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कहानी

साँकल
ज़किया ज़ुबैरी


क्या उसने अपने गिरने की कोई सीमा तय नहीं कर रखी?

सीमा के आँसुओं ने भी बहने की सीमा तोड़ दी है...। इनकार कर दिया रुकने से...। आँसू बेतहाशा बहे जा रहे हैं...।

वह चाह रही है कि समीर कमरे में आए और एक बार फिर अपने नन्हें मुन्ने हाथों से सूखा धनिया मुँह में रखने को कहे, ताकि उसके आँसू रुक सकें। बचपन में ऐसा ही हुआ करता था कि समीर माँ की आँखों से बहते हुए आँसू देखकर बेचैन हो उठता और लपक कर मसालों की अलमारी के पास पहुँच जाता, उचक उचक कर मसाले की बोतलें खींचने लगता; पंजों के बल खड़े खड़े जब थक जाता तो कुर्सी खींच कर लाता और ऊपर चढ़ कर बोतल में से धनिये के बीज निकाल कर माँ के मुँह में डाल देता कि माँ की आँखों से प्याज काटने से जो आँसू बह रहे है वे धनिया मुँह में रखने से रुक जाएँगे।

सीमा मुस्करा देती समीर की मासूमियत भरी मुहब्बत पर। वो शरमा जाता। माँ की टाँगों से लिपटते हुए कहता मैंने सूजी आंटी को कहते हुए सुना था जब आपके साथ आपके बाल बनवाने गया था। माँ खो गई है वक्त के उन सुहाने सपनों में जब समीर हर समय सीमा के साथ ही रहना चाहता था।

"माँ! मैं डरता हूँ कहीं आपको कुछ हो ना जाए इसी लिए मैं आपके साथ साथ आता हूँ।" ये कहकर वो अपने प्यारे प्यारे हाथों से सीमा के मुँह को पकड़ कर अपनी तरफ मोड़ लेता।

आज उन्ही हाथों ने उसके बदन... उसके दिलो दिमाग को चूर चूर कर दिया है। नील के निशान ने उसकी तीस वर्षों की तपस्या को तार तार कर दिया है। नील का निशान तो समय के साथ धुँधला होकर मिट जाएगा पर मन पर लगा ये झटका... ये जख्म कैसे भरेगा...। रिसता रहेगा। क्या यह मेरे दिए हुए संस्कार हैं? सीमा कुछ समझ नहीं पा रही - बिल्कुल ब्लैंक हो गई थी।

समीर घर में केवल अपने पिता से डरता था। बच्चों को डराना सीमा की प्रकृति में शामिल नहीं था। बस यही जी चाहता था कि हरदम दिल में समाय रक्खे अपने बच्चों को...। खासतौर से समीर को... एक ही तो बेटा था, वो भी बीच का, निग्लेक्टेड... सैंडविच बना हुआ... बहनें तंग करतीं तो जवाब में उनसे बढ़ चढ़ कर वो परेशान करता। बड़ी वाली तो सह लेती पर छोटी इतना चिल्लाती कि सँभालना मुश्किल हो जाता और फिर समीर की धुनाई तो पक्की होती। वो भी... पक गया था मार खा खा कर। मार तो उसको पड़ती पर चोट - चोट हमेशा सीमा को लगती। धड़ाधड़ शीशे के बरतन जब बरसना शुरू होते तो... कभी हाथों और दुपट्टे के पल्लू से समीर का सिर छुपाती तो कभी कोहनियाँ ऊँची करके उनके पीछे अपना मुँह बचाती।

समीर को अपनी छाँव में लेकर भागती तो पीछे से एक जूता उसकी कमर पर पड़ता। वह जूते की चोट को सह जाती। उसे संतोष इस बात का होता कि जूता उसके पुत्र के शरीर तक नहीं पहुँच पाया।

"माँ आप कान्फ्रेंस में जाएँगी ना?"

"हाँ, सोच तो रही हूँ"

"कब से शुरू है कान्फ्रेंस?"

"२४ सितंबर से।"

"आप कितने दिनों के लिए जाएँगी?"

