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कहानी

ढीठ मुस्कुराहटें...
ज़किया ज़ुबैरी


"अरे भई रानी मेरी एड़ी को गुदगुदा क्यों रही हो... क्या करती हो भई... ये क्या हो रहा है... यह गीला गीला क्या है... अरे अब तो जलन भी हो रही है... उठो जागो भी, देखो क्या हो गया है...!"

रानी ने अंगड़ाई लेते हुए करवट बदली और फिर से मुँह ढक कर सो गई।

सरजी बोलते रहे, बड़बड़ाते रहे... कराहते भी रहे... रानी खिदमत कर कर के तंग आ चुकी थी। छोटी सी बीमारी को पहाड़ बना दिया करते थे सरजी। मगर आज शायद सचमुच तकलीफ में थे। एक बार फिर जोर से आवाज लगाई, "रानी सुन नहीं रही हो...? मैं तड़प रहा हूँ, ...दर्द और जलन से जान निकल रही है।"

रानी एक झटके से उठी और एड़ी से चादर उठाई तो देखा खून रिस रहा था और एकाएक वहाँ से एक चूहा कूद कर भागा। रानी चीख पड़ी... घिघी बँध गई उसकी। "सरजी चूहा... चूहा... सरजी ...वो भागा चूहा... वो... भा...गा... लगता है उसी ने काटी है आपकी एड़ी..."

यह सुनते ही सरजी ठंडे पड़ गए... बदहवासी में कुछ भी अनाप शनाप बकने लगे... "रानी डॉक्टर को बुलाओ... नौकरों को आवाज दो... और हाँ हर तरफ झपट लगवा दो एक चूहा भी नजर न आए हमारे घर के आस पास... जरा मेरी एड़ी को भी तो देखो... कुछ करो जल्दी से... चूहे का काटा तो खतरनाक होता है... जहर फैल जाता है!"

डॉकटर के इंजेक्शन के बाद जब तूफान थोड़ा थमा, तब कहीं जा कर रानी को कुछ सोचने का अवसर मिला। उसने अपने पति की ओर देखा... दोबारा गहरी नींद सो गए थे... वे विवाह के पहले दिन से ही उसके लिए 'सर जी' बन गए थे जो कि वक्त के साथ चलते चलते 'सरजी' में परिवर्तित हो गया था। रानी को बहुत शौक था कि उसका पति उसका मित्र बन जाए, किंतु दोनों की आयु में दस वर्ष का अंतर आड़े आ गया।

अचानक रानी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभर आई। उसके जहन में खुरच खुरच कर यादें अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने लगीं। उसकी बद्दुआ पर सरजी कैसी खलनायकी हँसी हँसे थे। रानी के दिल-ओ-दिमाग पर यह बात कहीं बैठ गई थी कि चूहे का सरजी के जीवन में अवश्य ही कोई ना कोई विशेष स्थान बनेगा। सलोनी उसके दिमाग को मथने लगी थी...

उस दिन घर में उसे कुछ ऐसी आवाजें सुनाई दी थीं...

"साली...! हरामखोर...!"

"मैं तो कहता हूँ... क्या कहा...? ...आवाज नहीं आ रही? ...ठहरो मैं जरा खिड़की के पास जाता हूँ... ये साले मोबाइल भी मनमानी करते हैं...। हाँ... अब बोलो... आवाज साफ हो गई है... वोह मोटी भैंस हो गई है... बकती है... धंधा खूब चल रहा है ...मुहल्ले भर के लोग उसी की परचून की दुकान से सौदा सुलुफ खरीदते हैं... नहीं यार ऐसा नहीं... उसका बेटा उल्लू का पट्ठा है... काहिल-ए-आजम... माँ को इस्तेमाल कर रहा है...। नहीं भाई कितनी बार बताया कि कर्जा लेने दोनो साथ आए थे...। वो मक्कार तकरीबन पाँव पकड़ने ही वाली थी... वो तो मैंने ही पाँव हटा लिए... मेरे तो जूते ही गंदे हो जाते...। अरे तुम फोन पर हो या फिर कट गया? ...ये साले फोन भी..."

"सर यह बताइए कि अब करना क्या है?"

