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शोध

उपन्यासों में बनारस
पीयूष कुमार द्विवेदी


दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नगरों में काशी की गणना की जाती है, जिसकी एक मुख्य वजह ये है कि आदिकाल से ही काशी को धार्मिक, पौराणिक, आध्यात्मिक नगरी के रूप में मान्यता मिली है। विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी सांस्कृतिक नगरी होने के साथ-साथ साहित्यिक हस्तक्षेप के लिए भी जानी जाती है। काशी में एक से बढ़कर एक मनीषी तथा श्रेष्ठ विद्वान जन्म लिए जिन्होंने काशी की महिमा को गौरवान्वित किया है, साथ ही काशी की गरिमा का महिमामंडन भी किया है। आदिकाल और मध्यकाल को छोड़ दिया जाय तो आधुनिक काल में ना जाने कितने पंडितों ने यहाँ जन्म लिया और कृतकृत्य हुए। काशी साहित्यिक, सांस्कृतिक, संगीत तथा सौंदर्य की अद्भुत नगरी है, जिसकी पराकाष्ठा के आगे सभी नतमस्तक होते हैं। वेद, वेदांग, छंद, उपनिषद, ज्योतिषशास्त्र, खगोलशास्त्र व्याकरण तो यहाँ के गलियों में उसी प्रकार गूँजते हैं, जिस प्रकार घाटों और मंदिरों में घंटे की ध्वनि गूँजती है। बनारसी संगीत परंपरा की गरिमामय उपस्थिति ने काशी को आलोकित किया है। संगीत के सबसे उच्चतम सप्तम सोपान पर यहाँ के भजनों को संगीतकार संगीतबद्ध किए हैं, जो काशी की प्राचीन धरोहर है। बनारस ने बड़े-बड़े संगीतज्ञों को जना है। यहाँ की मिट्टी की उर्वरा शक्ति की पहचान देश-विदेश में रहने वाले वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, डॉक्टर, संगीतज्ञ, राजनीतिज्ञ तथा साहित्यकारों से होती है। बनारस की सोच हिमालय है, बनारस का विचार थार जितना व्यापक है। बनारस में गंगा खुद में विशाल महाकाव्य लगती है, जिसके किनारे ''गंगा तरंग रमणीय जटा कलापं, गौरी निरंतर विभूषित वाम भागम्'' का अद्भुत उद्घोष सुनाई देता है। एक पंथ दो काज को चरितार्थ करती हुई गंगा जहाँ एक तरफ नयनों को सुख की अनुभूति कराती है, वहीं दूसरी तरफ गंगा के किनारे बैठकर उपन्यासकार लेखक अपनी साहित्यिक प्रतिभा दिखाते हैं।

काशी में अनेक विद्वान हुए। काशी को कोई सामाजिक दृष्टि से व्याख्यायित किया है, तो किसी ने वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाशित किया है। कोई आध्यात्मिक ढंग से प्रचारित किया है तो कोई साहित्यिक ढंग से प्रसारित किया है। काशी का वर्णन कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, यात्रा संस्मरण हरेक विद्या में मिलता है। हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण विधा उपन्यास में काशी को जो व्यापकता मिली है, शायद ही किसी नगर को इतनी प्रसिद्धि मिली होगी।

काशी केंद्रित उपन्यासों की संख्या लगभग पचास के आस-पास है, जिसके कुछ लेखक काशीतर है, तो कुछ स्थानीय है, जिन्होंने अपनी आभा से काशी को पुष्पित और पल्लवित किया है। गंगा-जमुनी तहजीब के चिंतक या समीक्षक अब्दुल्ल विस्मिल्लाह बात-चीत के दौरान काशी की मीमांसा करते हुए कहते हैं - ''दिल्ली में बहुत भीड़ है, बहुत शोर शराबा है पर बनारस में अमन है, चैन है, सुख-शांति है। साहित्य को जानने समझने तथा बुनने-गुनने की अद्भुत नगरी है।'' काशी देखने से ज्यादा अनुभव करने की चीज है। काशी व्यक्ति को संघर्ष करना सिखाती है, जिसका उदाहरण शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास 'नीला चाँद' का नायक कीर्ति वर्मा है।

