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कहानी

कॉफी-मग
अमिता नीरव


मृत्यु का सारा दर्शन चाहे वह पूर्वी हो या फिर पश्चिमी... मरने वाले की दृष्टि से ही है। उसके अपनों के लिए कोई दर्शन नहीं, कोई सांत्वना, कोई राहत नहीं...। उसे तो बस अभाव, दुख, अकेलापन सहना ही सहना है। कोई कितनी भी कोशिश कर ले, जब मन दुखी हो तो नहीं ही बहलता है। डॉ. शुद्धोधन अवस्थी अपने दुख से लड़ते हैं... तो कभी अपनी रिक्तता से लड़ते हैं, जब ये दोनों नहीं होती, तब इस बात पर संघर्ष करते हैं कि उन्हें दुख नहीं है...? छह महीने लगभग हो गए हैं, वैदेही को गुजरे। शुरुआती वक्त बहुत मुश्किल से निकला। आखिर पिछले ४० साल उसी के साथ... उसी के सहारे ही तो कटे। पुरुष मन यह मानने से तो बचता है कि जीवन की दौड़ में एक स्त्री उसका संबल है... अवलंब है। तब तो और भी ज्यादा, जब वह पत्नी हो। परंपरा से तो यही सीखा है कि जिससे आप शादी करें, वह उम्र में... कद में छोटी, आपसे कम पढ़ी-लिखी और यदि कमाती हो तो आपसे कम कमाती और आपसे बेहतर पद पर आसीन नहीं होनी चाहिए। जब ये सब देखा जाता है, तो ऐसे में यह मानना कितना तकलीफदेह होता होगा कि एक स्त्री के बिना उनकी जिंदगी का खाका उतना सुंदर नहीं हो सकता है, जितना उसके होने से होता है।

डॉ. अवस्थी जानते हैं कि उन्होंने जीवन भर सिर्फ पढ़ा और पढ़ाया ही है, बाकी उनके जीवन में सारे रंग वैदेही ने ही भरे हैं, सजाए हैं, उनके जीवन को परिपूर्ण किया है। कितने तो रंग रहे उनके जीवन में... प्रेम के, वात्सल्य, उल्लास, उत्साह, अपनेपन के, सारे ही रंग वैदेही की वजह से ही तो थे। उसके न रहने से कितना सूना-सा हो गया है, सब कुछ।

आज भी वह उसी शिद्दत से याद आ रही है। दोपहर का वक्त है, अमोघ और राजश्री दोनों ही अपने-अपने काम पर चले गए हैं। मोक्ष हॉस्टल... अनु तो अपनी माँ के मरने के १५वें दिन ही अपने ससुराल लौट गई थी। एकाएक भरा-पूरा घर वीरान हो गया था। क्या एक स्त्री इतनी परिपूर्ण होती है, कि उसका होना ही घर और मन के सारे कोनों को भरकर गुंजायमान रखता है? डॉ. अवस्थी अब भी इस सवाल से जूझते रहते हैं। गोयाकि इसे मान लेने से ही उनके जीवन का अभाव ज्यादा विकराल, ज्यादा विस्तृत हो जाएगा।

अक्सर सूनी दोपहर उनके कुछ रिटायर्ड सहकर्मी और टाउनशिप में रहने वाले उनके हमउम्र रिटायर्ड लोग उनके घर को अपना डेरा बनाए रहते हैं। लेकिन दोपहर तक का समय बड़ा मुश्किल से गुजरता है। यह वैसा ही समय था, जब बच्चे अपने-अपने काम पर जा चुके थे। सूना घर भाँय-भाँय कर रहा था, ऐसे में उनका अकेलापन और गहरा हो रहा था। डॉ. अवस्थी अब हर वक्त समय को गुजरते ही देखते रहते हैं। वैदेही थी तब तक तो उत्सव-पर्व-त्योहार सब गुलजार रहा करते थे। कैसे वह हर चीज में रंग की सृष्टि करती रहती थी, डॉ. अवस्थी आज उस सबको समझ पा रहे हैं। कैसे सर्दियों में खाने में रंग-सुगंध भरती थी वह, कैसे गर्मियों में रस-शीतलता...।

उदास मन से उन्होंने अपने आस-पास पर नजर फेरी थी, वॉल-टू-वॉल विंडो के उस तरफ लॉन में लाल, गुलाबी, सफेद गुलाब खिले थे। रजनीगंधा पर सफेद-गुलाबी कलियाँ झूम रही थीं। ट्रक के टायरों से बने झूलों पर बँधे घुँघरू उत्तर की तरफ से आती ठंडी हवाओं में सिहरकर बज रहे थे। उन्होंने बेदिली से अपनी नजर वहाँ से हटा ली। कहाँ नजर डालूँ? हर तरफ तो वही नजर आती है। कमरे में सामने लगा आदमकद आईना... पलंग की चादर, किताबों की रैक और टेबल पर रखा हुआ टेबल लैंप... छत पर लटका पंखा और नाइट बल्ब... क्या-क्या और कहाँ-कहाँ वैदेही नहीं है? खिड़की पर झूलते पर्दे और पोर्च में लटका विंड शाइम... दरवाजे के इर्द-गिर्द टँगा ग्रामीण जोड़ा और ड्राईंग रूम की दीवार पर लटका अमोघ की शादी का पारिवारिक फोटो... खिड़की के पास लगी तीन फ्रेम में मोक्ष, बुलबुल और श्लोक के बचपन के चित्र... सब कुछ कितना तरतीब से सजाया था उसने। छह महीने की उसकी अनुपस्थिति में भी जैसे वही इस घर में रह रही हो। खुद राजश्री भी तो उसके टेस्ट की कायल थी। अपने भाई की शादी के लिए सारी खरीददारी उसने वैदेही के साथ ही तो की थी। अमोघ इससे बहुत रिलेक्स हो गया था। हालाँकि वैदेही थक जाया करती थी, लेकिन बहू के उत्साह से वह स्वयं भी संचालित रहा करती थी।

