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कहानी

कच्चा गोश्त
ज़किया ज़ुबैरी


बित्ते भर का कद और दस गिरह लंबी जबान...! और जब यह जबान कतरनी की भाँति चलती तो बृज बिहारी बहादुर भी बगलें झाँकते दिखाई देते। भिड़ के छत्ते को छेड़ने से पहले सोचना चाहिए था न कि पंचायत के सरपंच बने बैठे हैं। और दबदबा ऐसा कि परिंदा भी पर मारते डरे।

फिर मदन मोहन बेचारे की क्या मजाल कि उनकी मर्जी के खिलाफ पलक भी झपकाए। शब्बो तो बालिश्त भर की ततैया बनी हर समय भिनभिनाती फिरती और जहाँ होता बैठ कर डंक मार कर उड़ जाती।

मदन मोहन चार बहनों पर एक भाई। ऊपर वाले ने मिजाज और जहन भी खूब दिया था। अभी स्कूल में ही था कि सरपंच बहादुर ने होनहार बिरवा के चिकने पात भाँप लिए थे और उसकी माँ से कह कर उसको घर पर बुलाना शुरू कर दिया था। घर के छोटे छोटे कामों के साथ साथ कुछ लिखत पढ़त के काम भी करवा लिया करते थे।

शुरू शुरू में तो मदन मोहन को भी भला मालूम होता। काम कम था और खाना अच्छा मिलता था, मगर कुछ ही दिनों में उसका हाल भी एक स्विस चाकू जैसा हो गया। स्विस चाकू की खूबी भी ऐसी ही होती है कि कहने को तो चाकू होता है मगर खोलिए तो उसमें दसियों काम करने के पुर्जे निकल आते हैं - कैंची, स्टेपलर, इंच-टेप, नाखून घिसने की रेती और टूथ पिक आदि आदि। इसी तरह बेचारा मदन मोहन इस छोटी आयु से ही स्विस चाकू बन गया था।

उसके कामों में शामिल था बृज बिहारी के मोटे बदन को दबाना, मालिश करना, कपड़े धोना, इस्त्री करना, खाना खिलाना; नहाते वक्त पीठ से मल मल कर मैल छुड़ाना; साइकिल और इक्के पर बैठा कर घुमाने और सैर को ले जाना; लिखाई पढ़ाई का काम करना; हिसाब किताब दिखाना; रोज सुबह अखबार पढ़कर सुनाना और खबरों की ऊँच-नीच समझाना।

बृज बिहारी बैठक में आते तो अखबार मुँह के सामने ऐसा ताने बैठे रहते जैसे पूरा अखबार आज ही चाट डालेंगे। या फिर हो सकता है कि अपनी प्रजा से मुँह छिपाने का ही कोई तरीका हो। गाँव वालों पर शेखी बघारते की पूरा अखबार पढ़ कर पूरी दुनिया की खबर रखता हूँ और गाँव वालों के सामने पूरे रोब से पूछते, "मदन मोहन, तुझे पढ़ना लिखना किसने सिखाया?"

मदन मोहन बेचारा अपनी गंभीर दबी आवाज में तोते की तरह रटे हुए अंदाज में जवाब देता, "सरपंच जी आपने। आपने ही लिखना पढ़ना सिखाया है।" यह जवाब देकर पैर के अँगूठे से जमीन पर लिखने लगता और सोचता कि मैं कॉलिज में पढ़ रहा हूँ या फिर सरपंच जी से? फिर अपने आप को समझाते हुए सोचता कि किताबी शिक्षा से कहीं बढ़ कर होती है अमली तालीम।

