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आलोचना

मैला आँचल’ में ग्रामीण जीवन का यथार्थ और समाजवादी चेतना
कँवलजीत कौर


हिंदी में ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले रचनाकारों के क्रम में फणीश्वरनाथ रेणु का नाम एक ऐसे समर्थ रचनाकार के रूप में लिया जाता है जिन्होंने ग्रामीण जीवन को एक विशेष प्रकार की अभिव्यक्ति दी है। एक ऐसी अभिव्यक्ति जिसमें ग्रामीण आत्मीयता की गंध है, जो रेणु को अन्य ग्रामीण जीवन के कथाकारों से अलग करती है, और कुछ मायनों में विशिष्ट भी। वे हिंदी के ग्रामीण उपन्यास साहित्य के पहले रचनाकार हैं जिनमें गाँव की परिवर्तित, अनगढ़, राजनीतिक चेतना का स्वरूप अपनी पूरी गत्यात्कता में रूपायित हुआ जो रेणु को विशेष रूप से रेखांकित करता है।

वैचारिक धरातल पर रेणु समाजवादी रहे हैं। उनका संबंध उस प्रकार के समाजवादी चिंतन से रहा जिसके प्रवक्ता भारत में डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण रहे हैं। उनके उपन्यासों में इन राजनैतिक विचारों तथा सक्रियता की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। उपन्यासों का कथांकन बिहार का पूर्णिया जिला है और इसमें संदेह नहीं कि रेणु अपने अंचल के रग-रेशे से परिचित हैं। रेणु जिस समय कथा-क्षेत्र में आए, हिंदी का कथा-साहित्य नगर-जीवन की कुछ खास समस्याओं के घेरे में ही सीमित था। 'मैला आँचल' का प्रकाशन इस प्रकार की रचनाओं से दबे पाठक वर्ग के लिए सुबह की ताजा बहार से कम सुखद अनुभूति देने वाला नहीं था। 'मैला आँचल' कृति ने उन्हें रातोंरात हिंदी कथा साहित्य की अगली पंक्ति के रचनाकारों के बीच प्रतिष्ठित कर दिया, और यह सच है कि उस कृति में ऐसा बहुत कुछ था जो कथा साहित्य के तत्कालीन संदर्भों में हिंदी पाठक के लिए नया और अछूता था।

रेणु के उपन्यासों के माध्यम से पाठक वर्ग ने हिंदुस्तान के एक ग्रामीण अंचल को उसके प्रकृत रूप में देखा और अनुभव किया। ग्रामीण जनों के आचार-विचार, बोली-भाषा, मान्यताएँ-विश्वास, गीत-संगीत, वर्ण-त्योहार, सुख-दुख इतने सहज और विश्वसनीय बनकर सामने आते हैं कि लगता है कि सचमुच हमारे ग्रामीण जीवन में ऐसा बहुत कुछ है जो अब तक उपेक्षित और त्याज्य रहा है। रेणु ने बड़ी सूक्ष्म भंगिमाओं में बड़ी आत्मीयता के साथ इस उपेक्षित और त्याज्य को उठाया और उभारा, उसे सजीव रूप में प्रस्तुत किया।

रेणु ने धरती को पूरी तरह परखा और पहचाना था तथा समस्त सुधार संभावनाओं से प्रेरित होकर उसे प्रस्तुत किया था। उनके उपन्यासों के अधिकांश पात्र ग्रामीण जीवन की सीमाओं और संकीर्णताओं से ग्रस्त बौने पात्र हैं तो तमाम पात्र ऐसे भी हैं जो इन विडंबनाओं के खिलाफ जमकर संघर्ष भी करते हैं। इनके बहाने उन्होंने ग्रामीण व्यक्तित्व की खोज की है और उस व्यवस्था का दिग्दर्शन भी कराया है जिसमें अर्थसंकट, अशिक्षा, जातिवाद, संप्रदायवाद, नजराना, रिश्वतखोरी, ठगविद्या आदि ने जड़ें जमा ली हैं। ये ग्रामवासी सात महीने बथुआ, पाट के साग से पेट भरते हैं। सतुआ-खम्हार खाकर जीते हैं। लेकिन पातकी गान और कीर्तन द्वारा गाँवों को अनुगुंजित किए रहते हैं। ये संक्रांति चेतना की देन हैं। वे भौतिक विज्ञान पर आधारित आधुनिकीकरण को कभी संशय की दृष्टि में देखते हैं तो कभी विस्मय-मुग्ध होकर उससे विद्रोह भी करते हैं। उन्हें संदेह होता है कि मलेरिया सेंटर में जहर के टीके लगाए जा रहे हैं, पर धीरे-धीरे उनका संस्कार भी होता जा रहा है। लेखक उनके प्रति पूर्ण आशावान है और 'मैला-आँचल' के नायक डॉ. प्रशांत के माध्यम से कहता है - 'आँसू से भीगी धरती पर प्यार के पौधे लहराएँगे। मैं साधना करूँगा ग्रामवासिनी भारत-माता के मैले आँचल तले।' बिहार के एक छोटे से भूखंड की हथेली पर उन्होंने समूचे उत्तरी भारत के किसान की नियति रेखा को उजागर किया। यह रेखा किसान की किस्मत और इतिहास के हस्तक्षेप के बीच गुँथी हुई थी जहाँ गांधीजी का सत्याग्रह-आंदोलन, सोशलिस्ट पार्टी के आदर्श, किसान सभाओं की मीटिंगें अलग-अलग धागों से रेणु का संसार बुनती हैं।

