आइए पढ़ते हैं : कुँवर नारायण की कविताएँ
बात इस हफ्ते लोक

कविता का जीवन
बेन ओकरी
अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

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ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की जरूरत आज कहीं ज्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की जरूरत है। हमें उस अप्रत्यक्ष आग्रह की जरूरत है, जो 'सुने जाने के जादू’ के प्रति कविता करती है। उस दुनिया में, जहाँ बंदूकों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है - हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित हो। हमें उस आवाज की जरूरत है, जो हमारी खुशियों से बात कर सके, हमारे बचपन और निजी-राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन से बात कर सके। वह आवाज जो हमारे संदेहों, हमारे भय से बात कर सके; और उन सभी अकल्पित आयामों से भी जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं, बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं - हमारा होना, जिस होने को सितारे अपनी फुसफुसाहटों से छुआ करते हैं।

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राजनीति की अपेक्षा कविता हमारे कहीं करीब है। वह हमारे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना चलना और खाना। जब हम जन्म लेते हैं, तो दरअसल श्वास और कविता की स्थितियों में ही जन्म लेते हैं। जन्म लेना एक काव्यात्मक स्थिति है - आत्मा का देह में बदल जाना। मृत्यु भी एक काव्यात्मक स्थिति है - देह का आत्मा में बदल जाना। यह एक चक्र के पूरा हो जाने का चमत्कार है - यह जीवन की न सुनी गई मधुरता का एक अपरिमेय चुप्पी में लौट जाना है। जीवन और मृत्यु के बीच जो भी कुछ हमारा दैनंदिन क्षण होता है, वह भी प्राथमिक तौर पर काव्यात्मक ही होता है : यानी भीतरी और बाहरी का संधि-स्थल, कालहीनता के आंतरिक बोध और क्षणभंगुरता के बाह्यबोध के बीच।

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राजनेता राज्य के हालात के बारे में बात करते हैं, कवि जीवन की बुनियादी धुनों में गूँजते रहने में हमारी मदद करते हैं, चलने के छंद में, बोलने की वृत्ताकार रुबाइयों में, जीने के रहस्यमयी स्पंदनों में। कविता हमारे भीतर एक अंतर्संवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है। हम पूरी दुनिया से कविता की आवाजों को एक साथ ले आएँ, और अपने हृदयों को एक उत्सव में तब्दील कर दें, एक ऐसी जगह जहाँ स्वप्न पलते हों। और हमारा दिमाग सितारों की छाँव में अनिवार्यताओं की अकादमी बन जाए।

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कविता सिर्फ वही नहीं होती जो कवि लिख देते हैं। कविता आत्मा की फुसफुसाहटों से बनी वह महानदी भी है, जो मनुष्यता के भीतर बहती है। कवि सिर्फ इसके भूमिगत जल को क्षण-भर के लिए धरातल पर ले आता है, अपनी खास शैली में, अर्थों और ध्वनियों के प्रपात में झराता हुआ।

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संभव है कि प्राचीन युगों के त्रिकालदर्शी मौन हों, और अब हम उन विभिन्न तरीकों में कदाचित विश्वास न करते हों, जिनसे ईश्वर हमसे या हमारे माध्यम से बोला करता था। लेकिन जिंदा रहने का अर्थ है कि हम कई सारे दबावों के केंद्र में उपस्थित हैं - समाज की माँग के दबाव, अपने होने के बिल्कुल अजीब ही दबाव, इच्छाओं के दबाव, अकथ मनःस्थितियों और स्वप्नों के दबाव और इस नश्वर जीवन के हर प्रवाह के बीच शक्तिशाली हो जाने की अनुभूतियों के दबाव।

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हम अपने मतभेदों पर बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं। कविता हमें, हमारे यकसाँपन के अचंभे की ओर ले आती है। यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंततः हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ हमारी नहीं, दरअसल हर किसी की हैं। हमें राजनीति की अपेक्षा कविता की अधिक आवश्यकता है, लेकिन हमें कविता की संभावनाओं में वृद्धि भी करते रहना होगा। कविता अनिवार्यतः दुनिया को बदल नहीं देगी। (अत्याचारी भी कई बार कवि-रूप में जाने जाते हैं, कहना चाहिए कि बुरे कवि के रूप में।) जब तक कविता हमारी बुद्धि को सवालों के दायरे में भेजती रहेगी, हमारी मुलायम मनुष्यता को गहरे से छूती रहेगी, तब तक वह हमेशा सौंदर्य का तेज बनी रहेगी, भलाई का वेग बनी रहेगी, तमंचों और नफरतों के शोर को धीरे-धीरे शून्य करती हुई।