बस इतना सोच कर ही मदन मोहन काँप काँप जाता कि कहीं बृज बिहारी उसके विचारों को ताड़ न जाएँ। सरपंच ने गाँव के भोले भाले वासियों के मन में एक अजब सा डर बैठा रखा था कि जिसके मन में जो भी विचार उठता है वह सरपंच की पोथी में पहले से ही लिखा होता है। हर गाँववासी सरपंच को भगवान का स्वरूप ही मानता। इसीलिए कई बार चाहते हुए भी बेचारे गाँव वाले बृज बिहारी के विरुद्ध कभी एक लफ्ज भी नहीं निकाल पाते। वैसे सच यह भी है कि जिस किसी ने सरपंच के विरुद्ध कुछ भी बोला, उस पर अचानक कुछ ऐसा घटित हो जाता कि वह अचानक लापता हो जाता और कुछ ही दिनों में लोग उसे भूल भी जाते। गाँव वालों के डर का आनंद बृज बिहारी मंद मंद मुस्कुरा कर उठाता।

मदन मोहन के मन में कभी कभी यह सवाल भी सिर उठाता कि पिता जी वापिस क्यों नहीं आ जाते? अगर वे आ जाते तो सरपंच जी का काम सँभाल लेते और वह तसल्ली से पढ़ाई कर पाता। उसे पढ़ने का बहुत शौक था मगर बृज बिहारी इस बात का ख्याल रखता था कि कोई इतना न पढ़ जाए कि उसके सामने वह स्वयं अनपढ़ लगने लगे।

मदन मोहन के पिता जगमोहन वर्षों पहले फौज में भर्ती हो गए थे। उनकी पोस्टिंग कश्मीर में हो गई और वे वहाँ आतंकवादियों के विरुद्ध लड़ने चले गए। उन्हें कहाँ पता था कि वे अपने बेटे को बृज बिहारी के आतंक के साए में छोड़ कर जा रहे हैं। जाते हुए अपने पुत्र को समझा भी गए थे कि हमेशा बृज बिहारी को अपना बाप समझे। गाँव का सरपंच बाप-बराबर जो होता है।

आज मदन मोहन को बाप नाम से चिढ़ होने लगी है। वह समझता था कि बाप कंधों पर बैठा कर खेतों को सैर करवाता है; अगर गाँव के शरारती लड़के मारने को दौड़ें तो बाप के पीछे छिपा जा सकता है; बाप के साथ कामों में हाथ बँटाया जाता है और फिर हँसते खेलते अपने बाप से कल को स्वयं बाप बनने का ज्ञान पा लेते हैं।

यहाँ बृज बिहारी जो प्रजा का बाप बना बैठा था, उसमें सब कुछ मौजूद था बस बाप के सिवा। फिर भी मदन मोहन इस सोच को अपने दिमाग से एक झटके में उतार फेंकता; रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो जाता। उसे अपने पर हैरानी भी होती कि उसे बृज बिहारी से कुछ लगाव सा भी होने लगा।

दुनिया की ऊँचनीच पर बैठा आँसू बहा रहा था मदन मोहन जब डाकिए ने आकर उसे एक लिफाफा थमा दिया। नाम उसी का पता उसी का - आज तक कभी किसी ने उसे चिट्ठी नहीं लिखी - फिर यह खत? कौन भेज सकता है उसे? लगभग बच्चों की तरह खुशी हुई उसे। खत खोला। सबसे पहले खत की आखरी लाइन पढ़ी कि भेजने वाला कौन है - तुम सब का पिता जगमोहन! अब आँसुओं को कौन रोकता। बहने लगे। सुरक्षा का अहसास जाग उठा। भागा भागा माँ के पास पहुँचा क्योंकि बचपन से अपनी हर खुशी माँ के साथ बाँटता, मगर अपने गम केवल अपनी तन्हाई के हवाले कर देता। माँ ने भी चिट्ठी की सुनी तो कह उठी, "चिट्ठी! सुना बेटा।"