प्रेमचंद के बाद ग्रामीण-जीवन के आग्रही कथाकार के रूप में 'रेणु' का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उन्होनें हमेशा अपने पैर तले की जमीन को ही अपने उपन्यासों का आधार बनाया। इसलिए गाँव की राजनीति, संस्कृति और कला का हू-ब-हू चित्र उनके उपन्यासों में प्राप्त होता है। उनके उपन्यासों की कथा की पृष्ठभूमि बिहार के पूर्णिया जिले का ग्रामीण क्षेत्र है। यूँ भी एक सीमित क्षेत्र को अपने लेखन का आधार बनाना कम जोखिम भरा कार्य नहीं है परंतु इन उपन्यासों में ग्रामीण-जीवन के जितने विस्तृत एवं बोलते चित्र दिखाई देते हैं शायद उतने अन्य ग्रामीण पृष्ठभूमि के उपन्यासों में नहीं। इन उपन्यासों में गाँवों की छोटी-छोटी घटनाओं, आचार-विचार, रीति-रिवाज, राजनीतिक उथल-पुथल तथा शोषण आदि के इतने सही और चलते-फिरते चित्र मिलते हैं कि समूचा ग्रामांचल मुखर हो उठता है। स्वाधीनता के बाद गाँवों का बदलाव और उस बदलाव में अवसरवादी नेताओं का उतार-चढ़ाव तथा उन्हें बेनकाब करने में युवा पीढ़ी का संघर्ष आदि जिस ढंग से उनके उपन्यासों में प्रस्तुत है उनसे हिंदी कथा साहित्य में रेणु की अलग पहचान बनती है। उनके उपन्यासों में चित्रित गाँवों की समस्याएँ आज के प्रत्येक भारतीय गाँव की समस्याएँ हैं।

'मैला आँचल' में जाति के आधार पर पृथक-पृथक दल बन गए हैं। गाँव में तीन प्रमुख दल हैं - कायस्थ, राजपूत और यादव। ब्राह्मण लोग अभी भी तृतीय शक्ति हैं। अन्य जाति के लोग भी सुविधानुसार इन्हीं तीन दलों में बँटे हुए हैं। ग्रामीण लोगों को जाति की संकीर्ण भावना के ऊपर उठकर कुछ सोचने का अवकाश नहीं है। ब्राह्मण टोली के लोग बालदेव जी से पूछते हैं - 'डाक्टर बाबू का नौकर तो दुसाध है। और डाक्टर बाबू कौन जात हैं? दुसाध का बनाया हुआ खाते हैं? डॉ. प्रशांत को अपनी जाति का पता नहीं है किंतु ग्राम समाज में जाति बहुत बड़ी चीज हैं। 'नाम पूछने के बाद ही लोग पूछते हैं जाति? जीवन में बहुत कम लोगों ने प्रशांत से उसकी जाति के बारे में पूछा है। लेकिन यहाँ तो हर आदमी जाति पूछता है।'

आर्थिक असमानता ने समाज में उच्च और निम्न वर्गों को जन्म दिया। व्यक्ति किसी न-किसी दल से संबद्ध होकर इकाई न रहकर वर्ग हो गया। उच्च और निम्न वर्ग के बीच व्यापक विषमता ने निम्न वर्ग को उच्च वर्ग के विरुद्ध संघर्षरत किया। फटेहाल, जूठन खाकर अभिजात लोगों की दया पर जीने वाले इन इनसानों की विसंगतियाँ उन्हें कचोटती रहीं और इन्हीं विषमताओं के परिणामस्वरूप वैचारिक चेतना आई और किसान-मजदूर वर्ग जमींदारों के विरुद्ध खड़ा हो गया। रेणु ने अपने उपन्यासों में वर्ग द्वंद्व का चित्रण व्यापक रूप में किया है। ग्रामीण-जीवन में शोषण एवं तद्जन्य निर्धनता और बेबसी का अत्यंत यथार्थ अंकन रेणु के उपन्यासों में हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रेमचंद के बाद पहली बार भारतीय ग्रामों की आत्मा अपनी पूरी सच्चाई के साथ उनके उपन्यासों में स्पष्ट हुई है। 'मैला आँचल' का मेरीगंज गाँव अनन्य जड़ताओं का शिकार एवं अभावों का विपुल भंडार है। डॉ. प्रशांत इस गाँव में आकर बड़ा आश्चर्यचकित होता है जब वस्त्रों के अभाव में निमोनिया के रोगी को पुआल में सिर छुपाए हुए देखता है। 'परती परिकथा' का निम्न वर्ग भी इस निर्धनता और बेकारी से जूझ रहा है। परानपुर की जनता प्रयत्नशील है अपनी गरीबी को दूर करने के लिए। इसका चित्र लेखक ने बड़े ही मार्मिक ढंग से खींचा है, 'बच्चे मर गए हाय रे। बीबी मर गई हाय रे। उजड़ी दुनिया हाय रे...। मजदूर हो गए, घर से दूर हो गए। वर्ष महीना एक कर, खून पसीना एक कर। बिखरी ताकत जोड़कर, वर्तन-पत्थर तोड़कर। इस डायन को साधेंगे। उजड़े को बसाना है।' इस प्रकार से ग्रामीण मजदूरों की कार्यशीलता का यह दृश्य उनके कठिन श्रम का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर, उनके अभावों, दुख-दर्द व विभिन्न विसंगतियों को उजागर कर उनकी उस जीवंत शक्ति की कथा कहता है जो ज्ञात होकर भी अज्ञात हैं।