"हमेशा के तरह तीन रातें चार दिन। मगर मैंने अभी फैसला नहीं किया है कि जाऊँगी या नहीं।" सीमा ने जवाब दिया

"माँ आपको अवश्य जाना चाहिए अगर एक बार सिलसिला टूट गया तो फिर आप आइंदा भी नहीं जाना चाहेंगी।" समीर ने इतने अपनेपन से कहा कि सीमा ने उसी समय फैसला कर लिया कि समीर ठीक ही तो कह रहा है। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचकर बहुत से काम समय से पहले ही छोड़ दिए जाते हैं। सीमा वक्त से पहले बूढ़ी नहीं होगी...। वो हमेशा कहती थी कि उम्र को रोकना और आगे बढ़ाना बहुत कुछ अपने ही हाथ में होता है। उसने फैसला कर लिया कि वह कान्फ्रेंस में अवश्य भाग लेगी।

सीमा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह लेबर पार्टी की कान्फ्रेंस में आई थी या अमीरों की पार्टी में...! हर पॉलिसी ओल्ड लेबर से हट कर न्यू लेबर को छूती हुई टोरी पार्टी की गोद में जा बैठी थी। सीमा उकताने लगी थी...। आखिर क्यों आ गई? क्या सब कुछ बदल जाएगा... क्या हर अच्छी चीज इसीलिए बदल जाएगी क्योंकि बदलाव जीवन की सच्चाई है...?

"अरे माँ आप वापिस भी आ गईं? अभी तो कान्फ्रेंस चल रही है। सुबह टी.वी. पर दिखा भी रहे थे।" समीर उस दिन काम से आया तो माँ घर में मौजूद थी।

माँ ने देखा...। पुत्र के साथ एक युवती भी थी। जाहिर है उसकी आँखों में एक सवाल उभरा जो जबान तक नहीं आया। मगर पुत्र को सवाल समझ में आ गया।

"माँ इससे मिलो ये... नीरा है।"

"हेलो नीरा...!" माँ ने पूछा, "कुछ खाओ पियोगे तुम लोग, या फिर बाहर से खा कर आ गए हो?" सीमा को बाहर खाना बिलकुल पसंद नहीं था। वह स्वास्थ्य की खराबी के लिए हमेशा बाहर के खाने को ही दोष देती थी। खाना घर का और ताजा पका होना जरुरी है। वह स्वयं तो शाकाहारी थी। पर दूसरों को केवल रेड मीट खाने से रोकती थी। मगर उसकी सुनता कौन था? पति देव तो दोनों समय रेड मीट ही खाते थे। बीफ के बहाने अपनी अम्मा को भी याद किया करते थे कि क्या कबाब बनाती थीं बस मजा आ जता था... उफ... बीफ...! सीमा अपने होठों को भींच लेती... साँस रोक लेती कि कहीं उसको बीफ की महक ना आ जाए?

"येस मामा डार्लिंग हम खा ही कर आए हैं क्योंकि आप तो थीं नहीं इसीलिए बाहर ही खा लिया था...।"

सीमा आज की पीढ़ी के मिजाज को समझती थी इसीलिए प्रश्न हमेशा सोच समझ कर पूछा करती थी। अब ते जमाना ही बदल गया था। पहले बच्चे अपने माँ बाप से प्रश्न पूछते डरते थे। आजकल माँ बाप एहतियात बरतते हैं।

फिर भी सीमा ने समीर को करीब बुलाकर मालूम करना चाहा ये नीरा कौन है और रात को घर में क्यों लाया है। क्या उसे अभी वापिस भी ले जाना है...?

"माँ रात को यहीं सो जाएगी...।" समीर ने थोड़ा झिझकते और आवाज को काफी गंभीर बनाते हुए उत्तर दिया।

सीमा उसके और करीब आ गई और तकरीबन सरगोशी करते हुए बोली, "मुझे ये पसंद नहीं है और अगर वापस आकर तुम्हारे पिता सुनेंगे तो मुझ पर बहुत नाराज होंगे।"

"वो आएँगे तो ये चली जाएगी...।"

"नहीं बेटे हमारा यह कल्चर नहीं है। यहाँ तुम्हारी बहन के सात आठ वर्ष के बच्चे आते हैं वो क्या समझ पाएँगे इस रिश्ते को उनको क्या बताया जाएगा।"

"माँ दिस इज नॉट माई प्रॉब्लम...!"

