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कहानी

कौन तार से बीनी चदरिया
अंजना वर्मा


खामोश हवा अचानक गीत पर मृदंग के सुरों से झनकने लगी थी। कड़ी, चिकनी आवाज में वे सब बाहर दरवाजे पर खड़ी होकर गा रही थीं, ''जच्चा रानी सोने के पलंग बिछा जा जच्चा रानी सोने के पलंग''

सुशील के साथ-साथ किरण ने खिड़की की दरार से बाहर झाँका। ऐसे तो किरण समझ ही गई थी कि यह आवाज किसकी है? कौन आया होगा अभी? या कौन आ सकता है इन दिनों? देखा तो वे ही दोनों थीं खूब सजी-सँवरी और हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर गा रही थीं। चेहरे पर पूरा श्रृंगार काजल से भरी आँखें और ललाट पर बड़ी-सी बिंदी, नाक में लौंग, कानों में लटकते हुए झुमके, गले में मोतियों की माला, माँग में सिंदूर और खूब चमक-दमक वाली सितारों जड़ी साड़ी। एक तो वही थी सुंदरी, जो कई बार शादी-ब्याह के मौके पर आकर नाच चुकी थी। बला की सुंदर थी और नाम भी था सुंदरी, लेकिन उसे बनाने वाला उस पर नर या नारी का लेबल चिपकाना भूल गया था। दूसरी साँवली नाक-नक्श की, पर साज-सज्जा वही। दोनों गाए जा रही थीं। आवाज बिना माइक के चारों ओर फैल रही थी। एक मृदंगिया उनके पास ही खड़ा मृदंग ठनका रहा था। उनका गीत कुछ देर तक चलता रहा। किरण सोच रही थी कि वह बाहर जाए न जाए ।

बाहर तो निकलना ही था, पर कैसे? ''इतना नहीं, इतना लेंगी'' वाले आक्रमण से निपटने की हिम्मत जुटा रही थी वह। खिड़की के पीछे चोर-सी छिपी हुई वह यही सोच रही थी कि उनका गाना बंद हो गया। कुछ समय के लिए फिजाँ खामोश हो गई। मियाँ-बीवी दोनों ने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराते हुए देखा। तभी सुनाई पड़ा कड़ी आवाज में दोनों में से कोई एक बोली, ''ये रानी जी! अरे बाहर तो जाओ। हम सबको पता चल गया है कि खुशियाली हुई है। चलो, नेग-निछावर निकालो। पोता खेलाए रही हो। जीए, जुग-जुग जीए।''

गाने-नाचने की आवाज सुनकर किरण की बहू भी आ गई थी अपने बच्चे को गोद में लेकर और साथ में बेटा भी। दोनों के चेहरों पर हँसी थी। मनोरंजन के इस अनोखे सान से उनकी देखा-देखी कभी ही कभी हो पाती थी। उन दोनों ने भी खिड़की से झाँका। अपनी बहू से किरण ने कहा, ''बच्चा लेकर न जाना बाहर। बच्चा ले लेंगी अपनी गोद में तो एक न सुनेंगी। अपनी माँग मनवाकर ही रहेंगी। और बच्चा जल्दी देंगी नहीं।'' बहू की हँसती हुई मुख-मुद्रा अचानक गंभीर बन गई।

फिर सुनाई पड़ा, ''ये बहू जी!''

किरण ने झाँका सुंदरी बोल रही थी। बोलने के बाद थोड़ी देर तक इंतजार करती रही कि कोई निकले। जब कोई न निकला किरण और न सुशील ही, तो वह बोली, ''अरी कुसुम! चल गा।''

और फिर दोनों शुरू हो गई थीं। सतर्क मृदंगिया के सधे हाथ मृदंग पर फिर चलने लगे थे सुर-लहरी की छाया की तरह। उन दोनों की आवाज फिर गूँजने लगी थी, ''अँगने में जसोमति ठाढ़ि हैं गोदी में कन्हैया लिहले, गोदी में कन्हैया लिहले ना / ये चंदा आव ना अँगनवाँ के बीच हो कन्हैया मोरा रोयेले ना ।''

थोड़ी देर तक सुर-ताल में गाते रहने के बाद गाना बंद हो गया था। पुकार आने लगी थी, ''अरी ओ बहूजी! बाहर आओ न, काहे लुकाय रही हो? अगर नय आओगी तो हम ही आते हैं। ओ बाबूजी! बाहर आओ।''

यह सुनते ही सुशील घबरा गए कि कहीं दोनों भीतर न आ जाएँ। उन्होंने सुन रखा था कि वे पुरुषों से नहीं डरती उनकी देह से लिपट जाती हैं। इसी डर से भले लोग तुरंत पैसे निकालकर दे देते हैं। सुशील बोले, ''चलो, बाहर निकलो अब, नहीं तो वे भीतर आ जाएँगी।''