भारतीय ग्राम जीवन में विवाह का सामाजिक ही नहीं धार्मिक महत्व भी है तथा इसे एक संस्कार की संज्ञा भी दी गई है। लेकिन समय के साथ समाज में वैवाहिक संबंधों का स्वरूप विकृत होता गया है। आज स्थिति यह है कि विवाह संबंधी धर्म और नैतिकता के सारे बंधन नारी के ऊपर लगा दिए गए हैं और पुरुष वर्ग इन सब बंधनों से मुक्त स्वेच्छाचार के लिए स्वतंत्र है। इन सभी बंधनों में 'काका इस बार इज्जत बचा लीजिए। क्या आप यही चाहते हैं कि नाई, धोबी और चमार के सामने हम हाथ जोड़कर गिड़गिड़ावें? कल से ही राम किरपाल काका के गुहाल में गाय मरी पड़ी है। चमार लोगों ने उठाने से साफ इनकार कर दिया है। ...राजपूत लोगों के टोले को देखिए, दाढ़ी कितनी बड़ी-बड़ी हो गई है। नाइयों ने काम करना बंद कर दिया है।' निम्न वर्ग विद्रोह पर उतारू है। इसीलिए कहा गया है कि 'मैला आँचल' में एक ओर किसान है तो दूसरी ओर सामंती मनोवृत्तियों के साँचे में ढला हुआ खेतिहर जमींदार। सांप्रदायिक संघर्षों का मूल कारण धर्म है। संकुचित धार्मिक भावना को लेकर विश्व में बड़े-बड़े संघर्ष हुए हैं।

गाँवों की सामाजिक रीतियों, अभिवृत्तियों एवं मूल्यों में विषम ढंग से परिवर्तन हो रहे हैं। ग्रामीण जीवन का हर पक्ष इस संक्रमण में फँस रहा है। सामाजिक मूल्यों की विघटन प्रक्रिया का स्वरूप रेणु के उपन्यासों में बड़ी मार्मिकता के साथ प्रस्तुत हुआ है। जीवन-मूल्यों की टूटन का घुन विविध पात्रों में विविध प्रकार से लगा है। कोई उन्हें टूटते देखकर दुखी है तो कोई उसे तोड़कर खुश। 'मैला आँचल' के अंतर्गत सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आए परिवर्तनों ने ग्रामीण जीवन की मूल्यवत्ता को हिलाकर रख दिया है। नैतिक मूल्य टूट रहे हैं। झूठी गवाहियों के बल पर कुर्की हो रही है। राजनेता तो मानों अनैतिकता के प्रतिमान बन चुके हैं। 'सोशलिस्ट पार्टी के ऑफिस सेक्रेटरी' रामनिहोरदास पुरानी रसीद पर चुपचाप चंदा वसूलते हैं। उनका भेद तब खुलता है जब सिखन बढ़ई पार्टी इंचार्ज को रिपोर्ट करता हुआ करता है कि - 'बावन रुपये का है पलंग, बाबू साहेब! पलंग बनवाकर ले गए राम निहोर बाबा! एक महीना दौड़ने के बाद, दाम के नाम पर डिबलूकट रसीद काट दिहिन हैं। रसीद लेकर हम क्या करें?'

भारतीय गाँवों में थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ सामंती व्यवस्था एवं संस्कार कमोवेश आज भी जीवित हैं। इस सामंती व्यवस्था ने अनेक सामाजिक बुराइयों को जन्म दिया ही है, विलासिता और कामुकता के क्षेत्र में तो सर्वथा नवीन मानदंड ही प्रस्तुत किए हैं। इसके लिए सामंतों ने अनेक विवाह किए और नैतिक-अनैतिक अनेक साधनों से कामुकता की परितृत्ति में लगे रहे। अवैध यौन-संबंध स्थापित किए। आत्महत्याओं, भ्रूण हत्याओं एवं अन्याय रूपों में अपराधों की शृंखला का जन्म हुआ। नारीवर्ग अनैतिकताओं एवं कुंठाओं का शिकार बन गया। आज भी यह अनैतिकता समाज को ग्रसे हुए है। रेणु के उपन्यासों में ये अवैध यौन-संबंध और विकृतियाँ, विविध रंगों में उभरी हैं। 'मैला आँचल' के तहसीलदार हरगोरी सिंह का अपनी खास मौसेरी बहन से संबंध है। महंत सेवादास लक्ष्मी दासिन से फँसा हुआ है। सभी साधु-संत यौन-पीड़ा से कुंठित हैं। तभी तो लक्ष्मी कहती हैं - 'गरदनियाँ देकर निकाल दो इसको। यह साधु नहीं राक्षस है। इसके सिर पर माया सवार है। इससे पूछो कि आज सवेरे जब मैं स्नान कर रही थी बाँस की टट्टी में छेद करके क्या देखता था? सैतान।' रेणु ने अपने उपन्यासों में तमाम अनैतिकताओं का पर्दाफाश किया है जो समकालीन जीवन-बोध में नैतिकता समझी जाने लगी हैं।

इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद के जटिल भारतीय जीवन के यथार्थ का बहुआयामी चित्र रेणु के उपन्यासों में दिखाई देता है। राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं में उलटफेर, संबंधों और स्वार्थों की टकराहट आदि के फलस्वरूप जीवन का जो नया रूप निर्मित हुआ था उसे रेणु ने बहुत गंभीरता से महसूस किया है। आर्थिक तंगी के बीच ग्रामीण पिस रहा है। वहाँ टूटन की प्रक्रिया जोरों पर है। सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक परिवर्तनों से भारतीय गाँव भी अप्रभावित नहीं रह पाए हैं। गाँवों के समकालीन जीवन में प्रकट हुए परिवर्तनों को रेणु के उपन्यासों में बड़ी सूक्ष्मता से परखा गया है। इसी परिवेश के प्रति आकर्षक के फलस्वरूप 'मैला आँचल', 'परती-परिकथा', 'दीर्घतपा', 'जुलूस' और 'कितने चौराहे' जैसे उपन्यासों का सृजन संभव हो सका है।