सीमा ने उसी समय समीर की आवाज और चेहरे के भाव पढ़ लिए थे। 37 वर्ष से झेल रही थी समीर के दोहरे उसूलों को।

जहाँ माँ और बहनों का मामला होता फौरन देसी बन जाता और अपने मामले में पश्चिमी मूल्य रखता।

सीमा सब सह लेती... उसके दिमाग में समीर के बचपन की पिटाई की यादें छपी हुई हैं... उसको दया आ जाती और वो चुप हो जाती पर उसने कभी ये नहीं सोचा था कि उसके ये फैसले समीर के लिए कितने हानिकारक हो सकते हैं वो तो माँ के स्नेह से लबालब थी... पुत्र की कमजोरियाँ भी स्नेह के आगे दब जातीं।

सीमा ऊपर पहुँची तो मालूम हुआ के उसके कंप्यूटर पर तो नीरा का राज है। इसके मतलब हुए जिस दिन वो गई उसी दिन नीरा आ गई होगी... तो फिर क्या... नहीं नहीं समीर ऐसा नहीं है...। उसने नीरा को दूसरे कमरे में शिफ्ट करना चाहा तो समीर आ पहुँचा ।

"माँ इसे रात को नींद नहीं आती तो आपका कंप्यूटर यूज करती है।"

"बेटे मेरा कंपनी का कंप्यूटर है मैं नहीं चाहती इसको कोई और भी हाथ लगाए।"

"कम ऑन माँ...।"

सीमा ने कहा, "अच्छा आज रहने दो मैं भी थकी हुई हूँ और कल तो यह चली ही जाएगी।"

"नहीं माँ इसका रहने का कोई बंदोबस्त नहीं है।"

"अरे तो फिर कहाँ से उठा लाए हो?" सीमा ने नाराज होते हुए पर आवाज को बिना ऊँचा किए पूछा। सीमा को हमेशा से नफरत थी ऊँची आवाज में गुस्सा करने से। उसका ख्याल है जब कोई गलत बात को सही बात साबित करना चाहता है तभी जोर जोर से बोलने लगता है। और फिर आगे वाले की भी तो कोई इज्जत होती है चाहे बड़ा हो या छोटा...! अक्सर उसका पति सोचता कि सीमा चिल्लाकर एक्सप्लेन नहीं कर रही तो इसके मतलब हैं झूट बोल रही है। सीमा सोचती इस बात में अवश्य परवरिश का हाथ होता है। कैसे माहौल में कौन पला है ऐसे ही क्षणों में असलियत मालूम हो पाती है।

वो अपने कमरे में सोने चली गई।

तीन दिन की कान्फ्रेंस ने थका दिया था कुछ तो दुखी कर देने वाली नई राजनीति थी, बिलकुल दक्षिणपंथी दल होने का अनुभव होने लगता है। मैंने इसलिए तो नहीं इस पार्टी कि मेंबरशिप ली थी...!!

वह बोर होकर पहले ही चली आई थी और यहाँ आकर भी उसे दुख ही हुआ था। औरत जिधर जाती है उधर दुख ही झेलने पड़ते हैं। समीर के बारे में सोचने लगी। कहता है कि जब बाप आएगा तो नीरा यहाँ से चली जाएगी। तो क्या वो ये सोच रहा है कि उसकी माँ को ये तौर तरीके पसंद हैं। वो फिर घबराने लगी कि कल वीकेंड है। बिटिया और दोनों बच्चे आएँगे, दामादजी तो छुट्टी वाले दिन भी काम करते हैं। ससुर के ऊपर तो वो पड़ गए हैं। सीमा ने भी छुट्टी का दिन पति के साथ कभी नहीं बिताया था। वो वीकेंड घर में रुक जाते थे तो ऐसा लगता जैसे बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। पूरे दिन टीवी के सामने आरामकुर्सी पर लेटे नखरे दिखाते रहते और सीमा नखरे उठाने की तो मशीन बन चुकी थी।

नखरे तो सभी उठवाते थे क्योंकि उसका कुसूर था पति का कहना मानना और हर तेरहवें महीने एक नया सा प्यारा सा मॉडल पैदा कर देना। बेटे की बारी में भी सीमा को मैनेजर के साथ ही भेजा था, पहले चैक-अप के लिए। उसको कितनी शर्म आ रही थी की डॉक्टर समझेगी की मैनेजर ही आने वाले बच्चे का बाप है। हुआ वही जिसका डर था... अपने पति को भी अंदर बुला लो। डॉक्टर ने कहा था। हालाँकि मैनेजर उसके पति से अधिक जवान और खुशमिजाज था पर सीमा को ये रिमार्क अच्छा नहीं लगा। वो उसी समय बहुत कुछ सोचने पर मजबूर सी हो गई। शर्मिंदा तो मैनेजर भी था। वो कब चाहता था कि उससे बड़ी उम्र की महिला को उसकी पत्नी समझा जाए।

मैनेजर ने सीमा से पहले ही साहब को जाकर खुशखबरी दे दी थी कि बेटा है तो सुना कि वो खुश हुए थे। उतने ही खुश वो आज भी थे बेटे से...!