उनके बाहर आते ही एक अजीब समाँ गया। वे दोनों पूरे उल्लास के साथ फिर गाने लगी थीं। स्वरों में एक ऊर्जा घुल गई थी ''हमें पीर उठति है बालम हो-बालम हो बालम हो।''

अजीब भंगिमा के साथ सुंदरी साड़ी फहरा-फहराकर नाचने लगी थी। दूसरी न देखने में सुंदर थी, न नाचने में ही अच्छी, फिर भी अलसाई-सी इधर-उधर हाथ फेंककर नाच रही थी, जैसे नाचने का कोई उत्साह उसके पास न बचा हो। गीत खत्म कर दोनों उस दंपति के पास आ गई थीं, ''अरे! जरा बबुअवा को लाओ न! हम भी तो देखें! खेलाएँगे हम बबुआ को, आसीरबाद देंगे।''

ताली बजाकर साँवली वाली ने कहा था, ''अरे रानी! जीए तेरा लल्ला, जीए-लाख बरीस जीए।''

सुंदरी बोली, ''तो लाओ, दो हमें। पाँच हजार से कम न लेंगी।''

बड़ी देर से उनका नाचना-गाना देखकर अवाक बनी हुई किरण बोली, ''अच्छा-अच्छा, ठहरो! मैं लाती हूँ।''

मोल-भाव का हिसाब बैठाते हुए उसने घर के भीतर से लाकर एक हजार का नोट पकड़ाया तो बात न बनी। सुंदरी ने या कुसुम ने लेने के लिए हाथ भी नहीं उठाया।

सुंदरी बोली, ''अरे-अरे! ये क्या देइ रही हो?'' कहकर आँखें नचाई।

कुसुम ने कहा, ''इतने से हम नहीं मानेंगी।''

सुंदरी बोली, ''तुम्हारे यहाँ खुशियाली है। चलो रानी, निकालो! हम रोज-रोज किसी के यहाँ नहीं जातीं। जब उपरवाला ऐसा दिन देता है तभी हम जाती हैं।''

कुसुम बोली, ''हम सबको तो तुम्हारा ही आसरा है। आजकल हम सबको कोई पूछता भी नहीं।'' उसकी आवाज में दीनता घुली हुई थी।

किरण ने अपने ब्लाउज में छुपाया हुआ एक वैसा ही नोट बढ़ाया। दोनों नोटों को थामते हुए सुंदरी ने कहा, ''कम-से-कम एक पत्ता तो और दो।'' उसका स्वर इस बार मुलायम था।

उसके कहने के साथ ही कुसुम बोली, ''हमारे अपने तो तुम्हीं सब हो, नाहीं त कौन है हमें देखने अउर पूछने वाला दीदी? देखो, तुम्हारे बगल में भी एक बच्चा हुआ है। उन सबने हमें केतना साड़ी-कपड़ा दिया है! पइसा भी दिया।''

यह कहने के बाद वह अपनी टोकरी पर पड़ा हुआ कपड़ा हटाकर दिखाने लगी थी जिसमें नई साड़ियाँ और कपड़े रखे हुए थे। किरण थोड़ा शरमा गई भीतर-ही-भीतर। बगल वाले ने इतना दिया तो उसे भी उससे कम तो नहीं देना चाहिए।

फिर कुछ खीझकर हजार का एक और नोट निकाला यह सोचते हुए कि ये जब तक मन-भर नहीं लेंगी, यहाँ से जाएँगी नहीं और तमाशा करती रहेंगी।

सुंदरी ने लपककर नोट पकड़ लिया। किरण की ठुड्डी पकड़कर बोली, ''जीयो दीदी, जीयो। बने रहें तुम्हरे पूत बना रहे तुम्हरा लल्ला। बाबू लखिया होए। भगवान दिन देवें अइसा कि हम बार-बार नाचें-गाए तुम्हारे दुआरे।''

इस तरह असीसती हुई दोनों चली गई। मृदंगिया भी मृदंग लिए उनके पीछे-पीछे चला गया। रास्ते में एक जगह रुककर सुंदरी ने मृदंगिया को पैसे पकड़ाए तो उसने अपनी अलग राह पकड़ ली।

पैदल चलते-चलते सुंदरी के चेहरे पर पसीने की बूँदें स्फटिक के दानों की तरह छलछला आई। वह रुक गई और कुसुम से बोली, ''का कहती हो? ऑटो ले लेवें?''

