आइए पढ़ते हैं : मोहन राकेश का कालजयी नाटक :: आषाढ़ का एक दिन
कविताएँ इस हफ्ते बात

फणीश्वरनाथ रेणु

बहुरूपिया

दुनिया दूषती है
हँसती है
उँगलियाँ उठा कहती है ...
कहकहे कसती है -
राम रे राम!
क्या पहरावा है
क्या चाल-ढाल
सबड़-झबड़
आल-जाल-बाल
हाल में लिया है भेख?
जटा या केश?
जनाना-ना-मर्दाना
या जन .......
अ... खा... हा... हा.. ही.. ही...
मर्द रे मर्द
दूषती है दुनिया
मानो दुनिया मेरी बीवी
हो-पहरावे-ओढ़ावे
चाल-ढाल
उसकी रुचि, पसंद के अनुसार
या रुचिका
सजाया-सँवारा पुतुल मात्र,
मैं
मेरा पुरुष
बहुरूपिया।

यह फागुनी हवा

यह फागुनी हवा
मेरे दर्द को दवा ले आई ... ई... ई...
मेरे दर्द की दवा!
आँगन बोले कागा
पिछवाड़े कूकती कोयलिया
मुझे दिल से दुआ देती आई
कारी कोयलिया - या - मेरे दर्द की दवा
लेके आई - ई - दर्द की दवा!
बन-बन, गुन-गुन
बोले भौंरा
मेरे अंग-अंग झनन
बोले मृदंग मन-मीठी मुरलिया! यह फागुनी ...!
मेरे दर्द की दवा ले के आई
कारी कोयलिया!
अग-जग अंगड़ाई ले कर जागा
भागा भय-भरम का भूत
दूत नूतन युग का आया
गाता गीत नित्य नया। यह फागुनी हवा ... ।

जागो मन के सजन पथिक ओ!

मेरे मन के आसमान में पंख पसारे
उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे!
मन की मरु मैदान तान से गूँज उठा
थकी पड़ी सोई-सूनी नदियाँ जागीं
तृण-तरू फिर लह-लह पल्लव दल झूम रहा
गुन-गुन स्वर में गाता आया अलि अनुरागी
यह कौन मीत अगनित अनुनय से
निस दिन किसका नाम उतारे!
हौले, हौले दखिन-पवन-नित
डोले-डोले द्वारे-द्वारे!
बकुल-शिरिष-कचनार आज हैं आकुल
माधुरी-मंजरी मंद-मधुर मुस्काई
क्रिश्नझड़ा की फुनगी पर अब रही सुलग
सेमन वन की ललकी-लहकी प्यासी आगी
जागो मन के सजग पथिक ओ!
अलस-थकन के हारे-मारे
... ... ... ... ... ... ...
... ... ... ... ... ... ...
कब से तुम्हें पुकार रहे हैं
गीत तुम्हारे इतने सारे!

24 फरवरी 1960 (बुधवार)

सुबह-सुबह वर्षा -
मन हर्षा
सूरज सिर्फ दो घंटे
टिका - किंतु प्रचंड रूप से।
फिर बदली उमस
हवा गुम्म!
सावन की पुरवैया
या पछवैया - क्या चले
क्या चले?
हठात पछिया हवा का
एक झोंका
आया - नारियल-सुपारी-बाँस
की फुनगियों पर
रुकी थमी हवा हरहराती -
तोते का बच्चा टॉय-टॉय
कर रोता उड़ता
फिरता!
पाट-धान के हरे-भरे
डेढ़ सेर चावल
घर में हैं, पिछवाड़े में कद्दू
...आज कोई काम नहीं होगा...
मछलियों के शिकार के सिवा।
मालिक ! आज माफ करो
घरवाली का पैर भारी है
मछली खाने को जी हुआ है।
...जी, जी!
बाबा रामचंदर
भगवान थे
हम दास हैं, सेवक हैं
हमारी स्त्रियाँ सोने के हिरण
की खाल खिंचवाकर
नहीं मँगवाएँगी।
दो-जीवा है
बेचारी के मन में
मछली भात खाने की साध है।
डेढ़ सेर चावल घर में है
पिछवाड़े में कद्दू!