"करना क्या है... पकड़ो साली को। अरे भाई अढ़ाई लाख का मामला है...। नहीं देती तो पुलिस को डालो बीच में। पुलिस अढ़ाई के पाँच निकलवा लेगी। तब होश आएँगे ठिकाने... हरामजादी के। नहीं नहीं वहाँ की पुलिस नहीं... यहाँ का इन्स्पेक्टर मेरा जानने वाला है... हाँ, मैं उस से बात करता हूँ। बड़ा जालिम और रिश्वतखोर है...। तुम फोन बंद करो..."

"इन्स्पेक्टर साहब, यार तुमको इससे क्या मतलब कि कितना बड़ा बैंक है? तुम अपना हिस्सा उसी से हासिल कर लेना। हाँ! मेरी तरफ से खुली छूट है।"

"फिर तो मैं सर, अगले हफ्ते ही आपके पैसे निकलवा लूँगा।"

"अब मियाँ, इतनी भी डींग ना मारो! हमने पूरी कोशिश करके देख ली है। तुमको कोई सख्त कदम उठाना होगा। आसानी से मानने वाली नहीं है।"

"...अरे क्या बात करते हो। चूड़ियाँ पहन रखी हैं क्या तुमने?"

"नहीं सर, हम तो सीधे उसके घर पहुँच गए थे। बाहर निकाला उसे... डराया, धमकाया। मगर वो तो पैर ही पकड़ने लगी। कहती है कि कर्जा ये कह कर लिया था कि साल भर बाद उतारना शुरू करेंगे। अभी तो छह हफ्ते ही ऊपर हुए हैं और बड़े साहब पीछे पड़ गए हैं। मैनेजर को रोज रोज भेज देते हैं। ऐसा लगता है जैसे उसके पास और कोई काम ही नहीं। रोज मेरे घर आकर बैठ जाता है। मैं तो उसके आने से ही डर जाती हूँ। उसकी नजर अच्छी नहीं है इन्स्पेक्टर साहब।"

"ओए सुन जनानी। मेरी तरफ देख... मेरी नजर कैसी है? मैं तो तुझे ऐसा पेलूँगा कि तू जिंदगी भर देखती ही रह जाएगी।"

इन्स्पेक्टर ने वापिस आ कर साहिबजी को पूरी रिपोर्ट दी अपनी पहली मुलाकात की। जनरल मैनेजर साहब को प्रभावित करने के लिए एक एक डॉयलॉग को कई कई बार दोहराया।

इन्स्पेक्टर साहब पहली ही मुलाकात में आने वाले कल का प्रोग्राम बना बैठे थे। सलोनी की टखने तक चढ़ी गुलाबी शलवार में से मोटी मोटी गोल पिंडलियाँ झाँक रहीं थीं - वो भी गुलाबी गुलाबी। पैर मोटे मोटे गद्देदार डबल रोटी जैसे; मगर खुरदरे खुरदरे। मोटे मोटे नाखून; गहरी लाल नेल पॉलिश - शायद साल भर पहले लगाई थी। अब दीवार के चूने की तरह जगह जगह से उखड़ी हुई थी। लगता था कि इन पैरों को जीवन में कभी भी झाँवे से नहीं रगड़ा गया हो। टेढ़े मेढ़े नोकीले मैल भरे मोटे मोटे नाखून।

इन्स्पेक्टर ने बहुत बारीकी से 'सर जी' का काम किया था। उसको खूब अच्छी तरह से निहार लिया था। इन्स्पेक्टर जब चलने लगा तो सलोनी ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, "इन्स्पेक्टर जी दया करो। हम गरीब लोग हैं। गरीबी से तंग आकर कर्जा लेना पड़ गया। मैनेजर साहब ने तो खुद ही कहा था कि बैंक से पैसे लेकर कोई धंधा शुरू कर लो। बड़े साहब से भी उन्होंने ही मिलाया था। अब सब भूल गए कि मैंने धंधा चल जाने पर पैसा वापिस करने का वादा किया था।"

"अरी, धंधे की औलाद, अगर वो धंधा नहीं चलता तो कोई और धंधा कर ले!"