कुसुम बोली, ''काहे? अब थोड़ी दूर पर तो हइए है। अब निगचाने पर पइसा काहे को जियान करें? सुस्ताय लो तनका देर।''

दोनों एक पेड़ की छाया में बैठ गई। सुंदरी और कुसुम शहर के सीमांत पर रहती थीं। वहीं पर इनके जैसी कुछ और भी थीं जो नाच-गाकर अपना जीवन चलाती थीं। इनका न कोई लिंग था, न कोई जाति थी। सबका जीवन एक-सा था। एक-सी समस्या, एक ही जीवन-शैली।

सुंदरी बोली, ''कल जाना है माई से भेंट करने। कल सवेरे ही निकलेंगे। तुम भी चलिहो हमरा साथे।''

कुसुम कुछ नहीं बोली। चुप रहने का मतलब था 'हाँ। कुसुम और सुंदरी की आपस में अच्छी पटती थी। दोनों दो सहेलियों की तरह, सहोदर बहनों की तरह रहती थीं। रिश्ते में रिश्ता यही एक था। थोड़ा सुस्ताने के बाद दोनों उठकर चल दी अपने बसेरे की ओर।

''सुना है तुम्हारे बहिन 'पुत' की शादी हो गई?'' कुसुम ने सुंदरी से कहा।

''हाँ। बहिन अपनी नई-नवेली बहू को लेकर माई से मिलने आई है। उसके यहाँ शादी में माई जा नहीं सकी थी। सो उसे देखाने ले आई है। उससे मिलूँगी? पता नहीं। सोचा है शिवाला पर मिलूँ। लेकिन माई किसके साथ आएगी शिवाला पर? रेणु उसके साथ आवेगी तब तो भेंट होइए जाएगा। केकरो मालूम नए होना चाहिए कि हमारा माय है।'' फिर ठहरकर बोली, ''बहिन तो शायद ना आ सकेगी मिलने। घर में पतोहू है। कोनो कुछो कह दिया कि तुम्हारी सास की एक खोजवा बहिन है तब? ना-ना। दूर ही से भेंट करौंगी, कहीं गाँव के बाहर। माई शिवाला में आएगी जो गाँव से तनिका दूर पर है। पर आएगी किसके साथ?''

इतना कहकर वह चुप हो गई जैसे कुछ सोचने लगी हो। फिर बोली, ''और क्या करना कुसुम बेसी हिलि-मिलि के? ओ सबके दुनिया अलग है, अउर हमर सबके दुनिया अलग। हाथ-पैर, मुँह-कान मानुस के समान होके भी हम मानुस में नहीं गिनाते हैं। ऐसे अच्छा होता कि हम कोनौ जनावरै जाति में जनम लेते चाहे मरद होते, चाहे मउगी। अभी हम क्या हैं? बताओ तो?''

यह कहने के बाद सुंदरी ने आँखों में पानी भरकर कुसुम की ओर देखा। उसकी दोनों बड़ी-बड़ी आँखें भादो के उमड़े तालों की तरह लग रही थीं, जिनका पानी काँपता रहता है। कुसुम उसी तरह निर्विकार थी, चुप। कोई उत्तर उसने नहीं दिया था। एक सूखा मौन पसरा था उसके चेहरे पर वैशाख का ताप।

फिर सुंदरी बोली, ''ये कुसुम! हमार ई शरीर कोनो काम का है क्या? चइला जैसा है देह! चढ़ जाएगा अगिन पर। कुसुम! तुम पहली बार जाओगी हमरे साथ हमरे गाँव। देखना मेरा घर कइसा है। जिसके भाग में जेतना लिखा रहता है न, ओतने मिलता है। मेरे भाग में क्या लिखा था? यही दुआरे-दुआरे नाचना। सो नाच रहे हैं। जिसके भाग में कोठा-अटारी रही, उसकै मिली। हमें तो कोई जानता भी नहीं कि हम किसकी कोख से जनमे? हमारे भीतर किस स्त्री-पुरुष का खून दौड़ रहा है? हमारे महतारी-बाप कौन हैं? पर कोई तो हैं? नाहीं तो यह देह नए होती। कौन जानना चाहता है? कोई चाहेगा तो भी ओके मालूम नहीं होने देंगे सब। आउर क्या करना? क्यों बताना? हम भी थोड़े कहेंगे? अपने महतारी-बाप का नाम नए हँसवाएँगे। कहना हमारा काम भी नहीं। अब तो जो हैं, जहाँ हैं वही सब कुछ। वही रास्ता हमारा। हमारा रास्ता अलग है सभी से। जाए रहे हैं माय को देखने। एगो ओही से माया-ममता है।'' यह कहते हुए उसने आँखें पोंछी।

यह सुनकर कुसुम की आँखों से भी एक बूँद लुढ़की और गाल पर अटक गई। फिर सुंदरी बोली, ''और जानती हो? अब तो मन भी नहीं होता भेंट करने का? क्या करना है मिलके? हमैं सब त्याग दिए, भूल गए। एक बहिन है और एक भाई। मेरे बाद पहिले बहन रेनु हुई। ओकरा बाद गोपी। दोनों मेरे घर से निकल जाने के बाद हुए। उनको बचपन में, फिर एक बार जवान होने पर देखा था। फिर अबकी बार कहीं। फिर अब। नहीं - अब शायद देखना न हो पाएगा - इसके बाद। उ, अपना घर-दुआर में मगन है। दुलहा, बाल-बच्चा, खेत-पथार। हमको याद रखी होगी एक खिस्सा की तरह...। उसको बहुतै बाद में, होसमंद होने पर पता चला था कि एक उसकी बहिन है जो खोजवा है।''

कुसुम बोली, ''ये सुंदरी! तुमको तो उहो मालूम कि तुम्हारा जनमभूमि कहाँ है? मतारी-बाप कौन है? हमें तो ओहू नय पता। हम तो जानते ही नहीं कि कौन हमरा माय-बाप है? हम कौन हैं?''