सुंदरियो

सुंदरियो-यो-यो
हो-हो
अपनी-अपनी छातियों पर
दुद्धी फूल के झुके डाल लो !
नाच रोको नहीं।
बाहर से आए हुए
इस परदेशी का जी साफ नहीं।
इसकी आँखों में कोई
आँखें न डालना।
यह ‘पचाई’ नहीं
बोतल का दारू पीता है।
सुंदरियो जी खोलकर
हँसकर मत मोतियों
की वर्षा करना
काम-पीड़ित इस भले आदमी को
विष-भरी हँसी से जलाओ।
यों, आदमी यह अच्छा है
नाच देखना
सीखना चाहता है।

सारिका, अप्रैल 1979 : रेणु स्मृति अंक से साभार

मेरा पता कोई और है
(उपन्यास)
कविता

कविता युवा पीढ़ी की समर्थ लेखिका हैं। यहाँ प्रस्तुत उनका पहला उपन्यास ‘मेरा पता कोई और है’ स्त्री-पुरुष संबंधों के एक नए परिदृश्य से रूबरू है। पर इस नए के भीतर एक आदिम राग भी है जो जस का तस बना रहा आया है हमेशा। जहाँ नैतिकता-अनैतिकता के पारंपरिक बोध के लिए कोई जगह नहीं हैं। शायद इसीलिए यह प्रेम से अधिक प्रेम की त्रासदी का उपन्यास है। इस सब के बीच जो नया है वह है इस त्रासदी को सहते हुए फिर फिर से खड़ा होने का जीवट। एक दूसरे को समझने बूझने की समझदारी। जो कविता के इस उपन्यास को एक अलग जमीन पर ला खड़ा करती है। और भी बहुत कुछ है यहाँ। स्त्री और पुरुषों की परंपरागत भूमिकाएँ हैं तो उनकी अदला बदली भी। पर यह किसी खेल की तरह नहीं है। दोस्ती है बहनापा है और इसी के साथ एक धीमी लौ में चलने वाला आवेग भी...

कहानियाँ
जयश्री राय
खारा पानी
सुख के दिन
सूअर का छौना
अपनी कैद
काली-कलूटी
छुट्टी का दिन

नाटक
भुवनेश्वर
एकांकी के भाव

निबंध
नामवर सिंह
प्रगतिशील साहित्य धारा में अंध लोकवादी रुझान

आलोचना
उमेश चौहान
यथार्थ का सत्यापन करती कहानियाँ
(शिवमूर्ति की कहानियों पर केंद्रित)

बाल साहित्य - कविता
विनोद कुमार शुक्ल

उद्भ्रांत की कविताएँ


पिछले हफ्ते

स्वाभिमानी
(उपन्यास)

इवान तुर्गेनेव

कहानियाँ
जैनेंद्र कुमार
एक रात
नीलम शंकर
उम्मीद और रोशनी
घिर्रराऊ
बुधना वाया बुद्धिदेव

निबंध
बालकृष्ण भट्ट
मन के गुण
महत्व
हिंदू जाति का स्वाभाविक गुण
ईमानदारी
सुख-दु:ख का अलग अलग विवेचन
संग्राम
तेजस्विता या प्रभुशक्ति
ग्राम्य-जीवन
कर्तव्य परायणता
ज्ञान और भक्ति

आलोचना
सूरज पालीवाल
जीवन की धूप और छाँह के चितेरे
(अमरकांत की कहानियों पर केंद्रित)

बाल साहित्य - कहानी
अरशद खान
नाना का घर - जादू-मंतर

बाल साहित्य - कहानी
विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी
ओ पापड़ वाले मुझसे पंगा न ले

कविताएँ
भवानी प्रसाद मिश्र : घर की याद
शमशेर बहादुर सिंह : टूटी हुई, बिखरी हुई
गजानन माधव मुक्तिबोध : चाँद का मुँह टेढ़ा है

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का मास्टरपीस
आखिरी अध्याय
हाजी औरंगजेब खान इमारती लकड़ी के सौदागर और आढ़ती

मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूँ
सआदत हसन मंटो

मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की। दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की। लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ। लीडर और दवाफरोशी दोनों पेशे हैं। राजनीति से मुझे उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी गांधीजी को सिनेमा से थी। गांधीजी सिनेमा नहीं देखते थे, और मैं अखबार नहीं पढ़ता। दरअसल हम दोनों गलती करते हैं। गांधीजी को फिल्में जरूर देखनी चाहिए थीं, और मुझे अखबार जरूर पढ़ने चाहिए। मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहानी कैसे लिखता हूँ। इसके जवाब में मैं कहूँगा कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ, कागज-कलम लेता हूँ और 'बिस्मिल्ला' कहकर कहानी शुरू कर देता हूँ। मेरी तीनों बेटियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उन से बातें भी करता हूँ। उनके लड़ाई-झगड़े का फैसला भी करता हूँ। कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, पर कहानी भी लिखता रहता हूँ। सच पूछिए तो मैं वैसे ही कहानी लिखता हूँ, जैसे खाना खाता हूँ, नहाता हूँ, सिगरेट पिता हूँ और झक मरता हूँ। अगर पूछा जाए कि मैं कहानी क्यों लिखता हूँ, तो कहूँगा कि शराब की तरह कहानी लिखने की भी लत पड़ गई है। मैं कहानी न लिखूँ, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या गुसल नहीं किया है या शराब नहीं पी है। दरअसल मैं कहानी नहीं लिखता हूँ, बल्कि कहानी मुझे लिखती है। मैं बहुत कम-पढ़ा लिखा आदमी हूँ। वैसे तो मैंने दो दर्जन किताबें लिखी हैं और जिस पर आए दिन मुकदमे चलते रहते हैं। जब कलम मेरे हाथ में न हो, तो मैं सिर्फ

सआदत हसन होता हूँ! कहानी मेरे दिमाग में नहीं, मेरी जेब में होती है, जिसकी मुझे कोई खबर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई कहानी निकाल आए। कहानी लिखने की बहुत कोशिश करता हूँ, पर कहानी दिमाग से बाहर नहीं निकलती। आखिर थक-हारकर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ। अनलिखी कहानी की कीमत पेशगी वसूल कर चुका हूँ, इसलिए बड़ी झुँझलाहट होती है। करवट बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चियों को झूला-झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ, घर में इधर-उधर बिखरे नन्हें-मुन्ने जूतें उठाकर एक जगह रखता हूँ, पर कमबख्त कहानी जो मेरी जेब में पड़ी होती है, मेरे दिमाग में नहीं आती और मैं तिलमिलाता रहता हूँ। जब बहुत ही ज्यादा कोफ्त होती है, तो गुसलखाने में चला जाता हूँ, पर वहाँ से भी कुछ मिलता नहीं। सुना है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मुझे अपने तजुर्बे से पता लगा है कि मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ, पर हैरानी है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ। इस बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि या तो मेरे आलोचकों को खुशफहमी है फिर मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ। ऐसे मौकों पर, जब कहानी नहीं ही लिखी जाती, तो कमी यह होता है कि मेरी बीवी मुझसे कहती है, "आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए!" मैं उसके कहने पर लिखना शुरू कर देता हूँ। उस समय दिमाग बिल्कुल खाली होता है, पर जेब भरी हुई होती है। तब अपने आप ही कोई कहानी उछलकर बाहर आ जाती है। उस नुक्ते से मैं खुद को कहानीकार नहीं, बल्कि जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद काटता है और लोगों के हवाले कर देता है। मैंने रेडियो के लिए जो नाटक लिखे, वे रोटी के उस मसले की पैदावार हैं, जो हर लेखक के सामने उस समय तक रहता है, जब तक वह पूरी तरह मानसिक तौर पर अपाहिज न हो जाए। मैं भूखा था, इसलिए मैंने यह नाटक लिखे। दाद इस बात की चाहता हूँ कि मेरे दिमाग ने मेरे पेट में घुसकर ऐसे हास्य-नाटक लिखे हैं, जो दूसरों को हँसाते हैं, पर मेरे होठों पर हल्की-सी मुस्कराहट भी पैदा नहीं कर सके। रोटी और कला का रिश्ता कुछ अजीब-सा लगता है, पर क्या किया जाये! खुदावंदताला को यही मंजूर है। यह गलत है कि खुदा हर चीज से खुद को निर्लिप्त रखता है और उसको किसी चीज की भूख नहीं है। दरअसल उसे भक्ति चाहिए और भक्ति बड़ी नर्म और नाजुक रोटी है, बल्कि चुपड़ी हुई रोटी है, जिस से ईश्वर जितना कहानीकार और कवि नहीं है। उसे रोटी की खातिर लिखना पड़ता है। मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बहुत बड़ा नाम है। अगर यह खुशफहमी न हो तो जिंदगी और भी मुश्किल बन जाये। पर मेरे लिए यह एक तल्ख हकीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूँढ नहीं पाया हूँ। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ। मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेंट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है कि परहेज शब्द ही मेरे लिये डिक्शनरी से गायब हो गया है। मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज से गुजारी जाए, तो एक कैद है। अगर वह बद परहेजियों में गुजारी जाए, तो भी कैद है। किसी-न-किसी तरह हमें इस जुर्राब के धागे का एक सिरा पकड़कर उसे उधेड़ते जाना है और बस!

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