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कविता की असाधारणता का कारण बहुत स्पष्ट है। कविता उस मूल शब्द का वंशज है, जिसे हमारे संतों ने सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना है। कविता, अपने उच्चांक पर, सृष्टि की सर्जनात्मक शक्ति को अपने भीतर जीवित रखती है। वे सभी चीज़ें, जिनके पास आकार होता है, जो परिवर्तित होती हैं, जो अपना कायांतरण कर लेती हैं - कविता उन सभी चीजों का सशरीर अवतार है। शब्द भी कैसी मिथ्या है न! शब्द का वजन कौन माप सकता है, भले एक पलड़े में आप सत्य का हल्का पंख रख दें, दूसरे में शब्द - क्या वैसा संभव है? फिर भी हृदय के भीतर शब्दों का कितना वजन होता है, हमारी कल्पनाओं, स्वप्नों में, युगों-युगों से चली आ रही अनुगूँजों में, उतने ही टिकाऊ जितने कि पिरामिड। हवा से भी हल्के होते हैं शब्द, फिर भी उतने ही रहस्यमयी तरीके से चिरस्थायी, जितना कि जिया गया जीवन। कविता हमारे भीतर की देवतुल्य उपस्थितियों के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूँज में बदल जाने का कारण बनती है।

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कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं माँगते। सच्चे कवि सिर्फ यही चाहते हैं कि आप इस पूरी सृष्टि के साथ किए गए उस अनुबंध का सम्मान करें, जो आपने इसकी वायु के अदृश्य जादू से अपनी पहली साँस खींचते समय किया था।

लफ़्टंट पिगसन की डायरी
(हास्य-व्यंग्य शैली का अद्वितीय उपन्यास)
बेढब बनारसी

पान की इतनी प्रशंसा सुनकर मैंने अपने विचार को काम में लाना ही उचित समझा और चार बीड़े पान मुँह में रखे। फिर उसे दाँत से कूँचने लगा। कूँचने के दो मिनट बाद ही क्या देखता हूँ कि मेरे मुख से चार धारायें फूटकर निकल पड़ीं। एक मेरी दाहिनी ओर कोट के कालर पर से होती बह चली, दूसरी मेरी बायीं ओर। तीसरी नेकटाई पर से और चौथी गरदन पर से होती हुई कालर के भीतर-भीतर सीने की ओर वह निकली, जैसे किसी झरने से चार नदियाँ बह निकलें। जान पड़ता था कि मैं लड़ाई के मैदान में हूँ। गोली लगी है और रक्त की धारायें बह चली हैं।

कहानियाँ
शशिभूषण द्विवेदी
खेल
शालिग्राम
छुट्टी का दिन
कहीं कुछ नहीं
एक बूढ़े की मौत

निबंध
हजारी प्रसाद द्विवेदी
देवदारु

व्यंग्य
विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक
दुबेजी की चिट्ठियाँ

आलोचना
रवि रंजन
दिनकर का आलोचना साहित्य

बाल साहित्य - नाटक
लक्ष्मीनारायण लाल
बंदर का खेल

कविताएँ
कुँवर नारायण


पिछले हफ्ते

अंगारे
(उर्दू की अत्यंत चर्चित, विवादास्पद तथा ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंधित किताब)
अनुवाद : शकील सिद्दीकी

इस किताब के लेखक इस संबंध में किसी प्रकार की क्षमा याचना के इच्‍छुक नहीं हैं, वो इसे वक्‍त के सुपुर्द करते हैं वो किताब के प्रकाशन के परिणामों से बिलकुल भयभीत नहीं हैं और इसके प्रसार एवं इसी तरह की दूसरी कोशिशों के प्रसार के अधिकार का समर्थन करते हैं, वो मूल रूप में समूची मानवता और विशेष रूप से भारतीय अवाम के लिए महत्‍वपूर्ण उद्देश्‍यों के सिलसिले में आलोचना की आजादी तथा अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार का खुला समर्थन करते हैं। इस क्रम में 'अंगारे' के लेखकों ने इस्‍लाम का इंतखाब इसलिए नहीं किया कि उन्‍हें इस्‍लाम से कोई खास चिढ़ है बल्कि इसलिए कि वो खुद इस्‍लामी समाज में जन्‍में हैं और अपने आपको इस समाज के बारे में चर्चा करने का ज्‍यादा अहल समझते हैं! यहाँ उन्‍हें बुनियादी मूल्‍यों का ज्‍यादा अंदाजा था। किताब का या उसके लेखकों का जो भी हस्र हो हमें यकीन है कि दूसरे लिखने वाले हिम्‍मत न हारेंगे। हमारा व्‍यावहारिक प्रस्‍ताव यह है कि फौरी तौर पर 'प्रोग्रेसिव राईटर्स लीग' का गठन किया जाए! जो समय-समय पर इस तरह की दूसरी रचनाएँ अंग्रेजी व अन्‍य भाषाओं में प्रकाशित करें। हम उन तमाम लोगों से जो हमारे इस ख्‍याल से सहमत हों, अपील करते हैं कि वो हमसे राब्‍ता कायम करें और अहमद अली से खतो किताबत करें।

