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व्याख्यान

इक्कीसवीं शताब्दी में कविता
गगन गिल


इस विषय पर सोचते हुए मैं थोड़ा-सा 'इक्कीसवीं शताब्दी' की तरफ गई, थोड़ा-सा उस 'कविता' की तरफ जो अभी लिखी जानी है, लेकिन ज्यादा समय मैं 'में' में ही अटकी रही। एक संधिकारक शब्द 'में' - जो इक्कीसवीं शताब्दी और कविता जैसी दो स्वतंत्र इकाइयों को जब जोड़ता है, तो कुछ अर्थ खुलते-से प्रतीत होते हैं। क्या यह शब्द 'में' दो भिन्न बहावों के बीच ठहरा हुआ कोई द्वीप है, एक भविष्य-द्वीप, जिस पर पहुँच जाने की आकांक्षा हर अनलिखी कविता करती है? एक खोया हुआ देश, जिसे हर रचना खोजती है? बस देश तक पहुँच जाएँ, फिर काल का सामना करना मुश्किल न होगा।

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जब एक अधबनी कविता कहीं नहीं 'में' होती है, यानी अपने देश और काल से दूर कहीं और - तब वह कहाँ होती है?

संभव है, वह अपनी सभ्यता के सागर-तल में होती हो, अपनी भाषा की समस्त 'लिखित' कविताओं के उपांत में।

वयस्कों की दुनिया से ओझल एक अपूर्ण, अविकसित भ्रूण। एक उँगली कम या ज्यादा हुई नहीं, कि सारा अस्तित्व संदेहास्पद हो सकता है। जाति बदल सकती है। जैसे मकड़ी मकड़ी न रहेगी, कुछ और हो जाएगी। एक चींटी, मक्खी या तितली।

क्या कविता एक मकड़ी है - कभी लय का और कभी शब्द का तार पिरोती? कभी अर्थ का झूला झूलती और कभी अपने ही अर्थ से कहीं दूर, आगे, निकल जाना चाहती हुई? या कि कविता एक सीपी है, भाषा के सागर में डूबती-उतराती, जिसे ऊपर आने की चाह है?

हर काल अपने शब्दों से गोता लगवाता है, लगभग उनकी गर्दन पकड़ कर। झूठे मोती डूब जाते हैं, सच्चे तैर आते हैं।

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लेकिन क्या कविता सच और झूठ के बारे में है? उसे होना चाहिए? शायद नहीं। सच और झूठ ज्ञान का क्षेत्र है, प्रमाण का क्षेत्र है, बुद्धि का क्षेत्र है। कविता केवल सच के बारे में है - एक सच और दूसरे सच के बारे में। यह मर्म का क्षेत्र है, जहाँ एक का होना दूसरे को रद्द नहीं करता। यह इतनी बड़ी सृष्टि में अपने होने को देखना है। इस 'होने' में कितना भय है, कितना संत्रास - इस के बारे में है।

कविता एकांत रचती है, और इस एकांत का एक समुदाय।

वह स्वयं भले ही समाज के हाशिए पर रही आई हो, परंतु मनुष्य हमेशा उसकी चिंता के केंद्र में रहा है। वह समाज को मनुष्यों का झुंड नहीं, स्वतंत्र व्यक्तियों की इकाई मानती है।

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यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि सृष्टि के उस आदिम एकांत का सामना करने के लिए पहले-पहल जो भाव बना, कविता बनी, वह देवताओं का आवाहन करती थी। ऋग्वेद में एक बहुत ही मार्मिक सूत्र है - 'वरुण सूक्त' में - मैंने इसे अँग्रेजी अनुवाद में ही पढ़ा था, इसलिए मोटे तौर पर उसका भावार्थ कहती हूँ -

घेर लिया है प्यास ने
जल के बीचोंबीच मुझ खड़े को
हे वरुण, दया करो, दया करो

जल और प्यास। एक समय में दो अलग जगहों पर एक साथ अवस्थित हो सकना। कविता इसे संभव करती है। वह हमारे 'होने' में 'होने की छाया' जोड़ देती है। जैसे काया के साथ थोड़ी-सी नींद, थोड़ा-सा स्वप्न।