डॉ. अवस्थी फिर से उदास हो गए थे। घड़ी की तरफ नजर घुमाई थी, डेढ़ बज गया था। अब खाना खा लेना चाहिए, नहीं तो एसिडिटी हो जाएगी। अब वैदेही तो है नहीं कि सारा किचन निकालकर मेरा इलाज करेगी। राजश्री के करने की अपनी सीमा है, जो पत्नी कर सकती है, वो कोई और नहीं कर सकता है। बेटी भी नहीं, बहन भी नहीं। अब उनका सिर दर्द करने लगा।

बैंगन की सब्जी और मूँग की दाल... अरे ये कोई कांबिनेशन है? भई बैंगन की सब्जी के साथ तो अरहर ही स्वाद देती है। अब कहो तो तुरंत अमोघ कह देगा पापा आपको एसिडिटी की प्रॉब्लम है। बैंगन और अरहर दोनों दिक्कत देती है। कम से कम एक से तो कम दिक्कत हो। कहता तो ठीक ही है, लेकिन जबान की भी अपनी माँग होती है न...! थोड़ी देर के लिए डॉ. अवस्थी ने अपना ट्रांजिस्टर चालू कर लिया। ये भी वैदेही की जिद से ही आया था। कितना तो शौक था उसे संगीत का... सामने पड़े पुराने सीडी प्लेयर पर नजर गई तो रैक में पड़ी कई सारी सीडीज भी दिखाई दी। डॉ. अवस्थी उठकर वहाँ चले गए। किशोरी अमोनकर और भीमसेन जोशी को तो वे स्वयं भी सुनते थे, वैदेही ने एक लड़की का एलबम खरीदा था... बहुत सुंदर-सी...। वे उसे ही ढूँढ़ने लगे, कितनी सुंदर ठुमरी गाई है उसने 'रंगी सारी गुलाबी चुनरिया...।' उस रैक को खोला तो उँगलियों के पोरों में धूल आ लगी। उसके न रहने के बाद शायद इस रैक को कभी किसी ने खोला तक नहीं है। कुछ सुनना तो दूर की बात है। आजकल की जनरेशन क्या संगीत सुनेगी? फिल्मी गानों से ही ऊपर नहीं आती, सूफी, गजल, लोक नहीं सुने तो फिर शास्त्रीय-उपशास्त्रीय क्या सुनेगी। यूँ भी राजश्री गणित पढ़ाती है, संगीत से तो उसका दूर-दूर का भी नाता नहीं है। कभी अमोघ और अनु भी माँ की तरह गजलें सुनते थे, लेकिन जिंदगी की दौड़ में यह सब पीछे चला गया। अनु तो अब भी सुनती हो, अमोघ को तो कभी सुनते नहीं देखा।

मोक्ष, श्लोक, बुलबुल... ये तो पता नहीं क्या सुनते हैं? कोई शकीरा-वकीरा... या कोई जस्टिन बीबर... और भी पता नहीं क्या-क्या ऊलजुलूल...। डॉ. अवस्थी ने अपना सिर हिकारत से झटका। जिंदगी में शऊर और सलाहियत का इस दौर के बच्चों के लिए कोई मतलब भी नहीं है। बाहर हल्की बारिश होने लगी है... थोड़ी देर में बारिश तेज हो गई। चाय की तलब लगने लगी। अभी वे चाय बनाने के बारे में विचार ही कर रहे थे कि डोरबेल बजी। परमजीत और जावेद थे। बारिश की बूँदों को अपने कपड़ों से झाड़ते हुए खड़े थे।

'अरे, बारिश में?' डॉ. अवस्थी ने दोनों को आश्चर्य से देखा।

'भीतर आ जाएँ?' - जावेद ने पूछा।

'अरे हाँ, आओ-आओ।' - डॉ. अवस्थी दरवाजे के एक तरफ हो गए। - 'कहीं और जा रहे थे?'

