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कहानी

इकामा फी
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’


वह दोपहर का समय था। जैसे ही घड़ी ने बारह का घंटा बजाया, जद्दा शहर के सैफा मोहल्ले की तीन नंबर गली के 'अल-हजरत' कारखाने में जलजला उतर आया। अचानक बाहर का गेट खड़का और दरवाजा खुलवाने के लिए कई लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे। उस समय अल-हजरत में कुल सोलह लोग मौजूद थे। देर रात तक काम करने के कारण वे लोग कुछ ही समय पहले उठे थे और हाथ मुँह धोने के बाद नाश्ता करने जा रहे थे। बाहर से आ रही आवाज की तेजी बता रही थी कि आने वाले लोग सुरता यानी पुलिस महकमे से ताल्लुक रखते हैं। और जैसे ही यह बात कारखाने में मौजूद लोगों की समझ में आई, वहाँ खलबली मच गई। सामने रखे खाने को छोड़ कर कोई आदमी कपड़े पहनने लगा, तो कोई पासपोर्ट की खोज में मसरूफ हो गया। पुलिस बाहर आ चुकी थी, इसलिए पकड़ा जाना तो तय था। हाँ, पकड़े जाने से पहले वे आगे आने वाली मुश्किलों को आसान बना लेना चाहते थे।

मशगल यानी सिलाई के उस कारखाने में कुल जमा बीस गैरकानूनी मुलाजिम काम करते थे। बीस में से दो लोग पिछले हफ्ते छुट्टी पर अपने मुल्क हिंदुस्तान गए हुए थे। तीन लोगों को कल रात बलद मार्केट के पास से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। वे तीनों अभी एक महीने पहले ही आए थे, अपने खेत और मकान गिरवी रखकर। लेकिन बलद की शीशे वाली मार्केट, जो कि अपनी खूबसूरती के लिए पूरे शहर में मशहूर है, के जादू ने उन्हें बनीमान जेल पहुँचा दिया था।

हिंदुस्तान सहित तमाम देशों के लाखों गरीब मुस्लिम मजदूर गैर कानूनी रूप से सऊदी अरब में रहते हैं। मजहबी रस्म 'उमरा' के बहाने ये लोग टिकट का जुगाड़ करके वहाँ पहुँचते हैं और फिर अपने जान-पहचान वालों की मदद से खुद को सोलह घंटे काम करने वाली मशीन के रूप में तब्दील कर लेते हैं। इनका सिर्फ एक ही मकसद होता है दिन रात कोल्हू के बैल की तरह जुट कर काम करना, जिससे कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके। आमतौर पर ऐसे लोग दिन-रात एक कर के छ महीने में अपने कर्ज को अदा कर लेते हैं। उसके बाद ऊपरवाले की मेहरबानी से वहाँ जितने दिन रुकने का मौका मिल जाता है, मुनाफा उतना ही मोटा होता जाता है।

जो लोग बाकायदा कानूनी वीजा लेकर सऊदी अरब जाते हैं, उन्हें वीजा जारी करने वाली कंपनी की तरफ से एक लाइसेंस मिलता है, जो 'इकामा' के नाम से जाना जाता है। वहाँ पर रह रहे सभी प्रवासियों के लिए इकामा को चौबीसों घंटे अपने पास रखना जरूरी होता है। क्योंकि गैरकानूनी रूप से रह रहे नागरिकों की तलाश में घूमती पुलिस पता नहीं किस गली, किस मोड़ पर पूछ बैठे - इकामा फी? यानी इकामा है? या फिर हात इकामा? यानी कि इकामा दिखाओ।

जिन लोगों के पास इकामा होता ही नहीं, वे लोग पासपोर्ट को हमेशा अपने पास रखते हैं। पासपोर्ट पास होने से पकड़े जाने पर उस आदमी की शिनाख्त में कोई परेशानी नहीं होती। ऐसे लोगों को कुछ दिन जेल में रखा जाता है। उसके बाद सऊदी अरब के धनाढ्यों द्वारा निकाले गए ज़कात के पैसों से टिकट दिलाकर उन्हें वापस उनके देश रवाना कर दिया जाता है।