"साबजी, थक गई हूँ।"

"अभी से थक गई है...? अभी तो तुमने मुझे देखा ही नहीं।"

"देख तो रही हूँ, इन्स्पेक्टर साब; विनती भी कर रही हूँ। और क्या करूँ?"

"बेटा कहाँ है तेरा?"

"अंदर घर में बैठा है। बुरी तरह से डरा हुआ है।"

"घर में क्यों बैठा है? काम पर क्यों नहीं जाता?"

"माँ, यह इन्स्पेक्टर जी क्यों आए हुए हैं...?" इतने में बेटे ने बाहर से आते हुए पूछा।

"अरे यह तो बाहर से आ रहा है। तू तो कह रही थी कि घर के भीतर बैठा है।"

"साबजी जमाना ही ऐसा है। बेटों को घर में ना बैठाएँ तो हमको तो गिद्ध नोच डालें।"

"तो तू झूठ बोल रही थी...! मुझसे झूठ? जानती नहीं है, पुलिस का इन्स्पेक्टर हूँ... कमरे में बंद करके सब उगलवा लूँगा... समझी के ना...!"

"सरजी, आप समझे नहीं... अपनी इज्जत बचाने के लिए बेटे का झूठ बोलना पड़ता है।"

"तू क्या समझती है बेटे से मैं डर जाऊँगा? उस पर कोई भी इल्जाम लगा कर चार दिन के लिए हवालात की हवा खाने भेज दूँगा?। अच्छा अब बता सरजी के साढ़े तीन लाख कब दे रही है?"

"इन्स्पेक्टर जी, साढ़े तीन नहीं अढ़ाई लाख...।"

"तो फिर मेरा हिस्सा कहाँ गया...?" कम से कम एक लाख तो मेरा भी बनता है ना। चल अब जल्दी जल्दी बता कि कब उतार रही है कर्जा... या फिर उतारूँ तेरी गुलाबी शलवार?"

"हाय हाय, इन्स्पेक्टर जी, कैसी बातें करते हो? भला शलवार उतारने से क्या पैसे मिल जाएँगे?"

"बहुत जबान चलाती है। जबान काट कर गुलाबी शलवार में डाल दूँगा।"

"इन्स्पेक्टर जी मेरी गुलाबी शलवार के पीछे क्यों पड़ गए हो? मैं कह तो रही हूँ थोड़ा टैम दे दो। मैं एक एक पैसा उतार दूँगी।"

"चल मैं अब चलता हूँ... दो दिन का और टैम दिया... बेटे को काम पर भेजना ना भूलना...।"

...

"सर जी बड़ी दबंग जनानी है। बराबर से जबान चलाती है। मैंने बहुत कोशिश की रुपयों की बात करने की पर घुमा फिरा कर चक्कर देने की कोशिश करती रही।"

"इन्स्पेक्टर अगर तुमको चक्कर देने की कोशिश करती है तो इसका मतलब हुआ मैनेजर सच ही बोल रहा था कि काम की बात पर आने ही नहीं देती।"

"सरजी वो मोटी भैंस अपना नाम सलोनी बताती है।"

"अरे भाई कभी जवानी में रही होगी सलोनी... वैसे अब क्या उम्र होगी उसकी?"

"यही कोई तीस पैंतीस सर जी..."

"ये कैसे हो सकता है... बीस का तो बेटा ही है उसका।"

"चलिए चालीस समझ लीजिए सर जी...। मगर क्या गदराई हुई है सर जी!"

"तुम्हारा दिमाग चकरा गया लगता है इन्स्पेक्टर जो मुझसे ऐसी बातें कर रहे हो। कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई मुझ से इस तरह बात करने की।"

"सरजी आप ही तो उसकी उम्र पूछ रहे थे। मैंने तो बस थोड़ी डिटेल में बता दी।"

"काम की बात करो इन्स्पेक्टर - पैसों का क्या हुआ।"

"सरजी समय माँग रही है, यानि कि वकत माँग रही है। मैंने दो दिन का कह दिया है।"

"क्या पूरे पैसे उतार देगी? ...तुमने माँगे कितने हैं?"