वर्तमान समाज-व्यवस्था में विभिन्न वर्णों के स्थान पर वर्गों के उदय की पृष्ठभूमि स्वार्थ और संपत्ति को अत्यधिक महत्व दिए जाने के कारण तैयार हुई। ऊँच-नीच के इस रोग को हिंदू-मुसलमान सभी में फैलते देखकर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों में इस पर चिंता व्यक्त करते हुए इसका विरोध किया गया है। ये वर्ग-भेद, अन्याय को सह लेने का मिथ्या संकोच और अपमान का झूठा भय पैदा करने में सफल होता है। 'मैला आँचल' के कालीचरन के शब्दों में रेणु की उस वैचारिकता के दर्शन होते हैं जो उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि समाज में जाति-पाँति टूट रही है और उसके स्थान पर दो वर्ग अमीर और गरीब बन गए हैं। इन उपन्यासों में अंतर्जातीय विवाहों की योजना ने एक ओर जाति-भेद की ढहती व्यवस्था को ठोकर दी तो दूसरी ओर निम्न वर्ग के संगठित विद्रोह का समर्थन कर वर्ग-भेद के प्रति अपनी तीखी घृणा का प्रदर्शन किया है। 'मैला आँचल' में अज्ञात कुलशील प्रशांत और कमला, 'परती परिकथा' में सवर्ण सुवंश और मलारी आदि के विवाह समाज के रूढ़ नियमों और नैतिक मान्यताओं की अवहेलना करके संपन्न हुए हैं। ये विवाह ग्रामीण जीवन के एक पक्ष को उद्घाटित करते हैं। इन पर ग्रामीणों की प्रतिक्रिया भले ही विपरीत हो किंतु उपन्यासकार ने स्वागत किया है।

जमींदारी प्रथा का वैधानिक रूप से उन्मूलन होने पर भी ऐसे जमींदारों का चित्रण रेणु के उपन्यासों में है जो किसान बनकर निरंतर शोषण करते हैं। आजादी से पहले आर्थिक शोषण के संदर्भ में जमींदार 'मिथ' और 'प्रतीक' बन चले थे। रेणु ने ग्रामीण जीवन में विभिन्न स्तरों पर व्याप्त आर्थिक-सामाजिक शोषण को बेपर्दा करते हुए उसके प्रति अपना रोष व्यक्त किया है। 'सैकड़ों बीघा जमीन वाले किसान के पास पैसे हैं, पैसे से गरीब को खरीदकर, गरीबों के गले पर, गरीबों के जरिए ही छूरी चलाते हैं।' शोषण वर्ग की भाग्यवाद विषयक एवं मालिक-नौकर की ईश्वरीय विधान विषयक मान्यताओं के प्रति विरोध उभर रहा है। 'जमींदारी प्रथा अब खत्म हो गई। अब जमींदार उसे बेदखल नहीं करता, जो जोतेंगे जमीन उसी की है।' जमींदारी के विरोध में 'परती परिकथा' का किसान आंदोलन प्रखर रूप ले चुका है। इस आंदोलन में छोटे-छोटे लड़के भी वर्ग-चेतना के प्रति भरते गए हैं - 'जमींदारी का विख-दाँत तोड़ेंगें-तोड़ेंगें। जमींदारी का साथ-हाथ छोड़ेंगें-छोड़ेंगे।' मैला आँचल का प्रशांत ग्रामीणों की दयनीय दशा का विचार करते हुए पाता है कि मौजूदा व्यवस्था दरार पड़ी दीवार की तरह है और उसका गिर जाना ही श्रेयस्कर है। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का यह सोचना सही है कि - 'असल सुराज उसी दिन होगा जिस दिन धनी, जमींदार, सेठ और मिल मालिक को लोग राह चलते कोढ़ी और पागल समझने लगेंगे।'

समाज में राजनीतिक चेतना विकसित होने से जन-जीवन को नवीन दृष्टि मिली है। स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व राजनीतिक जागरण का एकमात्र लक्ष्य भारत को पराधीनता की जकड़ से मुक्त कराना था। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जनवाद, आर्थिक समानता, राष्ट्रीय एकता तथा धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रीय नीति का आधार बनाने से विविध जटिलताओं का प्रादुर्भाव हुआ है। वर्तमान स्थिति में भारतीय अर्थ व्यवस्था का परंपरागत रूप क्षीण पड़ता गया है। आर्थिक समृद्धि से शक्ति-संचय करते हुए राष्ट्र समृद्ध अवश्य हुआ है लेकिन सामान्य जनता की दरिद्रता, बीमारी, अज्ञान, बेकारी आदि को लक्षित करते हुए लगता है कि राष्ट्र को आर्थिक विकास की सही दिशा नहीं मिली है। वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था के पूँजीवाद एवं समाजवाद के मिश्रित स्वरूप में पूँजीवाद को समाप्त करने के आह्वान से रेणु के उपन्यासों में आर्थिक संतुलन के प्रजातांत्रिक प्रयासों की स्थिति राजनीतिक परिपार्श्व में प्रतिमान के रूप में उभरी है। 'जिस तरह सूरज का डूबना एक महान सत्य है, पूँजीवाद का नाश होना भी उतना ही सच है। मिलों की चिमनियाँ आग उगलेंगी और उन पर मजदूरों का कब्जा होगा। चारों तरफ लाल धुआँ मँडरा रहा है। उठो, किसानों के सच्चे सपूतो! धरती के सच्चे मालिकों उठो!'

ग्राम्य जीवन की जाँच-परख के दौरान रेणु ने ग्रामांचल में नारी के शोषण और उत्पीड़न को वहाँ के समकालीन जीवन का कटु यथार्थ माना है। शोषण के तमाम चौराहों से गुजरते हुए नारी अबला, सतीत्व एवं देवीत्व के संज्ञान से विश्वास उठता गया है जिसके फलस्वरूप रूढ़ियों की शृंखला को तोड़कर वह पुरुष की समकक्षता प्राप्त करने लगी है। यूँ भी समाज की सारी संस्थाएँ, संबंध और संदर्भ बदल रहे हैं। 'जहाँ नहीं बदले हैं, वे टूट गए हैं या उनसे बँधे व्यक्तियों का उन्होनें तोड़ दिया है। पत्नी परंपरा है, संस्था है। यदि वह अपने अधिकारों, आदर्शों या मर्यादाओं के नाम पर बदलने या लचीले होने से इनकार कर देगी तो समाप्त हो जाएगी।'

