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कहानी

एक छोटी सी संतुष्टि
किरण राजपुरोहित नितिला


वैन से उतरते ही मूमल खुशी से उछल पड़ी। प्रसन्नता के मारे वह कुछ जोर से वाह कहकर जी खोल कर अपनी इस खुशी को उन घाटियों के समक्ष उँड़ेलना ही चाहती थी लेकिन वाह के साथ ही मध्यमवर्गीय सलज्जता ने अनायास ही उसके हाथों को मुँह पर रख दिया। लेकिन उसके हृदय पर हाथों का कोई जोर न था। वह मुँह पर हाथ धरे ही प्रकृति के उस अप्रतिम दृश्य को आँखों ही आँखों में पीकर जैसे एक ही पल में समाहित कर लेना चाहती थी।

चारों तरफ हरियाली से अटी घाटियाँ, दूर बहुत दूर चाँदी का ताज पहने गर्व से सिर उठाए खड़े पहाड़, चीड़ के घने वृक्षों के झुंड में गर्वित देवदार का मस्तक जैसे ऊँची गर्दन निकाल आस-पास की सुषमा को निहार-निहार कर निहाल हुआ जा रहा है, चीड़ की डालियाँ हाथों की भाँति गोलाई में ऊपर उठे पत्तियों का गुलदस्ता जैसा थाम मानो भेंट दे रहे हों। सुबह की चमकीली धूप में दमकती हरियाली ओढ़नी ओढ़ धरती जैसे अपने ही रूप पर मोहित हों और अचल उन्हें ठिठककर मुग्ध से खड़े रह गए हो। मूमल ने आँखों ही आँखों में यह सब पति जय को कहने के लिए देखा तो पाया कि इस अकल्पनीय सौंदर्य को देख कर वे भी ठगे से खड़े थे। दृष्टि मिलने पर ऐसा लगा जैसे कह रहे हो देखो! हमारा सपना सच हो गया। प्रत्युत्तर में मूमल बस मुस्कुरा दी। प्रकृति की गोद से निकल कर वे वर्तमान में लौटे तों देखा कि वहाँ और भी पर्यटक उपस्थित है। अचानक उसे भान हुआ कि अच्छा किया खुशी से चीख न पड़ी। ऐसा करती तो अवश्य ही सबकी दृष्टि का केंद्र बन जाती। लेकिन मूमल के लिए यह एक सुंदर सपने का यथार्थ रूप था। बचपन से ही कहानियों, किताबों, टी.वी. में देखा था हिमाचल के पर्यटन केंद्रों को। प्रकृति प्रेमी मूमल को अपने गाँव में बेरे के हरियाले मैदानी खेतों को देखते-देखते हरियाले पहाड़ों की सुंदर कल्पना बहुत मोहित करती थी।

हाथों में हाथ डाले सबसे बेखबर अपने में ही मस्त नवविवाहित जोड़े घूम रहे थे। शिमला के भीड़-भाड़ से कुछ दूर प्रकृति की गोद में बसा यह विवेकानंद स्मारक कुछ अधिक ही मोहक था। हल्के गर्म कपड़ों में रंग-बिरंगे पर्यटक, कीमती कपड़े में लदे बच्चे अपने पापा की गोद में चढ़े थे। माएँ कीमती पर्स को थामे ऊँची ऐड़ी के सैंडिलों की अभ्यस्त अपने उद्गार अँग्रेजी में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पा रही इसलिए हाथों का पूरा सहारा लेना पड़ रहा था। लेकिन उस विचार को झटक कर एक बार फिर वह उस सुरम्य दृश्य में खो जाना चाहती थी। गलबहियाँ डाल नव परिणय युगल की भाँति ही जय ने हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। जैसे उन्हें अचानक ही याद आ गया हो कि वे भी तो नवविवाहित हैं। लेकिन वह हाथ झटक कर उसी तरह दूरी बनाकर चलने लगी। एक प्रशंसा भरी दृष्टि से जय ने उसे देखा। वह जानती है कि लजीले जय ने केवल यूँ ही उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए हाथ बढ़ा दिया था अन्यथा दोनों को ही हर कहीं अपने प्रेम का प्रदर्शन करना नापसंद है। कुछ छिछोरे किस्म के लड़के, ड्राइवर जैसे लोग उन जोड़ों को देख आँखें सेंक रहे थे। पॉपकॉर्न, चिप्स, फाइव स्टार, फ्रूटी की दुकान पर कई माँएँ अपने बच्चों के साथ एकत्रित थीं। बच्चों की एक फरमाईश पर उन्हें मनचाहे पैकेट मिल रहे थे।