"वही जो आपने कहे थे।"

"अपना हिस्सा मुझसे मत माँगना। बैंक ऐसे वैसे काम नहीं करता।"

"सरजी बैंक तो आप खुद ही हो। यहाँ कौन बैठा है जो आपसे पूछ-ताछ कर सके।"

"ध्यान से बोला करो इन्सेपक्टर... जो मुँह में आता है बोल देते हो। तुम जैसे लोगों के मुँह पर भी तो प्लास्टर लगाना होता है ना... वो काम हमारा बैंक नहीं करता। हमें आप ही फैसला करना होता है कि किसको क्या देना है... भई काम तो निकालना होता है ना।"

"सरजी मेरा हिस्सा तो आप ही को देना होगा। उस कमीनी से तो आप ही के पैसे निकलवाने मुश्किल लग रहे हैं।"

"अरे भाई तुमने माँगे तो होते।"

"सरजी, रोने पीटने लगी। मेरे भी पाँव पकड़ने लगी। मैंने तो एक ठुड्डा भी मारा। गिर पड़ी। मोटी मोटी पिंडलियाँ केले के तने की तरह, चिकनी चिकनी गोल गोल, गुलाबी शलवार के बाहर झाँकने लगीं।"

"इन्स्पेक्टर, तुम मजे लूट कर आए हो।"

"नहीं नहीं, सरजी भगवान कसम, नहीं।"

...

"अरे भाभी जी, आप...! नमस्ते।" रानी को बैठक की ओर आते हुए देख कर इन्स्पेक्टर खड़ा हो गया। "अच्छा सर जी मैं चला; रिपोर्ट देता रहूँगा।"

रानी ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाए बिना नमस्ते का एक सपाट सा जवाब दिया और सरजी के हाथ में घर का फोन थमाते हुए कहा, "लीजिए, आपके मैनेजर का फोन है।"

पति देव ने फोन हाथ में लेते हुए अपना आदेश भी सुना दिया, "रानी, नाश्ता लगवा दो आज बैंक जल्दी जाना है।"

"आपको तो रोज ही जल्दी जाना होता है और देर से वापिस आना होता है... वैसे यह इन्स्पेक्टर रोज रोज क्यों आकर हमारे घर में बैठ जाता है। पुलिस वालों का इस तरह हमारे घर आना अच्छा नहीं लगता। आप इसे बैंक में ही बुलाकर मिल लिया कीजिए। मेरे घर को पवित्र ही रहने दीजिए।"

"तुम कहना क्या चाहती हो, कि बैंक अपवित्र होता है?"

"होता नहीं, बना दिया जाता है। जैसे अधिकारी होते हैं वैसा ही वातावरण बनता है...। आप शायद भूल गए कि मैनेजर अभी भी फोन लाइन पर मौजूद है।"

"तुम बाहर जाओ तो बात करूँ।" रानी ने पति की ओर शक-भरी नजरों से देखा और कमरे से बाहर निकल गई।"

खाने के कमरे में मेज पर चीजें रखने की आवाजें आने लगीं। कबाब और गरम गरम ऑमलेट की खुशबू फैल गई। "सरजी, आ जाइए नहीं तो पराठे ठंडे हो जाएँगे।"

सरजी अपने मैनेजर से बात खतम करने के बाद ही आए और आते ही बोले, "अरे भई, सूजी का हलवा कहाँ है?"

"आज पराठे बनवाए थे, इसलिए सूजी का हलवा नहीं बनवाया। मीठी सिवइयाँ बनी हैं।"

"चलो ठीक है। आज इस समय तो चल जाएगा मगर रात के खाने पर बनवा लेना। हाँ भुने कीमे के साथ साथ बकरी के गोश्त का स्टू भी बनवाना। पूरी के साथ अच्छा लगेगा।"

रानी सुनती रही। हाँ हाँ करती रही और सोचती रही कि हार्ट अटैक के बाद से डॉक्टर ने सादा खाना खाने की हिदायत की थी; वजन कम करने को कहा था; सिगरेट बिल्कुल बंद करने को कहा था; वर्जिश और सैर करने की ताकीद की थी। मगर सरजी को तो अपनी मनमानी करनी होती है। किंतु रानी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि पति को याद दिला सके।