कविता सबसे पहले एक नींद बुनती है, फिर उस नींद में से भी उठ कर दूसरी तरफ चली जाती है। इस तरह अपनी नींद तोड़े बिना ही कविता यथार्थ का विध्वंस करती है।

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ऋग्वेद से लेकर महाभारत में कुंती के गुप्त-मंत्र प्रयोग करने तक हमारे यहाँ शब्द ही देवता है, नाद ही देवता है। सही उच्चारण करते ही देव प्रकट हो जाते हैं। लेकिन जो बात मुझे चकित करती है, कविता की विद्यार्थी होने के नाते, वह यह, कि मध्ययुग तक आते-आते हमारे कुछ कवियों के स्थूल शरीर ही लुप्त होने लगते हैं। अक्का महादेवी, मीरा, कबीर, गुरु नानक, तुकाराम। एक के बाद एक कवियों के गायब होने के उदाहरण मिलते हैं और ये घटनाएँ एक समुदाय विशेष में नहीं घटतीं। न भूगोल के एक हिस्से में। न एक समय में ही। ये सब कवि अपना-अपना जीवन जीते हुए - जिसमें बहुत कष्ट थे, साधना थी, परीक्षा थी - अंततः उस जगह आते हैं जहाँ शरीर मिट्टी हो जाता है। लेकिन इन में से कुछ अपने पीछे फूल छोड़ जाते हैं, कुछ वह भी नहीं।

एक कवि का सदेह इस संसार से चले जाना - युधिष्ठिर के धर्म की तरह नहीं - क्योंकि बहुधा एक कवि का सत्य और संताप एक-दूसरे से कुछ इस तरह लिथड़ा हुआ होता है कि एक को दूसरे से अलग कर पाना कठिन है। एक कवि का सदेह इस संसार से चले जाना - यह एक सुंदर बिंब है लेकिन क्या यह बिंब से आगे भी कुछ है? शायद शब्द-सिद्धि का ही औंधा उदाहरण?

पहले कवि के शब्द से देवता खिंचे आते थे, अब शब्द ही कवि को खींच कर ले जाने लगा!

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हम घूम-फिर कर यहीं आ जाते हैं। बीसवीं शताब्दी की आखिरी घड़ियों में। कविता के इतिहास की सब से पीड़ित सदी में।

क्या हम इस सदी की दुर्घटनाओं से मुँह मोड़ कर इक्कीसवीं सदी का सामना कर सकते हैं? क्या इस सिंहद्वार की बजाय कोई दूसरा दरवाजा है जिससे दूसरी तरफ जा सकें?

मुझे लगता है, इस सदी के समस्त पीड़ा-प्रदेशों को याद रखने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। इससे हम कम से कम उन कष्टों, उन यंत्रणाओं से बच सकते हैं, जिन्हें हमने बीसवीं सदी के कुछ अभागे क्षणों में पहचानना सीखा। यह सदी, जिसने कविता के लिए अभूतपूर्व यातना-गृह बनाए, जैसे उसके लिए अपनी स्वयं की बनाई हुर्इं कठिनाइयाँ कम हों। यह सदी, जहाँ कविता को बार-बार अपने को सिद्ध करना पड़ा। राजनीतिक उथल-पुथल, दो-दो युद्धों के नरसंहार, जिनके बाद एकबारगी लगा था कि कम-से-कम उस भाषा में (जर्मन) तो अब कविता नहीं ही लिखी जा सकेगी, जो इस विभीषिका के भौगोलिक केंद्र में थी।

