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लेख

तक्सीम की पीड़ा और अतीतीय संवेदना
कौशलेंद्र प्रपन्न


जमीनी तक्सीमियत और संवेदना का दो फाँक हो जाना दो अलग भाव भूमि पर अपनी छाप छोड़ती हैं। मानवीय विकास यात्रा के इतिहास में ऐसी ही एक घटना को अंजाम दिया गया। इसे अब सत्तर बरस हो गए। लेकिन आज भी विभाजित, विखंडित मानवीय पीड़ा की टीस हमें बेचैन करती है। सन् 1947 का मंजर ही ऐसा है जिसे जितनी बार, जितने कोणों से देखने समझने की कोशिश करें हजारों, लाखों अश्रुपूरित आँखें नजर आती हैं। वह सजल नयन इस पार के हों या उस पार के। भौगोलिक भूखंड बेशक अलग कर दिए गए, लेकिन संवेदनाएँ वहीं की वही हैं। इन्हें न तो किसी ने पाटने की कोशिश की और न ही वे भर ही पाईं। भरेंगी भी कैसे, क्योंकि हर किसी की भावनाएँ, अपनत्व उस तक्सीम में खंडित हुईं। खंडित तो मानवीय संबंध भी हुए जो उस पार या इस पार रह गए। इन संवेदनाओं को आज तक सीने में दबाए काफी लोग हैं जो जी रहे हैं। उन्हें अभी भी उम्मीद है कि एक दिन ऐसा आएगा जब दोनों की देशों के बीच के खटरास कम होंगे। दोनों देशों के मध्य रिश्तों की स्नेहिल बयार बहेगी। लेकिन यह कब और किन मूल्यों पर होगा यह अभी कहना व अनुमान लगाना जरा कठिन है। क्योंकि जब भी मानवीय रिश्तों की रेलगाड़ी पटरी पर आती नजर आती है वैसे ही इसे डिरेल करने वाली ताकतें अपनी तमाम शक्ति इसमें झोंकने लगती हैं। दोनों ही देशों के रणनीतिकार, समाजवैज्ञानिक, शिक्षाविद् आदि मानते हैं कि यह तक्सीम विश्व की सबसे विनाशकारी और विभाजन की घटना रही है। इसमें जान-माल की क्षति तो हुई ही साथ ही दोनों देशों के गंगाजमुनी संस्कृति को खासा हानि पहुँची। यदि बँटवारे के इस दंश की टीस का अंदाजा लगाना हो तो दोनों ही देशों के कलमकारों, लेंसकारों, कलाकारों की कृतियों में बहुत मुखरता से दिखाई और सुनाई पड़ती हैं। वे साहित्यकार हों, संगीतकार हों या फिर सृजनात्मकता के जिस भी विधा से जुड़े लोग हों उन्होंने अपनी आहत संवेदना को स्वर देने में पीछे नहीं रहे। यदि हम साहित्य, कला, सिनेमा के आँगन में छाई छवियों की विवेचना करें तो एकबारगी 1947 से दो तीन साल पूर्व और दो तीन साल बाद की घटनाएँ ताजी हो जाती हैं। यही कारण है कि जब हम सिक्का बदल गया, पेशावर ट्रेन, खोल दो, टोबा टेक सिंह, झूठा सच, काली सलवार, दो हाथ, जिन्ने लाहौर नी वेख्या ते जन्मीया नइ आदि साहित्यिक रचनाओं में कलमकारों ने तब की घटनाओं को न केवल कलमबद्ध किया, बल्कि उसकी छटपटाहटों को शिद्दत से महसूसा भी है। वह एक प्रकारांतर से भोगा हुआ यथार्थ है।