सरजी को तो यह भी पसंद नहीं था कि उन्हें कोई नाम ले कर पुकारे। पहली बार ही रानी के ऐसा करने पर उन्होंने पत्नी को झिड़क दिया था। फिर रानी तो उम्र में भी अपने पति से दस बारह साल छोटी थी। कई बार तो लोगबाग उसे सरजी की बेटी ही समझ लेते थे।

सरजी को इस बात का भी खासा गुरूर था कि उनकी पत्नी उनसे इतनी छोटी है। यार दोस्तों से मूँछों पर ताव देकर कहते, "मियाँ इतनी छोटी लड़की से शादी करने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए। बेचारी छोटी लड़कियाँ, शादी के बाद बूढ़े पति में अपनI जीवन-साथी, अपना दोस्त ढूँढ़ते ढूँढ़ते अपना पूरा जीवन होम कर देती है। उसका अपना अस्तित्व तो कुचला जाता है; किंतु उसका जीवन अपने बूढ़े पति को कभी बाप की तरह तो कभी मालिक की तरह देखभाल में गुजर जाता है। रानी घर की रानी तो बन गई, किंतु कभी भी सरजी के सपनों की रानी नहीं बन पाई।

सरजी तो शायद सपने देखते ही नहीं थे। खड़ा खेल खेलते थे। रात को शराब के नशे में डूबे हुए जब आते तो रानी को अवश्य आवाज लगाते - जूता उतारने के लिए। बस फिर लुढ़क जाते बिस्तर पर। सारा घर जैसे शेर की गरज से गूँजने लगता। उन धुआँधार खर्राटों में रानी को नींद ना जाने कैसे आती होगी।

खर्राटों से भी कहीं अधिक रानी शराब की बदबू से परेशान रहती। आवाज का इलाज तो हो सकता है - कान में रुई ठूँस कर। मगर नाक में रुई ठूँसने से तो दम घुटने का अंदेशा रहता है। हालाँकि रानी का दम तो वैसे ही घुटता रहता था सरजी के सामने।

सुबह सवेरे दरवाजे पर घंटी बजी। रानी दौड़ी दरवाजे की ओर ताकि घंटी के शोर से सर जी की नींद में खलल ना पड़े। मगर उसके दरवाजे तक पहुँचते पहुँचते सर जी की दहाड़ सुनाई दे गई, "रानी, मैनेजर होगा। उसको बैठक में बिठा दो और चाय भिजवा दो हम दोनों के लिए।"

"सर जी, बड़ा गजब हो गया। इन्स्पेक्टर तो दिन रात सलोनी के घर के चक्कर लगाता रहता है। ना मालूम क्या घुट रहा है दोनों में।"

"तुमको कैसे मालूम है कि इन्स्पेक्टर रोज रोज चक्कर लगा रहा है?"

मैनेजर हड़बड़ा गया, सँभलते हुए बोला, "आते जाते लोग तो देखते हैं ना सरजी। वही बात को हर तरफ फैलाते हैं।"

"यार मैंने तो सुना है कि तुम पैसा लाने के बजाए उल्टे उसे पैसे दे आए हो - उस मोटी भैंस को।"

"सर जी ऐसी कोई खास मोटी भी नहीं है... गद्दर अनार है!"

"तुम तो उसके प्रेम के जाल में फँसे हुए लगते हो।"

"परेम वरेम क्या सरजी, दो चार बार दिल बहला लेने को प्रेम थोड़े ही कहते हैं। प्रेम तो मैं अपनी पत्नी से ही करता हूँ।"

"तभी पराई औरतों की चौखटें चाटते फिरते हो।"

"नहीं सरजी, ऐसा नहीं है। सलोनी जैसी मिले तो..."