कहानियाँ
गणेशशंकर विद्यार्थी
हाथी की फाँसी
राजेंद्र यादव
जहाँ लक्ष्मी कैद है
अरुण प्रकाश
जल-प्रांतर
जयनंदन
गोड़पोछना
राकेश मिश्र
सभ्यता समीक्षा

संस्मरण
दिनेश कुशवाह
राजेंद्र यादव : हम जा मिले खुदा से दिलवर बदल बदल कर

निबंध
बालकृष्ण भट्ट
कष्टात्कष्टतरंक्षुधा
मनुष्य की बाहरी आकृति मन की एक प्रतिकृति है
कवि और चितेरे की डाड़ा मेड़ी
पौगंड या कैशोर
शब्दों की आकर्षण शक्ति
माता का स्नेह
मुग्ध माधुरी
चरित्रपालन
चारुचरित्र
कल्पना शक्ति

व्यंग्य
पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'
नेता का स्थान

चिंतन
वाल्टर बेंजामिन
छोटी परछाइयाँ

बात
ग्राउचो मार्क्स
उसने कहा था

अभय कुमार दुबे
समाज-विज्ञान विश्वकोश

बाल साहित्य - कहानी
जयशंकर प्रसाद
छोटा जादूगर

कविताएँ
परमानंद श्रीवास्तव

लघुकथाएँ
विजयदान देथा

विचित्र अधिकार

एक महात्मा फेरी पर जा रहे थे। एक नवेली बहू ने न तो उन्हें दक्षिणा में आटा डाला और न उन्हें रोटियाँ ही दीं। महात्मा को काफी गुस्सा आया। उनकी ऐसी शान तो पहली बार ही बिगड़ी। रास्ते भर उसे कोसते हुए, बुरा-भला कहते हुए बड़बड़ाते जा रहे थे कि सर पर लकड़ियों की भारी उठाए बहू की सास मिल गई। उसे रोककर कहने लगे, कैसी कुलच्छनी बहू लाई हो जो हाथ की बजाए संतों को मुँह से उत्तर दे। क्या एक अंजलि भर आटे व एक रोटी से भी साधु सस्ता हो गया? महात्मा के भेख में एक कुत्ते जितनी भी इज्जत नहीं रखी। मुँह के सामने ही साफ मना कर दिया कि मुफ्तखोर साधुओं को देने के लिए आटा नहीं पीसा। अब तो घर-घर बहुओं का राज होने लगा है। थोड़े दिन बाद तो खुद भगवान भी भूखे मरने लगेंगे। महात्मा की बात सुनकर सास आगबबूला हो गई। अविश्वास के भाव से पूछा, सच कह रहे हैं? नहीं तो क्या झूठ बोल रहा हूँ। लगता है अब इन बहुओं के कारण हमें भी झूठ सीखना पड़ेगा। फिर तो यह दुनिया जीने के काबिल नहीं रहेगी। नहीं महाराज, आप अपने मुँह से ऐसी बात न करें, सुनने से ही पाप लगता है। चलिए मेर साथ। बड़ी आई नवाबजादी, जीभ न खींच लूँ तो मेरे नाम पर जूती। खड़े-खड़े देख क्या रहे हैं, चलिए न मेरे साथ। महात्मा ने सास का यह रंग-ढंग देखा तो बड़े प्रसन्न हुए। बार-बार मना करने पर उसके सर की भारी अपने कंधे पर धरने के बाद ही वे उसके पीछे-पीछे चले। सास गुस्से में तेज चलती हुई बहू को दनादन गालियाँ निकाल रही थी। सुनकर महात्मा को भी अचरज हुआ कि इत्ती गालियाँ तो वे भी नहीं जानते। पर मन-ही-मन बड़े खुश थे कि सास-बहू के झगड़े में उनके पौ-बारह हो जाने हैं। लकड़ियों का भारी बोझ उन्हें फूलों की डलिया जैसा हल्का लगा और उधर भार उतरने से सास का मुँह और ज्यादा खुल गया था। घर पहुँचते ही महात्मा जी से भारी लेकर वह दनदनाती अंदर पहुँची। गले की पूरी ताकत से बहू को झिड़कते हुए उसने अंत में पूछा, बोल तूने, सचमुच महात्मा जी को मना किया? बहू ने धीमे से अपराधी के नाईं हामी भरी। सास की आँच और तेज हो गई, बेशऊर कहीं की! तेरी इतनी हिम्मत कि मेरे रहते तू मना करे? महात्मा मन ही मन सोचने लगे कि आज तो यह झोली छोटी पड़ जाएगी। बड़ी लाते तो अच्छा रहता। उन्हें क्या पता कि सास इतनी भली है! उबलती हाँडी के ढक्कन के तरह फदफदाते सास बाहर आई। पर खाली हाथ। गुस्से के उसी लहजे में बोली, भला आप ही बताइए, मेरे रहते वह मना करनेवाली कौन होती है? मरने के बाद भी उसकी ऐसी हिम्मत क्या हो जाए! मना करूँगी तो मैं करूँगी। यूँ मुँह बाए क्यूँ खड़े हैं? हाथ-पाँव हिलाते मौत आती है! खबरदार कभी इधर मुँह किया तो। इस घर की मालकिन हूँ तो मैं हूँ, एक बार नहीं सौ बार मना करूँगी। फौरन, अपना काला मुँह करिए यहाँ से। बेकार झिकझिक करने की मुझे फुरसत नहीं है। बेचारे महात्मा ने डरते-सहमते अपने सर पर हाथ फेरा। सचमुच, लकड़ियों का गट्ठर तो सास उतार ले गई थी, फिर यह असह्य बोझ काहे का है? उनके पाँव मानो धरती से चिपक गए हों।