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद कुसुम बोली,''जाने दे सुंदर की। हम सबको उ, सब नहीं सोचना चाहिए। हमको भी तो उसी ने बनाया जिसने मरद-मानुस बनाया, जनी-जात बनाया। काहे सोच करैं हम? पेड़ में भी देख तो सब पेड़ों में फूल-बीज कहाँ होत है? हम भी हैं उसी तरह। लेकिन हैं तो उसी के हाथ के बनाए। वही रामजी हमें भी बनाए हैं।'' कुसुम कभी-कभी उसको सुंदर की बोल देती थी।

''हाँ, पर कोन सोचता है अइसे? फिर हमें सबसे अलग क्यों रखा गया जैसे अछूत हैं हम? हमें कौन गुदानता है? रास्ते चलते सब देखिकै हँस देते हैं? का हम हँसने की चीज हैं?'' सुंदरी बोली।

''नहीं मानेगा तो क्या हुआ? सच्चाई तो इहे है न कि हम भी भगवान के बनाए हुए हैं।''

''अपना को संतोष दे ले कुसुमी! बाकी सोच के देख कि पिलुआ-पतारी में भी एक ठो मरद होत है त एगो मउगी।'' दुख से उसका चेहरा तमतमा उठा।

इसके बाद दोनों ही चुप हो गई। कोई शब्द न फूटा किसी के मुँह से।

दूसरे दिन सवेरे-सवेरे दोनों निकल पड़ीं। उन्होंने सुबह वाली रेल पकड़ ली थी कि रेल में गाते हुए जाएँगी। रास्ते में कुछ कमाई भी हो जाएगी। एक डब्बे में सुंदरी चढ़ी। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। दरवाजे से भीतर घुसकर जब बर्थ के पास पहुँचीं तो दोनों खड़ी हो गई। उन्हें देखकर कुछ लोग मुस्कुराने लगे। औरतें शरमा गई उनके चेहरे पर पसरी पुरुष की छाया देख। पुरुषों को उनके चेहरे में औरतों के चेहरे की मूर्ति दिख रही थी। इन दोनों अर्धनारीश्वरों को देखकर पूरा डब्बा कौतुक के मूड में आ गया था। एक छिपी-छिपी मुस्कुराहट सबके चेहरे पर तैरने लगी थी। सुंदरी ने आहत होकर कुसुम की ओर देखा जैसे कहती हो, ''देख - ये लोग कैसे मुस्कुरा रहे हैं!''

कुसुम को यह सब देखते हुए एक जमाना बीत चुका थाय क्योंकि वह उम्र में सुंदरी से काफी बड़ी थी। वह निर्विकार बनी रही। अभी तो पैसे कमाना जरूरी था। अतः सुंदरी ने एक फिल्मी गीत शुरू कर दिया। वह गाते हुए आगे-आगे चल रही थी। पीछे-पीछे कुसुम हाथ पसारे हुए चल रही थी। कुछ लोगों ने पैसे निकाले, परंतु कुछ कंजूस इन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे थे और गंभीर बने बैठे थे कि कुछ देना न पड़े। गाते-गाते उनकी यह भाव-भंगिमा देखकर सुंदरी का दिल घृणा से भर गया - संवेदनहीन। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। सारे अंग बनाकर भी ईश्वर इन लोगों के भीतर दिल रखना भूल गया। मन तो किया कुसुम से बोले, ''कुसुमी! ये जो मुँह छुपा रहे हैं, इनके आगे तो हाथ पसार मत।'' लेकिन मजबूरीवश कुछ कह न पाई। वह देखती रह गई थी, कुसुम का हाथ उन पत्थरों के आगे भी पसरा हुआ था। नोट-सिक्के बटोरते हुए दोनों आगे बढ़ती चली रही थीं। डिब्बे का अंत आ गया तो सुंदरी ने कुसुम से पूछा, ''क्या कहती है? आगे चलें?''

यह कहने के बाद उसने अपने नकली उरोजों पर आँचल डालकर उन्हें इतनी हिफाजत से ढँक लिया था कि वैसे कोई स्त्री भी न करती। ऐसे उसके नारी-रूप की बराबरी करने वाली कोई न थी। कुसुम ने कहा, ''एक डिब्बा अउर देख लें।'' यह कहते हुए दोनों अगले डब्बे की ओर चलीं।

कुसुम ने डब्बे में चढ़ते हुए कहा, ''अब हम गाते हैं।''

सुंदरी ने पूछा, ''कौन वाला गाओगी?''

