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कविता

उभयचर
गीत चतुर्वेदी


1

दुख भरा था तुममें दुख से भरा यह जग था
इस जग का तुम मानते नहीं थे खुद को फिर भी दुख था जो तुम्हें अपना मानता था
और इस जग को क्या फिकिर कि तुम उसे अपना मानो न मानो
सो दुख था बस जिसे तुम्हें मानना था अपना दुख से भरे इस जग में
सुख को छूना दरअसल नष्ट होना था नष्ट होने का सुख भी इतना प्रतिबंधित था
कि कठोर दंडों का प्रावधान था कि किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा जाती रहे
इससे हुआ यह कि जो पास था उसका मोल जान लिया इससे
अपमान जो झेले थे उनको भूल जाने का संकोच नष्ट हुआ

 

2

ऊँची कूदों तेज जिरहों दौड़ती गाड़ियों के बीच मैं घुस न सका गोलियों और गालियों के बीच ना पहुँच पाया
बल को प्रदर्शन चाहिए होता है हमेशा भुजाओं की मछलियों ने बताया मुझको
मेरे युग में सुख पोर-भर की दूरी पर थे पोर-भर भी डूबे जो उनमें वो धन्य हुए
पंद्रह साल पहले मैं चुपचाप करता था प्रेम आज चुपचाप करने पर प्रेम छूटता जान पड़ता
अब मैं बोलता बहुत बहुत बोलता फिर भी उनकी शिकायत है ये के
जैसे-जैसे दिन चढ़ता है मुझ पर चुप्पी चढ़ती जाती है
इस तरह बहुत बोलने को बहुत चुप रहने का समार्थी ही जाना उनने
हर वक्त जानना चाहा कि कौन हूँ मैं जो कभी उनके तंबुओं की तरफ नहीं आया
जब कहा उन्होंने सत्य के बहुत करीब मत जाओ सूर्य के भी रहो उन जीवों की तरह जो जाने किस ब्रह्मांड में रहते आए
भूख भय खुशी प्रेम आवश्यकता नहीं शौक हों जिनके लिए
मैं खौफजदा उनसे भागता छिपता फिरता रहा
यूँ अपना कबीला बचाया मैंने उनसे नूह की कश्ती में भरोसे की कहानी पढ़
सच कहूँ क्या सच में बचा भी पाया कि यहाँ कोई आबादी नहीं दिखती मेरे पास
फिर भी जो बची वह निर्जनता है और जन की स्मृति भी जन को जनने में मददगार होगी ही
बस मैं डरता हूँ कि मेरी स्मृति कब तक रहेगी मेरी ही
यह जो भय का छाता है यही मुझे बचाता है
और इसे पहचाने बिना मैं तुम्हें धन्यवाद करता रहा भगवन!

 

3

जो जीवन में सहा वह कहाँ कहा जो नहीं सहा उसकी इच्छा कर ली
संसार का सारा दुख मैं झेलूँ यह कामना ही
घृणित है वैसी ही विश्वविजयी होने की कामना-सी
मैं उभयचर प्रेम और घृणा में रहता बराबर घृणित कामनाओं का प्रकाशपिंड भी
वह आलू खाता हूँ जिसमें केकड़ों के गुणसूत्र भरे
चौवन साल बाद मेरी नस्लों में केकड़े होंगे जाने कब से केकड़ों को अपना भाई कहता आया मैं
इसी उम्मीद में क्या?
जब कहता हूँ अठारहवीं सदी में मनुष्य के आकार की एक लिपि हुई थी
पढ़ने में माहिर अंग्रेज भी जिसे पढ़ ना पाए थे
मेरे पढ़े-लिखे यार-दोस्त समझते हैं कुछ नया पढ़ा रहा हूँ इन दिनों
तुम्हारी पीड़ा की कल्पना करना तुम्हें पीड़ा देने से बेहतर है
सुख भले दोनों में एक-सा हो सुख की परिभाषा तो कभी भी एक ही रही नहीं
फिर भी मैं कहता हूँ हमारी कल्पनाशक्ति की सबसे बड़ी असफलता
है कि हम युद्ध करते हैं जब भी हमारा इस या उस तरफ होना होता है सजा देने वाला बनना होता है
एक ऐसी फसल का बोना होता है जिसमें बालियाँ नहीं होतीं सुंडियाँ ही बस
एक दिन मैं भूल जाऊँगा क्योंकि यही मेरी प्रकृति है लेकिन मैं क्षमा नहीं दूँगा
क्षमा देने से सत्ता बनती है समभाव नहीं
उदात्तता नहीं क्षुद्रता की स्थापना की राजनीति है यह
सो हम दोनों ही गलतियाँ करेंगे उसके लिए न लड़ेंगे न माफ ही करेंगे
कुछ यूँ करेंगे एक-दूसरे का परिष्कार हम
इसीलिए जब भी मैं पीड़ा की बात करता हूँ उसमें कल्पना भी मिलाता हूँ
कुछ तो कम हो ही जाती है इससे खालिस वह मेरी अपनी नहीं रह जाती
किस गुरु से सीखा मैंने यह उद्घोष :
पीड़ाओं को उनकी औकात बता दूँगा एक बार लिखकर उनको खत्म कर दूँगा

 