कश्मीर के हालात, खून गारत, गोला बारूद, विधवाओं की सिसकियाँ और आतंकवादी - सभी कुछ मौजूद था उस चिट्ठी में। "तुम सब की बहुत याद आती है। यहाँ आकर बहुत बड़ी गलती कर बैठा। छुट्टी तक नहीं मिलती। ...सच तो यह है कि वहाँ भी डरता था और यहाँ भी डर! न जाने कभी डर से निजात मिलेगी या नहीं। ...न जाने मुझ जैसे लोग पैदा ही क्यों होते हैं। अक्ल पर पत्थर पड़े थे कि पेट की आग बुझाने के लिए आग में ही कूद पड़ा। मोहन बेटा, तू अपनी पढ़ाई दिल लगा कर करना। और हाँ, मेरे पीछे सरपंच को ही अपना माँ-बाप समझना।

मोहन की अम्मा चिट्ठी को हाथ में लिए उदास ही बैठी रही। सोचती रही उसका पति कितना भोला है। कहता है - सरपंच पिता समान है। अगर सरपंच बाप समान है तो फिर भला मुझ से ऐसी बातें कैसे कह लेता है। अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात है - मीना को बुलवा भेजा और हुक्म दिया कि'मदन मोहन सयाना हो गया है, अब इसका ब्याह कर डाल। घर में बहू आ जाएगी तो मेरा भी भला होगा; बुढ़ापे में काम आएगी।'

मीना ने सिर झुका कर कहा था, "सिमी तो अभी पढ़ रही है। ब्याह के लिए कमसिन भी है।" बृजबिहारी ने झटके से उठकर बैठते हुए कहा, "बहू तो मैने ढूँढ़ ली है।"

"सरपंच जी, कौन है वो?"

"अरे भाई शब्बो! शब्बो! ...अपनी शब्बो।" बृजबिहारी ने अपना निर्णय सुना दिया। मीना कभी सरपंच जी को देखती तो कभी जमीन को अपने पाँव के अँगूठे से कुरेदने लगती। हकबका सी गई। ...जमीन भुरभुरी सी महसूस होने लगी... शब्बो! ...उससे तो शायद गाँव का कुत्ता भी शादी न करे। आखिर जानवर भी तो अपनी पसंद से मुँह लगावे है! शब्बो तो किसी और ही दुनिया से आई लगती है।

"तुमने सुना नहीं मीना? ...मैं कुछ कह रहा हूँ।"

मीना समझ नहीं पा रही थी कि बृज बिहारी आखिर क्यों उसके पढ़े लिखे गबरू जवान बेटे की बलि माँग रहा है।

"ये बात अपने दिमाग में बैठा लो तुम। मदन मोहन का ब्याह शब्बो से ही होगा। चल अब जा कर ब्याह की तैयारी कर। खर्चा पानी मुझसे माँग लेना। ...और हाँ, सुन, अब तू भी अपने बारे में सोचना शुरू कर। कब तक जगमोहन की राह तकती रहेगी? अरे लड़ाई में जाकर कभी कोई वापिस आया है जो जगमोहन आएगा। ...तुझे महसूस नहीं होता कि तेरा ये संदली बदन कितना प्यासा है। इसकी प्यास बुझा दे तू अब।" मीना नजरें झुकाए हमेशा की तरह अनजान बन गई। जवाब देने से डरती थी कि सरपंच जी के मुँह कैसे लगे। अकेली औरत यहाँ हवस के युद्धस्थल में अपनी लड़ाई लड़ रही थी। सोचती है... काश! हम औरतें भी अपने पतियों के संग ही लड़ने मरने चली जाया करतीं। अपने सुहाग की सेवा करतीं पतियों के साथ ही साथ जान दे देतीं। कम से कम गाँव वाले सरपंचनुमा गिद्धों से बचाव हो जाता। पति तो चले जाते हैं अपने देशवासियों को आतंकवादियों की गोलियों से बचाने। और यहाँ गिद्धों के आतंक से अपनी आबरू बचाती लड़ती फिरती हैं उनकी औरतें जिन्हें ये गिद्ध केवल कच्चा गोश्त समझ हड़प लेना चाहते हैं।