बच्चा पैदा करने सीमा बड़ी बहन के पास भेज दी गई थी।

वहाँ भी घर में अकेले ही समय काटना होता क्योंकि बहन डॉक्टर थीं। फिर भी वो खुश थी कि जब बेटा लेकर जाएगी तो सब कितने खुश होंगे और शायद बेटे से खेलने के लिए पति भी जल्दी घर आ जाया करेंगे।

बेटा हुआ तो सीमा की टेल-बोन उखाड़कर आया। 6 महीने तो बिस्तर ही में पड़े पड़े बेटे की देखभाल की। सारी रात रोता था। सीमा अकेले जाग जागकर साथ साथ आप भी रोने लगती थी। कितना अच्छा होता था पुराने जमाने में कि परिवार का हर बच्चा सबका बच्चा समझा जाता था। सभी मिल-जुलकर पाल लिया करते थे। अब तो सभी कुछ बिखर गया था।

आज उस नील की जलन उस हड्डी के दर्द से कहीं अधिक महसूस हो रही है जो समीर के पैदा होने पर उखड़ी थी। दूसरे कमरे में खटपट की आवाज होती तो सीमा को आशा बंधती कि शायद अब बस समीर आकर अपनी मजबूत वार्जिशी बाँहों में माँ को सँभालेगा और शर्मिंदगी के आँसू बहाएगा... माँ के आँसुओं के साथ। और उसका दर्द उसकी जलन सब ठीक हो जाएगा।

मगर वो तो बैठा उस जवान लड़की की दिलजोई कर रहा था और एक्सप्लेन कर रहा था कि आज जो कुछ भी हुआ वो माँ की उम्र ज्यादा हो जाने और काम बढ़ जाने के साथ ही अधिकतर अनुचित व्यवहार की आदत पड़ जाने के कारण हुआ है। वो आइंदा ख्याल रखेगा कि घर का माहौल ठीक रहे। नीरा धीरे धीरे मद्धम सुरों में उसके कान में रस घोलती जाती और वो और अधिक माँ के जहालत भरे व्यवहार से शर्मिंदा होता जाता।

आज सीमा को जिल की बहुत याद आई। कितनी सुशील और कितनी घरेलू नीली आँखों वाली अंग्रेज लड़की थी वो। लगता ही नहीं था कि इस देश कि पैदाइश हो। समीर से कितना प्यार करती और सीमा से अक्सर कहती, 'सीमा, युअर सन इज सो हैंडसम। इट वाज लव ऐट फर्स्ट साइट।'' सीमा उसकी चुटकी लेने को कहती ''ऐसा तो कोई हैंडसम नहीं, तुम्हारी नजर ही कमजोर होगी...!' वो सीमा से लिपट जाती, आप कितनी शैतान हैं...!!'' सास बहू के ये मजाक चलते रहते। सीमा खूब जी भरकर प्यार से अपने बेटे को देखा करती कि सच ही तो कहती है जिल, है तो सुंदर मेरा बेटा। जिल को समीर कि गहरी आवाज और सही अंग्रेजी बोलने का अंदाज भी बहुत अच्छे लगते। वो इस बारे में भी सीमा से बेधड़क बात करती।

सीमा सोचती मैंने कितना अच्छा किया जो पति के विरोध के बावजूद भी शादी होने दी इन दोनों बच्चों की। उसने पति के सामने पहली बार जीवन में मुँह खोला था कि समीर को वही करने दिया जाए जो वह चाहता है क्योंकि अब तो वो नौकरी कर रहा था। एक फ्लैट भी खरीद लिया था शहर के बीचोबीच, टेम्स के किनारे। किराए पर दे रखा था। सीमा को कितना गर्व होता अपने सुंदर बेटे पर कि वो केवल सुंदर ही नहीं है समझदार भी है। कैसे पिटा करता था बेचारा...! एकदम से सीमा उदास हो जाया करती और दुआ करती कि हे भगवान अब मेरे बच्चे को कभी भी ऐसे दुख ना देखने पड़ें... जो झेलना था उसने बचपन में झेल लिया है।

कभी कभी तो वो भगवान को चुनौती भी देने लगती कि खबरदार! ...अब मेरे प्यारे बेटे को अपनी शरण में ही रखना वरना...! आप ही मुस्कुरा देती। हे! प्रभू यह औलाद भी क्या बला होती है।? क्यों इतना प्रेम होता है इनसे...! ये जवाब में तो कुछ भी नहीं देते फिर भी बुरा नहीं लगता। इनके दुर्व्यवहार भी भुला दिए जाते हैं।