कुसुम बोली, ''झूठी देखी प्रीत जगत की।''

सुंदरी बोली, ''फिर वही गितवा। अपन गीत रख अपने पास। भजन सुनिके इहाँ कोई पइसा न टसकाएगा। इन सालन के चटकदार गीत सुनाव, नैन मटक्का कर, तबही मिली पइसा। तू छोड़ दे। हम ही गाते हैं।''

यह सुनकर सदा शांत रहने वाली कुसुम की भी हँसी छूट गई। बोली, ''ठीक है। तो तू ही गा।''

सुंदरी ने दूसरा फिल्मी गीत शुरू किया। कुसुम के मन में वह भजन गूँजता रह गया जिसे गाने का वह मन बना चुकी थी, ''ऐसी देखी प्रीत जगत की'' और जिसे अक्सर वह खुद के लिए गाती थी, खुद ही सुनती थी।

रेल रुकी तो दोनों उतरीं और गाँव जाने वाली बस में सवार हो गई। बस में खलासी और ड्राइवर की आँखें उन्हें वैसे ही घूर रही थीं, जैसे वे गर्म-गर्म जलेबियाँ हों। उन्हें देखकर सुंदरी ने हिकारत से मुँह चमकाकर घुमा लिया।

बस ने उन्हें गाँव के सीमांत पर उतार दिया। यहाँ से मिट्टी वाली सड़क थी जो गाँव तक जाती थी। उसके बाद खेतों की पगडंडी। दोनों चल दीं उस ओर। सुंदरी का मन हरे-भरे खेतों को देखकर हरा हो गया था। दिशाओं के पट खोलकर खुली हवा चली आ रही थी। दोनों के चेहरों पर ताजगी छा गई। सुंदरी का गोरा रंग खिलकर खूब चिकना और गुलाबी हो गया। दोनों ने पान खा लिया था। एक अजब उल्लास से भरी हुई दोनों चली जा रही थीं। खेतों की पगडंडी पर सँभाल-सँभालकर पैर डाल रही थीं। गाँव आने पर कुछ बच्चे, कुछ नौजवान इन्हें मुस्कुराकर देखने लगे थे। सब सोच रहे थे कि क्या बात है कि दोनों खोजवा चली आ रही हैं। किसी पर ध्यान न देते हुए सुंदरी ने कहा, ''चल अपने घर की ओर ले चलती हूँ। देखना। पर इहाँ किसी से मिलना नहीं है। सिर्फ जाना है अनजान बनकर।''

वे एक बड़े घर के बाहर पहुँची। वह घर पूरा संपन्न लग रहा था देखने से। कुसुम हैरत से देखती रह गई थी अपनी ठुड्डी पर ओठों के नीचे उँगली दबाएँ हुए। कुछ गर्व में भरकर सुंदरी ने उसे देखा। वे दोनों कुछ देर रुक गई वहाँ पर।

कुसुम बोल उठी, ''हाँ, बहुते हैं तुम्हारे माई-बाउजी।''

सुंदरी बोली, 'त ओसे का? हमें क्या मिला उनका? बस, खाली जनम दिए। अउर त कुछो नाहीं। छोड़ - कुसुम।''

''तो माई से भेंट कैसे करोगी?''

''हाँ, शिवाला पर। बाकिर अभी जना तो दें कि हम आ गए हैं।''

वे दोनों अहाते के भीतर चली गई। सुंदरी अपने ही घर के भीतर जाने में ठिठक रही थी। कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे, लग रहा था जैसे किसी अपरिचित के आँगन में जा रही हो। उसने पहले बाहर से ही झाँका। एक औरत दिखाई दी। वह पहचान गई कि यह उसकी बहन रेनु थी जो अब बहुत बदल गई थी। उसकी देह गदरा गई थी और अब वह पूरी तरह से प्रौढ़ा दिखाई दे रही थी।

बहन को देखने के बाद वह आँगन के भीतर गई और नाटक करते हुए बोली, ''इहाँ पर सादी-ब्याह हुआ है? हमको मालूम हुआ।''

स्त्री-पुरुष के बीच की कड़ी आवाज सुनकर रेनु ने उलटकर देखा और उसके पास चली आई। अपनी किन्नर बहन को देखकर उसकी नजर में पहचान उभर आई। उस पहचान को उसने आवाज में घुलने से रोक दिया। पर खुशी की मुस्कुराहट बिखेरे बिना न रह सकी। बोली, ''हाँऽऽ, तुम लोग आ गई? अच्छा, माई से कहती हूँ।''

वह सामने वाली कोठरी में चली गई जहाँ उसकी माँ बैठी हुई थी पलंग पर। उसने कहा, ''माई! माया दीदी आई है।''