नारी अब घर की चारदीवारी में बंद रहकर केवल बच्चे पैदा करने वाली मशीन ही नहीं कहलाना चाहती अपितु वह भी अपने हृदय में उठने वाली अभिलाषाओं और इच्छाओं को साकार रूप से देखना चाहती है।

समकालीन जीवन स्थितियों में परंपरागत और पुख्ता मूल्यों के सामने अनेक प्रश्नचिह्न लगे हैं। इस मूल्य संक्रमण के पीछे आत्मीय संबंधों में आया बदलाव सक्रिय है। यह बदलाव मात्र नगरों या महानगरों में ही नहीं आया अपितु इसने ग्रामीण जीवन को भी एक बारगी झकझोरकर रख दिया है। रेणु के उपन्यासों में संबंधों के बीच बढ़ती दूरी और उसके फलस्वरूप उत्पन्न स्थितियों की विस्तृत चर्चा मिलती है। 'मैला आँचल' में जातीय वैमनस्य, 'जुलूस' में संप्रदायगत द्वेष तो 'परती परिकथा' में वैमनस्य का कारण जमीन है। 'घर बाहर घनिष्ठ आत्मीय संबंधों में बिगड़ आने का दुष्परिणाम यह हुआ कि ग्राम्य जीवन में अनैतिक संबंधों की बाढ़ आ गई। आत्मीयता रहित यौवनाकर्षण पर आधारित इन काम संबंधों से स्पष्ट है कि गाँव कस्बे की मानसिकता बदल रही है और पुरानी मान्यताएँ कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रही हैं। इस संबंधों के पीछे कहीं अभावजन्य विवशता और पैसे वालों की ऐय्याशी है तो कहीं सहसा उत्पन्न परिस्थितियों का तकाजा है।' गाँव की भी शिक्षित युवा पीढ़ी अब प्रेम करने लगी जबकि पहले ऐसे संबंधों की निर्मिति कम ही हो पाई थी। 'मैला आँचल' के डॉ. प्रशांत और कमला का प्रेम-संबंध इसका उदाहरण है साथ ही ग्रामीण परिवेश में कुछ नए प्रकार के संबंधों की स्थापना तथा नए मूल्य मर्यादाओं को जमने की ओर इंगित करता है।

रेणु के उपन्यासों में मानव के महत उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक परंपरागत नैतिकता की घोर भर्त्सना हुई है एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भी उचित-अनुचित, शुभ-अशुभ एवं पाप-पुण्य को नवीन दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया गया है। उनमें मानवतावाद की प्रतिमा के आग्रह से मानवीय मूल्यों एवं सत्यों का संधान लक्षित किया जा सकता है। सामाजिक मर्यादाओं एवं जाति-पाँति के बंधनों के प्रति शिथिलता दर्शाते हुए 'मैला आँचल' में नीलोत्पल के रूप में नव्य मानवता को विकसित होते देखा गया है। नए विश्वासों, संकल्पों एवं आशाओं से प्रेरित होकर ममता गांधीवादी विचारधारा को 'महाप्रकाश' की संज्ञा देती है 'जिसकी रोशनी में दुनिया निर्भय हजारों वर्ष का सफर तय कर सकती है।' डॉ. प्रशांत का दृढ़ संकल्प है - 'मैं प्यार की खेती करना चाहता हूँ। आँसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहराएँगे।'

लोकजीवन के संपूर्ण संस्कारों, गतिविधियों, सोचने के ढंगों, क्रिया-कलापों उपलब्धियों, कलात्मक प्रयासों, धार्मिक-सांस्कृतिक क्रियाओं आदि लोक के समस्त कार्यों के पीछे जो चेतना काम करती है, वह लोक सांस्कृतिक चेतना ही है। लोक संस्कृति किसी से अभिभूत नहीं है बल्कि अप्रभावित निष्कलुष है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में यह लोक संस्कृति अपने अच्छे-बुरे रूप में जैसी है वैसी ही प्रस्तुत हुई है। न जाने कितने युगों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दाय के रूप में प्राप्त यह लोक संस्कृति लोकजीवन की सही पहचान है। इसी पहचान को समझने और परखने का उपक्रम ही रेणु के उपन्यासों की मूलभूत आकांक्षा है। इस आकांक्षा के द्वारा वस्तुतः अपने आस-पास को ही नहीं, उन्होंने अपने को भी टटोलकर पहचाना है और लोक संस्कृति की जीवन गाथा को लिपिबद्ध करने का प्रयास ही उनके उपन्यासों का ध्येय रहा है। लोक संस्कृति की गतिशील धारा को अपने उपन्यासों से जोड़ने का उनका उपक्रम, कृतिम घिसी-पिटी, जटिल और दुरूह वर्तमान सभ्यता अथवा शिष्ट संस्कृति के बजाय अकृतिम, अलिखित स्वाभाविक लोक-संस्कृति के शाश्वत मूल्यों और सहज जीवन विधाओं की निजता का महत्वपूर्ण उपक्रम है। रेणु के उपन्यास हमें लोक की वसीयत से परिचत कराते हैं और पुनः ग्राम्य भारत की मूल-चेतना से जोड़ते हैं।

मानव जीवन के इतिहास को रेणु लोक के संघर्षपूर्ण जीवन के साथ आज तक की लंबी यात्रा को निरंतर गतिशील रूप में देखते हैं। लोक-जीवन में गतिशीलता की स्वाभाविक प्रकृति और प्रवृत्ति निहित है। गतिशीलता के कारण ही लोक जीवन प्राण संपन्न दिखाई देता है। मनुष्य और उसके बनाए हुए विचार धीरे-धीरे बासी पड़ते जाते हैं। पुराने मूल्यों से मुक्त होकर नई मान्यताओं से जीवन में विकास देखते हुए 'मैला आँचल' के नीलोत्पल का कथन है - 'यहाँ विगत के प्रति पछतावा नहीं है। बीत गया सो बीत गया। वह सब भूलने के लिए ही है।' अन्य उपन्यासों के भी अनेक मुख्य पात्र अत्यंत जागरूक दृष्टि का परिचय देते हैं। मृत मान्याताओं, अप्रासंगिक व्यवस्थाओं तथा नीति-अनीति की सड़ी रूढ़ियों को तोड़कर जीवन की प्रवाहमान धारा से उत्पन्न नए मूल्यों को स्वीकारने का साहसपूर्ण प्रयास रेणु के उपन्यासों में हुआ है।