4

बहुत टूटकर प्रेम किया था मैंने एक बार। बाहर आया प्रेम के दिनों से तो पाया मेरे सिवाय कुछ न टूटा था। ठीक ऐसा ही कहा था उसने जिससे मैंने प्रेम किया था। टूटना ही अंतिम सत्य है यह जीवन का फलसफा रहा नहीं फिर भी टूटने के बाद हम दोनों ने ही प्रेम को क्यों बुहार फेंका? मेरे घर के पुराने एक संदूक में पुरानी एक बहुत माला था टूटी हुई धागे से अलग। नानी ने उसे करीने से सँभाल रखा था। जब भी संदूक से वह कोई सामान निकालतीं, माला के कुछ दाने गिर पड़ते थे जमीन पर, किसी साड़ी दुपट्टे शॉल या पुराने कागज में अटके हुए। उन्हें बीनते हुए नानी याद करती थीं उस माला को जिसके टूटने की कहानी उन्होंने कभी नहीं बताई, लेकिन यह बताया बार-बार कई बार सैकड़ों बार कि अगली बार हाट से वह मोटा धागा ले आएँगी, फिर इस माला को उस नए धागे में पिरो देंगी। इस तरह, अपनी तरह, नकार देंगी कि टूटना ही अंतिम सत्य है। यह जबर्दस्ती की कल्पना ही होगी, नजाकत के स्वाँग से भरपूर कि वह माला नानी के किसी प्रेम की टूटन रही होगी। उनके मरने के काफी समय बाद हमें याद आई थी वह माला, जो संदूक में नहीं थी। कहीं भी नहीं थी ऐसा तो नहीं कह सकते क्योंकि हमारी स्मृतियों में तो थी ही, और नानी की भी मृत्योपरांत स्मृतियों में जो उनकी जल चुकी अस्थियों की बुझ चुकी राख में से झरती किसी डेल्टा प्रदेश में किसी पेड़ या फसल की जड़ में जल के तंतुओं से चिपकी होगी। उस दिन मुझे लगा था कि नानी ने वह धागा पा लिया होगा। न भी पाया तो क्या सारे दानों को साथ ले गईं होंगी और जो कहीं फिर से बिखर गए दाने, तो कहाँ-कहाँ बीनती फिरेंगी वह उन्हें? मैंने अपनी मालाओं के दाने कभी नहीं सहेजे, इसीलिए जो छिटके हुए दिखते हैं मुझको कपड़ों से आलमारी से किताबों के बीच बिखरते, मैं अक्सर खुद से कहता हूँ ये मेरी नानी की टूटी माला के दाने हैं

 

5

दुर्भाग्य के दिनों में सुंदरता की फि़क्र करना कला से ज्यादा जिजीविषा है
हमारे जीवन में ज्ञान का सबसे बड़ा योगदान कि वह हमारे दुखों में अकल्पनीय इजाफा करता है
मुझसे छीनी गई पहली चीज थी मेरा आध्यात्मिक विवेक उसके बाद छिनी चीजों की फेहरिस्त ही न बना पाया
फिर ऐसा कुछ भी न बचा बची जिसकी मुझमें इच्छा हो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ करता था जिसकी मुझमें इच्छा न रही
इतने बरसों से मैं ठीक वैसा ही हूँ अपने आप जैसा इसका कोई अफसोस न रहा
कितने दिनों से अंदाजा नहीं कि मेरी पिंडलियाँ शरीर के किसी काम भी आती हैं
मैं एक प्रतिध्वनि बना रहा जिसे अपने उत्स का भान नहीं दीवारों पहाड़ों घाटियों से टकराता और दोगुना होने के भरम में आधा होता जाता
आँख के भीतर पानी वैसे ही छटपटाता है जैसे कट गए बकरे के अंग
अत्याचार सहने में कोई तजुर्बा काम नहीं आता
मैं ऐसे बताता अपना नाम जैसे अर्थी के पीछे कोई मरने वाले का नाम बता रहा हो

 

6

उसी भीड़ में वे औरतें भी थीं जिन्हें चंगेज खान अपने साथ भगा ले गया था जिन्हें इल्तुतमिश ने नगर की सीमाओं से बाहर खदेड़ दिया था जो अखाड़े में लड़ता देख कृष्ण को रीझी थीं जो बैबल की लाइब्रेरी से किताबें चुरा रोटी खरीदा करती थीं जो सड़कों पर नंगी थीं और शयनकक्षों में भी जिन्हें सड़क किनारे पा ट्रकवाले पैंट की जि़प खोलकर दिखाया करते थे पोलियो की शिकार वह किशोरी भी जिसे उसके एक परिजन ने ही गर्भवती कर दिया था। वहाँ रेल की पटरियों के किनारे बैठ निपट रही थीं औरतें। जब तेजी से गुजरती कोई लोकल धड़ाधड़, वे उठ तुरंत खड़ी हो जातीं। सिग्नल न मिलने पर कोई लोकल अगर वहीं खड़ी हो जाए कुछ देर, तो वे औरतें भी उसी तरह इंतजार में खड़ी रहतीं। दूर बिना किसी ओट के बैठे पुरुष कभी खड़े नहीं होते थे। जिनके सामने लेडीज कोच आकर लग जाता, वे शर्माते, यहाँ-वहाँ देखते, तुरंत निपटकर चले जाते, तो कोई ऐसा भी होता, जो रगड़-रगड़कर तान लेता अपना लिंग। मेरी ट्रेन ऐसी जगहों से भी गुजरी, जहाँ पटरी के किनारे बने थे वेश्यालय। द्वार पर बैठी वेश्याएँ लोकल से लटके लौंडों के इशारे पढ़ा करतीं। एक बूढ़ी हो रही वेश्या गोद में बैठी एक जवान लड़की के बाल काढ़ रही होती। हाफ पैंट पहना दो साल का एक बच्चा पीछे मिट्टी में खेल रहा होता, दूसरा रो रहा होता और तीसरा बार-बार लोकल के पहियों की तरफ बढ़ जाता, जिसे दौड़कर पकड़ती हमेशा एक ही औरत। एक स्त्री और पुरुष हिंसक तरीके से लड़ने लग जाते। एक नौजवान मग्गे से पानी उड़ेल मोटरसाइकिल का टायर धोता। वाटर सप्लाई की टूटी पाइप से निकलते पानी से नहा रही होती एक औरत, पूरे कपड़े पहन। मेरी ट्रेन वीटी पर जाकर खत्म हो गई, जहाँ से मुझे बाहर सड़क पर निकल जाना था। वहाँ फोर्ट की दुकानों के सामने सुंदर लड़कियाँ किसी का इंतजार कर रही थीं। दुकानवाले एक बार माल देख जाने को बुला रहे थे। मेरी एक दोस्त एक बार बहुत रोई थी, मैंने उसे वीटी के सामने इंतजार करने के लिए कह दिया था। वह आधा घंटा वहाँ खड़ी थी और उतने में तीन बार उससे पूछा था अलग-अलग लोगों ने - चलती क्या? रोते हुए कहा था उसने मुझसे - तुम्हें इंतजार कराने की जगह चुनने की भी तमीज नहीं! मैं ट्रेनों से बहुत थका हुआ उतरता, बहुत थका हुआ ही चढ़ता था ट्रेनों में। घर आकर बिस्तर पर पसर जाता। टीवी में एक औरत कपड़े उतारती, एक खंभा पकड़कर नाचती, एक अपने वक्षों को इतनी तेजी से हिलाती कि उनके टूटकर गिर जाने का डर लगता। जेनेसिस ने बताया मुझे कि ईश्वर ने मिट्टी से बनाया आदम का पुतला, उसके नथुनों में हवा फूँक प्राण दिया उसे, फिर उसकी एक पसली तोड़ी और उससे बनाई दुनिया की पहली औरत। किसी ने नहीं बताया मुझे कि ईश्वर के पास मिट्टी कम पड़ गई थी क्या ईव को बनाने के लिए?