साहित्य को इसीलिए समाज और कालखंड का जीता जागता सच कहा गया है, क्योंकि इस दर्पण में वर्तमान समय की बेचैनीयत, बजबजाहटों के साथ ही तत्कालीन समाजो-सांस्कृतिक हलचलों को भी दर्ज किया जाता रहा है। यह अलग विमर्श का मसला हो सकता है कि कई बार साहित्य भी पूर्वग्रह के राह पर चली है। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि कलमकारों ने अपनी निजी मान्यताओं, आस्थाओं, पूर्वग्रहों आदि को नियंत्रित नहीं किया तो उसकी छाप उनके साहित्य में स्पष्टतः दिखाई देती है। और ऐसे लेखन ने साहित्य की मूल आत्मा, संवेदना को थोड़ा गंदला ही किया है। लेकिन जो रचनाकार अपनी वैश्विक जवाबदेही को महसूसा है और जिसने तटस्थता बरती है उनकी रचनाओं को आज भी बड़े सम्मान के साथ साहित्य में स्थान मिला है। ''आजादी की छाँव में'' एनबीटी से प्रकाशित उपन्यास में मोहनीश बेगम ने बड़ी शिद्दत से आजादी से दो साल पूर्व से लेकर 1948 तक की पूरी घटनाओं को जिस तरह से बयाँ किया है उसे पढ़कर अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि वह दौर कैसा रहा होगा। दंगे में लेखिका अपने प्रशासनिक अधिकारी पति जो नेहरू के करीबी थे, उन्हें हमेशा के लिए खो देती हैं। यह तो लेखिका की निजी क्षति थी। लेकिन उससे बढ़कर जो देश की स्थिति थी उसे समझना हो तो इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए। यह तो एक बानगी हुई। इसके साथ ही जिसने भी खोल दो, दो हाथ, सिक्का बदल गया या फिर जिन्ने लाहैार नहीं वख्या... देखी व पढ़ी हो तो वे महसूस कर सकते हैं कि साहित्य ने किस प्रकार उस कालखंड को कलमबद्ध किया। एक लेखक की हैसियत तो इस पूरी प्रक्रिया में शामिल थी ही साथ ही एक जिम्मेदार संवेदनशील नागरिक भी जिंदा था तभी इस प्रकार की कहानियाँ, उपन्यास, रिपोतार्ज, यात्रा संस्मरण आदि की सर्जना हो पाई। हम जहाँ कृष्णा सोबती, इस्मत चुग्ताई, असगर वजाहत, मंटो, कृशन चंदर, कुलदीप नैयर, कमलेश्वर, हरीश नवल आदि की रचनाओं का अनुशीलन करते हैं तो स्पष्ट तौर पर तक्सीम की रूखी हवा हमें छू कर निकल जाती है। कमलेश्वर जी की कितने पाकिसतान एक शोधपरक उपन्यास के हिस्से आता है जहाँ इतिहास के साक्ष्यों के बरक्स पूरी घटना की परतों की पड़ताल की जाती है। वहीं हाल ही में कृष्णा सोबती जी का लिखा अधुनातन उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' को पढ़ना दिलचस्प होगा। यह महज उपन्यास भर नहीं है, बल्कि लेखिका अपनी मातृभूमि पाकिस्तान के गुजरात को जीती है। साथ ही विभाजन के बाद हिंदुस्तानी गुजरात के अनुभवों को पन्नों पर उकेरती हैं। ये वही लेखिका हैं जिन्होंने सिक्का बदल गया, मित्रो मरजानी आदि भी लिखा।