पर पति की चोट तो हमेशा जिंदा रहती है। मैं क्यों ना याद रखूँ मेरी औलाद थोड़ी है मेरा पति। उनकी माँ तो सब भुला देती थीं। उसके यहाँ तो पूरा परिवार साथ ही रहता था। कैसे कैसे चिल्लाते थे उसके पति अपनी माँ पर। वोह भी खूब चिल्लाती थीं। ऐसा लगता था जैसे पक्के गाने का अभ्यास हो रहा हो। दोनों में से पहले जो तीव्र ध और तीव्र नी वाले अंतरे में जाता वही अपनी जीत समझ लेता और सामने वाले को सर पकड़कर बैठ जाना होता। जैसे घोर बरसात के बाद परनाला मद्धम सुरों में बह रहा हो। अम्मा की आँखों से ऐसे ही आँसू बह रहे होते। सीमा उनके पास जाकर बैठ जाती और आहिस्ता से पति की ओर से माफी माँगने लगती। पति ने तो कभी भी माँ से माफी नहीं माँगी थी। वो तो पैसे वाले बेटे थे। माँ ने तो उनको केवल जन्म दिया था। मेहनत तो उन्होंने आप ही की थी बड़ा आदमी बनने के लिए।

बन तो गए थे बड़े आदमी पर संस्कारों का जिक्र तो उनके शब्दकोश में था ही नहीं। मामूली बात थोड़ी थी कि माँ को महीने के पैसे देते थे... तो क्या हिसाब माँगना उनका हक नहीं बनता था! बेचारी अम्मा...! पढ़ी लिखी तो थीं नहीं। हिसाब याद कैसे रख पातीं?

सीमा ने कभी सोचा भी नहीं था कि कभी उसका बेटा बाप के पदचिह्नों पर चलेगा... उन्ही को ठीक और सही ठहराएगा। जिल ये भी तो बड़े गर्व से कहा करती थी, "सीमा मैं कितनी लकी हूँ कि मेरा समीर अपने बाप से बिलकुल अलग है। हर तरह से, सुंदर तो है ही पर खुले विचारों का भी है। उज्जवल है अपने विचारों में। साफ सुथरा।"

आज सीमा का जी अपने से अधिक जिल को याद कर कर के रो रहा था। समीर का अस्थिर मन ना जाने क्या क्या सोचा करता। कानों में शूं शूं कि ध्वनि गूँजने लगी। डॉक्टरों ने टिनिटस बता दिया। "ये बीमारी तो अक्सर लोगों को हो जाती है। बहुत आम है आजकल। अक्सर परेशानियों से होती है।'' जिल ने समीर को तसल्ली देने के लिए कहा और सवेरे जल्दी उठने के ख्याल से जल्दी ही सो गई। वो भी अपनी कंपनी में ऊँचे पद पर काम करती थी औए सवेरे उठ कर समीर का नाश्ता भी बनाती, घर को साफ सुथरा करने के बाद ही घर से निकलती। सीमा को जिल की सारी आदतें बेहद पसंद थीं। इसी लिए सास बहु में गाढ़ी छनती थी। दोनों जैसे सहेलियाँ बन गई थीं। अंग्रेज तो वैसे भी कभी एक दूसरे से उम्र नहीं पूछते... और ना ही उनका पता, उनका पेशा या कौन कौन सी कार चलाता है या कैसे आता जाता है। किसी को किसी की कोई खोज नहीं रहती आपस में। केवल दोस्ती का रिश्ता होता है या नहीं भी होता... तो भी दुश्मनी नहीं होती।

समीर जिल से नाराज रहने लगा था। वो सीमा से कहती ना जाने समीर को क्या हो गया है... देर में घर आता है। पूछने पर कुछ भी नहीं बताता। कभी कभी खाना भी नहीं खाता। मैं ऑफिस से आकर पका कर रखती हूँ। सीमा मैं भी तुम्हारी तरह ही ताजा खाना खिलाती हूँ समीर को। फ्रिज में रखे खाने में तो सारे तत्व मर जाते हैं। पर समीर गरम गरम खाना देखकर भी नहीं खाता। "एक दिन मुझे अपने घर इन्वाइट करो समीर के सामने ही, मैं आ जाऊँगी और सब कुछ आप ही देखकर फिर समीर से बात करूँगी।" परेशान सीमा ने अपनी गंभीर आवाज में कहा।