प्लेटफॉर्म पर किताबों में सिर गड़ाए बैठी हैं कुछ। ये कवियों के प्रेम की शिकार महिलाएँ हैं जो खूब किताबें पढ़ती हैं और रोते-रोते कवियों को गालियाँ दिया करती हैं।

 

7

एक ही अर्थ है भय और इच्छा का
समय आने पर दोनों दगाबाज हो जाते हैं
बीस अक्षर तक खर्च नहीं हुए बीस सदियाँ बीतने में
यहाँ किसी ज्ञान को प्रवेश की अनुमति नहीं गूगल के ज्ञान को चुनौती की गुंजाइश नहीं
शब्दों पर उँगली रखें उनका उभार महसूस करने के लिए नहीं उनके अर्थ को देने दिशा
शरारती शब्दकोश हैं जो यह भाषा अपने पैरों पर नहीं चलती कितौ उनकी शरारत है जो हमेशा दूसरे के पैरों पर चलते
ओ मेरी भाषा, तू गए-गुजरों की, घृणित तबकों की, लुच्चे-लंपटों की है
और वे अपनी किसी चीज से प्यार नहीं करते
वे भी नहीं जिन्हें नमक का निबंध कहता आया मैं अमूर्तन के अपने अनगिन क्षणों में असहाय बोली-बानी में
मिले को तजने और न मिले को भोगने की इच्छाओं से मजबूर मानता हुआ

 

8

मैं आपको 1810 की एक कहानी सुनाता हूँ : इसे लंदन के पास एक गाँव से हिंदुस्तान आए एक अंग्रेज पादरी ने 1838 में छपी एक किताब में लिखा है : वह पादरी यहाँ ईसाइयत का प्रचार करने और उससे पहले उसका एक रोडमैप बनाने आया था : पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गाँव में एक पंडित जी सौ साल की उम्र पूरी कर मर गए : उनके गाँव में शोक था : घर में नाती-पोते-परपोते तक थे : उनकी पत्नी बरसों पहले मर चुकी थी : उनकी चिता के साथ जलने वाला कोई न था : उनके बेटों ने, पड़ोसियों ने, गाँव वालों ने, जवार वालों ने उनकी मौत की खबर दूर-दूर तक पहुँचाई : जाने कहाँ-कहाँ से औरतें घूँघट में आईं : अपना चेहरा तक न देखने दिया उनने किसी को : एक औरत कूद गई उनकी चिता में : जलती-तड़पती वह सती हो गई : फिर दूसरी : फिर तीसरी : चार दिन तक जलती रही पंडित जी की चिता : चार दिन में सती हुईं चालीस से ज्यादा औरतें : वे सब उस बुजुर्ग मृतक की पत्नियाँ जो सौ साल के जीवन की उसकी गुप्त आय की मानिंद थीं : जिनके बारे में कोई जानता तक न था : वे खुद भी एक-दूसरे से अनभिज्ञ थीं : शको-शुबहा तो यूँ भी हुआ करता : उन पर कोई बंदिश न थी सती हो जाने की : फिर भी जो जलकर अपना जीवन खत्म कर बैठीं : यह 19वीं सदी के शुरुआत के उत्तर प्रदेश में महिलाओं के मुक्त होने की गाथा है या स्थानीय भाषा न जानने की अंग्रेज पादरी की सीमा या जयदेव की गोपियाँ गीत-गोविंद की किसी जर्जर पांडुलिपि से निकल वहाँ दौड़ी आई थीं : आप यह न समझ लें कि मैं सती-प्रथा के समर्थन में हूँ : पर चार दिन में चालीस महिलाएँ जब एक साथ सती होती हैं तो मिलकर चालीस नहीं बस एक सवाल खड़ा करती हैं : वे चाहतीं तो कोई जान भी न पाता उनके और बुजुर्ग पंडित के संबंधों के बारे में : फिर क्या आया एक साथ उन सबके भीतर ऐसा : कि वे एक पल को भी न झिझकीं सार्वजनिक जल-मरकर पंडित के प्रति अपने प्रेम की इस तरह घोषणा करने से?

 

9

उसके मुख का तेज उसका नहीं है उसकी पतली कमर उसकी नहीं है उसकी लंबी टाँगें उसकी नहीं हैं उसके देह की लोच भी उसकी नहीं वह खुद नहीं जानती कि वह किसकी है फिर भी मदोन्मत्त कैसे चल रही है चली आ रही उसे नहीं पता वह खाई जाएगी या अधखाई फिंका जाएगी शोकेस में सजाई जाएगी या पताका-सी लहराई जाएगी उसको अपने मन का कर लेने दो क्योंकि उसे नहीं पता कि जिस मन को वह अपना मानती आ रही वह भी दरअसल उसका है नहीं और मानना तो सिर्फ एक अवधारणा होता है और अवधारणाओं की उत्पत्ति अनुपस्थितियों पर व्यापक ऐतबार के लिए होती हैं मसलन यही एक अवधारणा कि दुनिया बहुत खूबसूरत है और मैं बहुत खुश हूँ और वह लेखक इसलिए महान है कि उसे पढ़कर दुनिया की खूबसूरती पर यकीन हो जाता है

 