मैदानी इलाके से इतनी दूर दुगुने से भी अधिक दामों में मिलने वाली थैलियों को दुकान पर वंदनवार की तरह सजाया गया था। बच्चों का जी ललचाने के लिए ही शायद हर चीज को दिखाने वाले काँच के अंदर धरा था। दुकानदार अवश्य जानते थे कि बच्चों की फरमाईश माता-पिता पूरी करेंगे ही। और इसी छोटी सी बात पर उनकी जीविका टिकी थी।

अभिभूत सी मूमल को पंजाबी लहजे की हिंदी मेहँदी लगवा लो ना दीदी! की वाणी सुनाई दी। ठेठ हिमाचली लिबास में ढकी गोरी सेब सा खिला रंग, सुंदर नैन-नक्श वाली गरीब दस-ग्यारह वर्षीय लड़की एक महिला से कह रही थी लेकिन वो महिला अपने बच्चे को शो केस में सजी अलग-अलग तरह की चॉकलेटों, टॉफियों को अँगुली के इशारे से दिखा रही थी कि कौन सी लेनी है। बहुत प्यारा सा बच्चा माँ का उदार रूप देख कर कुछ तय नहीं कर पा रहा था कि कौन सी ले और कौन सी छोड़े। माँ जिस चीज पर अँगुली रखती बच्चा उसे ही 'नहीं' कह कर दूसरे पर अँगुली रख देता है। दुकानदार आशा भरी नजरों से देख रहा था। यह सोचते हुए कि जल्दी से बच्चा कुछ न कुछ खरीदने पर मान जाए तो अच्छा है अन्यथा बच्चों का क्या है कभी भी रूठ कर कह दे नहीं! कुछ नहीं चाहिए। लेकिन यह सोच कर संतुष्ट था कि माँ कुछ न कुछ दिलवाने पर अडिग है और बच्चा लेने पर। बच्चे ने आखिर चार तरह की टॉफियाँ और एक पॉपकॉर्न का पैकेट पसंद किया। महिला ने सौ का नोट पकड़ा दिया। इस बीच वह लड़की आग्रह और आशा भरी नजरों से उस महिला के निहोरे करती रही। लेकिन उस महिला का इस तरफ जरा भी ध्यान नहीं था। चमचमाते पैकेट में नाजुक तरीके से लिपटी उस खाद्य सामग्री को वह लड़की देखने लगी। बच्चे ने झट से थैली फाड़ खाना शुरू कर दिया। उस लड़की को भी शायद भूख लग आई थी। मूमल को स्वयं पर ही व्यंग्य भरी हँसी आ गई... शायद... दोपहर के एक बजने को है...। इन लड़कियों को देख यह कह पाना कुछ मुश्किल नहीं कि अब तक तो उन्हें रोटी नसीब नहीं हुई होगी। कुछ क्षण देखने के बाद उसे सचमुच की अपनी भूख का खयाल आ गया तभी तो वह लड़की ऐसे उस सपने से जागी जैसे यह निरर्थक है। यथार्थ तो उसके हाथ में पड़े इन सामान का बिकना है।

वह और अधिक आशा से वही स्वर दोहराने लगी। महिला अब तक दाम चुका अपना पर्स बंद कर चलने लगी। तब वह लड़की अधिक निहोरे वाले दीन स्वर में बोली ''मेहँदी लगवा लो न दिद्दी।''

लेकिन महिला लगभग अनसुनी सी आगे बढ़ी पर उस लड़की ने पीछा न छोड़ा। लगातार कहती ही जा रही थी। जाने उसे क्या आशा बँधी की वह अब उसके साथ-साथ चलते हुए ही मेहँदी की अलग-अलग आकृतियाँ हाथ में ले-ले कर दिखाने लगी। उसने भी चलते-चलते ही एक उचटती सी नजर डाली। इससे प्रसन्न होकर वह फुर्ती से अपने पास की दूसरी आकृतियाँ भी दिखा-दिखा कर उन्हें लगवाने का अनुनय करने लगी।