'अल हजरत' कारखाने में उस समय एक बाहरी व्यक्ति भी मौजूद था। उसका नाम था हफीज। हफीज वहाँ पर अपने दोस्त से मिलने के लिए आया हुआ था। खुशकिस्मती से उसके पास इकामा था। जब काफी देर हो गई और कोई भी आदमी गेट खोलने के लिए राजी नहीं हुआ, तो हफीज ने हिम्मत जुटाई, ''मेरी समझ से गेट को खोल देने में ही सभी लोगों की भलाई है।''

कुछ देर रुक कर उसने सभी लोगों के चेहरों पर आ रहे भावों को पढ़ा और फिर बात आगे बढ़ाई, ''अगर वे लोग गेट तोड़ कर अंदर आए, तो फिर उनके कहर से बचना बहुत मुश्किल होगा।''

हफीज की बात सुनकर कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। सहसा इलियास आगे आया। अपने पासपोर्ट को जेब के हवाले करता हुआ वह बोला, ''खोल दो गेट। पुलिस वाले हमें पकड़ कर जेल ही तो ले जाएँगे न? ...अगर अल्लाह-त-आला को यही मंजूर है, तो हम क्या कर सकते हैं?''

''ठीक है, मैं गेट खोलता हूँ।'' कहते हुए हफीज गेट की तरफ बढ़ गया।

किसी ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हफीज सीधे गेट के पास पहुँचा। उसने एक पल के लिए अपने आप को सँभाला और फिर गेट खोल दिया। सामने तीन पुलिस वाले और दो गाड़ियाँ खड़ी हुई थीं। इससे पहले कि वे लोग कुछ पूछते, हफीज बोल पड़ा, ''अस्सलाम आलैकुम, वरह मतुल्लाह!''

अपने हुक्म की नाफरमानी की वजह से पुलिस वालों के चेहरे गुस्से में लाल-पीले हो रहे थे। अगर कुछ समय तक गेट और न खुलता, तो यकीनन वे उसे मिसमार कर देते। सलाम सुनकर वे थोड़ा नार्मल हुए। तीनों ने एक साथ जवाब दिया, ''वालैकुम अस्सलाम!''

इससे पहले कि वे लोग कुछ और पूछते, हफीज ने अपना इकामा आगे कर दिया। एक सिपाही उसका इकामा लेकर देखने लगा और बाकी के दोनों लोग कारखाने के अंदर घुस गए। हफीज का इकामा एकदम दुरुस्त था। सिपाही का सिग्नल पाकर उसने राहत की साँस ली और मन ही मन 'अल हजरत' में फँसे अपने साथियों के लिए दुआ करता हुआ वह अपनी मंजिल की तरफ बढ़ गया।

दोनों सिपाही अपने बूट खटकाते हुए अंदर पहुँचे। वहाँ पर मातम का माहौल था। सभी लोग झुंड बनाकर एक जगह पर खड़े थे। जैसे कसाई के सामने खड़ा बकरों का रेला इस इंतजार में हो कि जाने कब उनकी गर्दन नाप दी जाए।

''इकामा फी?'' सिपाही की आवाज ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा।

कोई कुछ नहीं बोला। जैसे सभी को साँप सूँघ गया हो। यह देखकर एक पुलिस वाले को गुस्सा आ गया। वह जोर से चिल्लाया, ''हात इकामा!''

किसी के पास इकामा होता, तब तो वह दिखाता। इलियास ने थोड़ी सी हिम्मत जुटाई। वह धीरे से बोला, ''माफी इकामा।''

यह सुनकर एक पुलिस वाले का धैर्य जवाब दे गया। उसने अरबी में एक भद्दी सी गाली दी। संयोग से इलियास उसे पहले भी सुन चुका था, इसलिए गाली सुनकर उसका खून खौल उठा। एक क्षण के लिए उसके दिमाग में आया कि अभी इन पुलिस वालों को उनकी औकात बता दी जाए, बाद में फिर चाहे जो हो। लेकिन अगले ही पल उसके कानों में अम्मी की बात गूँज उठी, ''बेटा, परदेश में हमेशा सबके साथ मेल-मोहब्बत से रहना। कभी किसी से झगड़ा नहीं करना। कोई दो बात कह दे, तो उसकी तरफ ध्यान मत देना। बस अपने काम से काम...''