10

जो सहज है वही प्रकृति है जो अहसज वह ज्ञान
अच्छे-बुरे का ज्ञान ही हमारे जीवन का विष है
ईश्वर ने मेरे सबसे पुराने पुरखों को इसी दोष का दंड ही तो दिया था
मैं दंड से डरता हूँ इस भेद को भूल चाने की चाह से भरा
भूलना ही सबसे प्राकृतिक क्रिया है याद रखने को कितने करतब करने पड़ते हैं
स्मृति का एक खंड इस काम के लिए सुरक्षित कि धीरे-धीरे सब कुछ भूल जाना है सजाएँ ही क्यों मिलती हैं भूलने पर लेकिन
मैं हमेशा तुरपाइयों के पुल पर चलता रहा वस्त्रों के अंतरंग में प्रविष्ट होने का अरमानी
और ताउम्र खुले दरवाजों पर दस्तक देता रहा जिन मकानों को लोग छोड़ना नहीं चाहते थे लेकिन जान बचाने के लिए जो
बिना ताला लगाए भागे थे और फिर वहाँ कोई रहने नहीं आया
हम घर पहुँचने का जितना इंतजार करते हैं उससे कहीं ज्यादा घर हमारा इंतजार करता है
तभी तो हमारी जगह कोई और आकर रहने लगे तो उसे अपनी उदास आवाजों से डराता है
दीवार और दरवाजे और खिड़कियों के पल्लों में क्या बातें होती हैं कभी सुना है किसी ने
मेरे कुरते पर कलफ की तरह लगी हैं जीवन की दुर्घटनाएँ
शर्ट का जो हिस्सा पैंट के भीतर रहता है उसके पास भी सुनाने को कई कहानियाँ हैं
मैं चेलो हूँ वायलिन की भीड़ में अकेला रखा गया है मुझे
इसीलिए जब भी बोलता हूँ बहुत गहरे से भर्रा कर बोलता हूँ और संकोच में अपनी गूँज फैलने नहीं देता
बाख से लेकर विवाल्दी तक मोत्सार्ट से फिलिप ग्लास तक
जब भी मुझ पर उँगली रखी जाती है लगता है कोई छोटा बच्चा मेरे कपड़े खींचकर अपनी आवाज सुनाना चाहता है मुझे
नियति पर तो खैर मुझे भी नहीं नीयत पर लेकिन सब ही को है संदेह
मैं जल में रहता हूँ तो दुख की पूर्णता में और थल पर भी मैं वैसा ही हूँ
रात को जिन पतंगों की आवाज आती है वे एक साथ मुझे दिलासा दे रहे होते हैं दरअसल

 

11

जो अमृत पिया उन्होंने उसका असर देह पर होता है और स्मृतियों पर
स्मृतियाँ बगीचों में रहती हैं और तहखानों में और नाबदानों में और दस्तानों में देह जबकि कहीं नहीं रहती सिवाय पिंड और खुद-खानों में
उनकी देह वैसी ही रही जैसी वे चाहते थे और स्मृतियाँ अक्षुण्ण
हर ब्रह्मांड में ग्यारह शिव होते हैं इतने ही विष्णु इतने ही ब्रह्मा
और छोटे देवी-देवता मिडिल मैनेजरों की तरह इफरात में
मृत्यु ब्रह्मा की बेटी है स्मृति भी दोनों ने क्षमा किया इन सबको फिर भी क्षमा न किया
कुछ अभिशाप छद्म-वर होते हैं जैसे कुछ वर होते हैं छद्म-अभिशाप
यानी मृत्यु इन सबकी होती रहती है कल्पांत में बस मरने के बाद ये फिर जी जाते हैं ठीक वही देह पाते हैं
और इनकी स्मृतियाँ भी विलुप्त नहीं होतीं पूर्वजन्मों की
इतने जन्मों के बाद भी शिव भूल पाते होंगे विष्णु के हाथों अपनी पराजय और मोहिनी के पीछे की अपनी लालसा से गतिवान दौड़
विष्णु अपने अवतारों के सभी कामों का स्पष्टीकरण खुद से दे पाते होंगे या क्षीरसागर के दुर्लभ एकांत में शर्मिंदा होते होंगे
न भूल पाने के अभिशाप से ग्रस्त ये अमर देव रुआँसे कभी झुकते होंगे ब्रह्मा की बेटी स्मृति के चरणों में
और कहते होंगे - लौट जा ओ स्मृति, अब तो महापराक्रमी मेरे शारंग धनुष ने भी अपनी टंकारों को भूलना शुरू कर दिया
चेयरमैनों-मैनेजिंग डायरेक्टरों-राष्ट्राध्यक्षों की तरह काम से ज्यादा मनोरंजनों में व्यस्त लगातार
अदना कर्मचारियों को उनके पहले नाम से पुकारते याद के ये धनवान
उन वादों को हमेशा भूल जाते जो उन कर्मचारियों से किए थे उन्होंने मँझोले देवों से निरीह भक्तों से आस में डूबी शाकों से
सुनसान में हजारों बरसों से खड़े पेड़ों से जो अपनी बेनूरी में भी हरे से भरे हैं
हिंदी के पो-बिज में हमेशा दुत्कारे जाने को अभिशप्त कुछ विषयों बिंबों रेटरिक जैसे
उनके वादों को कदमताल पर गुनगुनाना छोड़ो वे हारे हुए अपनी अमरता से
पेड़ो, सावधान हो जाओ तुम्हें हरा रखने की जिम्मेदारी अब कॉर्पोरेट्स ने ले ली है

 

12

उसको इस तरह देखना कि फिर वह मुझे ही देखती रहे बार-बार
इस तरह पलटना हजार सफों की किताब जैसे हजार परों वाला परिंदा उड़ने को टालता
बड़ी सावधानी से सीढ़ियाँ चढ़ना उसे तरक्की मानना
पानी कहते ही ठंडक का आभास होना न ही अपनी-पराई प्यास का
खुद को सीमित रखना एक ही ईश्वर एक ही साथी एक ही विश्वास एक ही विचार एक ही अवस्था तक
निष्ठा की एकरसता में बहुलता की ध्वनि नहीं होती
अभय-अरण्य में भय का अभिशाप
मुझमें अर्थ मत खोजना मैं किसी प्रतीक में प्रविष्ट हो नष्ट नहीं होना चाहता
यह भी एक गलती ही ऐसी कोई गलती बची नहीं जो मैंने न की हो
जीवन को फिर से जीने की शर्त बदी तो विशाल शुद्धिपत्रों को बाँचते बर्बाद हो जाएँगे स्वर्ग के मुंशी
ऐसी दुनिया हो कम से कम वह जहाँ जरूरी हो किताबों को खर्रों को गट्ठरों को पुलिंदों को ईंटों की तरह एक-दूसरे पर लदे इंसानों को पूरा पूरा पढ़ना
अंतरिक्ष के जिस हिस्से में रहता आया मैं वहाँ किताबों का और बाकी सब ही कु़छ का अधूरा होना उनके गौरव की महती शहतीर-सा रहा
पूरा होने का स्वप्न जो मिला मुझको उसे पूरा का पूरा स्थानांतरित कर दिया तुम सबमें
यह भी बस एक रिवायत के तहत
समस्त द्वीपों पर मैं ही रहता आया इस तरह अकेलापन खत्म हुआ द्वीपों का मेरा भी
मेरा नाम इतिहास है और इसी तरह लिखूँगा मैं आत्मकथा