माया सुंदरी का वास्तविक नाम था, उसके माता-पिता द्वारा दिया हुआ। जिंदगी में वह क्षण कभी न आया कि वह अपने नाम को अपने माता-पिता द्वारा पुकारे जाते हुए सुनती। यह सुनते ही उसकी माँ बाहर आँगन में आई। पर सुंदरी को सामने खड़ी देखकर भी उसे संबोधित न कर सकी। क्या बोले, समझ नहीं पा रही थी। बस खड़ी देखती रही। आवाज मुँह तक आकर रुक गई थी। आँखों में खुशी के साथ एक बेबसी थी। सुंदरी ने ही कहा, ''सादी-ब्याह हुआ है। बहुरिया को दिखाओ। आसीरवाद दे देवें।''

सुंदरी आँगन में एक ओर खड़ी चारों ओर नजर दौड़ा रही थी कि परिवार का कोई सदस्य दिखाई दे जाए। पिता अब नहीं रहे थे। न भाई दिखाई दे रहा था और न ही बहन का बेटा। बहू तो कोठरी में होगी।

तभी अपनी पायल की झंकार से आँगन को गुँजाती हुई एक ओर से बहू आती दिखाई दी। उसके हाथों में कुछ खाने की सामग्री थी। सुंदरी की माँ का दिल तड़प रहा था कि वह सुंदरी को कलेजे से लगा ले। बुलाकर भीतर बैठाए। परंतु मजबूर थी। अतः खड़ी-खड़ी सारे दृश्य को निहार रही थी चुपचाप। कुछ न कह सकती थी। नौकर-दाई, नाते-रिश्ते सब जैसे छिपे हुए कैमरे थे। कहाँ क्या क्लिक हो जाए? सतर्क थी। दो महरियाँ आँगन में काम कर रही थीं। अभी उनकी नजर भी सुंदरी और कुसुम पर थी कि वे क्या करती हैं? क्या गाती हैं?

बहू सुंदरी के पास आई तो उसने कहा, ''आय-हाय! चाँद जैसी बहू उतार लाई हो। एहवात बना रहे बहू का। दूधे नहाय पूतों फले।''

सुंदरी ने अपना झोला फैलाकर कागज में बाँधी खाद्य-सामग्री ले ली। फिर जैसे उसने एलान किया, ''अब हम जा रही हैं शिवाला की ओर।'' यह कहकर अर्थ-भरी आँखों से एक बार माँ को, फिर रेनु को देखा।

उसके बाद अपनी नजरें आँगन में चारो ओर दौड़ाई। बड़ा-सा आँगन। काम करती हुई महरियाँ। भरा-पूरा घर। फिर सूनी नजरों से माँ और बहन को देखते हुए मुँह घुमाकर बाहर निकल गई। उसके पीछे-पीछे कुसुम भी। उन दोनों के जाते ही एक महरी ने कहा, ''ये लो। ये तो बिना नाचे-गाए चली गई।''

''तो आई किसलिए थीं?'' दूसरी ने कहा।

''हूँऽऽ देखो न!'' दूसरी व्यंग्य से मुस्कुराई।

इस पर सुंदरी की माँ ने तड़पकर कहा,''बिचारियों ने कुछ नेग-निछावर भी तो नहीं लिया। आई, आशीर्वाद देकर चली गईं।''

घर से बाहर निकलकर सुंदरी और कुसुम कच्ची सड़क पर आई तो कुसुम ने पूछा, ''माई से कैसे मिलोगी? अभी तो देखा-देखी भी नए हुई ठीक से?''

''माने-मतलब से सुनाए तो दिया कि जा रहे हैं शिवाला पर। उँहें आएगी सब।''

दोनों एक निर्जन शिवालय पर पहुँच गई थीं जो गाँव के बाहर पड़ता था। वह शिवालय काफी प्राचीन था जिससे सटा हुआ एक विशाल बरगद का पेड़ था। दूर-दूर तक फैली उसकी डालियों से मोटी-मोटी जड़ें लटक-लटककर को छू रही थीं। गाँव के लोग कहते थे कि इस पर शंकर जी का साँप रहता है, जो काटता नहीं है, पर अक्सर आस-पास घूमता हुआ दिखाई दे जाता है। वहीं पास में एक कनेर का पेड़ था। दुनिया-भर के पीले फूल उसके नीचे झर-झर कर गिरे हुए थे।

मंदिर के आस-पास पसरी हुई नीरवता बरगद की घनी पत्तियों में छिपी चिड़ियों की निश्चिंत और निर्भय बतियाहट के स्वरों से टूट रही थी। कभी-कभी दूर से टेरते किसी पंछी का तेज स्वर सुनाई दे जाता। ऐसे तो सन्नाटे की झंकार ही गूँज रही थी।

कुसुम चली उसकी छाया में बैठने तो सुंदरी ने कहा, ''वहीं बैठेगी? शंकर जी के साँप से भेंट करेगी क्या?''

