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खास
काशीनाथ सिंह
रेहन पर रग्घू
उपन्यास को आधुनिक युग का महाकाव्य कहा गया है। आकार में बड़ा न होते हुए भी 'रेहन पर रग्घू' को महाकाव्य कहा जा सकता है – नए भारत का महाकाव्य, जहाँ संबंध कच्ची मिट्टी के खिलौनों की तरह टूट रहे हैं और एक भावनात्मक उजाड़ बढ़ते हुए रेगिस्तान की तरह लोगों की जिंदगी को बेअर्थ बना रहा है। यह कहानी उजड़ते हुए गाँवों और उजाड़ते हुए शहरों के माध्यम से कही गई है - गाँव की परंपरागत संस्कृति का क्षय, सर्वग्रासी हवस का हमला, बाप-बेटे के रिश्तों में आ रहा बदलाव, राजनीति की घनी होती हुई अपसत्ता, पैसे और सुविधाओं के लिए कुछ भी करने की लोलुपता, प्रेम की निरर्थकता और विदेश भागने की अदम्य ललक। लेकिन इस नए भारत में बहुत कुछ पॉजिटिव भी है – इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी! वे चले जाएँगे और इस धरती का वैभव, इसका ऐश्वर्य, इसका सौंदर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़-पौधे, ये फसलें, ये नदी-नाले, कछार, जंगल, पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आँखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जाएँ, आँखें रह जाएँगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुँचाती रहेंगी जीवन की सार्थकता की खोज, स्त्री की स्वतंत्रता के पगचिह्न, दलितों में उमड़ते गुस्से का विस्फोट और युवाओं के एक छोटे-से हिस्से में नवनिर्माण की पवित्र ललक। 'काशी का अस्सी' ख्याति के लेखक काशीनाथ सिंह का ताजा, प्यारा उपन्यास, जिसे इस वर्ष के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से एक अपेक्षा यह की जाती है कि वह हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा बनने के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए। यह तभी संभव हो सकता है जब हिंदी न सिर्फ गंभीर विमर्श का माध्यम बने बल्कि हिंदी में लिखा गया महत्वपूर्ण साहित्य देश-विदेश के विशाल पाठक समुदाय तक पहुँचे। विश्वविद्यालय पिछले कुछ वर्षों से ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में शिक्षा और अनुसंधान के अतिरिक्त स्तरीय पुस्तकें तथा तीन साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से प्रकाशित करने का काम भी कर रहा है। इसी क्रम में हमने यह निर्णय किया है कि हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण लिखा गया है, उसे हिंदीसमयडॉटकॉम के जरिए दुनिया भर में फैले साहित्य प्रेमियों को उपलब्ध कराया जाए। आशा है, यह सामग्री हिंदी के अध्येताओं, शोधार्थियों और विद्वानों के लिए भी उपयोगी होगी। |
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नई प्रविष्टियाँ |
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मुकेश मानस का निबंध : हिंदी कविता की तीसरी धारा
मुकेश मानस के अनुसार, हिंदी कविता का पहला संसार उन लोगों का है जिन्होंने अपने आस-पास के संसार, समय और समाज से परे कविता की एक स्वायत्त दुनिया बसा ली है और जो प्रेम, रति और मृत्यु जैसे शाश्वत विषयों को ले कर ही कविताएँ लिख रहे हैं। कविता का दूसरा संसार ऐसे कवियों का है, जो सामान्य जन के प्रति सहानुभूति रखते हैं, पर अपनी सामाजिक और वर्गीय स्थिति को भी सुरक्षित रखना चाहते हैं। जनसंघर्षों से पूरी तरह जुड़े हुए कवियों द्वारा निर्मित हिंदी कविता का तीसरा संसार ही उसे समाज और साहित्य की दृष्टि से सार्थक बनाता है। जनता की अनवरत संघर्ष चेतना से संबद्धता ही इन कवियों को क्रांतिकारी आस्थावाद की ओर ले जाती है। हिंदी कविता की इस तीसरी धारा के सरोकारों पर एक युवा आलोचक की नजर।
यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी : कामरूपी
यू.आर. अनंतमूर्ति न सिर्फ कन्नड़ के अपितु समस्त भारतीय भाषाओं के शीर्ष कथाकारों में एक हैं। वह परंपरा और आधुनिकता के तीव्र द्वंद्व और इस वजह से पैदा हुई त्रासदी को अपनी रचनाओं का विषय बनाते हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘कामरूपी’ आज की राजनीति के पतन के गर्त में गिरते ही चले जाने को रेखांकित करती है। इस कहानी का केंद्रीय पात्र ‘शंकर बाबू’ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पतन के किसी भी स्तर पर जाने के लिए तैयार मिलता है। वाचाल शंकर बाबू अपने पतन का बयान कुछ इस तटस्थता से करता है कि दहशत होने लगती है। पर शंकर बाबू रुकता नहीं, वह अपने नरक पथ पर आगे बढ़ता चला जाता है...
अखिलेश की कहानी : श्रृंखला
अखिलेश हिंदी के ऐसे विरल कथाकार हैं जो श्रेष्ठ रचने के लिए ही जाने जाते हैं। राजनीति से एक सुविधाजनक दूरी बनाने के इस दौर में अखिलेश की कहानियाँ गहरी राजनीतिक चेतना से लैस होती हैं। यहाँ उनकी ताजा कहानी ‘श्रृंखला’ प्रस्तुत की जा रही है जो आज की राजनीतिक सत्ता की सर्वव्यापी तानाशाही का गहरा विखंडन पेश करती है। इस कहानी का कथानायक ‘रतन’ सत्ता से जुड़े नामों के संक्षिप्त रूप को डिकोड करने का काम शुरू करता है जो उसके अनुसार सत्ता की असलियत को छुपाने के लिए रचे-गढ़े गए हैं। बदले में व्यवस्था उससे क्रूरतम बदला लेती है। कथाकार किसी किस्म के रोमानी अंत की बजाय रतन की पीड़ा और संत्रास पर अपने को केंद्रित करता है और भविष्य की संभावनाओं की तरफ इशारा भी...
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य : एक क्रांतिकारी की कथा
आज की तरह परसाई जी के जमाने में भी ऐसे क्रांतिकारी बहुतायत में पाए जाते थे, जिनकी आँखें आसमान पर टिकी रहती थीं, पर जो जानते थे कि ऐन मौके पर समझौता कैसे कर लिया जाता है। भारत का मध्य वर्ग तब भी इतना चतुर था कि वह सामाजिक परिवर्तन और अपने वर्ग स्वार्थ के बीच सामंजस्य बैठा सके। ऐसे ही एक क्रांतिकारी की मनोरंजक धज और छटा।
केदारनाथ सिंह की कविता : मंच और मचान मूल कहानी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें | ||||||||||||||||
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