 

13

वह देखो बैठा है अतीत का थॉमस रो अतीत के जहाँगीर के दरबार में बैठा हो जैसे आज का आज के दरबार में
कैसे आँखें फाड़े देखता है बादशाह के कमर में सोने का पट्टा है गले में कीमती मालाएँ और बाँह पर बँधा याकूत
जो मुर्गी़ के अंडे से भी बड़ा है जिसकी चमक के आगे ओटोमान का सुल्तान भी शरमा जाए
कैसे शरमा रहा है जहाँगीर इस तरह पराये एक मर्द को देखते अपनी ओर आँखें फाड़े लालसा में
कितना अमीर है यह बादशाह खुद बादशाह को बादशाह से नीचे कुछ मंजूर नहीं
और हैरत है कि जो बादशाह नहीं वह भी कभी रिआया नहीं बनना चाहता
तू भी बादशाह मैं भी बादशाह आह रे बादशाह तेरी धन्य है उदारता
जब वह दुआ करता है हम सबका विनोद होता है
देखिए न, सारे लोग आईना हो गए हैं जिसको देखता हूँ खुद मेरे जैसा पाता हूँ
यह मेरा भ्रम नहीं होमोजेनाइजेशन है यह कॉन्स्टीपेशन का ग्लोबलाइजेशन है

 

14

वह क्या अपराध था जो राजा बिक्रम से हो गया था जब वह लड़कपन में था जवानी में या प्रौढ़
किसी गुरुकुल में था जहाँ गुरु के प्रवचनों के बीच वह उठा था झपट मारा था उसने एक हाथ और
बगल से गुजरते मेढक को दबोच निचोड़ दिया था
बित्ते-भर की मछली की पूँछ में ऐसा भारी कंकड़ बाँध दिया था कि वह दस कदम भी तैर न पाई तड़प तड़प डूब गई
या किसी सर्प की देह में कील ठोंक उल्टा टाँग दिया था वृक्ष से और बेबसी भूल पक्षियों ने नोंचा था उसका मांस
क्या गुरु नाराज हुए थे इस पर दे दिया था शाप?
या जवानी में किसी युवती से किया था प्रेम तमाम वादों के बाद गया था भूल भूल को मानने से इंकार कर दिया था
बरसों करती रही वह युवती इंतजार भटकती रही जंगलों में वनों-उपवनों में नगरों में गुजारती दिन रात नगरपथ की धूल में लोट जाती अवसन्न
अँधेरे में किसी रथ के नीचे कुचला था उसका हाथ उसकी चोट से वह मरी थी तो क्या आह निकली थी उसके मुँह से
जो रथ चालक को न लगी सीधे बिक्रम को जा धँसी जबकि वह कहीं नहीं था चोट से मिली मृत्यु के विधान का साझीदार?
पड़ोसी राजाओं, अय्यारों, विषबालाओं, नगरवधुओं का किया टोना था या उसी युवती की आह या गुरु का शाप
कि अपने वैभव के वर्तमान में रहता राजा एक दिन सारा वर्तमान, सारा भविष्य तज देता है
और सिर्फ अतीत में रहने लगता है?
कौन था वह बेताल जो सिर्फ अतीत की बातें करता था?
क्या था बिक्रम का अतीत जो उसे हमेशा अपनी पीठ पर टाँगे रहता?
क्या उन सारी कहानियों का नायक-दोषी खुद बिक्रम था
या अतीत के उस समय में उसे नहीं सूझे थे उन सवालों के जवाब
जो वह एक सुदूर भविष्य में पीठ पर लदे अतीत को देता गुन लेता था
समय का पहिया सवालों के पहिए से धीमा चलता है
तो समय खुद क्यों सवालों से जूझने को मचलता है?

 

15

मैं यहाँ बुद्धू जैसे एक शब्द के बारे में सोचता हूँ : मैं यानी गीत चतुर्वेदी नहीं : मैं यानी तुम यानी वह यानी वे यानी हम यानी सब कुछ यानी कुछ नहीं यानी निरपेक्षता यानी सापेक्षता यानी काल यानी अ-काल यानी समय के हिसाब से बदलता अर्थ यानी अर्थ के हिसाब से बदलता समय : यानी बुद्धू : यानी बुद्धिमान : यानी यह शब्द जब बना था, तो उस आदमी का सिंगार था, जिसने बुद्ध की परंपरा में खड़े हो बुद्ध के शतांश से भी कम यानी बहुत कम यानी कम से कम बुद्धि के सम पर इतना तो ज्ञान पा लिया था कि पास-पड़ोस की दुनिया में बुद्धिमान कहलाया था : यानी बुद्धू उपनाम पाया था : और यह कोई नई रिवायत नहीं कि : उपहासों का सबसे आसान शिकार मूर्खताएँ नहीं, ज्ञान हुआ करता है : तो जो बुद्धू था, उसे पास-पड़ोस वालों का उपहास झेलना पड़ा : और चूँकि ज्ञान में पलटवार करने की क्षमता नहीं होती, वह पहला बुद्धू चुप ही रहा : और भी लोग जो बुद्धू हुए तो पास-पड़ोस वाले डरने लगे उनसे : कि सारी दुनिया ही बुद्धू हो गई तो उस पवित्र धार्मिक ईश्वरीय संतुलन का क्या होगा : सो एक साथ कहा सबने : चलो जी हटो, बुद्धू न बनाओ : और इस तरह सदियों तक अलग-अलग अंदाज में कहा गया यह संवाद : जिससे बिल्कुल उलटा हो गया इसका अर्थ : यानी निरा बुद्धू : यानी काल यानी अ-काल यानी खतरों की सुंदरता को नष्ट कर दो यानी सुंदरता के खतरों को नष्ट कर दो यानी सुंदरता को नष्ट करके खतरनाक बना दो यानी खतरनाक को ऐसा सुंदर बना दो कि बुद्धू होकर उनमें घुसा व्यक्ति बुद्धू बनकर बाहर आए

 

