायके नहीं गई। वह मायके फिर क्यों नही गई? उसके मायके के हालात भी तो ठीक नहीं थे। उन लोगों का घर खर्च भी मुश्किल से निकलता था।

उन दिनों उनके घर में एक कांड भी तो हो गया था। उसकी भतीजी ने आत्महत्या कर ली थी। क्यों? राधिका ने भी तो ऐसा ही किया। क्यों? मैं हत्यारा हूँ। मैंने ही अपनी लड़की को वहाँ तक पहुँचाया। मैं ऐसा क्यों हूँ? मैंने ऐसा क्यों किया? मैंने मुरारी को भी कहीं का ना छोड़ा। पर इन सब में मेरा क्या दोष है? मैंने कुछ नहीं किया। मैं जो भी करता वह मुझसे हो जाता। राधिका मेरी बेटी थी। वह बुरी लड़की नहीं थी। जब वह मुझे पानी देती तो मैं देखता उसके हाथ बहुत कोमल थे। उसकी नाक तीखी थी। उसने मुझसे कभी भी एक बात नहीं की थी। मैंने भी उससे कहाँ कोई बात की। वह मुझसे डरती थी। वह मुझसे वैसे ही डरती थी जैसे मैं अपने पिता से डरता था। मैं उनके सामने खड़े-खड़े काँपने लगता था। मैं अपने पिता से खूब डरता था। मैं उनके सामने खड़े-खड़े काँपने लगता था। मैं उसे बचपन से खूब गालियाँ देता। उसने मेरी माँ को कभी भी सुख नहीं दिया। वह जल्दी मर गया। माँ बड़े भाई के साथ रह गई और मैं माया, राधिका मुरारी के साथ। मैं अपने ढंग से रहने लगा। मुझे जब पता चला कि मुरारी की शादी माया ने अपने भाई के कहने पर उसी की बताई एक लड़की से तय कर दी है तो मैं उसके भी के पास गया। उसे ऐसी खरी खोटी सुनकर आया कि उसने मेरे पाँव पकड़ लिए। उसको मैंने साफ-साफ कहा कि अपनी बहन को अपने पास ही रख लो। उसके होश उड़ गए। उसके बाद जानते हैं आप मैंने क्या किया?

मैंने मुरारी का रिश्ता तोड़ दिया। जब कभी कहीं किसी जगह से रिश्ते की बात आती, मैं लड़की वालों को खरी-खोटी सुना भगा देता। मैंने उसका रिश्ता कहीं तय होने नहीं दिया, पर एक दिन मैंने देखा माया फिर खड़ी है। उसने कहा कि मुरारी की शादी उसने कहीं तय कर दी है और मैंने कुछ भी अड़चन डालने की कोशिश की तो उससे बुरा कोई ना होगा। ना जाने कैसे इस बार मैं डर गया। मुझे माया में अपना बाप दिखलाई पड़ा। उसमें इतना साहस कहाँ से आया? जो भी हो उस साली से मैं दब गया। पर मैं क्या दबकर रहने वाला हूँ। मैंने जान लिया कि लड़की वाले क्या दे रहे हैं, फिर माया से वह सब कुछ ले लिया। माया का ऐसा रोना देखकर मुझे मेरी विजय पर गर्व हुआ। मैं कहता - साली... मुझसे उलझने चली थी। उसके बाद घर में बहू आ गई। बहू क्या थी एकदम लड़ाकू। फिर तो हमारा घर अखाड़ा हो गया। मुझे खूब मजा आता। रोज-रोज की किच्च-किच्च से। झगड़ा-झाँटी से। इन सब से मेरा चित्त प्रसन्न रहता। मैं माया से कहता - बड़ी आई थी शादी करने वाली। अब लूटो मजा बेटे के ब्याह का। माया ने बच्चों पर कभी हाथ नहीं छोड़ा था पर उन दिनों उसने मुरारी पर हाथ में पकड़ा गिलास दे मारा। बोली, बाप की तरह बनना था तो मर क्यों नहीं गए। हुआ यह था कि मुरारी ने अपनी पत्नी को खूब पीटा था। यह सब देखकर मैं खूब खुश हुआ।