इलियास के कदम खुद-ब-खुद पीछे हट गए। तब तक तीसरा पुलिस वाला भी अंदर पहुँच गया। उसके हाथ में प्लास्टिक की एक बड़ी सी रस्सी थी। उसने सभी लोगों को लाइन से खड़ा किया और उनके हाथ रस्सी से बाँध दिए। उन लोगों को लेकर पुलिस वाले बाहर जाने ही वाले थे कि तभी ऊपर छत पर किसी चीज के गिरने की आवाज हुई। पुलिस वालों के कान खड़े हो गए। एक सिपाही सीढ़ियाँ खोजकर ऊपर गया। वहाँ पर दो लड़के छिपे हुए थे। सिपाही उन्हें लेकर नीचे आया। तीनों पुलिस वालों ने उनकी जमकर धुनाई की। सात-आठ मिनट तक कूटने के बाद उन्हें इत्मिनान हुआ। वे दोनों लड़के भी रस्सी से बाँध दिए गए। उसके बाद सिपाहियों ने पूरे घर की तलाशी ली। जब उन्हें पूरी तरह से यकीन हो गया कि अब इस घर में और कोई नहीं है, तो उन्होंने लडकों को ले जाकर बाहर खड़ी गाड़ियों में ठूँसा और जेल की ओर रवाना हो गए।

लॉकअप में लगातार भीड़ बढ़ती जा रही थी। अभी-अभी दस-बारह लोगों का एक और जत्था उसमें शामिल हुआ था। सीखचों का सहारा लिए इलियास बमुश्किल उकड़ू बैठ पा रहा था। अब तक उसके पेट में चूहों की दौड़ शुरू हो चुकी थी। लेकिन इस समय वहाँ खाना कहाँ रखा। उसने दाएँ हाथ से अपनी जाँघिया को टटोला, उसमें लगी जेब में 500 रियाल का नोट सही सलामत था। भूख से ध्यान हटाने के लिए वह अपनी याददाश्त को खँगालने लगा।

चार साल पहले की बात है। एक दिन बड़े जोर की आँधी आई। खेतों से घर लौटते वक्त एक पेड़ इलियास के अब्बू के ऊपर आ गिरा। सर पर गहरी चोट आई और ज्यादा खून बह जाने की वजह से उनका इंतकाल हो गया। अपने पीछे छोड़ गए वे अपनी पत्नी, इलियास और उसकी चार बहनें। घर में थोड़ी बहुत खेती थी, सो उसके सहारे किसी तरह से नमक-मिर्च चलता रहा। इलियास उस समय आठवीं में पढ़ रहा था। अब्बू का गुजरना और उसका स्कूल छूटना दोनों काम एक साथ हुए। परिवार का इकलौता मर्द होने के कारण घर की जिम्मेदारी उसके ऊपर आन पड़ी। ऐसे में रहमत चाचा की सिलाई की दुकान उसके काम आई। कापी-किताब छोड़ कर उसने सुई-धागे को सँभाला और उसी में रमता चला गया।

इलियास का दिमाग बहुत अच्छा निकला। रहमत चाचा ने अपनी रहमत जारी रखी। उसका नतीजा यह निकला कि दो साल में वह पक्का दर्जी बन गया। उसके दूर के रिश्ते के एक मामू सऊदी अरब में सिलाई का काम करते थे। संयोग से उसी दौरान वे ईद की छुट्टियों में घर आए। उन्होंने इलियास की अम्मी से कहकर उसका पासपोर्ट बनवा दिया। हालाँकि उस समय उसकी उम्र चौदह-पंद्रह साल से अधिक नहीं थी। पासपोर्ट की इन्क्वायरी के लिए आए हुए इंस्पेक्टर ने यह बात उठाई भी, लेकिन जैसे ही उसकी जेब में पाँच सौ रुपये गए, उसने इलियास को बालिग घोषित कर दिया।

खेत और मकान को गिरवी रख कर टिकट का इंतजाम हुआ। उड़ान दिल्ली से थी। और दिल्ली तक पहुँचने के लिए लखनऊ मेल में रिजर्वेशन हो चुका था। जिस दिन इलियास अपने घर से निकला, वह जनवरी का दूसरा शनिवार था। ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। शाम चार बजे से ही कुहरे ने अपने हाथ-पैर फैलाने शुरू कर दिए थे। गाँव वालों से विदा लेकर जब वह अपने गले में पड़े गुलाब के हार को लहराता हुआ टैंपो में बैठा, तो उसकी माँ का बुरा हाल था। जबान को तो उन्होंने जब्त करके बंद कर रखा था, पर आँखें सब्र के बाँध को तहस-नहस करने पर उतारू थीं। छोटी बहनें इस तरह से जार-ओ-कतार रो रही थीं, जैसे उनका भाई विदेश न जाकर कहीं जंग के मैदान के लिए रवाना हो रहा हो।