"अम्मा, उसको मेरा कोई ख्याल नहीं। टिनिटस हो गया है। रातों को नींद नहीं आती। सारी रात पंखा चला कर सोता हूँ। तब कहीं जाकर चैन मिलता है जब पंखे की आवाज कान की शूं शूं की आवाज से ताल मिला लेती है।"

''तो इसमें जिल का क्या कुसूर?" सीमा ने समीर से हैरान होते हुए पूछा।

"पत्नी है मेरी मेरा ख्याल रखना उसका फर्ज है।"

"क्या खाना नहीं बनाती या घर गंदा रखती है या बराबर से कमाकर नहीं लाती?" एक ही साँस में सीमा ने प्रश्नों की बौछार कर दी। वो इस समय एक औरत बनकर दूसरी औरत की ओर से एक मर्द से सवाल कर रही थी। अपने बेटे से नहीं।

''फिर भी, जब मैं रातों को जगता हूँ तो इसको भी जागना चाहिए। ये तो कानों में म्यूजिक सुनने का प्लग लगाकर सो जाती है, गाने सुनते सुनते।'' समीर ने अपनी कड़वाहट एक ही साँस में उगल दी। सीमा सन्नाटे में रह गई। हे राम! बिलकुल बाप, पूरा बाप।! ये क्या हो गया कब हो गया... क्यों हो गया...! मैं तो खुश थी कि अच्छी संस्कारी लड़की से शादी करेगा तो इनसान बना रहेगा। ये तो जानवर का जानवर ही रह गया। बिलकुल खामोश हो गई सीमा।

डॉक्लैंड के अपार्टमेंट के साथ ही टेम्स नदी में खड़ी तमाम किश्तियाँ जैसे डूबने लगी हों। उन किश्तियों में रहने वाले जैसे मदद को चिल्ला रहे हों। उसको जिल की आवाज भी कहीं दूर से सुनाई दे रही थी। सहायता के लिए चिल्लाते हुए। अपने पति की मोहिनी सूरत को आँखें फाड़ फाड़कर एकटक देखते हुए। जैसे आज वो उसके चेहरे के आकार को अपने मन में बैठा लेना चाहती हो। हमेशा के लिए...

"माँ, मैं उसको दो फ्लैट्स, आपके दिए तमाम जेवर और पाँच हजार पाउंड कैश भी दे रहा हूँ। जेवर देने में आपको समस्या तो नहीं होगी क्योंकि आप औरतों को जेवर से बहुत प्यार होता है?"

कितना कड़वा बोलता है, ये मेरा बेटा तो लगता ही नहीं, जैसे बाप कहीं और से ले आया हो...! "मेरा तो जी चाह रहा है मैं उसको अपने जेवर ही नहीं बल्कि अपने हिस्से की जो कुछ भी खुशियाँ रह गई हैं वो भी दे दूँ।" "क्यों ऐसा जी क्यों चाह रहा है। मुझ से रक्तसंबंध है या उससे?'' खून का रिश्ता क्या होता है। उसका क्या महत्व होता है, उसकी क्या अहमियत होती है और दिलों के रिश्ते की क्या, ये बातें तुम नहीं समझोगे।

समीर दफ्तर ही में था तो जिल सीमा के पास आ गई। सीमा से उसके कंधे पर सर रखकर रोने की बाकायदा इजाजत माँगी और सीमा के आँख उठाकर देखने से पहले ही उससे लिपट कर उसके कंधे भिगा दिए। अपने दुख जैसे उसके कंधों पर डाल दिए हों। खामोश बैग उठाया और जाने लगी तो सीमा ने कुछ कहना चाहा, पर वो चली गई।

आज ना जाने उसको जिल क्यों इतनी याद आ रही है।? शायद वो होती तो समीर को समझा लेती पर ये नीरा ना जाने कहाँ से उठा लाया है। मैं इस तरह इसको अपने घर में नहीं रहने दूँगी।

"अगर आप ये समझ रही हैं कि मैं इसके साथ कोई गलत रिश्ता रखता हूँ तो माँ ये बीमार मानसिकता की पहचान है। ये केवल एक दोस्त है। जैसे एक लड़का दोस्त हो। ये परेशान है इसलिए कुछ दिनों के लिए यहाँ ले आया हूँ।"

"तो आजकल बेला कहाँ गई?"

"वो फ्रांस गई हुई है अपने घर वालों के पास।"

"कब तक आएगी?"