‘मैं री मैं’

एक मालदार जाट मर गया तो उसकी घरवाली कई दिन तक रोती रही। जात-बिरादरी वालों ने समझाया तो वह रोते-रोते ही कहने लगी, ‘पति के पीछे मरने से तो रही! यह दुःख तो मरूँगी तब तक मिटेगा नहीं। रोना तो इस बात का है कि घर में कोई मरद नहीं। मेरी छः सौ बीघा जमीन कौन जोतेगा, कौन बोएगा?’ हाथ में लाठी लिए और कंधे पर खेस रखे एक जाट पास ही खड़ा था वह जोर से बोला, ‘मैं री मैं’ जाटनी फिर रोते-रोते बोली, ‘मेरी तीन सौ गायों और पाँच सौ भेड़ों की देखभाल कौन करेगा? उसी जाट ने फिर कहा, ‘मैं री मैं’ जाटनी फिर रोते रोते बोली, ‘मेरे चारे के चार पचावे और तीन ढूँगरियाँ हैं और पाँच बाड़े हैं उसकी देखभाल कौन करेगा?’ उस जाट ने किसी दूसरे को बोलने ही नहीं दिया तुरंत बोला, ‘मैं री मैं’ जाटनी का रोना तब भी बंद नहीं हुआ। सुबकते हुए कहने लगी, ‘मेरा पति बीस हजार का कर्जा छोड़ गया है, उसे कौन चुकाएगा?’ अबके वह जाट कुछ नहीं बोला पर जब किसी को बोलते नहीं देखा तो जोश से कहने लगा, ‘भले आदमियों, इतनी बातों की मैंने अकेले जिम्मेदारी ली, तुम इतने जन खड़े हो, कोई तो इसका जिम्मा लो! यों मुँह क्या चुराते हो!’

साधु की कमाई

एक जाट बैलगाड़ी से कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे एक साधु मिला। चौधरी भला था गाड़ी रोकते हुए कहा, ‘महाराज, जय राम जी की! गाड़ी के रहते आप पैदल क्यों जा रहे हैं! रास्ता आराम से कटे उतना ही अच्छा। आइए, गाड़ी पर बैठ जाइए! आपकी संगत से मुझे भी थोड़ा धरम-लाभ हो जाएगा।’ महाराज के पास एक वीणा थी। पहले उसे गाड़ी पर रखा और फिर खुद भी बैठ गया। चौमासे के कारन रास्ता बहुत उबड़खाबड़ था। हिचकोलों से गाड़ी का चूल-चूल हिल गया। चौधरी ने बैलों को पुचकारकर रास खींची। नीचे उतरकर देखा - पहिए की पुट्ठियाँ खिसककर बाहर निकल आई थीं। ठोंकने के लिए और कुछ नहीं दिखा तो उसने महाराज की वीणा उठा ली। एक तरफ बड़ा-सा तूंबा देख कर उसे लगा यह ठोंकने के लिए अच्छा औजार है। उसने पूरे जोर से पुट्ठी पर वीणा का प्रहार किया। तूंबा भीतर से थोथा था। पुट्ठी और पाचरे पर पड़ते ही उसके परखच्चे उड़ गए। चौधरी ने महाराज को उलाहना दिया, ‘वाह महाराज, सारी उम्र भटककर एक ही औजार सहेजा और वह भी थोथा! आपकी इस भगति में मुझे कुछ सार दिखा नहीं।’

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