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कहानी

हरी दूब की कच्ची सुगंध...
ज़किया ज़ुबैरी


"क्यों इतना काम करते हो?"

"परिवार के लिए...!"

"जो भी कमाते हो हमारे परिवार के लिए काफी है।

"शीना मैं तुमको बहुत सुखी और हँसता मुस्कुराता देखना चाहता हूँ।"

"मैं खुश रहूँगी जब तुम ये लैपटॉप और उसका काम ऑफिस में छोड़ कर आया करोगे।"

"अरे यार कैसी बात करती हो? ये ऑफिस का थोड़े ही है, यह तो मेरा अपना है।"

"तुम्हारी अपनी तो मैं हूँ ...बस मैं!" शीना ने लाड़ से इतराते हुए कहा।

ईश ने जल्दी से लैपटॉप को एक तरफ सरका दिया और शीना का चेहरा अपने लंबी लंबी उँगलियों वाले बड़े बड़े हाथों के घेरे में ले लिया...। शीना खिल उठी।

अच्छा चलो खाना परोसो भूख बहुत तेज लगी हुई है।

शीना मस्ती से झूमती मोटी सी चोटी पीठ के ऊँचे नीचे उभार के ऊपर लहराती किचन की ओर चल पड़ी।

जल्दी जल्दी खाना गरम करके फुल्के बनाने खड़ी हुई तो ईश को खाने पर आने के लिए आवाज दी।

ईश ने शायद सुना नहीं या अगर सुना भी तो फेसबुक ने सिर उठाने नहीं दिया।

"ईश आओ ना जल्दी... गरम गरम फुल्के तैयार हैं।" ईश ने कोई जवाब भी नहीं दिया और आया भी नहीं। वह बड़बड़ाने लगी 'पुरुषों की बड़ी बुरी आदत होती है खाना माँग तो लेते हैं पर खाने जल्दी नहीं आते। हम बेचारियाँ इनको गरम गरम फुल्के खिलाने को तड़पती रहती हैं। जब ये रोटी ठंडी ही खाना चाहते हैं तो हम क्यों नहीं पहले से पका कर रख देती हैं। आज उसका मन विद्रोही हो रहा था। इसे भी तो डुमेस्टिक वायलेंस कहा जा सकता है! फिर स्वयं ही मुस्करा दी। बेचारे ईश के लिए ऐसे ही बुरा भला सोचने लग पड़ी थी।

"ईश अब आ भी जाओ खाना ठंडा हो रहा है।"

"बस आया...!" ईश ने जल्दी से जवाब दिया और चप्पल ढूँढ़ने लगा। एक चप्पल मेज के काफी नीचे घुस गई थी।" शीना, चप्पल नहीं मिल रही।"

वह दौड़ी कि जल्दी से चप्पल ढूँढ़ दे तो ईश खाने पर आ जाए। लैपटॉप अभी भी उसकी गोद में ही था इसीलिए झुक नहीं पा रहा था।

ईश मैं सारा दिन काम करके थक जाती हूँ जल्दी से खा लो तो मैं भी नहाकर सोने आ जाऊँ।

वो घर के सारे काम आप ही करती। बाई वाई का झंझट नहीं पालना चाहती थी। बाइयाँ भी तो आजकल बहुत महँगी पड़ती हैं... पगार के साथ पति भी ले उड़ती हैं। मेघा के घर कैसी कड़क बाई आती है। साड़ी का पल्लू ऐसे कसकर शरीर के ऊपर लपेटे होती है जैसे एक एक अंग साड़ी फाड़कर बाहर निकल आएगा। आँखों में काजल... काले तेल लगे चमकीले बालों का जूड़ा... गोल गोल काली, पीली, गोरी, गदराई पिंडलियाँ। छोटी बड़ी साइज की चप्पल। जो भी फ्री में मिल जाए... किसी भी नंबर की चप्पल पहनने से शायद उँगलियों पर जोर पड़ने के कारण पैरों की उँगलियाँ दूर दूर हो जाती हैं और पंजे फैल जाते हैं... पर पैरों की किसको परवाह। पिंडलियों तक ही जाकर निगाह ठहर जाती है। मेघा का पति तो दूसरे शहर रहता है... उसका अकेलापन दूर करने के लिए पति ने एक बाई रख दी है। इसीलिए तो वो सुख उठा रहा है बाई का भी... और फेसबुक का...