'अबे तेरे घर की ओर ही आ रहे थे।' - परमजीत ने जोर से डॉ. अवस्थी के कंधे पर हाथ जमाते हुए कहा।

'बैठो... चाय पिओगे? मैं चाय बनाने ही जा रहा था।' - डॉ. अवस्थी ने पूछा। जावेद ने नजरें चुरा लीं, परमजीत ने कहा - 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं। इतना सोंणा मौसम हो रहा है, चाय क्या व्हीस्की भी पी लेंगे हम तो।' - और हो हो कर हँसने लगा।

डॉ. अवस्थी ने उसे घूरकर देखा तो जावेद जोर-जोर से हँसा।

'ओए तो बात ही की है, कोई माँगी तो नहीं है न!' - परमजीत की सफाई पर जावेद ने ठहाका लगाया। अबकी डॉ. अवस्थी थोड़ा सकुचाकर मुस्कुराए और चाय बनाने चल दिए। चाय और बिस्किट लेकर जब बाहर आए तो जावेद ने रंग-बिरंगे कप पर प्रशंसा की नजर डालते हुए कहा 'डॉ. साहब आपके यहाँ कप बहुत सुंदर होते हैं। कहाँ से लाते हैं?'

डॉ. अवस्थी कुछ बोले इससे पहले ही परमजीत बोल पड़ता है 'ओए तू चाय पी न... सुंदर कप में, फालतू की तफ्तीश क्यों कर रहा है?' डॉ. अवस्थी कहना चाहते थे, वैदेही ही लाती है ये सब। उसे बड़ा पसंद है ऐसा सब करना। लेकिन सोचते ही उदास हो गए। अब कहाँ वैदेही? कितना पागलपन था, उसमें क्रॉकरी को लेकर। कितनी एक साथ खरीदती थी? ये कप उसने क्रॉफ्ट मेले से खरीदे थे। तीन तरह के कप पसंद आए थे, वो तो वे स्वयं थे जो उन्होंने कहा कि कोई एक खरीदो। जो सबसे ज्यादा पसंद आए। आखिर कितने एक साथ खरीदोगी? तब उसने ये वाले कप का सेट उठाया था, निराश होकर। राजश्री तो उन्हें देखकर एकदम बावरी ही हो गई थी। एक गहरी साँस ली थी उन्होंने, जैसे दुख बाहर छोड़ा हो। और वर्तमान में लौटे। डॉ. अवस्थी ने पूछा 'तुम दोनों शंभू को लेकर नहीं आए?'

जावेद ने कहा 'शंभूनाथ बीमार हैं। हम गए थे, उसके घर...' और फिर उसने अपनी बात यूँ ही छोड़ दी।

'अरे तो मुझे भी बताया होता, क्या हुआ है?'

'पता नहीं, उसकी कमीनी बहू है न उसने हमें अंदर ही कहाँ जाने दिया...!' - कहते-कहते परमजीत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। डॉ. अवस्थी भी खामोश हो गए। जावेद की आँखों में आँसू की झिल्ली उतर आई। माहौल एकाएक बोझिल हो गया। डॉ. अवस्थी ने कॉर्नर टेबल पर पड़े रिमोट को उठाकर टीवी ऑन कर दिया। बाकी दोनों की नजरें भी टीवी की तरफ उठ गई।

पेरिस के जलवायु सम्मेलन पर रिपोर्ट दिखाई जा रही थी। डॉ. अवस्थी उस पूरी रिपोर्ट को गौर से देख रहे थे, बुदबुदाकर बोले 'कुछ भी होने जाने वाला नहीं है।'

जावेद ने प्रश्नवाचक नजर से उन्हें देखा।

'हाँ, हाँ कुछ भी होने वाला नहीं है। ये कहेंगे कि हमने तो पर्यावरण बर्बाद नहीं किया, वो कहेंगे कि आप ही बर्बाद कर रहे हैं। वो कहेंगे कि हमारी ऊर्जा आवश्यकता के लिए परमाणु रिएक्टर स्थापित करने हैं, अभी ये कहेंगे कि परमाणु ऊर्जा से पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा, बाद में ये ही रिएक्टर लगाने के लिए समझौता करेंगे। न इनकी नीयत है न हमारी औकात... दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी।' - डॉ. अवस्थी ने हिकारत और निराशा से अपनी गर्दन झटकी।