कुसुम डर गई, ''क्याऽऽ? साँप?''

''अरे नहीं कुछ नहीं बैठ, जहाँ मन करता हो। कुछ नए होगा।''

''नहीं-नही, चल मंदिरवा के ओसारे में। वहीं बैठेंगी।''

सुंदरी ने देखा वहाँ एक खूब साफ-सुथरा कुआँ है तो उसका मन कुएँ के गर्भ का पानी पीने के लिए मचल उठा। वह चल दी कुएँ से पानी निकालने। डोल कुएँ में गिराने लगी तो कुसुम भी चली आई। सुंदरी ने पानी का डोल ऊपर खींचा और बोली, ''पहिले तू पी ले पानी।''

कुसुम अपने पैरों पर बैठ गई और ओक से पानी पीने लगी। ऊपर से सुंदरी पानी गिरा रही थी। जब वह पीकर उठी तो उसकी जगह सुंदरी बैठ गई ओक मुँह तक ले जाकर। कुसुम डोल से पानी गिराकर उसे पानी पिलाने लगी। बहुत दिनों बाद शैवाल की महक वाला ठंडा पानी सुंदरी के कंठ से फिसलता हुआ कलेजे तक उतर रहा था। बहुत दिनों बाद पानी में बसे हरेपन के स्वाद से वह तृप्त हो गई। पीकर उसने डकार ली। फिर चल दी आँचल से मुँह पोंछती मंदिर के ओसारे में बैठने। दूर से आती हुई ठंडी हवा से दोनों की आँखें झपकने लगीं तो वहीं चादर बिछाकर दोनों लेट गई।

लेटे-लेटे सुंदरी कुसुम से बोली, ''हाँ तो तुम्हें साँप का खिस्सा नहीं मालूम न?''

''नाहीं।''

''इहाँ ई बरगद की जड़ी में एक जोड़ा नाग-नागिन रहता है कौना जमाना से, कोई नहीं जाने। कोई कहता है कि शंकर जी का साँप है तो कोई कहता है कि शंकरे जी हैं। पर एक बार तो हमहीं देखैं रहें। ठीक हमरा सामने छत्तर काढ़ के खड़ा हो गया। साक्षात भोले बाबा लेखन। बाकिर काटा-उटा नए, जैसे आसीरबाद दे रहा होय''

ऐसा कहते हुए सुंदरी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, ''देख, हमरे रोएँ खड़े हो गए हैं। उ, भोले बाबा रहें और साथ में पारबत्ती जी। एक अउर साँप था।'' कुसुम ने आश्चर्य से कहा, ''हूँ? बाप रे! हम तो डरिए जाते।''

''नाहीं, कौनो डर नाहीं - ईहा के कौनो लड़िका-बूढ़-जवान से पूछो। सबकै मालूम है ई बात। सब कहेगा हम ईहा देखा, उहाँ देखा। बाकि साँप आज तक केहुको काटा नए है। बड़ा जगता मंदिर है। भागे से कोई उ, साँप को देख पाता है।''

फिर तरह-तरह की बातें होने लगीं। कहते-सुनते कुछ समय बीता। तब सुंदरी ने सूने रास्ते की ओर देखा जिस पर दो स्त्री चली आ रही थीं।

वह बोली, ''देख, उहे, माय आय रही है। उसके साथ रेनु है। पता नहीं आज गोपी क्यों नहीं दिखाई दिया? बहिन पुत भी नहीं।''

उन दोनों के नजदीक पहुँचते ही वह उठी। पहले माँ से, फिर बहन से गले लगकर मिली।

वृद्धा ने पूछा, ''कैसी है तू माया? मेरी बेटी! तू आँगन में आई, पर मैं किसी से कह न सकी कि मेरा बच्चा आया है। तुझे आँगन में अजनबी की तरह खड़ा रहने दिया। बैठा न सकी। पानी तक के लिए पूछ न सकी तुझे। यही तो मेरा भाग्य है।'' यह कहकर वह अपनी आँखों से निकलते हुए आँसुओं को पोंछने लगी।

''अच्छा-अच्छा! अब रोय मत। अभी थोड़ा देर हमरे साथ बोल-बतिया ले। रो नहीं। हमैं अच्छी तो हूँ। देखिए रही है।'' सुंदरी अपनी माँ को मंदिर के ओसारे में बैठाते हुए बोली। उसे बैठाने के बाद उसके बगल में बैठ गई। रेनु भी वहीं बैठी हुई थी। थोड़ी दूर पर कुसुम थी। शायद यह दूरी उसने स्वयं बना ली थी कि उनकी आपसी बातों में उसके कारण कोई खलल न पहुँचे। सब खुलकर अपना दुख-सुख कह-सुन सकें। ''अच्छा, तू अपनै बारे में बता। तू एतना दुब्बर काहे होए गई है? हड्डी-हड्डी तो निकल आई है।'' सुंदरी बोली।

''मुझे छोड़ दे। अब क्या करना है मुझे? उठ जाऊँ संसार से, अब तो यही चाहती हूँ। जीकर क्या करना है? अब सारी पिछली बातें याद आने लगी है।'' वृद्धा बोली।

''क्या?''