शीना सारे दिन घर-बाहर के काम निबटा कर थोड़ी देर के लिए फेसबुक खोलकर घर वालों से बातें करके माता पिता को नाती नातिन के फोटो दिखाती और उनको बातों से खुश करके फिर घर के कामों में लग जाती। शीना सोचती 'फेसबुक के कारण मायके जाने का चांस भी मारा जाता है। अगर यह फेसबुक ना होती तो सवेरे सवेरे माता-पिता के दर्शन भी ना हो पाते। फेसबुक भी अद्भुत चीज है... कैसे कैसे लोग अपनी पूरी दिनचर्या दुनिया जहान के साथ शेयर कर लेते हैं... निजता नाम की कोई चीज तो बची ही नहीं...'

"अरे शीना खाने के बाद की चाय क्या भूल गईं?"

"ला रही हूँ जरा बरतन धोने लगी थी।"

"शीनू रानी बाद में धो लेना। चाय की तड़प तुम क्या समझो! तुमने चाय से मोहब्बत तो की नहीं है।"

"ईश मैंने तुमसे मोहब्बत की है तुम ही मेरी चाय हो... बिना दूध की चाय।" दोनों जोर से हँस पड़े।

"अच्छा सुनो चाय बड़े वाले मग में देना और भरकर देना मुझे जरा अधिक काम करना है आज।"

"यह चाय है या पेट्रोल...!' तुलसी की चाय बना दूँ स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है... मुझे कोई मंदिर थोड़े ही जाना है बस बिस्तर में लेटकर काम करना है। तुम जल्दी से नहाकर आ जाओ।"

शीना का हाथ जल्दी से ब्लाउज के छोटे छोटे हुक खोलने में व्यस्त हो गया। पल्लू से सीना ढकती हुई जल्दी से नहाने भागी।

बाथरूम से बाहर निकलकर लंबे लंबे चमकते बालों को कमरे के सामने ही तौलिए से झटक झटक कर सुखाने लगी थी। दरअसल वह ईश को दूर ही से ललचाना चाह रही थी। वो हेअर ड्रायर से बालों को सुखाना पसंद भी नहीं करती थी। बाल सूखे सूखे छल्ली के बालों जैसे हो जाते हैं। ईश को उसके बाल भी तो पसंद थे। नहाए हुए हल्के-हल्के गीले-गीले संदल वाले शैंपू की भीनी भीनी उभरती हुई खुशबू ईश को बेसुध कर देती।

शीना कमरे में पहुँची तो ईश एक हाथ से लैपटॉप को पकडे पेट पर रखे लेटा हुवा था दूसरा हाथ न जाने कहाँ था शीना को दिखाई नहीं पड़ा आँखें कुछ बंद कुछ खुली हुई थीं गरम गरम साँसें अंदर-बाहर हो रही थीं। शीना ने चुपके से लैपटॉप को हटाना चाहा उसने जल्दी से बंद करके करवट बदली और लैपटॉप अपने नीचे ही दबा लिया। फेसबुक का पूरा परिवार उसके सीने के नीचे दफन हो गया। शीना उसके पीछे ही लिपट कर लेट गई... थोड़ा कसमसाई... गले में बाँहें डालीं पर ईश दम साधे पड़ा रहा। शीना थकी हुई थी वो जल्दी ही सुरीले सुरीले खर्राटे लेने लगी।

वह शायद सपना देख रही थी। पर यह कैसा सपना...! ईश की आवाज कानों में गूँज कर गुम हो जाती थी।

शीना पहले तो मद्धम मद्धम गहरी घुटी हुई आवाज सुनती रही फिर गहरी नींद में चली गई।

ईश ने झुक कर कान लगाकर शीना की साँसें महसूस कीं फिर घूर कर गौर से देखा जैसे मुर्दे की नाड़ी देखी जाती है की मर गया... या जिंदा है...! शीना सो गई थी... वह खुश हो गया...

ईश को जल्दी पड़ी थी यह जानने की कि फेसबुक पर जो प्रश्न पोस्ट किया था उस पर क्या क्या कमेंट्स आए। साथी लोग उसकी लगाई चिनगारी में घासलेट छिड़क रहे होते। वह अपनी शरारती मुस्कान बिखेरता और अपनी फेसबुक-सहेलियों की महफिल में खो जाता।

साली...! कितना नीचा गला पहने है। एवरेस्ट की दो पहाड़ियों के बीच बारीक कसी हुई पगडंडी नीचे को उतरती चली जा रही है। मन चाहता है उस पर दौड़ पडूँ। ये देखो मेघा को... ऊँची स्कर्ट पहनकर नंगी टाँगें दिखा रही है। एक टाँग तो जैसे कमान बनी हुई हो...

