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कविता

इस समय के किस्सागो को समझे जाने की ज़रूरत है
महेश वर्मा


मृतकों के बारे में बताता हुआ वह मनुष्यों से अपने विवश जुड़ाव
को व्यक्त कर रहा है, कम से कम एक वस्तु तो उन्हें मान ही रहा
है जिसे पहचानता है।

सफ़ेद बर्फ़ जिसमें कोई जीवाश्म भी जीवित नहीं विकिरण भी
नहीं, बताते हुए उसके पास पानी की एक पुरानी (उदास) याद
तो है।

खिड़की के बाहर की स्थिरता जिसमें वायुमंडल की खाली
जगह है और कँटीली झाड़ियाँ, इसमें ही से आपको ढूँढ़ लेने
हैं इतिहास और नृविज्ञान के संदर्भ।

उसके किस्सों में काफी कुछ दर्ज है भाई अब भी।

 


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हिंदी समय में महेश वर्मा की रचनाएँ