रेणु के उपन्यास ऐसे लोक जीवन की झाँकी प्रस्तुत करते हैं जहाँ अशिक्षा का कुहासा है तथा वे रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। यहाँ रूढ़ परंपराओं से हटकर किसी को कोई तथ्य दिखाई देता है तो उसका विरोध होता है। लेकिन भविष्य के सपने और लोक संस्कृति की शक्ति में अपार-विश्वास जिस आदर्श को उत्पन्न करते है, वह रेणु के उपन्यासों की रचना प्रक्रिया का अंग बन गया है। यूँ भी स्वातंत्र्योत्तर भारत में सांस्कृतिक परिवर्तनों की प्रक्रिया तेज हुई है। परंपरानिबद्ध भारतीय दृष्टि को नवीन वैचारिक जगत का परिवेश प्राप्त हुआ जिससे नवीन संस्कृति के ताने-बाने बुने गए। रेणु के उपन्यासों में भारतीय लोक संस्कृति की उन समस्त प्रभाव रेखाओं को उजागर करने का प्रयास किया गया है। जो आज हमें लोकजीवन की समस्त संभावनाओं से परिलक्षित कराती है। 'मैला-आँचल' के मेरीजंग गाँव में नए और पुराने विचारों की टकराहट है। गाँव में शहरी खान-पान एवं वेष-भूषा का प्रसार आ पहुँचा है। गाँव की फुलिया बालों में सुगंधित तेल लगाती है, शहरी तौर-तरीके से रहती है। 'साड़ी पहनने का ढंग, बोलने का, बतियाने का ढंग, सब कुछ बदल गया है। तहसीलदार साहब की बेटी कमली अंगिया के नीचे जैसी छोटी चोली पहनती है, वैसी वह भी पहनती है। कान में पीतर के फूल हैं। फूल नहीं फुलिया कहती है - कनपासा। आँचल में चाबी का गुच्छा बांधती है, पैर में शीशी का रंग लगाती है।'

भौतिकता ने भारतीय गाँवों का भी वातावरण स्वस्थ नहीं रहने दिया है। मामूली स्वार्थ भी तूफान उठाने के लिए काफी होता है। अतः बात-बात पर ईश्वर की दुहाई देने वाले ग्रामीण अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए अपने भाई का गला काटने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते। 'परती परिकथा' के परानपुर गाँव की सामूहिकता, एकता, सांस्कृतिक उच्चता आज शेष नहीं है। युवक-युवतियाँ, नर-नारी, माँ-बेटी, बाप-बेटे सभी ने अपने-अपने अलग रास्ते अपनाए हैं। चकबंदी ने घर-परिवार को बाँटकर रख दिया है। कोई एक-दूसरे से मुक्त हृदय होकर नहीं मिलता। इसी की आवश्यकता को अनुभव करता हुआ 'परती परिकथा' का नायक जीतेंद्र कहता है - 'प्रीति-बंधन के खोए हुए सूत्र को खोजकर निकालना होगा। नहीं तो, इस सर्वभौम रिक्तता से मुक्ति की कोई आशा नहीं। ...परमादेव की सवारी के दिन, गाँव में चांचल्य! रग्घू-रामायनी की गीतकथा के समय, श्याम-चकेवा की रातों में बंद मन से झरोखे जरा खुले थे। ...जात्रा, कीर्तन, नाटकों के अवसर पर आनंद से सारा गाँव फूला रहता, और अब?' गाँवों में पहले एक-दूसरे को अपनी बहन-बेटी समझा जाता था किंतु अब ऐसा भी नहीं रह गया है, फलतः गाँव दुराचार के शिकार हो रहे हैं; अनैतिक संबंधों का अधिक्य फैल रहा है। रेणु के उपन्यासों में तमाम अनैतिक संबंधों एवं अनैतिकताओं का लेखा-जोखा है।

लेकिन इन सबके बावजूद भी इन तमाम बुराइयों की काली छाया सर्वग्रास नहीं कर सकी है अभी भी लोक संस्कृति को। इसका एक पहलू जरूर धूमिल और दिशाहीन हो गया है किंतु उसका दूसरा पहलू भी है, 'जिस पर देशकाल का कोई प्रभाव नहीं है, जो अपने अक्षय नैसर्गिक कंचन-विलास में अखंड सनातन सत्य-सी गाँव में विराजमान उसकी सारी उदासी और मलिनता को एक स्तर पर उत्फुल्ल मुक्ताभा से रँगती रहती है। यदि इसे ही गाँव की असली संस्कृति के रूप में रेखांकित किया जाय तो असंगत नहीं होगा। रेणु ने लोक संस्कृति को अभिव्यक्त करने के लिए अनेक लोक उपादनों का प्रयोग किया है। इस दृष्टि से उपन्यासों में प्रयुक्त हुई लोक-कथाओं का विशेष महत्व है। जिसकी चर्चा उपन्यासों में हुई है। 'मैला-आँचल' में चर्चित सारंगा सदाब्रत, तिज्जेभान एवं 'परती परिकथा' की सुन्नरि-नैका और श्याम-चकेवा की कथाएँ शताब्दियों से लोक-जीवन की मस्ती को मुखरित करती आ रही है। इन कथाओं को गा-गाकर सुनाया जाता है। श्याम चकेवा के संगीतमय नाद ब्रह्म में और आनंद की धाराओं को रक्तप्रवाह में संचरित करने वाली चाँदनी रात में शूद्रों की टोलियों और ऊँची जाति की स्त्रियों की टोलियाँ एकमेव हो गईं। 'चाँद को भी नहीं पता लड़कियों की दोनों जमात कब नाचते-नाचते एक गिरोह में घुलमिल गई।' इन अतीत कथाओं को उपन्यास में अत्यंत सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इन लोक कथाओं को भूमिका लोक संस्कृति के जिस आयाम का उद्घाटन करती है वह एक उपलब्धि है।