काशी केंद्रित उपन्यासों में मुख्य रूप से पंडित श्रद्धाराम फुल्लौरी कृत 'भाग्यवती', मुंशी प्रेमचंद कृत 'रंगभूमि', जयशंकर प्रसाद कृत 'तितली', शिवप्रसाद सिंह कृत 'नीला चाँद', 'वैश्वानर', 'गली आगे मुड़ती है', शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र काशिकेय' कृत 'बहती गंगा', अब्दुल विस्मिल्लाह कृत 'झीन झीनी चदरिया', काशीनाथ सिंह कृत 'काशी का अस्सी', कैलाश नारायण तिवारी कृत 'विरले दोस्त कबीर के' और अल्पना मिश्र कृत 'अन्हियारे तलछट में चमका' है।

पंडित श्रद्धाराम फुल्लौरी ने एक ही उपन्यास 'भाग्यवती' (1877 ई.) लिखा था। पंडित जी मुख्यतः धर्मोपदेशक थे। अतः उन्होंने 'भाग्यवती' के रूप में ऐसी पोथी हिंदी भाषा में लिखी ''कि जिसके पढ़ने से भारत खंड की स्त्रियों को गृहस्थ धर्म की शिक्षा प्राप्त हो। इस उपन्यास के केंद्र में बनारस है। सोद्देश्य और साभिप्राय लिखे गए इस उपन्यास के द्वारा काशी के कई घटनाओं तथा विसंगतियों पर प्रकाश डाला गया है। उपन्यास की नायिका भाग्यवती के माध्यम से नारी सशक्तिकरण भी दिखाया गया है।

मुंशी प्रेमचंद की जन्मभूमि बनारस होने की वजह से उनके उपन्यास रंगभूमि में बनारस की झलक दिखाई देती है। 1924-1925 में प्रकाशित उपन्यास रंगभूमि नायक अंधे सूरदास का गाथा है। सूरदास का ताल्लूक बनारस के पांडेपुर नामक जगह से है। शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुकदमेबाजी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं। बनारस में पांडेयपुर ऐसी ही बस्ती है। वहाँ न शहरी दीपकों की ज्योति पहुँचती है, न शहरी छिड़काव के छींटे। रंगभूमि उपन्यास के नायक सूरदास जो जाति से चमार और धन से गरीब था। उनके गुण और स्वभाव भी जगत प्रसिद्ध है - गाने बजाने में विशेष रुचि, हृदय में विशेष अनुराग, अध्यात्म और भक्ति में विशेष प्रेम उनके स्वाभाविक लक्षण है। वैसे उपर्युक्त स्वभाव बनारस से निजी संबद्ध रखते हैं। संस्कृति, साहित्य, संगीत, संगीत, अध्यात्म की धारा-अविरल गति से चलती है। स्वतंत्रता पूर्व बनारस की स्थिति को रंगभूमि के बहाने मुंशी प्रेमचंद ने स्थापित किया है। सूरदास और जनसेवक का संघर्ष 'रंगभूमि' के कथानक का केंद्र-बिंदु है। ज्यों ज्यों यह संघर्ष गहराता जाता है त्यों त्यों प्रेमचंद का आशावाद, उनका जीवन दर्शन और गांधी के आदर्शों में उनकी आस्था के तमाम अर्थ संदर्भ खुलते जाते हैं और हम पाते हैं कि 'गोदान' अगर प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति है, तो 'रंगभूमि' उनके विचारों की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति। होरी को उन्होंने अपनी संवेदना से सिरजा है, तो सूरदास सिर से पैर तक संघर्ष में ढाला गया है। होरी और सूरदास दोनों आजीवन संघर्ष करते हैं। लेकिन जहाँ होरी अपनी तमाम उद्दातता के बावजूद हमारी दया का पात्र बना रहता है, वहीं सूरदास अपनी तमाम असमर्थता के बावजूद हमसे दया जैसी कोई चीज नहीं माँगता बल्कि हमेशा योद्धा की तरह हमारे सामने आता है और बतलाता है कि हारकर भी कैसे सीना ताने रहा जा सकता है। बनारस के संघर्षशील लोगों का प्रतिनिधित्व रंगभूमि का सूरदास करता है।