एक कवि का जीवन कितना छोटा होता है और एक विचार-धारा का आतंक कितना लंबा। आज हम रूस के ऑसिप मांदेलश्ताम, मारीना स्वेताएवा, मायकोवस्की, अन्ना अख्मातोवा, स्पेन के फेदरिको लोर्का, पोलैंड के ज़्बीग्नीएव हर्बर्त और अपने समय के पाश की कठिनाइयाँ याद करें तो स्वयं को ठगा गया पाएँगे। इतने सारे विलक्षण और स्वाभिमानी कवियों को अपने समय की सत्ता के कारण क्या-क्या नहीं देखना पड़ा? इनमें से कुछ बंदीगृहों में मरे, कुछ ने आत्महत्या की, कुछ की लावारिस लाशें मिलीं। उल्लेखनीय, और शोकजनक, बात तो यह है कि ये उस तरह के प्रतिबद्ध राजनैतिक कवि नहीं थे, जैसे हम आज देखने के अभ्यस्त हैं। इनके समय की आग इनके घर तक आ गई थी और ये बच नहीं पाए। श्रीकांत जी के शब्दों से उधार ले कर कहूँ कि - अगर बचते, तो क्या रच सकते थे!

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आखिर कविता सभ्यता के विकास में क्या योगदान देती है? क्या वह थोड़ी-सी चिंगारी राख के नीचे दबा रख छोड़ती है, कि मुश्किल वक्त में आग चाहिए हो, रोशनी चाहिए हो, तो यह संभव हो सके?

जब कोई नहीं देखता, कविता स्वप्न देखती है, कि मनुष्यों के लिए स्वप्न देखते रहना संभव रहे। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक कवि को अपने संसार के लिए इतनी कम जमीन, इतना जरा-सा आकाश चाहिए होता है, और फिर भी वह खतरे में पड़ जाता है।

क्या सचमुच स्वप्न देखता हुआ कवि सबसे खतरनाक प्राणी है? शायद। कोई भी सत्ता कवि से नहीं, उसके स्वप्न देखने से डरती है - कि उसका अपना कारोबार स्वप्न बेचने से ही तो चलता है।

कितना अच्छा है कि जब एक कवि स्वप्न देखता है तो बहुधा वह इतना एकाकी और संशयग्रस्त होता है कि उसे मालूम ही नहीं होता कि वह शेष मानवता के लिए भी कोई स्वप्न देख रहा है। हमारे समय के हरिभजन सिंह हों या श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध हों या धूमिल - ये सब कभी डूबते नजर आते हैं, कभी तैरते। इस तरह वे अनजाने हमारे दर्पण साफ करते जाते हैं। हमें अपनी छलनाएँ, प्रवंचनाएँ, कुछ जिद्दी-से स्वप्न पहले से अधिक चमकदार नजर आते हैं।

हम कविता में अकेले हो सकने की विधि को पढ़ते हैं - और इस अकेलेपन को सह जाने की विधि भी।

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लेकिन क्या हम अकेले हैं? यदि हैं, तो किस तरह से?

हमारे आसपास इतना शोर है, तकनीकी तिलिस्म हैं, सफलता की लुभावनी सीढ़ियाँ हैं। इक्कीसवीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते मुझे चिंता यह है कि कहीं हम इतने अकेले न हो जाएँ कि भीड़ में ही स्वयं को सुरक्षित समझने लगें!

टॉलस्टॉय कहा करते थे, "निर्वासन तुम्हें सही जीवन जीने से नहीं रोकता। मनुष्य स्वयं को असली निर्वासित तब करता है, जब वह सही जीवन नहीं जीता।"

विडंबना यह है कि हम कविता के पास तभी जाते हैं, जब कहीं और नहीं जा पाते। एक तरह से यह बात हमारे ईश्वर के पास जाने के क्षण पर भी लागू होती है।

हर कविता आत्म-निर्वासन से आरंभ होती है और धीरे-धीरे अपना पुनर्वास साधती है। लेकिन बड़ा कवि वही होता है, जो अपने निर्वासन को कभी भूलता नहीं।