लोकगीतों में लोकजीवन स्पंदित होता है। उसका समूचा अंतर-वैभव इन गीतों के रूप में प्रस्तुटित होता है। परंपरा के रूप में गाए जाने वाले ये गीत जिनके रचयिताओं का कोई उल्लेख नहीं है कभी-कभी उनके गायकों के व्यक्तित्व के साथ घुल-मिलकर एकमेव हो जाते हैं। रेणु ने इन लोकगीतों को खेत-खलिहानों से उड़ाकर अपने उपन्यासों के अमर-पृष्ठों के साथ जोड़ दिया है। 'परती परिकथा' में लोकगीत और लोक-कथाओं की विधिवत खोज में संदर्भ उभरे हैं। रग्घू रामायनी सुन्नरी नैका का गीत गाता है। कोसी मैया के लोकगीत को रेणु ने एक बूढे़ भैसवार के द्वारा प्रस्तुत कराया है। जित्तन बरसाती लोकगीत गुनगुनाता है। ताजमनी और मलारी 'शामा का गीत' गाकर चकित कर देती हैं। 'मैला आँचल' के मेरीगंज वासियों के तो मानो नस-नस में संगीत व्याप्त है। 'यहाँ के जीवन का कोई प्रसंग ऐसा नहीं होगा जहाँ ढोल नहीं ढमकता हो, हास्य-व्यंग्य की बौछारें नहीं होती होंगी। उत्सव-पर्वों के गीतों में जहाँ मस्ती और मौज के गुलाल-अबीर के रंग उड़ते हैं वहीं ऋतु-गीतों के यहाँ की नारियों की अंतःवासिनी वेदना को बोल मिलते हैं।' वर्षा में एक बिरहिणी यौवना के बोलों के फूटती टीस देखिए -

     'चढ़ती जवानी मोरा अंग-अंग फड़के रे।
              कब होई गवना हमार रे भउजिया।।'

नाच और गान के साथ ही लोक जीवन में अनेक उत्सव और त्यौहार भी प्रचलित होते हैं। होली यहाँ का प्रसिद्ध पर्वोत्सव है। यही ऐसा पर्व है जिस दिन मेरीगंज के लोग जाति-पाँति, ऊँच-नीच के सारे भेदभाव भुलाकर अबीर और गुलाल के रंगों के साथ एकमेव हो जाते हैं। 'मैला आँचल' में 'सतुआनी' की भी चर्चा है जो चैत्र-संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त 'सिखा' नामक पर्व का भी उल्लेख है जिसमें मछलियों का शिकार किया जाता है और बैसाख में संपन्न होता है। 'परती परिकथा' में श्री पंचमी नामक उत्सव का उल्लेख है। रेणु द्वारा चित्रित फारसिबगंज के मेले में परानपुर की नाइनें तंबू लेकर जाती हैं। बहुत गहमागहमी है। पुलिस वाले टोकते हैं - 'मेले में रंडी-पतुरिया मोजरा गाने वाली या तंबुक वाली किसी को बसने का हुकुम नहीं है।'

भारतीय जीवन में धर्म और संस्कृति का अत्यंत अन्योन्याश्रित संबंध है लेकिन आज वह पाखंड अथवा अंधविश्वास बनकर रह गया है। उसका सांस्कृतिक रस एकदम निचुड़ गया है। उसके केंद्र भ्रष्टाचार के अड्डे हो गए हैं। मेरीगंज की धार्मिक स्थिति इसी प्रकार विकारग्रस्त है। दिन-रात भजन, बीजक पाठ करने वाला, सतगुरु की टेक के साथ उठने-बैठने वाला महंत सेवादास का चेला रामदास एक दिन रात में लक्ष्मी कोठारिन के यहाँ पहुँच जाता है और कहता है - 'तुम मठ की दासिन हो, महंत के मरने के बाद नए महंत की दासी बनकर तुम्हें रहना होगा। तू मेरी दासिन है।' 'परती परिकथा' में धार्मिक विश्वासों को व्यक्त करने के साथ ही इन विश्वासों से लाभ उठाने की स्वार्थी प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डाला गया है। निरसू भगता पर परमादेव के सवार होने की कथा तथा मलारी पर देवी परमेसरी की सवारी के चित्रण जमकर किए गए हैं। कमरेड मकबूल की भाभी तक परमादेव से संतान माँगने पहुँच गई है।

'मैला आँचल' रेणु का बिहार राज्य के पूर्णिया जिले के ग्रामीण जीवन पर आधारित प्रथम उपन्यास है। इस उपन्यास में पूर्णिया जिले के 'मेरीगंज गाँव को पिछड़े गाँवों का प्रतीक मानकर वहाँ के जन-जीवन का सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्वरूप चित्रित करने का अत्यंत सफल प्रयास लेखक ने किया है।' समस्त ग्रामीण परिवेश को लेखक ने सजीव और स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है। उसका दृष्टिकोण एकदम यथार्थवादी है। उस ग्रामीण परिवेश की अपनी विशेषताएँ हैं। साथ ही अपने गुण-दोष भी हैं। लेखक ने एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में संपूर्ण घटनाओं का अंकन किया है। स्वयं लेखक के शब्दों में 'इसमें फूल भी हैं, शूल भी है। धूल भी हैं, गुलाब भी, कीचड़ है, चंदन भी, सुंदरता है, कुरूपता भी - मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया। कथा की सारी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ साहित्य की दहलीज पर आज खड़ा हुआ हूँ।'