"सुनो... उठो... और बाहर निकलो यहाँ से। यह शरीफों का घर है। यहाँ ये गुंडागर्दी की बातें नहीं होनी चाहिए।" सरजी ने देख लिया था कि रानी करीब ही खड़ी गुलदान में फूल लगा रही थी। फट से बातों का रुख ही बदल दिया सर जी ने। बड़े उस्ताद हैं सर जी। मैनेजर और इन्स्पेक्टर तो उनके सामने कुछ भी नहीं।

मैनेजर के बाहर जाते ही सर जी ने आवाज दी, "रानी जरा घरवाला फोन देना तो।"

"घरवाले फोन से तो आपको गंदे लोगों को फोन भी नहीं करना चाहिए। फोन भी अपवित्र हो जाता है।"

"अरे भई अगर तुम इतनी बड़ी संन्यासिन हो गई हो तो पहन लो भगवा चोला, चिमटा बजाती हुई चली जाओ हरिद्वार।"

रानी चुप रही। वो समझदार है; पति से बहस में नहीं पड़ना चाहती। वह अपनी बात कहने से चूकती भी नहीं मगर लड़ाई भी नहीं करती। इसीलिए मन ही मन सर जी दिखाने को तो शेर बने रहते हैं मगर असल में रानी से रोब खाते हैं।

जैसे ही रानी कमरे से बाहर निकली, सरजी ने मोबाइल से इन्सेपक्टर को फोन मिलाया। सिग्नल कमजोर थे... भाँय भाँय की आवाज हो कर कॉल बंद हो गई। "ये... मोबाइल भी मनमानी करते हैं।" सर जी ने खींचकर मोबाइल दीवार पर दे मारा। सामने दीवार पर रानी और सरजी की बड़ी सी फोटो लगी हुई थी। मोबाइल फोन सीधा जा कर फोटो में सरजी के मुँह से टकराया। शीशा मकड़ी के जाले की तरह चकनाचूर तो हुआ मगर वहीं चिपका रहा; नीचे नहीं गिरा। साथ में रानी की तस्वीर वैसे ही मुस्कुराती रही जैसे कह रही हो - 'सरजी, अभी तो फोटो पर अटैक हुआ है, आइंदा क्या पता...!'

रानी सब समझती थी कि मैनेजर, इन्स्पेक्टर और उसका अपना पति मिलकर कैसी कैसी बातें करते हैं। पति का संस्कार नाम की चिड़िया से कुछ भी लेना देना नहीं था। जंगली पौधों की तरह उसका जन्म हुआ था और वैसे ही जैसे तैसे बड़ा हो गया था। तिकड़मी था, इसलिए बी.ए. पास करते ही बैंक में किसी भी तरह नौकरी पा ली। अपने अफसरों को खुश रखना आता था; इसलिए तरक्की हो जाती। अब ऐसे शहर में तबादला हो गया था जहाँ के लोग पैसे वाले थे। उनका ईमान भी पैसा ही था। पुलिस वालों के तो यहाँ मजे थे।

मजे तो सरजी के भी थे। बैंक से एडवांस देते और अपनी चुटकी अपने अकाउंट में जमा करा देते। करोड़ों के मालिक बन गए थे बैंक को चूस रहे थे पर सलोनी के ढाई लाख रुपए वसूलने के लिए जान लगाए दे रहे थे। कभी मैनेजर को और कभी इन्स्पेक्टर को बार बार उसके घर भेजते और मजे ले लेकर उसकी पिंडलियों उसके बदन के रंग उसके उलझे हुए बालों के बारे में पूछते। गुलाबी शलवार के जिक्र से झुरझुरा जाते...

ये पूरी कोशिश करते की ये दोनों वहाँ ज्यादा देर तक रुकने न पाएँ। टाइम का पूरा हिसाब माँगते... और ये भी कहते जब बेटा घर में हो तभी जाया करो... मगर पकड़ो उसे गर्दन से... हराम का पैसा नहीं है। बैंक को क्या हिसाब दिया जाएगा...

देखो भई इन्स्पेक्टर अगर ये केस तुमसे नहीं सँभल रहा तो जवाब दे दो मैं किसी और को लगाऊँ...

इन्स्पेक्टर आया हुवा माल कैसे जाने देता। जल्दी से बोला सरजी आपका कहा मानता हूँ। ले जाता हूँ और भी सिपाही उसके घर और वही काम करता हूँ जो चूहे वाला आपका आइडिया है...