"मुझे नहीं मालूम। वहीं बैठकर अपनी थीसिस भी लिखेगी।"

"क्या अब आएगी ही नहीं। सीमा ने डरते डरते पूछा।"

सीमा को ऐसे तो पसंद वो भी नहीं थी। पर कम बुरी थी। जिल उसको बहुत याद आती थी पर कभी भी उसका जिक्र नहीं करती। सोचती समीर को दुख होगा कि माँ मेरी मदद नहीं करना चाहती मेरे लिए दूसरी पत्नी की तलाश में।

समीर अगर परिपक्व दिमाग का होता तो सीमा विवाह के लिए लड़कियों की लाइन लगा देती। पर उसको बेटे पर भरोसा ही नहीं था। कहीं सीमा कि पसंद की लड़की आ गई तो समीर उसके साथ ना जाने क्या व्यवहार करेगा। लव मैरिज का जनाजा तो उठ चुका था।

"माँ आपसे कितनी बार बताया है की बेला ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. कर रही है आप बार बार गलत सवाल क्यों पूछती हैं। वो अपने माँ बाप के पास गई है। अब खाली थोड़ी बैठेगी, जब तक वहाँ है थीसिस लिखती रहेगी।" अच्छी भली डाँट पड़ गई थी सीमा को। हर समय इतनी पढ़ी लिखी और एक्जेक्यूटिव पोजीशन की माँ को कैसा उल्लू समझा करता था।

सिर्फ उल्लू समझता तो भी शायद इतना बुरा ना लगता क्योंकि उल्लू कि फोटो तो निशानी होती है अक्लमंदी की। गधा भी समझे तो भी सीमा बुरा नहीं मानेगी क्योंकि वो भी एक मेहनती जानवर होता है और अपनी ताकत से बढ़ कर काम करता है। समीर उसको एक जढ़ मूड़ नकारा औरत समझता है। जब बचपन में पिटा करता था तो गोदी में घुस घुसकर कहता था अगर आप ना होतीं तो ये पिताजी तो मुझे मार ही डालते। माँ आप भी तो बड़ी पोजीशन पर हैं फिर आप क्यों नहीं थकतीं? आज उसे अपनी माँ में कोई अच्छे गुण दिखाई ही नहीं देते। कैसे सब कुछ बदल जाता है। मेरे अपने ही बेटे में अपने ननिहाल का एक भी गुण नहीं आया... पूरा असर अपने पिता के खून का दिखाई देता है।

सीमा ने सोचा अब स्वयं ही जाकर बरफ निकाले और सेंक करे। शायद कुछ आराम आ जाए। कैंसर के बाद से बाईं ब्रेस्ट के पास का हिस्सा कुछ ज्यादा ही सेंसिटिव हो गया है। बगल से सात लिंफ-नोड्स निकाल दिए गए थे। इसलिए उधर के हिस्से में चोट का असर दुगना होता था। आज तो चोट उधर ही लगी थी केवल जिस्म पर ही नहीं उसके अहम को कितनी बड़ी ठेस लगी थी ये केवल वही जानती थी।

सोचा पहले जाकर कपड़े बदल ले। अब तक तो सब सो गए होंगे। उसको मनाने कोई नहीं आएगा। कपड़े बदलने गई तो बाजुओं को देख कर आँखें मूँद लीं। दोनों बाजुओं पर जैसे काले रंग के बाजूबंद बाँध दिए गए हों। कैंसर वाली तरफ का नील लगभग काला हो चला था। वहीं तो जलन हुए जा रही थी।

वह शर्म से गड़ी जा रही थी कि आज यह नौबत आ गई है कि समीर उस नीरा के कारण उस पर हाथ उठा दे...। अपनी पूरी ताकत उस पर निकाल दी। कैसे दरवाजे के ऊपर रखकर दोनों बाजू भींच दिए थे कि अब रहिए यहीं। बाहर ना निकलिएगा। अगर आपने नीरा की बेइज्जती की तो मुझसे बुरा कोई ना होगा।

सीमा अपने को छुड़वाने के लिए दुहाई देती रही पर ऐसा लगता था जैसे समीर बाप का बदला उससे ले रहा हो। बाप ही की तरह वहशी बन गया था, चेहरा वैसा ही भयानक हो गया था... हाँ वही चेहरा जिसे वह सुंदर कहती रही है... साँस रोके गुर्रा रहा था माँ पर की आपने नीरा को घर से जाने को कहकर उसकी बेइज्जती की है। उसके बदले में वो माँ की इज्जत का जनाजा निकाल रहा था।