जयशंकर प्रसाद को एक अच्छे नाटककार के रूप में प्रसिद्धि तो मिली ही साथ ही एक अच्छे उपन्यासकार के रूप में भी ख्यातिलब्ध हुए। प्रसाद जी का जन्म बनारस में सुंघनी साहु के घर में हुआ था। प्रसाद जी में साहित्यिक मेधा शुरू से ही थी। किशोरावस्था से ही कविता, कहानी नाटक लिखने लगे थे। हिंदी कथा साहित्या के विकास के प्रथम चरण में ही प्रसाद जी ने कविताओं के साथ कथा-साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया। उनकी सांस्कृतिक अभिरुचि और वैयक्तिक भावानुभूति की स्पष्ट छाप के कारण उनके द्वारा रचित कथा साहित्य अपनी एक अलग पहचान बनाने में पूर्णतः सक्षम हुआ है। जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित उपन्यास तितली की कथा भूमि बनारस और उसके आस-पास की है। 'तितली' में कथासूत्र जटिल नहीं है। जीवन की यथार्थवादी भूमि काफी साफ हो गई है। कथा का वेग अपेक्षाकृत मंद है। प्राकृतिक खंडचित्रों को उपस्थित करने में 'प्रसाद' की प्रवृत्ति रमी है। समस्याओं पर लेखक ने स्पष्ट टिप्पणियाँ की हैं। सम्मिलित परिवार की प्राचीन परंपरा आज अनावश्यक सिद्ध हो रही है।

काशी या बनारस प्राचीन परंपराओं की ही नहीं, आधुनिक युग की नई नगरी भी है। बहती गंगा में काशी केवल, राँड़, साँड़, सीढ़ी और संन्यासी की नगरी ही नहीं बल्कि विश्व को एक नए जीवन दर्शन का सूत्र देने वाली भी कही गई है। रुद्र काशिकेय ने अपने उपन्यास 'बहती गंगा' में सत्रह कहानियों के माध्यम से काशी की जिस परंपरा और संस्कृति का रचनात्मक इतिहास रचा है, उसे यह पुस्तक केवल परंपरा के अक्स में ही नहीं देखती बल्कि आधुनिक आईने में भी परखती है। रुद्र काशिकेय की 'बहती गंगा' को समझने की जरूरत तब और बढ़ जाती है, जब हमारे ही समाज में काशी को एक वस्तु बनाकर बाजार में जैसे चाहे वैसे भुनाया जा रहा हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि बाजारवाद के दौर में काशी को म्यूजियम से ज्यादा का दर्जा प्राप्त नहीं है। नई पीढ़ी यहाँ की परंपरा, संस्कृति और सभ्यता को समझने के बजाय कई भ्रांतियों और पूर्वग्रहों से ग्रसित है। ऐसे में इस उपन्यास की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इस उपन्यास में काशी के दो सौ वर्षों (1750 से 1950) के रचनात्मक इतिहास को बड़ी महीनी और सजगता से उकेरा गया है। दो सौ वर्षों के काशी के लोक जीवन और आधुनिक जीवन की आत्मा को पकड़ने की कोशिश इस पुस्तक में की गई है।