यही सब सोचती मीना घर की ओर चली जा रही थी कि सामने से शब्बो मटकने की कोशिश कर रही थी। मीना के भीतर उसे देख कर एक उबाल सा उठा। लगता था प्रकृति जैसे उसकी गर्दन बनाना ही भूल गई थी। धड़ लंबा और छोटी टाँगें। कंधे को एक तरफ झुकाए हुए थी। वह अपनी छोटी छोटी टाँगों से मीना की तरफ लगभग भागी चली आ रही थी। ...उसे पहले से ही मालूम था कि सरपंच आज मदन मोहन की माँ को क्या फैसला सुनाने वाला है। सारा गाँव उसे बुद्धू समझता था, मगर वह अपने मामले में पूरी काइयाँ थी।

मीना ने जल्दी से पगडंडी बदल खेत खेत होती घर की ओर तेज तेज कदमों से चलने लगी। सोचती जा रही थी कि जबसे सयानी हुई है बृज बिहारी को सर पर सवार पाया है।

बृजबिहारी अपने माँ बाप की दर्जन भर बच्चों में से एक था। अब तो उसे अपना नंबर भी ठीक से याद नहीं। बाप बचपन में ही चल बसा था। माँ ने अकेले ही पालन पोषण किया था। बचपन से ही बृजबिहारी को पंचायत लगाने का शौक था। बातें खूब बघारनी आती थीं। गाना-बजाना, खाना-पीना सभी तरह के शौक थे। उसने एक सेना बना रखी थी जिसका सेनापति बन वह हुक्म चलाया करता। जो भी उसका हुक्म नहीं मानता उसे बृजबिहारी की डाँट मिलती। छोटी सी उम्र में ही बृजबिहारी अच्छा खासा दादा बन गया था। अब वह अपनी माँ की डाँट की परवाह भी कहाँ करता था।

अब लूटपाट भी बृजबिहारी की गतिविधियों का हिस्सा बन गई। खेतों, खलिहानों, बागों और घरों से जो चाहता उठवा लेता। न जाने क्यों सब उसका कहा सुनते और मानते - उसकी श्याम छवि में शायद कुछ ऐसा आकर्षण होगा कि वह किसी से भी अपनी बात मनवा लेता। उसकी जबान में कुछ ऐसा जादू था कि वह अपने गलत कामों को भी सही साबित कर लेता। गाँव के बड़े बूढ़े तक उसकी चक्करबाजी के जाल में फँस जाते। अपनी बातचीत की इसी तेजी के चलते नौजवानों का सहारा लेकर गाँव का सरपंच बन बैठा। गाँव के सभी कायदे कानून पीछे रह गए कि किसी बड़े बुजुर्ग को ही सरपंच होना चाहिए। लोकतंत्र में गुंडे बदमाश बहुत काम आते हैं। पंचायत के चुनावों में बस वही वोट डालने जा पाए जिन्हें बृजबिहारी के गुंडों ने जाने दिया। उसके बाद से आजतक कोई भी उसे सरपंच की गद्दी से हटा नहीं पाया। गाँव के बुजुर्ग कभी कभी सर जोड़ कर बैठते और गाँव के अच्छे दिनों को याद करके आहें भरते। और फिर अपने बूढ़े शरीर को घसीटते हुए घर की ओर जाती हुई पगडंडियों में गुम हो जाते। जब कभी किसी ने बृजबिहारी के खिलाफ आवाज उठाई, उसकी ऐसी बेइज्जती होती कि सामने वाला शर्म से मर मर जाता। सच बोलने वाला मुजरिम बन जाता और गुनाहगार बृजबिहारी अपनी राजगद्दी पर बेशर्म मुस्कुराहट बिखेरता रहता।

उसकी इसी बेशर्मी ने शब्बो तक को न छोड़ा था। शराब के नशे में शब्बो भी खूबसूरत लगती होगी, तभी तो एक दिन गाँव की दाई को बुला कर शब्बो को उसके हवाले करते हुए कहा, "देख दाई अम्मा! यह गाँव की छोरियाँ कहाँ कहाँ से सामान उठा लाती हैं! अब मैं किन किन बातों का ख्याल रख सकता हूँ।"