उन चित्रों पर क्लिक्स आना शुरू हो गए। वो देखता रहा पर वो केवल क्लिक ही तक सीमित नहीं रहना चाहता था। यह उसकी दो हजार फेसबुक-मित्रों में से एक थीं।

"आपकी आँखें बहुत सुंदर हैं।"

"कोई नई बात करिए। यह तो बहुत बार सुन चुकी हूँ।"

"आपकी पोशाक बहुत सुंदर बनी है, कहाँ से सिलवाई?"

"आपको भी बनवा दूँ?"

"अभी मेरी शादी नहीं हुई..."

"अच्छा तो आप बैचलर हैं...!"

"और आप?"

"मैं भी..."

जैसे ही यहाँ दाल गलती नजर आई वह पहाड़ियों के बीच दौड़ गया।

"..."

"आपके केवल होंठ ही नहीं सभी कुछ सुंदर है..."

"सभी से क्या मतलब?"

"वही जो कुछ नजर आ रहा है..."

"क्या नजर आ रहा है?"

आज उसने ठान लिया था कि घबराएगी नहीं खुलकर बात करेगी। पुरुष जैसे दिल की हर बात खुलकर बोलता है तो हम महिलाएँ क्यों बैठी शरमाती रहें...! क्या हमारा मन नहीं होता की हम भी वही सब कुछ करें जो पुरुष करते हैं अब तो विदेशों में सुना है कि महिलाएँ चर्च की पादरी भी बन सकती हैं। तो क्या हम रंगीनियाँ नहीं मना सकते पुरुषों ही की तरह...!

शीना ने करवट बदली तो ईश चौंक गया और फट से लैपटॉप का ढक्कन नीचे गिराकर लैपटॉप बंद कर दिया। वहाँ जो कुछ भी था वहीं घुट कर रह गया पर ईश के मन में हलचल मची रही।

"आओ ईश सो जाओ। क्या कर रहे हो?"

"ऑफिस का काम पूरा कर रहा था।"

"ईश, इतनी मेहनत मत करो। थक जाओगे। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं जी ना सकूँगी।"

ईश को शीना की ये सब बातें फालतू की लग रही थीं। वह तो उन चित्रों को निहारना चाहता था जिनका सही नाम पता भी नहीं मालूम था। शीना तो उनसे कहीं अधिक सुंदर थी... पर वो... वो तो अपनी थी।

सुबह उठकर ईश ऑफिस जल्दी जाने की तैयारी करने लगा...। "आज जल्दी क्यों जा रहे हो?"

"जल्दी आने के लिए।"

शीना को खुशी हुई की ईश को आखिर फँसा ही लिया अपनी लंबी जुल्फों के रेशमी जाल में...

आज वो भी खाना पकाकर नहा धोकर ईश के इंतजार में बैठ गई थी।

"क्या कहीं जा रही हो?" ...ईश ने खुश होते हुए पूछा...

शीना खिसयानी सी हो गई।

"नहीं ईश, मैं कहीं नहीं जा रही... बस तुम्हारे लिए तैयार हुई हूँ।"

"इसके क्या मतलब?... मैं तो... जल्दी अपना काम करने के लिए आया हूँ।"

"क्या आज फिर लैपटॉप के संग ही जियोगे?"

"हाँ शीना इसी के तो पैसे खाता हूँ।"

शीना ने सोचा लैपटॉप कमबख्त कहलाता ही है 'गोद का खिलौना' और आई-पैड... 'आँखों की सेंक'...!! बेचारा ईश इन्ही दोनों मशीनों के साथ जी रहा है। और मैं कामों की मशीन बनी हुई हूँ। मुझे ईश के लिए समय निकालना चाहिए।