अरे इन्स्पेक्टर उस समय तो मैं भी वहाँ होना चाहूँगा... तमाशा देखूँगा... जब उसके शरीर का एक एक अंग अलग अलग काँपेगा... कुरते से जवानी बाहर निकल पड़ेगी।

जी सरजी तो रख लेते हैं ये प्रोग्राम आज से दो दिन के बाद। सब अफसरों की छुट्टी होगी... कोई सुनने वाला भी नहीं होगा...

उन दो दिनों के बीच इन्स्पेक्टर दो बार उसके घर हो आया बेटे को बाहर भेजकर... यही लालच देता कि तेरे पैसे माफ करवा दूँगा सरजी से कह कर...

और आज दो दिन बाद सरजी को भी साथ देखकर खुश हो गई सलोनी की सरजी पैसे माफ करने आए हैं...

मगर साथ में तो दो लेडी कॉन्स्टेबल भी थीं। उन लोगों ने पहुँचते ही एक गंदी सी गाली देकर कहा की सरजी के पैसे खाकर बैठी है देख कैसी जवानी फूट रही ह। अभी निकलवाते हैं तुझसे पैसे...

सलोनी भयभीत हो गई। हाथ पैर जोड़ने लगी की थोडा और टेम दे दिया जाए। एक लाख उसने जोड़ लिए हैं... बेटा गया हुआ है कहीं से उधार माँगने। सरजी तो खुश हो गए चलो अच्छा हुआ बेटा नहीं है यहाँ... सरजी उसको उसकी काली कोठरी में ले गए...

"सरजी यह आप क्या कर रहे हैं... दया करो सर जी... मैं तो इन्स्पेक्टर और मैनेजर को आपके नाम से डराया करती थी। वो दोनों हरामी ठठ्ठा मार मार कर हँसा करते थे। एक दूजे को आँख भी मारा करते थे...। नहीं नहीं सरजी आप तो मेरे बाप जैसे हैं...। कैसी गुलाबी शलवार?... सरजी यह तो लाल थी... रंग उड़ गया है..."

"रंग तो अब तेरा उड़ेगा, ऐसे थोड़े ही छोड़ दूँगा।"

"नहीं, नहीं... नहीं... सरजी... सरजी..."

सलोनी की हाय हाय का शोर बाहर लाइन में लगे सब सुनते रहे... ढीठ मुस्कुराहटें उनके चेहरों पर दिखाई दे रही थीं... अपनी अपनी बारी की राह देख रहे थे...

सर जी सीना फुला कर निकले ही थे कि दोनों भैंस जैसी मोटी पुलिस वालियाँ लाइन तोड़कर अंदर घुस गईं और अपनी ड्यूटी बजाने लगीं। उसकी गुलाबी शलवार को खींचकर दोनों पाएँचे नीचे से बाँध दिए और ऊपर से नेफे के पास से हाथ अंदर डालकर चूहा अंदर छोड़ दिया और शलवार ऊपर से कसकर बाँध दी। सलोनी को उस वक्त तक कुछ समझ में नहीं आया जब तक चूहे ने उसकी शलवार में हर ओर दौड़ना नहीं शुरू किया। वहाँ सलोनी की चीख पुकार सुनने वाला कोई नहीं था सब एक आवाज यही कह रहे थे 'अब निकाल पैसे कहाँ छुपाकर रखे हैं'... वो तड़प रही थी और सब हँस रहे थे... उसकी आवाज आकाश से टकराती धरती पर फैल कर गुम हो जाती। हाथ उसके बँधे हुए थे... औरतों को औरत होने का वास्ता देती पर वहाँ तो सब दरिंदे थे... तमाशा देखने आए थे पैसा निकलवाने के नाम पर...

सरजी घबराकर उठकर बैठने लगे इधर उधर टटोलने लगे कि कहीं चूहा उनके पायजामे के अंदर तो नहीं घुस गया... सर्दी लग कर बुखार चढ़ना शुरू हो गया था। एड़ी दर्द और जलन से फटी जा रही थी और सूज भी गई थी... डाक्टर बुलाओ, डाक्टर बुलाओ! पागलों की तरह चीख रहे थे सरजी... अरे रानी मेरे पायँचे का ख्याल रखना कोई नीचे से बाँध ना दे...


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