जैसे ही टैंपो ने गाँव के चौराहे को छोड़ा, अम्मी के हाथों से सब्र का दामन छूट गया। वे फूट-फूट कर रोने लगीं। उनके जिगर का टुकड़ा पहली बार उनसे इतनी दूर जा रहा था। पता नहीं कब उसका चेहरा देखने को मिले? यह देखकर इलियास भी अपने आप को रोक नहीं पाया और फूट-फूट कर रोने लगा।

''अपने आप को सँभालो बेटे।'' बगल में बैठे मामू ने हिम्मत बँधाई, ''इस तरह से रोओगे तो कैसे काम चलेगा?''

इलियास ने अपना मुँह मामू के सीने में छिपा लिया। वे उसकी पीठ सहलाने लगे। अनजाने में ही इलियास का बायाँ हाथ दाहिने हाथ पर बँधे ताबीज पर चला गया। आज सुबह ही अम्मी ने मौलवी साहब का लिखा हुआ ताबीज इमाम जामिन में मढ़कर उसके हाथ में बाँधा था। ताबीज बाँधते हुए उन्होंने कहा था, ''या पीर बाबा, परदेश में मेरे बेटे की हिफाजत करना।''

उसके बाद वे इलियास से मुखातिब हुई थीं, ''इलियास बेटे, हमेशा पीर साहब का सिजरा पढ़ना और वक्त पर नमाज अदा करना। अल्लाह तुम्हारा निगेहबाँ रहेगा।''

लखनऊ स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर लखनऊ मेल लगी हुई थी। चारों ओर भीड़ ही भीड़ थी। लगता था जैसे पूरे शहर के लोग वहाँ जमा हो गए हैं। भीड़ को चीरते हुए वे लोग ट्रेन की ओर बढ़े। एस-9 की 27 और 28 नंबर सीटें उनका इंतजार कर रही थीं।

अपने आस-पास के लोगों को देखकर इलियास हैरान रह गया। वहाँ पर पचासों लड़के उसी की तरह गुलाब का हार पहने हुए इधर-उधर खड़े थे। तो क्या ये सभी लोग...?

तभी कोई आवाज उसके कानों से टकराई, ''ये इतने सारे लोग हार पहन कर कहाँ जा रहे हैं?''

पड़ोस में कोई आदमी अपने साथी से पूछ रहा था। उसके साथी ने हँसकर जवाब दिया, ''हलाल करने से पहले बकरे को फूल-माला पहनाना सुन्नत का काम है।''

इलियास के मुँह का स्वाद खराब हो गया। ख्यालों की गलियों से निकलकर वह यथार्थ की जमीन पर आ गिरा। तो क्या वह सचमुच हलाल होने वाला बकरा है? उसने लॉकअप में चारों ओर नजर दौड़ाई, फिर अपने आप से पूछा। आखिर क्या कुसूर है उसका और इन तमाम लोगों का? यही न कि ये अपने-अपने परिवार का पेट पालने के लिए यहाँ चार पैसे कमाने आए थे? आखिर इन लोगों ने पुलिस वालों का क्या बिगाड़ा है, जो ये यहाँ पर चोर-उचक्कों की तरह पकड़ कर बंद कर दिए गए हैं? क्या मेहनत करके खाना जुर्म है? क्या अपने परिवार का पेट पालना गुनाह है? क्या बेहद कम तनख्वाह में लोगों का काम करना अपराध है?

हाँ, शायद ये सब जुर्म है। उसका सबसे बड़ा गुनाह है गरीब के घर में पैदा होना। गरीब हमेशा पिसता है, गरीब हमेशा कुचला जाता है, गरीब हमेशा सताया जाता है। और उसके साथ सब कुछ इसलिए ऐसा होता है, क्योंकि वह चुपचाप यह सब झेल लेता है। इसीलिए, शायद इसीलिए वह हलाल हो रहा है।

शोर सुनकर इलियास चौंका। उसने देखा पास के एक लॉकअप में किसी कैदी पर पुलिस वाले लात-घूँसे बरसा रहे हैं। कैदी के मुँह और नाक से खून बह रहा था और वह बुरी तरह से चिल्ला रहा था। इलियास ने उसे गौर से देखा। उस आदमी ने पठानी सूट पहन रखा था।