साहित्यकार, इतिहासकार, फिल्म निर्माता भी कई बार अपनी रचनात्मक और लेखकीय प्रतिबद्धता से न्याय करने में कहीं चूक जाते हैं। ऐसी चूकों को इतिहास माफ नहीं करता। साहित्य व इतिहास लेखन में तटस्थता की माँग अहम होती है। मसलन यदि हम दोनों देशों में आजादी के एक दो साल पूर्व व पश्चात पैदा हुए बच्चों की बात करें तो उन्हें किस प्रकार की छवियों से रूबरू कराया गया व कराया जाता है यह जानना भी बेहद मानीखेज है। प्रसिद्ध शिक्षाविद्, कथाकार प्रो. कृष्ण कुमार ने कुछ साल पहले पाकिस्तान में स्कूली स्तर पर सामाजिक और इतिहास की पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन किया था जिसमें उन्होंने इतिहासकारों और पाठ्य पुस्तक निर्माताओं की वैचारिक रुझानों को रेखांकित किया था। वहाँ गांधीजी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि को किस दृष्टि से इतिहास के स्कूलों पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता है इसकी विहंगम झाँकी हमें 'प्रिजुडिस एंड प्राइड' किताब में मिलती है। शैक्षिक पहलकदमियों के चरित्र को समझना हो तो समय समय पर पाठ्यपुस्तकों में होने वाले फेरबदल को देख कर समझा जा सकता है। जब एक ओर शिक्षा को एक खास मान्यताओं एवं पूर्वग्रहों को पोषित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वहीं फिल्मों के माध्यम से भी कई राजनीतिक, सामाजिक हित साधने की कोशिशें होती रही हैं। वह चाहे बार्डर, एलओसी, गदर, ट्रेन टू पाकिस्तान, गांधी, क्या दिल्ली क्या लाहौर, पिंजर, जनरल बख़्त खान, अर्थ, वीर-जारा, फिल्मिस्तान, बजरंगी भाईजान, सरबजीत आदि फिल्मों में भी साफतौर पर दिखता वह पूर्वग्रहपूर्ण बरताव समझ में आता है। इन फिल्मों के साथ निर्देशक, पटकथा लेखक आदि का क्या वैचारिक झुकाव रहा है वह हमें समझने में कोई परहेज नहीं करना होगा। लेकिन एक सामान्य दर्शक केवल मौज मस्ती, हँसी ठिठोली कर के बाहर आ जाता है। वहीं थोड़ा सा भी सजग दर्शक होता है वह उसकी बारीक तहों की बुनावट को पहचान लेता है। यहाँ मसला यह भी अहम हो जाता है कि क्या फिल्म के कंटेंट के साथ जो बरताव हुआ वह समुचित हो पाया या नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो क्या कंटेट के साथ न्याय हो पाया।

साहित्य की दुनिया ने विभाजन को किस प्रकार दस्तावेजित किया इसे जानना भी बेहद रोचक और दरपेश है। साहित्य के बारे में एक और स्थापित मान्यता यह है कि साहित्य तटस्थ होकर अपने समकालीन हकीकतों को दर्ज किया करता है। इस दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में किस प्रकार की चुनौतियों और सावधानियों का ख्याल रखना उचित होता है इसे भी जानना और समझना जरूरी है। साहित्य की विभिन्न प्रचलित विधाओं में विभाजन की छटाएँ देखी-पढ़ी जा सकती हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में भी कहानी, उपन्यास ज्यादा लिखे गए। रिपोतार्ज, यात्रा वृत्तांत, डायरी, व्यंग्य आदि विधाओं में थोड़े कम काम हुए। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करें तो संभव है कहानी एवं उपन्यास ऐसी गली थी जिससे गुजरना दूसरी विधाओं की तुलना में जरा सहज प्रतीत होता है। या यूँ कहें कि कहानियाँ हमारी जिंदगी के बेहद करीब रही हैं। इस दृष्टि से देखें तो मुशर्रफ आलम जौकी की 'विभाजन की कहानियाँ' बेहद मौजूँ हैं। इस कहानी संग्रह में उन कहानियों को जगह दी गई है जो कहीं न कहीं किसी न किसी स्तर पर विभाजन की जमीन को छूती हैं।

यहाँ मलबे का मालिक मोहन राकेश लिखित कहानी की चर्चा प्रासंगिक सी लग रही है क्योंकि यह कहानी विभाजन के आस-पास की मानवीय संवेदना को उकेरने में सफल रही है। एक संवाद देखिए - गनी मियाँ विभाजन के बाद पाकिस्तान को अपनी भूमि कबूल किया। लेकिन सात साल बाद भारत के अमृतसर आने का मौका मिला तो अपने घर, बच्चे, बहू को तलाशते हैं। वही घर जहाँ उनका बेटा,पोता पोती रहा करते थे। गलियों में गुजरते हुए अपने घर के निशाँ ढूँढ़ते हैं। इस दरमियाँ एक बच्ची को देखकर दादा के एहसास से भर जाते हैं। उसे प्यार करना चाहते हैं। जेब से पैसे निकाल कर देना चाहते हैं। तभी उस बच्ची की माँ कहती है 'पुच कर मेरा वीर! रोएगा तो तुझे वह मुसलमान पकड़कर ले जाएगा, मैं बारी जाऊँ।' इस अविश्वास से जैसे ही गनी साहब का साबका पड़ता है उनकी जमीन खिसकती नजर आती है। एक और संवाद में उनके अंदर की हलचलों का पता मालूम होता है। जब गली के एक लड़के ने कहा 'कहिए मियाँ जी, यहाँ कैसे खड़े हैं?' बातचीत में रिश्तों की डोर खुलती है और मनोरी पहचान लेता है। कहता है, 'आप तो काफी पहले पाकिस्तान चले गए थे।' इसका जवाब गनी मियाँ देते हैं 'हाँ, बेटे, यह मेरी बदबख्ती थी कि पहले अकेला निकलकर चला गया। यहाँ रहता तो उनके साथ मैं भी...' दरअसल यह कहानी अपने पुराने घर के मलबे से जुड़ी है। क्योंकि यहीं इसी घर में उनके बेटे, बहू, पोते, पोती को सुपुर्द ए खाक किया गया था और न जाने किसने इस घर में आग लगा दी थी। वहीं दूसरी एक और कहानी भीष्म साहनी की लिखी 'अमृतसर आ गया' भी पढ़ने योग्य है। यूँ तो कहानियाँ और भी हैं। उपन्यास भी और हैं जो विभाजन के दर्द को पकड़ते हैं।