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लेकिन एक दूसरा खतरा भी है। न केवल आज कविता में शोर बहुत है, बल्कि लगभग हर कवि को कविता शुरू करने से पहले ही अपना और उस अनलिखी कविता का रास्ता पता है। दोस्त-दुश्मन सब सफेद-स्याह हैं। कविता अब अपना रास्ता भूलती नहीं। न उसके कोई बीहड़ रास्ते हैं, न उन पर चलने के जोखिम। न उसे कोई अंगुलिमाल डाकू मिलता है, न कोई महात्मा। जंगल तो खैर अब वैसे ही नहीं हैं। आज कविता अपना सत्य यूँ प्रस्तुत करती है, जैसे उसने 'पा' लिया है।

लेकिन किसी भी महान से महान कविता का सत्य भी क्या ठोस और अपरिवर्तनशील हो सकता है? कविता का सच भंगुर है, भंगुर ही होना चाहिए। प्रेम की तरह, जीवन के हर्ष-शोक की तरह, बच्चे के हाथ में खिलौने की तरह।

मेरी चिंता का विषय यह भी है कि जो कविता 'पा' लेने का दंभ करती है, वह जरूर खोने से डरती है। और जो खोने से डरती है, वह कहीं पहुँचेगी कैसे?

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इक्कीसवीं शताब्दी। क्या हम इक्कीसवीं शताब्दी में पहुँचने से डरते हैं? हम जो एक रात के बाद दूसरी सुबह जागने के अभ्यस्त हैं, हम जो इस सदी से एक रात जितनी दूरी पर हैं, हमारे लिए इस सदी में प्रवेश करने का क्या अर्थ होगा?

कविता की चिंता एक कहानी सुना कर खत्म करती हूँ। टॉमस मान की एक कहानी है - मोहभंग। उसके मुख्य पात्र के साथ जब भी कुछ बुरा होता है, वह स्वयं से कहता है, अच्छा, तो ऐसा होता है यह। बचपन में उसके घर में आग लग जाती है, भगदड़ मची है, औरों की तरह उसे भी दूसरी मंजिल से नीचे कूदना है। लपटों से घिरा इधर से उधर दौड़ता वह एक विचित्र उत्तेजना में अपने से कहता है - "अच्छा, तो ऐसा होता है घर का आग से घिर जाना!"

बरसों बाद वह पहली बार प्रेम करता है और जैसा कि अक्सर होता है, वह लड़की उसे दुत्कार देती है। न केवल दुत्कार देती है, बल्कि उसके सबसे अच्छे मित्र के साथ चली जाती है। उस रात उसे अपने हृदय में एक अबूझ सी पीड़ा का ज्वार उठता महसूस होता है। वह बाहर निकल आता है, तारों की छाँह में। कहता है - "अच्छा तो, ऐसा होता है प्रेम में दुत्कारा जाना!"

उसका जीवन अनेक दुखद स्मृतियों का पुंज है। कहानी जब शुरू होती है, वह बूढ़ा हो चुका है। वह किसी भी बात से चकित न हो पाने की अपनी असमर्थता से इतना निराश है कि अब मर जाना चाहता है। लेकिन मरने से पहले वह किसी को अपनी गाथा सुनाना चाहता है। कहानी के अंत में वह इस निपट अजनबी से, जिसे वह अपनी आपबीती सुना रहा है, कहता है, "मैं किसी चट्टान से कूद कर मर जाना चाहता हूँ, लेकिन मुझे डर यह है, कि मरते हुए भी मैं यही सोच रहा होऊँगा - अच्छा, तो चट्टान से गिर कर मर जाना ऐसा होता है!"

मुझे आशंका है कि एक सुबह हम सब बहुत ही अनाटकीय ढंग से इक्कीसवीं शताब्दी में आँखें खोलेंगे, और लगभग इस पात्र की तरह कहेंगे - अच्छा तो, ऐसी होती है इक्कीसवीं शताब्दी! बस?

( भारतीय दूतावास , नेपाल द्वारा आयोजित विचार-गोष्ठी ' इक्कीसवीं शताब्दी में कविता ' में पढ़ा गया वक्तव्य , मार्च 1999)


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