'' पाँच रुपये में है दीदी, थोड़ी देर में ही अच्छा रंग खिल उठ्ठेगा दीदी, लगवा लो ना दीदी।''

उस समय उस लड़की को लगा कि मेहँदी लगवाई का दाम बताने से शायद लगवाने के लिए वह मान जाए। अब उस महिला का ध्यान उस लड़की की तरफ गया। आशा की खुशी उस के चेहरे पर तैर गई। बच्चा चपर-चपर टॉफी खाए जा रहा था। तभी एक टुकड़ा जमीन पर गिर गया। बच्चे ने उठाना चाहा लेकिन माँ ने टोक दिया।

''नीचे गिरी चीज नही उठाते बेटा! दूसरी दिलवा दूँगी।'' पर बच्चे को वह स्वाद बहुत भाया था शायद इसीलिए वह नीचे गिरी टॉफी को उठाने को झुका। उससे पहले ही उसकी माँ ने वह टुकड़ा उसकी पहुँच से दूर फेंक दिया। लड़की चकित सी यह सब क्रिया देखती रही। बच्चा रोने लगा। माँ पुचकारते हुए बच्चे को उसी दुकान पर ले गई। दुकानदार एक और बिक्री की संभावना जान खुश हुआ और बच्चे पर बेहद प्यार जताते हुए वैसी ही दूसरी टॉफी दे दी। बीस रुपये का नोट और दुकानदार ने पाया। नोट हाथ में लेते हुए बोला ''बड़ा ही प्यारा बच्चा है।'' उसकी दुबारा बिक्री इस बच्चे के कारण हुई इसलिए उसका प्यारा होना लाजिमी था। वह बेटे का हँसता चेहरा देख मुस्कुराते हुए तेजी से अपनी टोली की ओर बढ़ने लगी। लड़की अब भी उसके पीछे पड़ी थी। उसे विश्वास था कि वो अदने से पाँच रुपये की मेहँदी तो अवश्य ही लगवा देगी।

उसकी टोली में और भी औरतें कहकहे लगाती चली जा रही थी। उसे अधिक कमाई के आसार नजर आते से लगे और उसने अपनी जैसी दूसरी लड़कियों को भी इशारे से बुला दिया। पल भर में ही दूसरी लड़किया भी अपनी-अपनी मेहँदी लिए वहाँ आ जुटी। समवेत कातर स्वर में वे सभी लड़कियाँ मेहँदी लगवाने के हर महिला से निहोरे करने लगी। सबका ध्यान बँटा और वो मेहँदी की उन आकृतियों देखने को तत्पर हुई। अतिउत्साहित वे गरीब लड़कियाँ झटपट झोले से अपना सामान निकालने लगी। लगा कहीं मेहँदी लगवाने से मुकर न जाएँ इसलिए बार-बार कहने लगी ''पाँच रुपये में ही तो है दीदी। बहुत सस्ती है और रंग भी बहुत बढ़िया आएगा, अभी लगा दूँगी।'' बोहनी की उम्मीद ने उसके चेहरे को खूब खिला दिया। झटपट अपनी सामग्री को निकाल-निकाल रखने लगी। सधे हाथ फुर्ती से काम करने लगे। उनमें से बेहद संपन्न दिखने वाली महिला बोली ''पाँच रुपये तो ज्यादा है। दो रुपये में लगाती हो तो लगा दे।'' झटके से अपने झोले में से उस लड़की ने मुँह बाहर निकाला। जैसे बिजली सी गिरी। एक बार तो वह ठगी सी रह गई। पर अगले ही पल सचेत हो गई। इस तरह गश खाने से काम नही चलेगा। ये बिजलियाँ तो रोज ही गिरती हैं। यूँ तो आज की रोटी का भी जुगाड़ न होगा। फिर बूढ़ी दादी की दवाई, छोटे भाई के लिए दूध? घर जाते ही लिपट पड़ेगा दूध के लिए। कभी कभी जब कुछ अच्छी बिक्री हो जाती है तो आधा पाव दूध ले जा पाती है। वह कैसे ताली बजा बजा कर नाचने लगता है दूध देख कर ही। कई दिन से ऐसे ही हालात है। आज भी दूध न ले जा पाई तो कैसा उदास हो जाएगा। नहीं! नहीं! कुछ भी हो ये बोहनी नहीं छूटनी चाहिए। मायूस सी वह दीन स्वर में बुझी सी बोली -