'ओए डॉक्टर तू तो ये बता कि ऐसा क्या हो रहा है कि सारे मिलकर इतना स्यापा मचा रहे हैं? कि इनका अपने-अपने देश में मन नहीं लगता है तो सारे मिलजुल कर पार्टी मना रहे हैं। कुछ नहीं हो तो भी तो बोर हो जाते होंगे न...!' - परमजीत ने डॉ. अवस्थी से पूछा। ट्रांसपोर्ट का कारोबार करने वाले परमजीत के लिए उसकी दुनिया बस उतनी ही है, जहाँ उसके ट्रक गए हैं। बाकी उसकी दुनिया अपना घर, अपना परिवार है। पत्नी है, बेटा-बहू है। चूँकि अब भी सारा कारोबार खुद परमजीत करता है, इसलिए घर में दबदबा है उसका। इसके उलट जावेद ने साइकिल के पंक्चर पका-पकाकर बच्चे को पढ़ाया। बच्चा इंजीनियर हो गया। जावेद की बीवी का दो साल हुए इंतेकाल हो गया। बेटे ने शहर में बुला तो लिया, लेकिन बहू को सुहाता नहीं है। एक मौका नहीं छोड़ती उसे ये जताने का कि यहाँ बुलाकर अहसान किया है। इस मामले में डॉ. अवस्थी किस्मत वाले निकले। बेटा-बहू दोनों नौकरी करते हैं। वैदेही और राजश्री के बीच अच्छी बनती थी। माँ-बेटी की तरह रहा करती थीं दोनों। सभ्य और सुसंस्कृत है राजश्री। दोनों ने बहू-बेटों को आजादी भी दी थी, तो सम्मान अपने-आप मिलने लगा था। ये भी एक बात है कि घर भी डॉ. अवस्थी का है और उन्हें सरकार से अच्छी-खासी पेंशन भी मिलती है। पैसा पास हो तो सब गुलामी करेंगे। लेकिन बात पूरी तरह से ये भी नहीं है। बस कुल मिलाकर सब एक-दूसरे के कंफर्ट का ध्यान रखते हैं। उम्र हो जाने और वैदेही के न होने से अब कभी-कभी डॉ. अवस्थी खीझ भी जाते हैं, लेकिन राजश्री ये नहीं भूलती है कि उसकी पढ़ाई-लिखाई भी तो पापा ने ही करवाई है। वह समझने लगी है कि बूढ़े हो चले हैं, माँ के नहीं होने से अकेले भी। थोड़ा एडजस्ट कर लेना चाहिए। कुल मिलाकर डॉ. अवस्थी को यूँ कोई दिक्कत नहीं है। जो भी है, वह वैदेही के न रहने की है, बस।

'अरे ऐसा नहीं है, कुछ होगा ही तभी तो दुनिया के सारे मुल्क चिंता कर रहे हैं। पूरी दुनिया में कोई तो ऐसा दानिश्वर होगा ही न जो असली मंशा समझता और आज तो कहीं से खड़ा होकर कोई कुछ भी अलाय-बलाय बक दे तो पूरी दुनिया में फैल जाता। तो यदि वो कहेगा तो क्या उस पर कोई मशवरा नहीं किया जाएगा क्या? कुछ गंभीर हो ही रहा होगा, तभी तो ये सब हो रहा है।' - साइकल पंक्चर बनाने वाले जावेद ने अपनी समझ का प्रदर्शन किया।

'है क्यों नहीं? तुझे फर्क दिखाई नहीं देता क्या परमे...?' - डॉ. अवस्थी ने खीझकर पूछा।

'क्या... देखो, पहले सूखा पड़ता था, अकाल पड़ता था। कभी पानी ज्यादा पड़ जाता था तो फसलें खराब हो जाती थी। अनाज मिलना बंद हो जाता था। अब ऐसा कहाँ होता है? कभी अनाज कम हुआ हो, कहीं अकाल पड़ा हो ऐसा तो सुनाई नहीं पड़ता।' - परमजीत ने फिर पूछा।

'अभी कौन-सा महीना चल रहा है?' - डॉ. अवस्थी ने पूछा।

'दिसंबर आया जाता है और क्या?' -परमजीत ने कहा। सबकी चाय खत्म हो गई थी। एक-एक कर कप ट्रे में रखे जा चुके थे।

'तो सर्दी लगी तुझे...!'- डॉ. अवस्थी ने उसे घूरकर देखा।

'हओ... अभी तक सर्दी का नामो-निशान नहीं है। सच कहता है तू डॉक्टर। पर ये तो बता कि ऐसा क्यों हो रहा है?' - परमजीत ने पूछा। डॉ. अवस्थी अभी सोच ही रहे थे कि इस मूढ़मति को कहाँ से और कैसे समझाए कि डोरबेल बजी। डॉ. अवस्थी अपने घुटनों की तकलीफ की वजह से थोड़ा धीरे से उठ पाते हैं। तो उन्हें बैठे रहने का इशारा करते हुए जावेद ने जाकर देखा कि कौन है और फिर दरवाजा खोल दिया। ये उन तीनों के लिए रोजमर्रा का काम है और रजनी बाई का भी। जब वो आती है, तीन-चार बुड्ढे वहाँ बैठे मिलते हैं। इनको भी आदत है उसके आकर काम करने की। उसने किसी की तरफ भी नहीं देखा और तेजी से कप वाली ट्रे उठाकर भीतर जाने लगी। पता नहीं क्या हुआ कि उसके हाथ से ट्रे छूट गई। ट्रे भी टूट गई और कप भी।

डॉ. अवस्थी चिल्लाए 'इतने घरों का काम ले लिया है कि हमेशा हड़बड़ी में ही रहती है। कितना नुकसान कर दिया?' - और उठने को हुए ही थे कि रजनी ने हाथ के इशारे से उन्हें बरजा। 'आप बैठे रहिए, तमाम काँच बिखर गया है।' - उसकी आवाज में उदासी और आत्मीयता की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी। डॉ. अवस्थी अभी उस ध्वनि का अर्थ ग्रहण करते इससे पहले ही परमजीत चिल्लाया 'ओए कुड़िए तू भी वहीं रे... नंगे पैर है। जरा हिली तो काँच पाँव में धँस जाएगा। रुक मैं चप्पल लेकर आया।' और परमजीत ने पोर्च में पड़ी स्लीपर हाथ में उठाकर रजनी के पैरों के पास रख दी। जाने क्या हुआ कि रजनी की आँखें जार-जार बहने लगी।