बेटी को जब मालूम हुआ कि माँ कान्फ्रेंस से जल्दी आ गई है तो वो भी मिलने चली आई और नीचे किचन में बच्चों को खिलाने पिलाने में व्यस्त हो गई। अगर वह इस समय ऊपर होती तो सीमा तो शर्म से गड़ ही जाती।

वह अभी अपने दुख को ठीक से महसूस भी नहीं कर पाई थी कि दरवाजे पर घंटी बजी। दरवाजा सीमा की बेटी ने ही खोला। सीमा भूल ही गई थी कि बेटी और नाती अभी घर में ही हैं। बाहर पुलिस खड़ी थी। बेटी ने पुलिस को फोन करके बुलवा लिया था। यानी वह सब सुन रही थी। वह यहीं की पली बढ़ी है। इस देश के हक और कानून से पूरी तरह वाकिफ है...। मगर उनके खानदान में पहली बार पुलिस घर में आई थी। सीमा को समझ ही नहीं आ रहा था कि वह पुलिस को क्या कहे। बेटी ने आगे बढ़ कर सारी बात पुलिस को समझा दी।

पुलिस की आवाज सुन कर समीर और नीरा भी नीचे आ गए... समीर घबरा गया... नीरा के जैसे होश ही उड़ गए थे... पुलिस ने सीमा से सीधे एक ही सवाल किया था, "क्या आप अपने बेटे को अभी घर से निकालना चाहती हैं?"

समीर के चेहरे पर बदहवासी देख कर सीमा को ठीक वही महसूस हुआ जैसे वह बचपन में अपने पिता के हाथों पिट रहा हो। उसके भीतर की माँ जैसे टूट रही थी। पुलिस देख कर शायद वह भी बुरी तरह से घबरा गई थी।

उस घबराहट में भी सीमा ने पुत्र को अकेला नहीं छोड़ा, "नहीं ऑफीसर, मेरे बेटे का इस घर पर पूरा हक है। मगर मैं इस आवारा लड़की को इस घर में नहीं रहने दूँगी।"

पुलिस ने समीर को आदेश दिया कि लड़की को उसी वक्त घर से बाहर करे...। नीरा के साथ ही शायद पुत्र और माँ का रिश्ता भी घर से बाहर चला गया था। माँ वही थी... वहीं खड़ी थी।

नीरा को कहीं छोड़ कर समीर घर वापिस आ गया है... घर के ऐशोआराम से दूर रह पाना शायद उसके लिए संभव भी नहीं था...। उसकी नजरों में माँ के प्रति बस एक ही भाव था... सीमा तय नहीं कर पा रही कि वो भाव क्या हैं... शत्रुता... नफरत... या फिर...!!

कभी कहता है आप कान्फ्रेंस में जरूर जाएँ और कभी दोस्तों के साथ बाहर खाना खाने की सलाह देता है... "माँ जब पापा आपको नहीं ले जाते तो आप खुद जाना शुरू कीजिए..." और आज जब माँ ने उसको नीरा के साथ कमरे में अँधेरे में बंद देखकर समझाना चाहा तो जो मुँह में आया बकता चला गया... बाजारू जबान...! बिल्कुल बाजारू...!

भला कौन अपनी माँ को छिनाल कह सकता है... अपने यारों के साथ घूमती हैं... क्या फर्क रह गया पति और बेटे में... वो भी तो अपनी कमजोरियाँ छुपाने के लिए यही इल्जाम लगाता रहा है... समीर की जबान की कटुता की चोट जितनी गहरी लगी थी उतना तो बाजुओं पर पड़े नील के निशान का दर्द भी नहीं चुभ रहा था... अपनी जवानी का एक एक क्षण... एक एक कतरा... इकलौते बेटे के नाम लिख दिया था... सोचती थी कि बाप के वक्त की भरपाई भी वह ही करेगी। आज इस उम्र में... माँ पर इतना बड़ा आरोप...!

बेटी रात को घर में ही रह गई है। वह और उसका पति अपने पिता के कमरे में आराम से सो रहे हैं... सीमा शरीर के दर्द से लड़ रही है... आत्मा के घाव सहला रही है... मुँह में धनिये के बीजों का स्वाद है मगर दिल में एक डर भी है... कहीं अपने गुस्से में समीर उसकी हत्या तो नहीं कर देगा? ...नहीं ...नहीं... यह नहीं हो सकता... आखिर पुत्र है। भला ऐसा कैसे कर सकता है। मगर दिल का डर उसे सोने नहीं दे रहा। बिस्तर पर करवटें बदल रही है...

एकाएक बिस्तर से उठती है सीमा और भीतर से कमरे की साँकल चढ़ा देती है।


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