प्रसिद्ध कथाकार शिवप्रसाद सिंह का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास नीला चाँद (1988) है। इसमें 1060 ई. की काशी को उसके पूरे सांस्कृतिक संदर्भ में मूर्त किया गया है। इस समय काशी पर दो राजवंशों का शासन था। व्यवहारिक रूप में काशी का शासन कलचुरी राजा कर्णदेव के हाथ में था। किंतु एक आपसी अनुबंध के तहत गाहड़वाल नरेश चंद्रदेव भी काशी के राजा माने जाते थे। कर्णदेव ने चंदेल राजा देववर्मा को हराकर उसका वध कर दिया था। देव वर्मा का छोटा भाई कीर्ति वर्मा गाहड़वाल नरेश चंद्रदेव के पौत्र गोविंद चंद को अपने सरंक्षण में लेकर जनशक्ति को संगठित करता है और एक सच्चे लोक-नायक के रूप में न केवल जनता को अनेक प्रकार के अत्याचारों से मुक्ति दिलाता है, वरन् कर्णदेव को पराजित कर अपनी वंश मर्यादा की पुनर्प्रतिष्ठा भी करता है। लेखक ने कीर्ति वर्मा को एक आदर्श एवं प्रगतिशील सामंत शासक के रूप में प्रस्तुत किया है। इतिहास को मार्मिक एवं जीवंत कथा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक ने रम्य कल्पना का सार्थक और सोद्देश्य प्रयोग किया है।

शिवप्रसाद सिंह का काशी केंद्रित काशी त्रयी का दूसरा और महत्वपूर्ण उपन्यास वैश्वानर है। वैश्वानर काशी को केंद्र में रखकर भारतीय संस्कृति के धन और ऋण दोनों ही पक्षों को प्रत्यक्ष किया गया है। उपन्यास विराट् वैश्वानर, जो द्यु लोक का सूर्य (शिर), पृथ्वी की नाभि (जनन केंद्र), द्यावा, पृथिवी और रोदसी (अंतरिक्ष) का स्वामी है, जिसे देवगण विश्वनेता कहते हैं, जिसने भारतीय जाति (आर्यों) को सदैव प्रकाश का मार्ग दिखाया है - को समर्पित है। यह एक काशी केंद्रित महत्वाकांक्षी रचना है।

'गली आगे मुड़ती है' नामक उपन्यास काशी त्रयी का तीसरा और अंतिम उपन्यास है। आधुनिकता की चरम पराकाष्ठा को व्यक्त करता ये उपन्यास विश्वविद्यालयी जीवन के छात्रों पर लिखा गया है। गली आगे मुड़ती है में युवा आक्रोश, छात्र आंदोलन, विश्वविद्यालय के अध्यापकों की राजनीति, समाज विरोधी तत्वों और प्रतिक्रियावादी शक्तियों का छात्र-आंदोलन को, गलत दिशा में मोड़ने की कोशिश, रामानंद तिवारी जैसे आदर्शवादी छात्रों का संघर्ष और अंत में टूटकर काशी छोड़ने का निश्चय, यह सबकुछ पूरे विस्तार और विश्वसनीयता के साथ दिखाया गया है। लेखक ने कथा का केंद्र काशी नगरी को बनाया है।

अब्दुल बिस्मिल्लाह द्वारा रचित उपन्यास 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' का प्रकाशन सन् 1986 ई0 है। बिस्मिल्लाह साहब के सभी उपन्यासों में से एक प्रसिद्ध उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया इनकी ख्याति का आधार है। बनारस के बुनकरों पर आधारित उपन्यासों में गरीब निम्न मध्यवर्गीय जुलाहों के शोषण की कहानी तो कही ही गई है, इसके साथ ही उनमें व्याप्त अशिक्षा, रूढ़िवादिता, जड़ता, धार्मिक संकीर्णता तथा उनकी अपराजेय जिजीविषा को भी विविध जीवन-संदर्भों में साकार किया गया है। इस उपन्यास में बनारस के बुनकरों का जीवन-यथार्थ अपनी पूरी संश्लिष्टता में सजीव हो उठा है। उपन्यास की कहानी में जुलाहों के खुरदुरे जीवन की तपती हुई रेत ही नहीं, रागदीप्त जीवन की स्निग्धता भी है। मानव जीवन के विकास में निरंतर सहभागिता निभाने वाली प्रकृति उसके फैलाव और कसाव में इस तरह घुल-मिल गई है कि उसे अलग किया ही नहीं जा सकता। उपन्यास में दोनों की संश्लिष्ट स्थिति ने उसे एक विशिष्ट काव्यात्मक आयाम प्रदान किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उपन्यास हमें जिंदगी की मजबूरियों के बीच ले जाकर निराशा के गर्त में ढकेल नहीं देता, वरन अपने हक के लिए निरंतर संघर्ष जारी रखने की प्रेरणा भी देता है। इकबाल के हृदय में उठने वाली विद्रोह की चेतना इस उपन्यास को एक सार्थक परिणति प्रदान करती है। अगर गोदान को कृषक जीवन का महाकाव्य कहा जा सकता है, तो झीनी झीनी बीनी चदरिया को बुनकारों का ज्वलंत दस्तावेज कहा जा सकता है।