''ना दीदी पाँच रुपये कहाँ ज्यादा हैं। छापे हैं, मेहँदी है। दो रुपये मेहनताने के कहाँ ज्यादा है?'' सबके ही चेहरे आशा से भरे थे एकाएक लटक गए। कुछेक तो वहाँ से चल पड़ीं जैसे कि उनकी फितरत को अपने अनुभव से पहचान लिया कि अब यहाँ खड़े रहने से कोई लाभ नहीं। इसकी बजाय दूसरा ग्राहक ढूँढ़ा जाए। फिर भी विवश होकर उस ने अंतिम अरदास की 'लगवा लो न दीदी, सुबह से एक भी पैसा नहीं बन पाया। सामान के रुपये की वसूली तक नहीं हुई और आपके लिए पाँच रुपये क्या ज्यादा है?'' अभी-अभी अपनी देख कर महसूस की बात वह कह गई। उस घटना की वे सामग्रियाँ आँखों के सामने घूम गईं और छोटे भाई का का चेहरा भी।

''ना बाबा ना! दो रुपये में लगाती हो तो लगा नहीं तो भाग यहाँ से।''

शब्दों से पत्थर फेंकती सी वह सुंदर स्त्री बोली। और सभी एक साथ खिलखिलाती चल दी। मायूस सी वे न जाने उस टोली को जाते एकटक देखते क्या सोचती रही।

''आओ लड़कियों जल्दी से मेरे मेहँदी लगा दो।'' हताश सूखे चेहरे आवाज की दिशा में घूम गए। क्षण भर तो वे समझ न पाई।

''छापे तो तुम्हारे पास बहुत सुंदर है।'' उन चेहरों से तारतम्य बिठाना चाहा मूमल ने। उन मायूस मूरतों पर मूमल के उन शब्दों ने आशा की कोंपल उगा दी। वे सब की सब चहकती सी उसकी तरफ लपकी।

मूमल वहीं एक पत्थर पर बैठ गई। एक-एक हथेली व पैर, चार लड़कियों को सँवारने के लिए सुपुर्द कर दिए। खिलखिलाती झरने सी वह मूमल के हथेली पर तरंगित सी झर पड़ी। अपनी हथेली पर झुकी उन लड़कियों के चेहरे पर क्षण भर के लिए ही सही उसने कुछ देखा जो उसे गहरे तक संतुष्ट कर गया लेकिन... गहरी निःश्वास में उसका शेष चिंतन समा गया। सबके चेहरों के भावों की लिखावट ईश्वर ने एक ही रची या विवशताएँ उन्हें एक सा आकार दे देती है। खोई सी वह गुम ही रहती यदि उन सबकी दृष्टि का ताप अपने चेहरे पर महसूस न करती। सचमुच ही तुरत-फुरत में ही मेहँदी रच गई। वे उसे न जाने कैसी सी नजरों से देखने लगी। मूमल ने और अधिक न तरसाकर उन चारों को पाँच-पाँच रुपये पकड़ दिए। वे खुश होकर चल पड़ी लेकिन शेष के चेहरे निर्विकार से रहे। जैसे कह रहे हों हमारी बोहनी न जाने कब होगी। एक पल को वह सोच में पड़ गई। अब क्या करे? इनकी आशाओं का घड़ा कैसे टूटने से बचाए।

कुछ हलचल ने उसका ध्यान भंग किया। जय ने एक थैली में काफी सारी मेहँदी की आकृतियाँ रखवा ली और उस हिसाब से सबको रुपये बाँट रहे थे। वह झुंड आशा भरा बतियाते छँटा तो मूमल और जय एक दूसरे को एक संतुष्टि भरी तृप्त दृष्टि से निहारते मंद मुग्ध मुस्कुरा रहे थे।


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