'ओ तेनू हुआ की है? ऐसे क्यों रो री है?' - परमजीत ने उससे स्नेह से पूछा।

'क्या हुआ बेटा... तेरे मियाँ ने पिटाई तो नहीं की न तेरी?' - डॉ. अवस्थी ने भी उससे चिंता से पूछा। इतनी सारी सहानुभूति, इतना सारा प्यार, इतनी चिंता एक औरत कैसे सह सकती है वह और भी जोर से सुबकने लगी।

'हुआ क्या है बेटी?' - अबकी जावेद ने जाकर उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा। उसने सुबकते हुए पूछा 'क्या आप मेरे भाई को काम दिलवा सकते हैं?'

अबकी तीनों ने एक-दूसरे की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा। रजनी की आँखें फिर से आँसुओं से भर गई। उसने दो घूँट भीतर उतारे, थोड़ा संयत हुई और बोली 'गाँव में मेरा मायका था, तीन महीने पहले बापू ने आत्महत्या कर ली। आप लोगों को याद हो वो फोटो जिसमें किसान ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी?' - उसने उदास और प्रश्न करती आँखों से देखा था।

'हाँ... हाँ...' - एकाएक डॉ. अवस्थी की आँखों के आगे वह तसवीर उभर आई थी। उस रात वे सो नहीं पाए थे। अभी कुछ दिनों पुरानी ही तो बात है।

'हाँ फसल बर्बाद होने की वजह से... वही न?'- डॉ. अवस्थी ने उससे पूछा।

'हाँ, वही... कर्ज बहुत हो गया था। हमारे गाँव में लगातार बारिश होती रही और धूप नहीं निकली तो कपास की फसल में कीड़ा लग गया। बापू ने पहली बार कपास की फसल ली थी, कर्ज लिया था बैंक से। लगा था कि पुराने सारे कर्ज चुका देंगे, गिरवी रखी जमीन भी छुड़वा लेंगे... कितना कुछ सोच लिया था। अम्माँ से कित्ते खुश होकर वो सब कहा करते थे। किसे मालूम था कि बीच में वो ही सब छोड़कर चले जाएँगे।' - वह चुप हो गई। आँखों में फिर आँसू भर आए।

'छोटा भाई है, बारहवीं में पढ़ रहा है। बापू के ऐसे अचानक चले जाने से उसका भी पढ़ाई में मन नहीं लगता है। कर्जदारों ने जमीन पर कब्जा कर लिया है। बैंक का कर्ज है तो घर और बैल कुर्क हो गए। अब माँ और भाई हैं, लेकिन जीने के लिए काम तो चाहिए न...? भाई शहर आया तो मेरा घरवाला कहता है कि मैं हाड़तोड़ मेहनत करके कमाता हूँ, मुफ्तखोरों को नहीं खिलाऊँगा, मैं चाहती थी कि भाई अपनी पढ़ाई पूरी कर ले...' - उसने निराशा में ठंडी साँस छोड़ी। 'उसे काम मिल जाता तो शायद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाता... आप उसे कोई काम दे सकते हैं क्या?' उसने एक उम्मीद से परमजीत की तरफ देखा। वह भी जानती थी कि दादाजी तो रिटायर हो गए हैं, जावेद की तो खुद की स्थिति ठीक नहीं है... बस परमजीत ही कुछ काम दिला पाए तो दिलाए।

'हाँ ओए तू मेरे पास भिजवा देना उसको। मैं देखता हूँ, क्या काम कर सकता है। तू लोड मत ले, सब ठीक हो जाएगा।' - परमजीत ने उसे सांत्वना देते हुए कहा।

'आपका बहुत अहसान होगा। मेरा भाई पढ़ जाएगा तो मेरी माँ का बुढ़ापा सुधर जाएगा। मैं उसे आपके पास भेज दूँगी, भगवान आपको खूब बरक्कत दे।' - कहते-कहते वह अपने काम में लग गई। तीनों एकदम से असहज हो गए।

टीवी पर अब भी वही रिपोर्ट चल रही थी। तीनों चुपचाप वही देख रहे थे। तभी डॉ. अवस्थी ने गला खखारकर परमजीत की से कहा 'ये हो रहा है, जलवायु परिवर्तन से...' परमजीत एकाएक उनकी बात को कनेक्ट नहीं कर पाया। उसने उजबक की तरह डॉ. अवस्थी को देखा 'क्या...?'

'अभी सुना नहीं? रजनी क्या कह गई?' - उन्होंने खीझकर परमजीत से कहा। 'तो...?'