शीना परेशान रहने लगी थी कि कहीं ईश पर काम का बोझ अधिक तो नहीं हो गया है। कहीं अस्वस्थ न हो जाए वह। ईश से प्यार से कहती 'ईश घर आकर घर के हो जाया करो' जैसे पहले हम दोनों संग संग हुआ करते थे। मैं जहाँ भी होती तुम छोटे से बच्चे की तरह मेरे पीछे पीछे वहीँ आ जाया करते थे। अगर मैं रसोई में खाना पका रही होती तो तुम पल्लू के नीचे से मेरी कमर को कस कर पकड़ कर लिपट जाया करते ...दबोचकर कमरे में ले जाते ...हंडिया जल जाती ...तवा तपता रहता और तुम ...तुम ...मैं कितना शोर मचाती ...तुम हँसते जाते और ...हँसते ही जाते। तुम्हारे खनकते कहकहे तो मुझे प्यारे लगते पर तुम भी मेरी मोती जड़ी मुस्कान पर फिदा रहते तुम ये कहते शीना तेरे मुँह से कभी भी बुरी महक नहीं आती।

'मैं हमेशा सच जो बोलती हूँ। ममी कहा करती थीं की झूठ बोलने वालों के मुँह से बदबू आती है।'

वह डरती कहीं हमारे रिश्तों में बदबू तो नहीं बस गई... समाज की बुराइयों की बदबू... गंदे दोस्तों की बिसांद... जलने वालों की चिरांद...! वह सोचती...

मैं तो अपनी बिटिया का रिश्ता पक्का करने से पहले ही कह दूँगी कि लड़का अगर शराब पीता है तो कोई बात नहीं... ड्रग्स भी लेता है तो भी चलेगा... किंतु अगर फेसबुक का नशा करता है तो नहीं होगा यह विवाह... बस कह जो दिया... नहीं...! ड्रग और शराब से केवल उसका अपना नुकसान होगा... मगर यह फेसबुक तो एक भटियारखाना है... दीमक की तरह रिश्तों को चाटती जाती है... किसी का कुछ मालूम ही नहीं चलता कि कौन किस से नत्थी होता चला जा रहा है। इसकी पत्नी उसके साथ और उसकी पत्नी दूसरे के साथ... कौन किसका दोस्त है और किसका दुश्मन...! यह खेल एक मुहल्ले, एक शहर, एक देश तक सीमित नहीं रहते... यहाँ तो तमाम संसार सिकुड़ कर एक फेसबुक में बंद हो जाता है... शायद इसी को ग्लोबलाइजेशन कहते हैं।

और...

आज फिर वह शीना को रसोई में भेजकर लैपटॉप पेट पर रखकर बिस्तर में पसर गया। इतनी जल्दी होती थी कि ऑफिस से आकर ऊपर के कपड़े उतारकर फेंक देता अंडरवेयर और बारीक बारीक छेदों वाली सुफैद बनियान में ही लेट जाता। एक हाथ लैपटॉप और दूसरा हाथ कहीं और खो जाता। आज उसने फिर मेघा और ऊँचे एवरेस्ट वाले फोटो खोली और व्यस्त हो गया...

आज एक कमेंट बहुत अच्छा लगा पर फोटो नहीं थी। बस चेहरे का एक साया था। मालूम ही नहीं पड़ रहा था कि महिला है या पुरुष। लिखा था 'मैं यहाँ हूँ इधर देखो' ...यह कौन है?

"अरे ...ये कौन है?"

"अरे भई यह कहाँ से आ गई?"

पर है कौन...?

हाहाकार सी मच गई...

सभी ने पूछना शुरू कर दिया।

सब टूट पड़े ...जैसे खानदानी जायदाद बँट रही हो... या जैसे कोई नया मुर्दा आ गया हो... गिद्ध टूट पड़े हों। चेहरा देखे बिना ही बस शुबहा हो गया था ...हो न हो... है कोई नारी...! सबको नारी गंध आ रही थी।

ईश ने लिखा... 'छुपने वाले सामने तो आ...'

"मुझे देखकर बेहोश हो जाइएगा।"

ईश ने सबसे अधिक क्लिक्स लगाए और हर थोड़ी देर में फोटो की फरमाइश कर देता। उसने लिखा, "आप पहले अपनी फोटो लगाइए।"

ईश यह नहीं करना चाहता था कि कहीं पकड़ा न जाए। उसका अपना एक संसार था। वो कहीं भी होता वही चित्र उसको चारों ओर से जकड़े होते उस जकड़ की चुभन बड़ी सुहानी महसूस होती। वो शाम को ऑफिस से घर आकर उनसे सब कुछ कर लेने की और कह देने की जल्दी में होता। हर उलझन चित्रों से ही बातें करके सुलझा लेता।

शीना प्यासी रहती, उसकी हँसी उसके प्यार की... अब तो संता सिंह और बंता सिंह भी कहीं हाशिये पर खो गए... शायद उनके घर फेसबुक अभी तक नहीं पहुँची थी...