16

बुरा भी था बहुत मैं कि चुप न रह पाता था सो भला न हो पाया किसी का वास्ते किसी के
जब भी टोकता था कि तुम गलत हो वे फौरन वह नीतिकथा सुना देते
कि टोकने का अधिकार उसी को है जिसने कभी पाप न किया हो
इस तरह कोई टोक न पाता जो टोकता भी सो सुना न जाता इस तरह
अनवरत चलता रहा पाप का व्यवहार
मैं खोजता फिरता उस चतुर सुजान व्यापारी को जिसने बनाई होगी यह नीतिकथा
और रणनीति की तरह किसी संत के नाम पर बेच दी होगी
(यह खोजना भी तभी जायज जब मैंने कभी नीति की रणनीति बनाई न हो?)
मुझे यह देश बिल्कुल पसंद नहीं
और ऐसे किसी काम में मेरी साझेदारी नहीं जिससे रातोंरात मेरी पसंद का बनता जाए यह देश हो भी रहे हों ऐसे और संभव है कि मैं शामिल भी हूँ
एक दिन इसे छोड़कर चला जाऊँगा ऐसा तो पता नहीं पता है यह जरूर मुझे छोड़ चुका है यह देश छोड़ता और हर रोज धीरे-धीरे तेजतर
अगर मैं विरोधाभासों से भरा हूँ तो भरा हूँ
कम से कम भरा तो हूँ
अपने में हूँ और तुममें नहीं तो कम से कम हूँ तो नहीं भी तो हूँ ही

 

17

मुझे नहीं पता कौन गा रहा था
मैं सुरों आलाप ठेके और ताल के बीच अनियमित पदचाप सुन रहा था
जैसे काफ्का को घबराहट होती थी प्राग की जमीन के नीचे कोई चलता रहता है लगातार
और चीजों से टकराता है उसका पैर तो खतरनाक आवाज होती है
मैं मेड़ों पर चुपचाप चल रहा था
गाने की आवाज सदियों पुराने एक अतीत से आ रही थी
यही अहसास क्या कम सुखद था कि अतीत में गाना भी था
यह एक दिन मेड़ों पर चुपचाप चलते हुए जाना मैंने
क्या फर्क पड़ता है कि कौन गा रहा था फर्क इससे है कि गाना था

 

18

पवित्रता का आग्रह हिंसा से भरा है सत्य और मौलिकता का आग्रह भी
अभिनय एक गुण-सा गुणसूत्रों में विकसित हुआ तो
हिंसा की संभावनाओं को न्यूनतम बनाने के वास्ते ही
मैं हिंदू हूँ और अन्याय सहना मेरी ऐतिहासिक आदत है
जैसे 20वीं सदी में यहूदी होना पाप था 21वीं में मुसलमान
मध्ययुग की सदियों का पाप मैं इकबालियों बयानों और तोहमत लगाने की अर्जी़ अग्रिम नामंजूर है जिसकी
एक अन्यमनस्क त्रिज्या अपने कोणों का बहिष्कार कर केंद्र से हटती है और अपने प्रतिरोध में गौरवान्वित जिस भी बिंदु पर टिकती है
उसे एक नए केंद्र में तब्दील कर देती है बजाए अपने त्रिज्या होने को तब्दील कर देने के

 

19

अभी-अभी सुबह हुई है यह समय सुबह से बहुत दूर है
अभी-अभी घर पहुँचा हूँ यह जगह घर से बहुत दूर है
अभी जो सपना देख रहा हूँ वह उन सपनों की संतान है जो अभी-अभी मरे हैं
सपनों के वैधव्य का विलाप है जिसमें रुँध जाती है कहीं पहुँचने की मेरी गति सुनने की शक्ति
जिसका शरीर 19वीं सदी के रूसी उपन्यासों की तरह था
वह औरत बरसों पहले मर चुकी है जिसे खोजता मैं यहाँ तक आया
वह अभी-अभी यहीं एक बच्चे की उँगली पकड़ सड़क पार करना सिखा रही थी
यह उस औरत ने बताया अभी-अभी जो यहाँ थी ही नहीं कभी
दूसरों से आदमी होने की उम्मीद वही करता है जो खुद कभी आदमी नहीं हो पाया
लगातार इसके क्षोभ में रहता है
मनुष्य होने के लिए कलाओं की जरूरत नहीं जितनी अ-मनुष्य होने से बचने के लिए
उसने कहा तुम जैसे हो वैसे ही रहो मुझे आज तक समझ नहीं आया क्या और कैसा हूँ मैं तो कैसे रहूँ किस तरह
सिर्फ इतना कह सकता हूँ
तुम्हारे लिए जो कविताएँ नहीं लिखीं मैंने वे कविताओं से ज्यादा हैं
जो संगीत नहीं रचा मैंने वह संगीत से ज्यादा है
जो वचन मैंने नहीं निभाए सो इसलिए कि हमारे बीच सब कुछ खत्म न हो जाए
तुम तकाजा करती रहो और गुंजाइशें बची रहें

 