'अरे... याद कर जब हम स्कूल-कॉलेज में पढ़ते थे तो दिसंबर ऐसा हुआ करता था? तूने तो खेती की है, बता क्या इस तरह का मौसम हो तो गेहूँ पकेगा... दाना बनेगा?' ऐसे में क्या तो खेती होगी और क्या लोगों को अनाज मिलेगा?' - चिढ़कर डॉ. अवस्थी ने कहा।

'हाँ, बात तो सही है ओए... गए साल जो सर्दियों में बारिश हुई थी उससे गेहूँ की फसल पूरी बर्बाद हो गई थी, मेरा भांजा बता रहा था। पिछला कर्ज को ठीक से चुका नहीं है, इस बार की फसल पर फिर से मुसीबत...। तो ये सब मौसम में परिवर्तन से हो रहा है?' - परमजीत ने मासूमी से पूछा।

'और नहीं तो क्या...? कोई मौसम अपने समय पर नहीं आता, न जाता है। ठंड जैसे सिकुड़ गई है और गर्मी फैल गई है। बारिश का तो कोई अनुशासन ही नहीं है। जब होना होती है, तब नहीं होती और जब नहीं होना होती है, तब होती रहती है। तो खेती के अतिरिक्त दूसरी और समस्या भी तो होती है न...?' - डॉ. अवस्थी ने सवालनुमा जवाब दिया। दोनों चुप थे, जैसे उनकी बात को समझने की कोशिश कर रहे हो। रजनी का काम पूरा हो गया था। वह बाहर ड्राइंग रूम में आई और परमजीत से बोली 'मैं कल भाई तो आपके घर भेज दूँ क्या?'

'अरे घर क्यों कुडिए... दफ्तर भेज न... सुबह १२ बजे तक उसे भेज देना। उसके बाद मैं दफ्तर से आ जाता हूँ, देविंदर को कुछ समझ नहीं आता।' - परमजीत ने रजनी से कहा।

'जी कल मैं उसे भेज दूँगी, रोहित नाम है उसका। आप देख लेना, थोड़ा शर्मीला है... लेकिन है ईमानदार और मेहनती भी।' - कहते-कहते रजनी की आँखों में आँसू उतर आए। जावेद गहरी साँस छोड़ते हुए बुदबुदाया... बहन...। परमजीत और डॉ. अवस्थी ने उसकी तरफ देखा तो उसकी आँखों में भी पानी झिलमिला रहा था। मौसम की बात दब कर रह गई। कुछ यहाँ-वहाँ की बात हुई और शाम होने से पहले ही परमजीत और जावेद अपने-अपने घर को रवाना हो गए। डॉ. अवस्थी अब राजश्री और अमोघ का इंतजार करने लगे।

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राजश्री किचन में चाय बनाने आई तो एकाएक उसे कप कम नजर आए। उसने सिंक में देखा, फिर वाश एरिया में जाकर भी देख लिए। एक नजर डॉ. अवस्थी के कमरे में भी कनखियों से झाँककर देख आई। कहीं भी नजर नहीं आए, तो क्या...?

डॉ. अवस्थी को बाहर आते देखकर राजश्री ने पूछ लिया 'पापा, कप फूट गए हैं क्या?'

'अरे हाँ, आज पता नहीं कैसे रजनी से हाथ से ट्रे ही छूट गई... सारे कप...।' कहते-कहते उन्होंने अपनी बात छोड़ दी, गला भर आया। वो सुन नहीं पाए, लेकिन राजश्री कुछ बुदबुदाई... पता नहीं क्या?

दो दिन बाद जब डॉ. अवस्थी दोपहर की चाय बना रहे थे, तब उनकी नजर रैक में रखे उन दो खूबसूरत कॉफी मग पर पड़ी जो शायद कल ही राजश्री लेकर आई थी। ऐसा कभी हुआ तो नहीं, पता नहीं आज क्या हुआ कि उन्होंने उन मग को हाथ में लेकर ललचाई नजर से देखा। कितने खूबसूरत है... दोनों का रंग काला है, हैंडल सफेद और काले रंग के मग पर लाल रंग से बनी दो आँखें और होंठ... कह सकते हैं कि एक मग पर स्त्री और दूसरे पर पुरुष की आँखें और होंठ हैं। एकबारगी तो उन मग को देखकर इस उम्र में भी डॉ. अवस्थी को झुरझुरी हो आई। वो बड़े मग थे, जितने बड़े मग में रात में दूध पिया जाता है या फिर अच्छे मूड और अच्छे मौसम में कॉफी।

बचपन में ही किसी ने शुद्धोधन को बताया था कि ज्यादा कॉफी नहीं पीनी चाहिए, क्योंकि कॉफी दिमाग का ग्रे मैटर कम करती है, इसलिए खूब पसंद होते हुए भी उन्होंने कॉफी पीना बंद-सा ही कर दिया था। हाँ सर्दियों में रात को गर्म दूध पीने का सिलसिला वैदेही का ही शुरू किया हुआ है। शुरुआती सालों में बड़ी बकझक होती थी। इत्ते बड़े होकर कोई दूध पीता है, दूध तो बच्चों को दिया जाता है। लेकिन वैदेही जल्दी हार मान जाए...? पढ़ाते तो डॉ. अवस्थी थे, लेकिन वे भी वैदेही से जीत नहीं पाते थे। फिर एक दिन डॉ. पाटणकर से इसकी चर्चा की तो उन्होंने भी वैदेही की बात की ही तस्दीक की। हाँ सर्दियों में रात में गर्म दूध कई वजहों से स्वास्थ्यकर हुआ करता है। लीजिए बात खत्म हुई। तो तब से परिवार में सर्दियों में गर्म दूध पीना जैसे एक रिचुअल-सा ही हो गया था। राजश्री ने भी अपनाया और अनु ने भी। अभी पिछली सर्दी में ही दोनों अनु के घर रहे थे कुछ दिन... जब उसके सास-ससुर की शादी की ५० वीं वर्षगाँठ मनाई गई थी, तब देखा था अनु रात में सभी को दूध गर्म कर दिया करती थी। वैदेही ने बहुत गर्व से अनु को और फिर डॉ. अवस्थी की ओर देखा था। अब बच्चों का पता नहीं बाहर रहकर वे इसका पालन करते हैं या नहीं, लेकिन घर में आकर तो उन्हें पीना ही होता है। एक बार फिर से उन्होंने उन मग्स को गौर से देखा था।