"आप फोटो लगाइए" कोई बार बार अनुरोध किए जा रहा था।

"आप सामने क्यों नहीं आतीं?"

"शर्माती हूँ ...डरती हूँ..."

"एक बार इस महफिल में शामिल हो जाने के बाद शरम वरम सब हवा हो जाती है... रिश्ते बन जाते हैं... अनोखे रिश्ते... हम सब ही एक दूसरे के परिवार बन जाते हैं। अनजाने... अनदेखे लोग। जीता जागता हँसता बोलता परिवार दीवार के उस पार चला जाता है। उसका काम होता है केवल इंतजार करना या इसी परिवार का हिस्सा बन जाना। इससे घर में सुकून तो आ जाता है पर सन्नाटा बढ़ जाता है...

"आप के घर का क्या हिसाब किताब है...?"

"मैं तो अभी फँसा ही नहीं इन झंझटों में..."

"यह खबर तो अच्छी है..."

"क्या आप भी...!!"

"बस यूँ ही समझ लीजिए... घर में सन्नाटा बढ़ गया है..."

"तो फिर तो मिलना चाहिए हम तो शायद एक ही रोग के रोगी हैं।"

"बस कैंसर न हो..."

ईश बहुत खुश था आज ड्रेस-वाली ने भी जलवा दिखा दिया था। उसके एवरेस्ट की बरफ पिघल चुकी थी होंठ देखकर सूवर की थूथनी भी प्यारी लगने लगती थी। क्यों लगाती हैं ऐसी महिलाएँ अपनी फोटो...?

वह लोगों को टैग करती अगर कोई ना फँसता तो सवाल करती... "आप टैग क्यों नहीं होते?"

'मेरे पास कोई विषय नहीं है...'

'कैसे हैं आप?'

'ठीक हूँ...'

'और सुनाइए...'

"क्या सुनाएँ...?"

अब ईश को इंतजार था उस बेचैन कर देने वाली रोगी का...

आज ईश की वॉल पर बहुत कुछ लगाया गया पर उसने किसी को कोई जवाब नहीं दिया ...वो अक्सर लड़ाइयाँ मोल ले लेता है दीवार पर लिखे रिमार्क्स पर... उसको संसार के हर विषय पर बोलना अच्छा लगता क्योंकि उसके पास ज्ञान था... लोग जलते भी थे... कुछ वाद-विवाद करके बात को आगे बढ़ाते भी थे और सीखते भी थे...

***

"ईश आज मेरी सहेली की पहली पुस्तक का लोकार्पण है।"

"बधाई बधाई ...ईश ने जल्दी से कहा।"

"ईश मैं चाह रही हूँ हम चलकर बधाई दें।"

"अरे यार ईशू रानी मैं तो थका-हारा मजदूर आदमी बस अब तो खाना खिला दो गरम गरम अपने प्यारे प्यारे हाथों से।"

"नहीं नहीं ईश आज मैं नहीं मानूँगी। तुमको चलना पड़ेगा। कितने दिन हो गए हैं मैं तुम्हारे साथ कहीं नहीं गई।"

"शीनू मैं भी तो कहीं नहीं गया।"

"तुम तो रोज ऑफिस जाते हो और... वहाँ से आकर फिर उन्हीं के साथ समय बिताते हो।"

ईश कुछ चौंक सा गया।

"कहाँ जाना होगा... कितनी दूर?"

"कला भवन..."

"कहाँ चलोगी... बहुत दूर है..."

"कार मैं चला लूँगी..."

"चलो ये बात पक्की..."