ये झगड़े चलते रहे और पता चला कि मुरारी के पेट में कुछ है। मैंने तो साफ-साफ कह दिया कि किसी डॉक्टर-डॉक्टर के पास ले जाने की जरूरत नहीं है। यह उसका कोरा नाटक है। माया कहाँ मानने वाली थी, वह उसे देर से ही सही बंबई ले गई और वह लौटकर नहीं आया। उसके पेट में कैंसर था। मैं चौंका, डरा फिर उसका दाह संस्कार कर गरुड़-पुराण सुन शांत हो गया। बहू को उसके पीहर वाले ले गए। घर में मातम छाया रहा। माया बिस्तर की हो गई। राधिका माँ-माँ कहती उसके आसपास हो रहती। मैं अब खुलकर आटा-चक्की से आए पैसे उड़ाने लगा। उसी तरह पानी का गिलास फेंकता और आयरन किए कपड़ों में फिर से इस्त्री करवाता। मैं क्या कमीना हूँ - यह मैं अपने आप से पूछता। फिर यह सोचकर कि कमीना होना बुरा है तो हो मैं ऐसा ही हूँ, कह मजे में रहता। एक दिन राधिका सुबह-सुबह चीखी। मैंने पूछा, क्या हुआ तो जानते हैं उसने क्या कहा? बोली, "कुत्ते कहीं के तुम्हारे कारन मेरी माँ भी चली गई।" मैंने राधिका को गाली देते नहीं सुना था पर जब उस दिन सुना तो अपार आनंद मिला। गुस्सा भी आया। तभी तो एक चाँटा रसीद दिया कि बाप से बात करने की तमीज नहीं है। उसके बाद उसकी माँ को फूँक आया। घर एकदम खाली हो गया। कोई किसी को गाली देने वाला, मार खाने वाला नहीं बचा। राधिका एक कोने में पड़ी रहती। अड़ोसी-पड़ोसी रिश्तेदार मुझसे इतना डरते थे कि हमारे घर के मामलों में नहीं बोलते। हर जगह से बेचारी राधिका, बेचारी राधिका आवाज सुनाई पड़ती। जब मुझे पता चला कि किसने बेचारी राधिका कहा है तो में उससे निबट आता। राधिका गुमसुम हो गई। वह दोनों जून खाना बनाकर रख देती। उसकी एक सहेली हुआ करती थी पर मुरारी के मरने के के बाद से ही उसने आना न जाने क्यों छोड़ दिया था। उसके बाद सुनने में आया कि उसकी शादी हो गई है। राधिका के मामा एक दो बार आकर मुझसे लड़ गए। उसके ब्याह के लिए लड़के भी देख दिखा गए। सभी लड़के मुझे बोदे लगते। मैंने कहा - अपनी लड़की को मैं देखूँगा। राधिका चुप सी हो गई। धीरे-धीरे मैं राधिका को ध्यान से देखने लगा। मैं राधिका से बात करने लगा। न जाने क्यों मेरा मन होता कि वह मेरे पास आकर बैठे। वह पढ़ने में अच्छी नहीं थी। इस कारण दसवीं के बाद से ही घर रहने लगी थी। वह दिन भर घर में रहती। वह आटा-चक्की पर भी नहीं जाती। मैं उसे पैसे देता 'कि घर का सामान खरीद ले। वह कहती कि आप ही ला दीजिए। वह कभी-कभी कमरे में बैठकर अकेले में रोती भी थी। मेरा मन होता पूछूँ कि वह रो क्यों रही है। पर मैं उसके पास नहीं जाता। वह मेरे पास क्यों नहीं आती? वह मुझसे क्यों डरती रही? मैं बार-बार प्यार से बात करने कि कोशिश करता। वैसे प्यार करना मुझे सुहाता नहीं, पर राधिका मेरी बच्ची थी। राधिका को मुझे अपनी बच्ची कहने का मन होता पर वह मुझसे झगड़ने लगती। कहती तुमने मुझे मार क्यों न डाला। उसने यह भी कहा कि तुम क्यों नहीं मर गए। जब उसने ऐसा कहा तो मैं प्यार-व्यार भूल गया और मैंने राधिका को खूब मारा। दूसरे दिन! दूसरे दिन मेरे पाँव उखड़ गए। जानते हैं मैंने क्या देखा? मैंने देखा राधिका बेसुध पड़ी है। उसने कुछ खा लिया है। उसके मुँह से क्या-क्या निकल रहा था। मैंने राधिका को उठाया। कातर हो बोला, "राधिका मेरी बच्ची, तुमने क्या किया," तो वह बोली, "मेरे मुँह में तुलसीदल दो।" मैं भगा-भगा दूसरे कमरे में गया। वहाँ आले में भगवान के पास जो तुलसीदल रखा था, उठाया। वहाँ माया और मुरारी की तसवीर रखी हुई थी। मैं सिहर गया। मेरे रोयें-रोयें खड़े हो गए। मैं इस घर को क्या मना दिया। मैं भागता सा राधिका के पास आया। जैसे ही उसके मुँह में तुलसीदल डाला, वह लुढ़क गई। मैं चीख उठा। मैं फूट-फूटकर रोने लगा। मैं पहली बार रोया था। मैं रोता रहा। मैं रो रहा हूँ। मेरा रोना रुक ही नहीं रहा। मैं इतना क्यों रो रहा हूँ? मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ।


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