उन्हें यकीन ही नहीं आ रहा है कि ये वे स्वयं हैं। जाने विषय का प्रभाव था कि स्वभाव ही ऐसा था कि भौतिकता के प्रति कभी कोई आग्रह रहा ही नहीं। या शायद ऐसा हो कि चूँकि वैदेही ने ही उनके जीवन में सारी चीजें भरी थी तो उन्हें इसका आकर्षण कभी रहा ही नहीं। जो भी हो उन मग्स के प्रति उनका आकर्षण उन्हें खुद ही चौंका रहा था।

हर रात जब राजश्री ट्रे में कप लेकर आती तो उनमें एक आकर्षक उत्सुकता जागती... शुरुआत में तो वे हसरत से ट्रे की तरफ देखते और निराश होते रहे। फिर कुछ दिन उन्होंने एक तरह की निस्संगता ही धारण कर ली या यूँ कह लें कि निस्संगता का भ्रम स्वयं को देने लगे। राजश्री का उनके कमरे में आना, कप का साइड टेबल पर रखा जाना। इस पूरे वक्त को ही टालते रहते... एक उपाय कर लिया उन्होंने। जैसे ही किचन की लाइट ऑफ होने की आवाज आती हैं डॉ. अवस्थी उठकर या तो बाथरूम चले जाते हैं या फिर पार्टीशन के उस तरफ रैक की ओट में किताबें देखने लगते हैं या फिर बालकनी में जाकर खड़े हो जाते हैं। 'पापा दूध रखा है टेबल पर' सुनने के बाद ही वे लौटते हैं, लेकिन उससे क्या? अपने बेड की तरफ आते ही सबसे पहले उनकी नजर कप पर पड़ती है और वे निराश हो जाते हैं। एक रात उनके मन में एक विचार आया कि चूँकि वो दो ही कप है, इसलिए जाहिर है वो दोनों अमोघ और राजश्री के लिए ही होंगे। यदि मोक्ष आता है तो उसे भी कोई और कप ही मिलेगा। इस विचार ने उन्हें काफी राहत पहुँचाई। अब वे दुविधा से बाहर आ गए हैं, मान लिया है, कि उनके हिस्से में वही हरे रंग का मग होगा जो हर रोज होता है। लेकिन दुविधा क्या कभी खत्म होती है? अमोघ को किसी ट्रेनिंग प्रोग्राम में चार दिन के लिए बाहर जाना पड़ा।

डॉ. अवस्थी की पूरी चेतना रात को आने वाले दूध के मग पर अटक गई। पहले ही दिन वे बेहद उत्सुकता से अपने बेड पर बैठकर राजश्री के दूध लाने का इंतजार करते रहे। जब वह ट्रे लाई तो उसमें एक वही हरा मग था और दूसरा वो काला मग... उन्हें निराशा हुई, खीझ आई, चिढ़ भी आई...। लेकिन क्या करते... क्या कहते? उन पूरे चार दिनों में न जाने कितनी बार उनके मन में मग का विचार आता-जाता रहा। इसके साथ ही खीझ भी होती रही। जैसे वो मग उनके दिमाग में कहीं अटक गया है, मन में कहीं उलझ गया है। आखिर अमोघ भी आ ही गया। फिर से वही होने लगा। बस वो मग डॉ. अवस्थी के मन में अटके ही रहे।

फरवरी आधा गुजर गया था। मौसम में अब भी सर्दियों की खुनक थी। हवा अब पश्चिम की बजाए दक्षिण की तरफ से चलने लगी थी और वहाँ के चक्रवात का असर यहाँ भी हुआ नतीजा दो दिन से मौसम में ठंडक बढ़ी और आज सुबह से ही बादलों का जमावड़ा होने लगा।