वो साथ बैठ गया आई - फोन हाथ में लेकर उसी से बे-आवाज बातें करता रहा। उसी में खोया रहा। शीना काली चमकती सड़क को बिना पलक झपकाए घूरती हुई कार चलाए जा रही थी।

चिलचिलाती गर्मी की पीली पीली धूप, पीले आकाश में मोटी ताजी गिद्धें जैसे ताजी ताजी पारसियों के शव को निबटा कर आई हों और धरती की ओर गोता लगा लगा कर जीवन के भारीपन को हल्का कर रही हों। गिद्धें आकाश में वापस तैरने लगतीं... शीना पलक झपकाकर गिद्धों को देखती फिर तेजी से काली कोलतार की चमकती सड़क पर गाड़ी दौड़ाने लगती। ...कोलतार की सड़क उसे फेसबुक की दीवार सी महसूस होने लगती जिस पर बिन बुलाए गिद्ध मँडरा रहे होते... सब अपनी अपनी बड़ाई कर रहे होते... बिल्कुल वैसे ही जैसे नरगिस का फूल पानी में अपनी ही छाया देखने में व्यस्त होता, आत्म-मुग्ध रहता और स्वयं अपने से ही प्यार करता। फेसबुक के रसिया फेसबुक के गहरे समुद्र में अपनी ही छवि देख रहे होते।

कभी ईश की हँसी से चौंक जाती। और ईश भी अपनी ही हँसी से घबरा जाता कि शीना से क्या बताएगा कि किस बात पर हँसा है।

"अरे ईश जी आप...! आपने तो बताया ही नहीं की आप यहाँ आ रहे हैं। रात को तो कितनी देर तक हम साथ थे। ईश रात में तो मेरे साथ था... सोच रही थी शीना... आजकल इस मॉडर्न टेक्नोलोजी के कारण रिश्तों और फासलों का कुछ पता ही नहीं चलता। ऐसा लगता है जैसे हम एक दूसरे के साथ रहते हुए भी अनजानों के साथ होते हैं और उन्हीं को वर्षों से जानते हों...।" ये बातें दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े पकड़े ही कर रहे थे। शीना वहाँ मिनट भर के लिए रुकी कि शायद ईश उसका परिचय कराना चाहेगा पर फिर वो खिसक गई। चाय पानी के समय बड़े हॉल में देखा कि किसी महिला से गले मिल रहा है तो किसी को बेटी कहकर सीने से लगा रहा है और उसी महिला का बार बार हाथ में हाथ लिए खड़ा हो जाता है। यह नहीं मालूम पड़ता कि कौन किसका हाथ पकड़े है... हाथ एक दूसरे में बस गड-मड होते।

तो यह है फेसबुक का परिवार...!!

उसको एक अखबार की खबर याद आ गई कि आजकल 'रेड लाइट एरिया' में भी फेसबुक का बहुत जोर है। बुरे-भले, इज्जतदार- कमीने, अमीर-गरीब, साहित्यकार, कवि और राजनीतिज्ञ सभी एक ही बुक में बंद हैं। थोड़ी बहुत शिक्षित खिलाड़िनें इस माध्यम से भी खिलवाड़ कर रही हैं। उसको ये भी याद आया कि एक धार्मिक संस्था ने कह दिया है कि उस संस्था को मानने वाले लोग फेसबुक का उपयोग नहीं करेंगे... काश ईश भी उसी धर्म को मानता होता... मगर ईश तो नास्तिक है।

आज उसको वो सब बातें याद आईं जिनको वो बेमतलब समझा करती थी... तो क्या ईश अब उसका नहीं रहा? केवल उसका शरीर यहाँ होता है और मन न जाने कहाँ कहाँ फेसबुक में भटक रहा होता है। बेचारा...! कितना मूर्ख है ...मैं तो उसको बहुत समझदार मानकर चल रही थी और... ईमानदार भी।

ईश घर पहुँचते ही थकन का शोर मचाता हुआ बिस्तर में खो गया उसकी अपनी भीड़ में। आज शीना बिस्तर में नहीं आई।

ईश बेचैन था छुपने वाली के लिए... जैसे ही उसकी वॉल पर पहुँचा उसने अपनी तस्वीर लगाने की बात मान ली थी। "भेज रही हूँ अपनी फोटो। पहले यह बताइए, वादा कीजिए मिलने का।"

"हाँ हाँ सौ बार वादा। आप बताइए कब और कहाँ?"

वह सोचती रही उसी पार्क में पहाड़ी के पीछे ...जंगली फूलों की सेज पर ...हरी दूब की कच्ची कच्ची सुगंध... धरती से उठती मिट्टी की सोंधी सोंधी खुश्बू... वह जैसे आज फिर से उसकी प्रियतमा बन गई... फेसबुक की महबूबा... जैसे वे दोनों ...शादी से पहले मिला करते...

"लीजिए फोटो देखिए..." ...और शीना ने अपनी फोटो लगा दी...

हर ओर से लाइक्स की बौछार होने लगी... और ईश...!


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