20

जब मैं कहता हूँ कि अठारहवीं सदी में मनुष्य के आकार की एक लिपि हुई थी जिसे लोग तीतू मियाँ कहते थे : तो पढ़ने-लिखने के शौकीन मेरे दोस्त मानते हैं : कि कुछ नया पढ़ा रहा हूँ इन दिनों : मैं उसे नहीं जानता आप भी नहीं जानते और हद है कि साला गूगल भी नहीं जानता : इंटरनेट पर मैं जैसे बैठता हूँ ठीक वैसे ही अपनी लाइब्रेरी में कभी बैठते होंगे बोर्हेस : और इसी तरह मनुष्य के आकार की लिपियों को पढ़ने की कोशिश में खो दी होगी उन्होंने दृष्टि : बायोग्राफिए बताते हैं कि उनके पिता ने भी वैसे ही खोई थी : उनके पिता भी कुछ वैसी ही गुप्त कोशिश कर रहे थे शायद : कुछ कोशिशों की आनुवंशिकता मिटाए नहीं मिटती : जैसे मेरा एक पुरखा रीवा की रियासत में फारसी में शेर पढ़ता था : मेरा परदादा संस्कृत में श्लोक बुना करता था : मेरा दादा फि़ल्मों में गीत लिखने के लिए भागकर मुंबई पहुँचा था : मेरे पिता फाउंटेन पेन से लिखी कविताओं की कापी में पानी से फैल गए अक्षरों को याद करने का प्रयास करते हैं : मैं अपनी कविताओं को खोने से बचाने के लिए हार्ड डिस्क पर नहीं रखता, ई-मेल पर अपलोड कर देता हूँ : इस तरह हम सब कविता की एक आनुवंशिक कोशिश में रहे : और हम सब असफलता की आनुवंशिकता को प्रसारित करते रहे : और असफलता ही मात्र ऐसी वस्तु है जीवन में जिसे चुना नहीं जा सकता : तीतू मियाँ भी नहीं चुना करते थे : यह 1790 के आसपास का चरित्र है जो बंगाल का एक मशहूर पहलवान था : जमींदारों के बीच उठना-बैठना प्यारा शगल था : और जमींदारों में अक्सर झगड़े होते थे : जिस तरफ हो जाते तीतू मियाँ उसका जीतना तय था : तो जीत के लिए उन्हें अपनी ओर करने की भरपूर कोशिश की जाती और कई बार तो झगड़ा ही इसी कोशिश के कारण होता : ऐसे ही अदला-बदली के एक खेल में उन्हें जेल हो गई : जेल से छूटकर आए तो उन्होंने खुद को बहुत बूढ़ा महसूस किया और हज पर चले गए : लौटते हुए वहाबियों से उनकी मुलाकात हो गई और 1857 से भी साठ साल पहले उन्होंने अंग्रेजों के खि़लाफ विद्रोह कर दिया : वह चाहते थे कि उनके पुराने जमींदार साथी भी उनकी तरफ हो जाएँ लेकिन उनका विद्रोह धीरे-धीरे किसान विद्रोह में परिवर्तित हो गया : और जमींदारों की संभावित दिलचस्पी जाती रही : सो वे जमींदार जो उनके इस या उस तरफ होने-भर से लड़ाइयाँ हार जाया करते थे : इस बार मिल-जुलकर उनके खि़लाफ हो गए और सिर्फ अपने इधर या उधर हो जाने-भर से लड़ाइयाँ जीत लेने वाले तीतू मियाँ जब किसानों की तरफ हुए तो लड़ाई हार गए : इतिहास हमेशा भाग्यवाद की उत्पत्ति करता है और इतिहास दरअसल खुद भाग्यवाद के सिवाय कुछ नहीं होता : तो तीतू मियाँ की जीतें जिनका कोई खास जि़क्र इतिहास में नहीं मिलता वे भाग्य की उत्पत्ति मानी जाती थीं : और जो उनकी हार थी जिसका कोई खास जि़क्र इतिहास में नहीं मिलता वह उनकी भाग्यविधाता बन गई : हारने के बाद तीतू मियाँ किस ओर हुए : और जिस ओर हुए क्या उस ओर की जीत हुई थी : ऐसा कोई सवाल गूँजता ही नहीं क्योंकि उस आखि़री हार ने उनका मिथक तोड़ दिया था : जिस उम्र में यहाँ या वहाँ हो सकते थे उस उम्र को उन्होंने मौज में उड़ा दिया : और एक तरफ होने का उनका आखि़री फैसला कितनी देर से आया उनके जीवन में : तीतू मियाँ खुद किस आनुवंशिकता से आए यह नहीं पता : लेकिन वे सारे लोग जो देर से जागते हैं वे सब तीतू मियाँ की आनुवंशिकता के उत्तराधिकारी हैं यह बात शिद्दत से महसूस होती है मुझे : जो यह नहीं समझ पाते कि टूटना मिथ की नियति होती है : एक मिथ हजार दूसरे मिथों की रचना करता है :

 

21

मैं किसी प्रतिस्पर्धा में रहा नहीं इसीलिए सबसे आगे रहा
अकेला भी क्योंकि उन दिशाओं की ओर जाना नितांत अकेला होना था
मेरी भाषा में उत्साह का अर्थ हमेशा निद्रानिमग्न मुस्कान था
जागृत गतिशील हड़बड़ाहट को मैं उत्साह के नाम से कभी पहचान न पाया
मेरे सीने पर हाथ रख साँस को महसूस करने में धर्मभ्रष्ट होता था उनका
सो दूर से ही देखकर उन्होंने घोषणा कर दी
यह एक मुस्कराती लाश है जिसमें सोई हुई हड़बड़ी तक नहीं
भुरभुरी मिट्टी के नीचे दब जाने की या महीन जल की धारा में बह जाने की
रह जाने की इस रहनशील दुनिया में रहना है तो सहना है इसीलिए रहन-सहन जैसा युग्म बना
जहाँ जीने के लिए उत्साह जरूरी माना जाता असल में जरूरी क्या था
यह वे भी न बता पाए जिन्हें किताबों के ब्लर्ब में सबसे जरूरी कहा गया
जो कहा गया था उसमें यकीन किया भी नहीं मैंने मसलन बुजुर्गों का सम्मान करो
बार-बार कही गई यह बात
बात मानो उनकी जो तुमसे प्रेम करते हैं
गोकि यह शर्त थी न मानने पर जिसे प्रेम खत्म हो जाता
तो हो जाए वह प्रेम ही क्या जो तुला हो अपनी बात मनवाने पर
मैं मानता न मानता पर सब मुझे हतोत्साहित लाश मान चुके थे
मुझे गाड़ा गया तब भी मेरे चेहरे पर उत्साह थिरक रहा था
जब मैं नींद में होता हूँ अपना चेहरा देख सकता हूँ

 

22

अच्छी चीजों से जुड़ा सबसे बड़ा विकार है कि उन्हें इतनी बार दुहराया जाता है
कि उनका होना एक मामूली होना हो जाता है कि उनकी अच्छाई एक उबाऊ अच्छाई में बदल जाती है
इस तरह एक दिन उनके अच्छा होने को मानना इंकार कर दिया जाता है
जो बार-बार सुनना चाहते हैं कि मैं अच्छा आदमी हूँ, वे दरअसल अच्छेपन की परिधि से बाहर बैठते हैं
मैं अपनी नींद के सिरहाने बैठ स्वप्न लिखता उनकी वर्तनियाँ दुरुस्त करता व्याकरण को जाँचता खुला छोड़ता
और मुँह में फूँक मार उनमें जीवन भरता
सारे स्वप्न जीवन थे और सारा जीवन स्वप्न था
सारी प्रज्ञाएँ दरअसल विशाल प्रकाशपिंडों से फूटती अँधेरे की किरणें थीं
मेरे स्वप्नों की मृत्यु हो गई है मेरी रातें विधवाओं-सा विलाप करती हैं
मेरी इच्छाओं को लगभग पंगु बनाते हुए
मेरे भीतर भय की पुस्तिकाएँ हैं वायु का खंड-काव्य खंडित काव्य
जल का श्लोक निर्जलता का शोक
उस लाश की आँखें खुली थीं जैसे कोई कंप्यूटर को शटडाउन करना भूल गया हो
दुख का प्रपात अवसाद का बोगनवीलिया थोड़ा गुल था थोड़ा आब
जाने कौन-सा वायरस है जो उदासी में घुसता है उदासीन बना देता है
वे फूल जिनकी प्रजातियाँ लुप्त हो गईं इसलिए कि हमने उनके जैसा होने की कामना बंद कर दी थी