शब्बो सब सुन रही थी। खामोशी से दाई अम्मा के पीछे पीछे चली गई। मगर चार दिन बाद ही लौट आई। अब वह भीगी बिल्ली नहीं घायल शेरनी लग रही थी। गाँव वालों के सामने सरपंच की लंबी नाक काटने को तैयार। वह चिल्लाए जा रही थी, "सरपंच जी तुम तो गाँव वालों के माई बाप हो। अब इस अबला को अपनी पत्नी बनाओ। भला इस अभागन से अब कौन शादी करेगा?"

सरपंच घबरा गया। हमेशा एक वार से दो काम निकालने वाला बृजबिहारी लगभग स्तब्ध चकित था। एक लंबे अर्से बाद उसने अपने आपको मजबूर महसूस किया था। हर परेशान औरत से चुंगी वसूल करता था। फिर मामले की तह तक पहुँच कर ही रुकता। मगर यह शब्बो तो पूरी ततैया निकली। जिस्म पर चिपक कर खून चूसने लगी। मगर बृजबिहारी ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थीं। उसके दिमाग मे एक तरकीब आई और होटों पर मुस्कुराहट। सामने दिखाई दिया मिट्टी का माधो - मदन मोहन! अरे दिमाग में पहले यह क्यों नहीं आया? कुरबानी का बकरा सामने खड़ा है और सरपंच परेशान! यह जरूर बात मान जाएगा और शब्बो से शादी कर लेगा। यही सोच कर उसने मीना से शब्बो की शादी की बात चलाई थी।

और मीना इस शादी की बात सुन पीली पड़ गई थी। चुप! कोई जवाब नहीं। शब्बो बेचैन - बृजबिहारी के इर्द गिर्द भिनभिना रही थी। पहली बार बृजबिहारी की कमजोरी उसके हाथ लगी थी। मगर जब बृजबिहारी ने मदन मोहन के साथ शादी की रिश्वत दी तो शब्बो खिल उठी। उसकी मर्दानगी को वह हमेशा ही ललचाई नजरों से निहारा करती थी। उसे लगा कि अब तो भाग्य खुल गए। सारे गाँव नाची नाची फिरी। न्यौता भी आप ही बाँटना शुरू कर दिया।

शब्बो की छोटी बहन नकटो ने जब शब्बो की यह आन बान देखी तो वह भी घुस गई सरपंच जी की सेवा करने। ऐसी घुसी की कई दिनों तक बाहर ही नहीं निकली। कुछ गाँव वाले बातें भी बनाने लगे थे कि आखिर यह सब क्या हो रहा है। मगर ऐसे भी थे जो सरपंच को परमेश्वर का रूप मानते। नकटो उनके हिसाब से पुण्य कमा रही थी। सरपंच को जब कोई नया शिकार मिलता, तो बस खुद ही पकाता और खुद ही खाता। वैसे कभी कभी कुछ बचा खुचा अपने उन साथियों के सामने भी फेंक देता जो मुँह से लार टपकाते शिकार को निहारते रहते। और फिर साथियों पर रोब गाँठता, "भाई हम अकेले कभी नहीं खा सकते। बाँट कर खाने का मजा ही अलग है।"

सब कुछ समझते हुए भी साथी लोग चुप रह जाते। ऐसा बहुत बार होता कि कोई नई लड़की या औरत दिखाई देती और बृजबिहारी तीन चार या अधिक दिनों के लिए अपने कमरे में बंद हो जाता। और फिर जब बाहर आता तो पंचायत लगा कर बैठ जाता। ऐसा चीखता चिंघाड़ता जैसे बाहर बैठे रातों दिन काम करने वाले तो ऐश कर रहे थे और वह नकटो जैसी किसी के साथ बंद कमरे में उसकी टूटी नाक गढ़ रहा है। सभी साथी सब कुछ समझते थे मगर बस अपनी भाग्य रेखाओं से नाराजगी व्यक्त कर लेते।