उपन्यास का शीर्षक 'मैला आँचल' स्पष्टतः ग्रामीण अंचल की ओर संकेत करता है। यह ग्रामीण अंचल अज्ञान, अंधविश्वास, रूढ़ियों, दरिद्रता, बीमारी और जमींदारों के द्वारा किए जा रहे शोषण के कारण अपनी उज्ज्वलता को खोकर मैला हो गया है। वस्तुतः केवल राजनीतिक, सामाजिक और पारिवारिक विवरणों को जुटाना इस कृति का उद्देश्य नहीं है। यह स्वतंत्रता के बाद गाँव में हो रहे परिवर्तन का प्रामाणिक दस्तावेज है। व्यंग्य, विद्रूप, करुणा और आक्रोश की विविध मुद्राएँ स्पष्ट कहती हैं कि उपन्यासकार अपनी जागरूक दृष्टि की तुला पर समूचे ग्रामीण परिवेश को तोल रहा है। जहाँ तक कथ्य का प्रश्न है, वह मौलिक है।

उपन्यास की कथावस्तु का प्रारंभ, गाँव में अस्पताल बनाने की घटना से आरंभ होता है। समूचा गाँव अनेक गुटों में विभक्त है। पूरा गाँव गुआर टोली, राजपूत टोली, तंत्रिमा-छत्री टोली, यदुवंशी-छत्री टोली, कुर्म-छत्री टोली, ब्राह्मण टोली, धानुक टोली, रैदास टोली, दुसाध टोली आदि अनेक टोलियों में बँटा हुआ है। इनके अपने परंपरागत झगड़े हैं। अस्पताल निर्माण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी इनमें पर्याप्त मतभेद है। ब्राह्मण टोली तो अस्पताल के खिलाफ दुष्प्रचार भी करती है। 'डाक्टर लोग ही रोग फैलाते हैं, सुई भोंक कर देह में जहर दे देते हैं। हैजा के समय कूपों में दवा डाल देते हैं। गाँव का गाँव हैजा से समाप्त हो जाता है।'

'मैला आँचल' में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गाँवों में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों तथा देश में सामाजिक चेतना के विकास का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। लेखक ने गाँवों में अस्पाल निर्माण के माध्यम से विविध राजनीतिक पार्टियों को पारस्परिक टकराव, गाँव में उत्पन्न वैषम्य, क्षोभ, तनाव और गहरी कशमकश के बीच जिए जाने वाले ग्रामीण जीवन के यथार्थ को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है।

उपन्यास के प्रमुख पात्र डॉ. प्रशांत तहसीलदार की पुत्री कमला के कठिन शारीरिक और मानसिक रोग की चिकित्सा करते हैं। संपूर्ण गाँव में हैजे का प्रकोप होता है। उस समय वे ग्रामवासियों को बचाने का भी प्रयास करते हैं। गाँव के लोग डॉ. प्रशांत को देवता की तरह मानने लगते हैं। तहसीलदार की पुत्री कमला जो हिस्टीरिया से ग्रसित है, उसका यथासंभव इलाज करते हैं परंतु बाद में उनका कमला से प्रेम संबंध हो जाता है। कमला उनकी पत्नी बन जाती है लेकिन तथ्य यह है कि वह विवाह से पूर्व माँ भी बन जाती है।

लोक वातावरण के यथार्थ स्वरूप केा चित्रित करने में लोक भाषा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। फलतः 'लेखक ने उपन्यास में यथास्थान तद्भव और देशज शब्दों के प्रयोग द्वारा ग्रामीण जीवन के यथार्थ स्वरूप को स्वाभाविक रूप में चित्रित किया है। यदि कहीं दुर्बोध शब्दों का प्रयोग हुआ है लेखक ने फुटनोट में उसका अर्थ लिखकर उन्हें सुबोध बनाने का प्रयास किया है। कथावस्तु में एक स्थान पर विधवा के लिए 'बेवा' शब्द का प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार अन्यत्र 'चुमौना' शब्द का भी लेखक ने प्रयोग किया है तथा फुटनोट में उसका अर्थ 'सगाई' लिखकर लेखक ने अंचल के लोकजीवन की यथार्थता को सजीवतापूर्वक प्रस्तुत किया है।'

'मैला आँचल' मेरीगजं के जीवन में व्याप्त, वस्तुतः जनजीवन की मैली जिंदगी की बहुरंगी दृश्यावली का एक दर्पण है। इसमें ग्रामीण जीवन की आर्थिक विषमता, इस विषमता के कारण अनैतिक संबंध, कहीं-कहीं सामान्य रूप में ऐसे संबंधों की व्यावहारिक परिणति, मठों के अधिपति, जिन्हें पूजा और श्रद्धा के भाव से देखा जाता है, उनकी कामपिपासा, अज्ञान के अंधकार में भटकती हुई गाँवों के गतिविधि, संस्कारों के विकास के विविध आयाम, भूत-प्रेतों के प्रति लोगों की अवधारणा आदि के सजीव एवं प्रभावपूर्ण चित्रण के द्वारा लेखक ने पूर्णिया जिले के एक गाँव के जीवन की यथार्थ झाँकी प्रस्तुत की है। दूसरी ओर लेखक ने डॉ. प्रशांत के माध्यम से भविष्य की संभावनाओं का आशावादी प्ररिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया है और आशा की है कि परिश्रम और साधना से देश की गिरावट को दूर किया जा सकता है - 'लाखों एकड़ बंध्या धरती, कोसी कलवित, मरी हुई मिट्टी शस्य-श्यामला हो उठेगी। ...मकई के खेतों में घास काढ़ती हुई औरतें बेवजह हँस पड़ेंगी।'


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हिंदी समय में कँवलजीत कौर की रचनाएँ