खाना खाकर थाली सिंक में रखी ही थी कि बारिश शुरू हो गई। एकाएक उन्हें कौशिकी चक्रवर्ती की सीडी मिल गई। मौसम बदलने से मन भी बदला... आखिर जिंदगी कहाँ ठहरती है? उन्होंने बहुत दिनों बाद फिर से म्यूजिक सिस्टम की धूल झाड़ी... सीडी लगाई। बहुत दिनों बाद मन हुआ कि आज कॉफी पी जाए... वैसी जैसी रिसर्च के दिनों में कई बार यूँ ही लाड़-लाड़ में वैदेही बनाकर पिलाया करती थी... खूब झाग वाली कड़क कॉफी... वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर दिमाग का ग्रे मैटर कम हो या फिर ज्यादा इससे बहुत ज्यादा कुछ बदलता नहीं है। उत्साह में भरकर डॉ. अवस्थी किचन में आए... मग लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो हाथ में वही खूबसूरत मग आया जो अर्से से उनके मन में अटका हुआ है। उन्होंने अपनी आँख मूँद ली... दोनों मग पास-पास ही थे, बिना देखे उन्होंने एक मग उठाया। अपने बचपने पर मुस्कुराए... अच्छा मन कुछ भी करवा सकता है। आँखें खोली तो स्त्री वाला मग... पूरे शरीर में सनसनी-सी फैल गई।

चीनी, कॉफी और एक छोटा चम्मच दूध डालकर वे कॉफी फेंटने लगे। जैसे-जैसे चीनी घुलने लगी मिश्रण का रंग कॉफी से गोल्डन होने लगा... चम्मच घुमाने में एक लय थी, एक लय मन में एक लय कौशिकी की ठुमरी... याद पिया की आए में थी। अतीत-भविष्य से इतर डॉ. अवस्थी आज में स्थित हो गए थे। कॉफी की चीनी उनके मन में भी घुल रही थी।

कॉफी बनाई... कप को हाथ में लेकर इत्मीनान से बॉलकनी के झूले पर बैठ गए। तराना के अटपटे बोल थे, बादलों की गड़गड़ाहट थी। डॉ. अवस्थी समय-काल के परे जा खड़े हुए थे। आँखें मूँद ली थी... जिंदगी प्रवाहित हो रही थी, मन गुनगुना रहा था। सीडी खत्म हो चुकी थी। बादलों का झरना जारी था। कॉफी पीकर मग को उन्होंने वहीं जमीन पर रख दिया था। आनंदातिरेक से आँखें भर रही थी... झर रही थी। बहुत देर तक वे यूँ ही बने रहे, मौन... अचल... विरल...। गहरी साँस से जैसे मौसम की गंध को खींचकर नसों में छोड़ दिया हो...। डोर बेल की आवाज ने उनकी तंद्रा भंग की... एक आनंदित क्षण की भ्रूण-हत्या हो गई। झुँझलाकर उठे तो उस सुंदर कॉफी मग को पैरों की ठोकर लगी और दीवार से टकराकर क्या बिखरा... जैसे सब कुछ बिखर गया। जाकर दरवाजा खोला, रजनी थी। रजनी को बॉलकनी में एहतियात से जाने और चीनी के टुकड़ों को सावधानी से समेटने की हिदायत देकर वे ड्राइंग रुम में टीवी के सामने आ गए। मन पर फिर से बादल घिर आए। एक तो चोरी से उन मग में कॉफी पीने का अपराध-बोध दूसरा उस सुंदर मग के टूट जाने की निराशा...।

उदास शाम थी, टीवी पर ऊलजुलूल कार्यक्रम चल रहे थे। अमोघ ने आकर चैनल बदल दिया, अब कोई न्यूज चैनल चलने लगा। मन उदास था तो कौन क्या बोल रहा था और टीवी पर क्या चल रहा था? डॉ. अवस्थी उस सबसे अनजान बैठे हुए थे। मन कहीं और था, वे स्वयं कहीं और...। सबने खाना खाया, डॉ. अवस्थी थोड़ी देर टहलने के लिए बाहर निकल गए। जब वे लौटे रहे थे, तब अमोघ और राजश्री बाहर जा रहे थे। वे अपने कमरे में आ गए। कुछ देर यूँ ही असमंजस में वे कमरे के बीचोंबीच खड़े रहे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि वे क्या करें? रैक की तरफ जाकर उन्होंने कुछ किताबों को टटोला... 'अष्टावक्र गीता' पर हाथ गया, वही खींच ली गई। जब मन विचलित हो तो गीता से बेहतर क्या? लेकर अपने बेड पर आ गए। दोनों घर में लौट आए हैं, किचन से चिर-परिचित आवाजें आ रही हैं, लेकिन डॉ. अवस्थी इस सबसे बिल्कुल उदासीन होकर किताब के पन्नों पर अपनी नजर लगाए हुए हैं, ये अलग बात है कि उदास मन तक चाह कर भी आँखें कुछ पहुँचा नहीं पा रही थी। घड़ी में ग्यारह बज रहे थे, साइड टेबल की तरफ उनकी पीठ थी, जब राजश्री ने आकर कप रखा और कहा 'पापा दूध रखा है।'

'ओके बेटा...' - कहकर वे उसी तरह पीठ किए किताब पढ़ते रहे। जब दूध का ध्यान आया तो वे करवट बदल कर बैठे... मग की तरफ हाथ बढ़ाया, आँखों ने पीछा किया... वही अकेला बचा काला कॉफी मग था, जिसका साथी आज बिछुड़ गया है... मन भर आया... अकेलापन सरसरा गया... आँखें बरसने लगीं।


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