कथा-कहानियों से होता क्या है? बस इन झरोखों से हम अपने अतीत को झाँक आते हैं। अतीत में क्या कुछ हुआ। क्यों हुआ? उससे हमारे जीवन पर क्या असर पड़े आदि को समझने का एक अवसर मिल जाता है। लेकिन यहाँ एक दिक्कत यह आती है कि हम अतीत में तो चले जाते हैं, लेकिन डर यह होता है कि कहीं हम अतीत में ठहर न जाएँ। कहीं हम उसके दबाव में न आए जाएँ। क्योंकि यदि ऐसा होता है तो उससे हमारा, हमारे समाज का वर्तमान प्रभावित होता है। कथा-कहानियाँ इतिहास से इतर हमें मानवीय और संवेदनात्मक समझ देती हैं। यह काम साहित्य ही कर सकता है। और इस दृष्टि से भारतीय साहित्य अटा पड़ा है। वह चाहे उर्दू साहित्य हो, हिंदी साहित्य हो या फिर अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य हर जगह विभाजन के छींटे मिलेंगे।

देश और भूगोल का विभाजन मानवीय संवेदना के विभाजन से थोड़ा अलग है। जिन पंक्तियों से यह पूरा विमर्श आरंभ हुआ था उन्हीं बिंदुओं पर लौटते हुए हम समझने की कोशिश करें कि क्या साहित्य और मनुष्य मात्र दस्तावेज का हिस्सा भर होता है या उससे आगे भी यह मसला निकलता है। निश्चित ही मनुष्य की प्रकृति उसके समाज और परिवेश में काफी हद तक गढ़ी और रची जाती है जिसे स्वीकारने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। लेकिन हम अपने स्वभाव और वर्तमान को अपने तई निर्माण कर सकते हैं। माना कि विभाजन हुआ। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अब जब हमारे पास खिलने, विकसने का अवसर है तो कोई वजह नहीं कि हम अतीत में अटके रहें। हमें आगे निकलना होगा। इसकी झाँकी, साक्ष्य हमारे साहित्य हों। साहित्य हमें आगे की राह दिखाए। दोनों ही देशों में साहित्य के माध्यम से भी मानवीय मूल्यों को संरक्षित और प्रवहमान रखा जा सकता है। इसका प्रयास नागर समाज के कंधों पर है।

साहित्य और समाज के साथ मानवीय विकास की यात्रा को समझना बेहद दिलचस्प होता है। यह तथ्य पूर्व के साहित्यों में पढ़ने को मिली हैं। साहित्य यदि निरपेक्ष भाव से लिखा जाए तो उसमें घटने वाली घटनाएँ पाठक समाज को नई रोशनी प्रदान करती हैं। विभाजन को हमने जीया। एक बड़े वर्ग ने इसे महसूसा और क्षति से भी गुजरे। अब सवाल यह उठता है कि क्या खोए हुए अतीत पर रुदन ही करें या फिर साहित्य में जज्ब उत्साह और बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक धाती को अपने जीवन में स्थान दें। यह हमारी आने वाली पीढ़ी पर काफी हद तक निर्भर करता है।


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