बनारस के बारे में कहा जाता है 'जो मजा बनारस में, न पेरिस में न फारस में।' प्रसिद्ध संस्मरणकार प्रो. काशीनाथ सिंह द्वारा लिखित उपन्यास 'काशी का अस्सी' काशी के वैविध्य को प्रस्तुत करने वाला जीवंत उपन्यास है। काशीनाथ सिंह की इस किताब की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। बनारस शहर भारत ही नहीं विश्व भर में अपनी संस्कृति के कारण विख्यात है। मौज-मस्ती, फक्कड़पन, गालियाँ, भाँग और पान यहाँ के जीवन के अंग है। इसी बनारस शहर और उसकी मस्ती, जिंदादिली का प्रतीक है 'अस्सी', जो कि कथानक का केंद्र बिंदु है। अस्सी के बारे में काशीनाथ सिंह तो यहाँ तक कहते हैं -

''अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं है। अस्सी 'अष्टाध्यायी' है और बनारस उसका भाष्य! तीस-पैंतीस वर्षों से पूँजीवाद के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी टीका हो जाए'', कहानी में अस्सी मुहल्ले के अन्य केंद्र बिंदु हैं - पप्पू की चाय की दुकान और तन्नी गुरु जैसे बिंदास पात्र। पोशाक के नाम पर गमछा, लँगोट लुंगी और जनेऊ धारण किए हुए और पान चबाते हुए अपनी मस्ती में मस्त। चाय सुड़कते, भाँग की मस्ती में एक-दूसरे से गपियाते, भरपूर गालियों का प्रयोग करते गर्मागर्म राजनीतिक बहसों में उलझे लोग बनारस की जीवंत संस्कृति का प्रतीक हैं। चाय ही इनका सेमिनार हॉल, भाषण मंच यहाँ तक कि उनकी संसद है। उनके लिए दुनिया भर के नेता, विचारधाराएँ, संस्कृतियाँ सब ब्रह्मांड के छोटे-छोटे पिंड हैं और उस ब्रह्मांड का केंद्र है अस्सी दुनिया उनके ठेंगे पर।

इसके अतिरिक्त काशी केंद्रित कई उपन्यास लिखे गए हैं परंतु किसी उपन्यास में काशी की संस्कृति पर कुठाराघात किया गया है, तो किसी उपन्यास में बनारस के पर्व, त्यौहार, मंदिरों अैर घाटों की संस्कृति का वर्णन किया गया है। इधर बीच दो महत्वपूर्ण उपन्यासों का प्रकाशन हुआ है। अल्पना मिश्र कृत 'अन्हियारे तलछट में चमका' एक ऐसा उपन्यास है, जो निम्नमध्यवर्गीय जीवन का महाख्यान है, जो स्त्री लेखन को एक बड़ा विस्तार देता है और स्त्री संसार की एकायामिता को तोड़ता है। कहने के अनूठे अंदाज और भाषा विकल्पन के गहरे नए रूपों से समृद्ध यह हिंदी उपन्यास क्षेत्र में अब तक के प्रचलित सभी खाँचों को तोड़कर सृजनात्मकता के नए शिखर निर्मित करता है। इसके बाद इक्कीसवीं सदी का बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास प्रो. कैलाश नारायण तिवारी द्वारा रचित 'विरले दोस्त कबीर के' जिसको नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है। इस उपन्यास में उपन्यासकार ने कबीर के जीवन के धागों को बड़ी बारीकी से उभारा है। कबीर के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न पहलुओं को कथा रूप में वर्णित किया है।


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