आइए पढ़ते हैं : रतननाथ सरशार का उपन्यास :: आजाद-कथा
देशांतर (9 फरवरी 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

माया बाजार
क्रिस्टिना रोसोटी

सुबह और शाम
लड़कियों के कानों में गूँजता था यह शोर
“आओ-आओ बाग के ताजे फल ले लो
आओ ले लो, आओ ले लो -
सेब और वीही
नींबू और संतरे
रस से भरी चेरी
खरबूजे और रसभरी
लाल-लाल गालों जैसी नाशपाती
मस्त सिरों वाले शहतूत
जंगल में पैदा हुए क्रेनबेरी
ललमुँहा-सेब,
अनानास, ब्लैकबेरी
अखरोट, स्ट्राबेरी
पके हैं सारे साथ-साथ
गर्मी के मौसम में
सरकती सुबह में
शाम की महकती हवा में
आओ ले लो, आओ ले लो
बेल से टूटे ताजे अंगूर
भरपूर दानों से भरे अनार 
खजूर और अजब तेज
बगूगोशा और नाक
डैमसनस् और डिलबेरीज
चख के देखो, ले के देखो
मुनक्का और करौंदा
सुर्ख लाल बारबेरीज
मुँह में भर जाएँ ऐसे अंजीर
दक्षिण से आई खट्-मिट्ठी
जो जीभ पर जाए घुल और आँखों में छा जाए
आओ-आओ, जल्दी आओ”

शामों-सहर
नदी किनारे
लौरा सिर झुकाए, कान लगाए
इस गाने पर ध्यान लगाए
बैठी रहती थी
लिजी ढाँपती कान उसके
समेट लेती खुद में उसको   
सुहाने मौसम में
अपनी गुदाज बाँहों में, सावधान करते होंठों से
अपने सिहरते गालों से, काँपती उँगलियों से
लौरा ने कहा “करीब हो जाओ”
उसके सुनहरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए बोली -
“हमें बिल्कुल नहीं देखना चाहिए उन मायावी बौनों को
न ही खरीदने चाहिए उनके फल
किसे पता वो किस मिट्टी में हैं उगे
किसे पता उनकी जड़ों में किस हवस की प्यास है”

“आओ आओ ले के जाओ”
बौने व्यापारियों की आवाज
घाटी में टकराती
उसकी आँखों को ढाँप के इतना की वो बामुश्किल ही कुछ देखे
लिजी कराही "ओह! लौरा तुमको नहीं झाँकना चाहिए उन बौनों की दुनिया में"

पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

पचास पद

सूरदास

सूरदास की कविता में व्यंजित आध्यात्मिकता जीवन-जगत के प्रति कोई वैराग्य का भाव नहीं पैदा करती - जैसा कि ईश्वरोन्मुख साधना का लक्ष्य होना चाहिए - बल्कि वह जीवन की सामान्य प्रक्रिया में हमें और अधिक अनुरक्त करती है क्योंकि वह जीवन-जगत के आत्म-तत्व के बोध की कविता है। इसी के चलते सूरदास की कविता में अवगाहन के बाद यह संभव होता है कि हम कृष्ण को बालरूप में देखते-देखते हर बालक में बाल-गोपाल और हर माँ में माता यशोदा को देखने लगते हैं और इसी तरह हर प्रेमी-प्रेमिका में कृष्ण और गोपी तथा हर मैत्री में ग्वाल-बालों को। इसीलिए यह अस्वाभाविक नहीं लगता कि इस आत्म-बोध से रहित होने पर भी रीतिकालीन कविता के नायक-नायिका कृष्ण और राधा ही क्यों नजर आते हैं - स्थूल रूप में ही सही। यह काव्य-संवेदना हमारे प्रत्येक लौकिक कार्य-व्यापार में अंतर्निहित उस पवित्रता की अनुभूति संभव करती है जो सृष्टि के एकत्व के बोध से प्रसूत है - वह एकत्व-बोध जो वस्तु-मात्र में अंतर्निहित आत्म के बोध का सह-साध्य है। - नंदकिशोर आचार्य।

कहानियाँ
सुदर्शन
साइकिल की सवारी
अमरकांत
बहादुर
दूधनाथ सिंह
रक्तपात
स्वदेश दीपक
किसी एक पेड़ का नाम लो
नवीन सागर
तीसमार खाँ

यात्रा संस्मरण
रामजी तिवारी
आदमी का अपना देश : केरल

विशेष
रवि रंजन
भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र और पदमावत
दिविक रमेश
भारतीय बालसाहित्य में पशु और पक्षी

आलोचना
पंकज पाराशर
धर्म, समाज और भारतीय राष्ट्र
(संदर्भ : भीष्म साहनी की कहानियाँ)

शोध
अनामिका
प्रेम और द्वंद्व की कहानी : यही सच है
कृष्ण कुमार मिश्र
उन्नीसवीं सदी के अंत की हिंदी कविता और ठाकुर जगमोहन सिंह

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(कुलपति)

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ISSN 2394-6687

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