जब गाँव वालों तक खबर पहुँची कि बृजबिहारी मदन मोहन का विवाह शब्बो के साथ करवाने पर तुला हुआ है तो वे भौंचक्के रह गए। क्या अन्याय है! कितना जुल्म है? बेचारे मदन मोहन ने ऐसा कौन सा पाप कर दिया था जिसकी इतनी बड़ी सजा उसको दी जा रही है। कितनी सेवा करता है बेचारा सरपंच जी की और इसका यह बदला!

मीना अपने बेटे के लिए गाँव भर से खुशामद करती फिरी। उसके बेटे को सरपंच की हवस की भेंट चढ़ाया जा रहा था। कोई तो उन पर दया करके बृजबिहारी से बात करे। शब्बो से शादी की खबर सुन कर मदन मोहन जैसे मनो बोझ के नीचे दब गया था। मगर वहाँ तो सब बृजबिहारी के क्रोध से डरे हुए थे। इनसाफ माँगे तो कौन? शब्बो के अतिरिक्त भला किसमें दम था कि बृजबिहारी के विरुद्ध आवाज उठा सके। भला वह क्यों कुछ कहती। उसके ही तो मन की कर रहे थे सरपंच महाशय। वह कब से अपनी छोटी छोटी धँसी हुई आँखें लगाए हुए बैठी थी। वह अपने होने वाले विवाह के लिए खुद ही कभी दर्जी के पास पहुँच जाती तो कभी रंगरेज के पास।

उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कोई भी उसकी खुशी में शामिल होने को तैयार नहीं हो रहा था। सब मदन मोहन के शोक में संतप्त थे। सबके मुँह पर एक ही बात - बेचारा बेमौत ही मारा जाएगा। शब्बो जब खुशी में दाँत निपोरती तो पायोरिया से ग्रस्त मसूढ़े पूरी फिजाँ में बदबू फैला देते। मगर उसे क्या फर्क पड़ता। वह हर वक्त गुनगुनाती और ठुमक ठुमक इधर से उधर फुदकती रहती। सुनार के पास जाकर माथे का टीका अपनी छोटी सी पेशानी पर सजा कर देखती। घुँघराले काले बाल छप्पर की तरह चेहरे के चारों तरफ छा जाते। छोटी गर्दन, तंग पेशानी, बाहर को निकले दाँत जैसे डार्विन की थ्योरी का शाहकार मालूम होती थी।

मदन मोहन अभी तक कुछ समझ नहीं पा रहा था। सारी उम्र गधा बन कर सेवा की सरपंच की। बाप समान माना। कभी कभी अपने मन को समझाने लगता कि सरपंच भी उसे प्यार करता है। नहाने के लिए खुशबूदार साबुन और साल भर में दो जोड़े कपड़े भी लेकर देता है। और आज तो सरपंच ने बहुत से नए कपड़े बनवा कर दिए हैं। नया जूता भी। जी चाहता है कि इसी नए जूते से सरपंच की सेवा करे। अब तो शादी का दिन सिर पर खड़ा है।

दुल्हन बनी शब्बो के लिए समय काटना मुश्किल हो रहा था। वह बेचैन थी मदन मोहन को दुल्हे के रूप में देखने को। पंडित जी ने पूजा शुरू कर दी। मदन मोहन को आवाज दी। मगर वह घर में होता तो आता ना। किसी ने बताया कि उसने मदन मोहन को शाम के समय बरगद वाले मंदिर की तरफ जाते देखा था। एक एक कर सभी लोग उठ कर घरों को वापिस चलने लगे।

अब शब्बो भी थकने लगी थी। बृजबिहारी भी अभी तक नहीं पहुँचे थे। शब्बो ने अपने दुल्हन के परिधान की चिंता नहीं की... बस उठी और चल दी सरपंच के घर की ओर।


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