''तुम्हें इतना रूप दिया भगवान ने, पर उसका माथा खराब हो गया था कि तुझे ऐसा बना दिया। फिर भी, जैसी भी थी रहती मेरे आँगन में। पर सब उठा ले गए मुझसे छल करके। मैं सो रही थी। हमेशा इसी डर से दरवाजा बंद करके सोती थी। उस दिन तुझे लेकर सोई तो आँख लग गई। किवाड़ खुले हुए थे। तभी सब उठा ले गए दे दिया तुम्हें खोजवा को अहँ... हँ... हँ...।'' कहकर वह अपनी छाती पीटने लगी थी।

सुंदरी ने कहा, ''माई! भूल जा उ सब बात। जो हमरे किस्मत में था, सोई हुआ। किस्मत का लिखा ना मिटत है, माई। तू काहे रोती अउर छाती पीटती है? एमे तोहार दोस ना है।''

वृद्धा ने उसकी ठुड्डी पकड़ ली और कहा, ''अब तो जाने कब मिलना होगा। मैं रहूँ... न रहूँ।''

''नहीं-नहीं, ई सब मत बोल। हम फिर आएँगे भेंट करने।''

सुंदरी अपने झोले में से मिठाई का डब्बा निकाल लाई। माँ को देते हुए बोली, ''लो माई, बड़का दोकान से खरीदा है। खाना।''

बहन की ओर देखते हुए बोली, ''तुझे अब देख रही हूँ जब तुम्हारे बेटा का बियाह होय गया। चलो, देखकर संतोष तो हुआ। माई को देखना। गोपी तो है ही। पर तू भी देखना। हम तो रमता जोगी। संसार के माया-मोह से तो अभिए छूटि गए हैं... गोपी कइसा है? दिखाई नए दिया।''

''ठीक है। वह शहर गया है। सवेरे ही निकल गया।'' रेनु बोली।

और ''राजू?''

'वह भी साथ में गया है।''

''हमरा भागे खराब है। उसकी दुलहिन को तो देखे, बाकिर उसको नए देख सके। अब पता नहीं कब देख भी पाएँगे, कि नाहीं।'' सुंदरी कुछ उदास होती हुई बोली।

''नहीं दिदिया, ऐसे क्यों कहती हो? देखोगी क्यों नहीं?''

''हाँ सायद कहीं देख पाए! पर कोय उम्मेद नाहीं।''

मंदिर के ओसारे पर ये तीन औरतें पास-पास बैठी रहीं। बातें जितनी हुर्इं, उससे अधिक स्नेह-भरी दृष्टि का लेन-देन हुआ। जितना कुछ कहा गया, उससे अधिक अनकहे को सुना और महसूसा गया। झिर-झिर हवा चल रही थी और एक अजीब शांति से नहाया हुआ था सब कुछ मंदिर, प्रांगण, बरगद, कनेर का पेड़, कुआँ और सामने कुछ दूर तक फैला हुआ मैदान।

अचानक सुंदरी उठी। अपना आँचल सँभालते हुए बोली, ''अच्छा माई! अब साँझ होय रही है। हमें बस पकड़ना है। तुझे भी घर जाना है। तू भी चलते-चलते थक जाएगी। धीरे-धीरे जाना। फिर मिलेंगे। कोनो बात का चिंता मत करना।''

उसकी माँ भी उठी। स्नेहकातर होकर अपने कमजोर हाथों से सुंदरी का गाल छूती हुई उसकी ठुड्डी पकड़कर उसे कई पलों तक देखती रही। कुछ बोल न सकी। सुंदरी ने माँ को पकड़ लिया और उसके गाल से अपना सटा लिया। माँ के गाल की गोरी कोमल त्वचा बुढ़ा के और भी कोमल लग रही थी सटने पर। सीने से चिपकी उसकी सूती साड़ी का मुलायम एहसास वह अपने कलेजे में सँजोती रही। अलग हुई तो देखा माँ रो रही थी। सुंदरी ने उसकी बुढ़ाई झुर्रीदार पलकों को उँगलियों से पोंछ दिया।

सुंदरी की माँ डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसके पैरों की डगमगाहट बुढ़ापे की कम और भावविह्वलता अधिक थी। रेनु ने उसे सँभाल रखा था। वह उसे पकड़कर ले जा रही थी। जब वे दोनों कुछ दूर निकल गई तो सुंदरी और कुसुम भी चल दीं अपनी राह पर।


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हिंदी समय में अंजना वर्मा की रचनाएँ