 

23

नहीं यह कोई परिकथा नहीं थी
उसका धड़ घोड़े का था पूँछ श्वानों-सी लिंग था विशालकाय और दूध से भरा थन भी लटका हुआ था
वह ऐसा उभयलिंगी खुद ही नर था मादा भी महान काम-क्षम वह पतली कटि का सुंदरी
वह कर्म-भीम हजार हाथों का काम अकेले करता दौड़ता सरपट सुपर सोनिक विमानों से तेज उड़ता
वह अपनी प्रजाति का पहला था जिसकी व्यापक उत्पत्ति के लिए सरकार की मंजूरी दरकार थी
तब तक वह एक तस्वीर में हर दीवार पर टँगा हर कंप्यूटर पर स्क्रीनसेवर बन टहलता प्रतीक्षारत
वह बीटी मानव था जेनेटिकली मॉडीफाइड मानव-प्रजाति जिसमें
सैकड़ों अनुसंधानों के बाद जीन्स की सही मात्रा मिलाई गई थी बीसियों पशुओं से निकाल
नहीं यह कोई परिकथा नहीं थी फंतासी भी नहीं विज्ञान का चमत्कार था
मनुष्यता जगाने के बजाय मेरी पशुताओं को ही जगा रहा विज्ञान और-और पशुओं को मिला रहा मुझमें
ऐसा कहूँ तो क्या यह मेरा पिछड़ा हुआ ज्ञान?
फिर भी कहता हूँ यह पहले से था
यह हमारी फूहड़ अभिलाषाओं की दमित प्रजाति सिर उठा मंजूरी माँगती प्रतीक्षारत
मैं जितना नकारता वह उतना हुंकारता

 

24

मेरी कार के समांतर वह लड़का ऐसी रफ्तार से चला रहा था साइकल जैसे कार को पछाड़ देगा : मैं ब्रेक दबा गाड़ी को धीमा और धीमा करता रहा : सरसराकर आगे निकल गया वह लड़का : रहम की मेहर से खिसियाया हुआ झुक कर सुस्ताने लगा : तभी मैंने रेज दे दी सर्रर्र से आगे निकल आया : उसे दुबारा साँस सँभालने में एक और शीत-युद्ध बीत चुका होगा : कार के भीतर शोस्ताकोविच की सिंफनी थी : कार से बाहर बीथोफन का बहरापन

 

25

इतना आसान नहीं था सीता को त्यागने का निर्णय जितना लंका को जीतना था
जिस तरह दो सीताएँ थीं एक अग्नि में छिपी हुई
उसी तरह दो राम हुए हों
और चूँकि राम की अग्नि परीक्षा कभी हुई ही नहीं
सो कभी लौट ही न पाया हो अग्नि में छुपा दूसरा राम
ऐसे ही मैं जो यहाँ बैठा हूँ दरअसल मैं हूँ ही नहीं एक और मैं था जो किसी समय जाकर आग में छुप गया
और अब बुलाने पर भी आ नहीं रहा
ऐसे ही यह जो युग है वह युग है ही नहीं जिसे होना था वह तो कहीं आग में जा पड़ा हुआ
सो इस राम इस मैं इस युग के जो फैसले हैं उस राम उस मैं उस युग के भी होते कोई जरूरी तो नहीं
पर यह कैसे पता करें कि उस राम उस मैं उस युग को पीड़ा होती होगी इस इस इस के फैसले सुनकर
आग की ओट से झाँक कर देखते हुए राज खुल जाने के भय से सावधान

 

26

एक साथ न जाने कितने युग चल रहे हैं : पृष्ठ पर मुख्य युग का पाठ है : पृष्ठभूमि में कितने तो पढ़े हुए और भूल चुके भी पाठ हैं : मैं मुख्य युग को पढ़ता और दूसरी लाइन पर लगे एस्टेरिस्क को देख फुटनोट पर बसे दूसरे युग में पहुँच जाता : फुटनोट में भी एस्टेरिस्क लगे हैं : जिन्हें खोजता मैं अनुषंगिका में चला जाता : वहाँ से कालक्रम और समय-निर्देशिकाओं में : फिर कोई एस्टेरिस्क पहुँचा देता अनुक्रमणिका तक : वहाँ से लौटता यह सोचते हुए कि किस युग में था मैं : कहाँ से शुरू किया था युगों के पाठ का यह सफर : जो तय है कि ऐसे ही चलेगा : तो बताओ, ऐसा, कैसे चलेगा

 

27

हम आपातकाल की संतान हैं सन 75 से 77 के बीच जन्मे हम उभयचर जो
निरंकुशता का अमूर्तन अपने भीतर ले चलते रहे सदा अराजक घोड़ों की तरह जमीन के उबड़खाबड़पन को नकारते
जितना विरोध करते समझौतों के लिए भी उतना ही खुद को उपलब्ध बता देते
सफलताओं का निषेध कर हम असफलता की कामना करते
और एक दिन अपनी कला में व्यवहार में प्रश्नों में जीवन में उत्तर-जीवन में घर में परिवार में बाजार और व्यापार में
खुद को असफल घोषित कर देते
उस क्षण कोई हमें याद न दिला पाता हमने जिसकी कामना की उसे पा लिया यह सफलता से अलग और क्या है
जब हम कहते दुख है हमें हमारे भीतर आग की कई लघुकथाएँ हैं जो उपन्यास बनने से इंकार करतीं लगातार
वह कौन-सी नस बंद कर दी थी कि बच्चे तो पैदा हो रहे थे जो
बरसों बाद भी जब साथ आते मुट्ठी जैसी उपस्थिति न बना पाते
विभिन्न समयों में करते रहे लोलक की तरह दोलन आंदोलन की आवश्यकता को दुहराते बुजुर्गों संग
हमें कोई बता नहीं पाता कि नसबंदी के तमाम अभियानों के बावजूद
अपने परिवार में पाँचवीं-छठी संतान थे हम
हमारा गर्भाधान बार-बार दुहराई एक भूल के तहत हुआ था या एक सुनियोजित उत्तेजक राजनीतिक विरोध के कारण?

 


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हिंदी समय में गीत चतुर्वेदी की रचनाएँ



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