''जरूर यह पाकिस्तानी होगा और इसने चोरी वगैरह की होगी।'' इलियास बड़बड़ाया, ''इन कमबख्तों ने तो पूरी मुसलमान कौम को बदनाम कर रखा है। उल्टे-सीधे कामों के अलावा इन्हें कुछ आता ही नहीं।''

कुछ ही देर में कैदी बेहोश हो गया। एक सिपाही ने जोर से उसके पेट में एक लात मारी और उसे घसीटते हुए एक ओर लेकर चला गया।

यह सब देखकर इलियास काँप उठा। बनीमान इसी कँपकँपी के लिए पूरे सऊदी अरब में जानी जाती है। बनीमान की गिनती बड़ी जेलों में होती है और आमतौर पर वहाँ खूँख्वार किस्म के मुजरिमों को ही रखा जाता है। दरअसल बनीमान एक खौफ का नाम है, एक ऐसा खौफ, जिसकी छाया वहाँ के हर उमरा वाले की दुआओं में कभी न कभी देखने को मिल जाती है।

अब से ठीक एक महीने पहले सऊदी सरकार ने गैरकानूनी रूप से रह रहे लोगों की धरपकड़ के लिए एक खुसुसी प्रोजेक्ट शुरू किया था। अपने इस मकसद को कामयाब बनाने के लिए उसने न सिर्फ कारखानों पर छापे मारे, बल्कि यह हुक्म भी लागू किया था कि जिस किसी के घर से गैरकानूनी मजदूर पकड़े जाएँगे, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। जुर्माने से बचने के लिए मकानमालिक खुद ही मजदूरों के इकामे देखने लगे। ऐसे में गैरकानूनी मजदूरों के पास दो ही रास्ते बचे। पहला खुद जाकर टिकट खरीदें और अपने मुल्क की राह पकड़ें। दूसरा रास्ता था खुद को पुलिस के हाथों पकड़वा देना। दूसरा रास्ता उन लोगों को ज्यादा मुफीद लगा। टिकट के पैसे बचाने और बनीमान से बचने के लिए लोगों ने जद्दा शहर की ही एक छोटी जेल अशर्फिया को चुना और खुद को गिरफ्तार करवाने के लिए वहाँ पर पहुँचने लगे।

पुलिस वाले यह देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने लोगों को पकड़-पकड़ कर जेल में बंद करना शुरू कर दिया। गिरफ्तारियों की संख्या सौ, दो सौ को पार करती हुई हजारों में जा पहुँची। दो ही दिन में जेलें ठसाठस भर गईं। पुलिस वाले हैरान। अब क्या करें? थक हार कर उन लोगों ने गिरफ्तारियाँ रोक दीं। लेकिन लोग थे कि अशर्फिया पहुँचते ही जा रहे थे। धीरे-धीरे यह आलम हो गया कि जेल के सामने रोड पर एक-एक किमी. इधर-उधर तक हजारों आदमी जमा हो गए।

जो मजदूर अपनी किस्मत को दाँव पर लगाकर रोजी-रोटी की तलाश में सऊदी अरब आए थे, वे खुले आकाश में अपनी गिरफ्तारी का इंतजार कर रहे थे। ऊपर दहकता सूरज था और नीचे सुलगती हुई जमीन। और उसमें भी होड़ कि मेरा नंबर पहले आ जाए? कई बार इसी बात को लेकर मजदूरों में झगड़ा हो गया। गाली-गलौज से होती हुई बात मार-पिटाई तक जा पहुँची। हालात जब बेकाबू होने लगे, तो बीच-बचाव के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा।

वीजा वाले मजदूरों के लिए यह आमदनी का एक खूबसूरत मौका था। उन्होंने रोजाना की जरूरत के सामान खरीदे और जेल के पास जाकर बेचने लगे। देखते ही देखते जेल के सामने खाने-पीने से लेकर छाते और कपड़े तक की दुकानें लग गईं। सभी मजदूरों ने ऐसे ही किसी हालात के लिए अपने पास कुछ न कुछ पैसे बचा रखे थे। उन्हीं पैसों से वे दुकानदारों से सामान लेकर खाते पीते, छाता लगाकर धूप से बचते, अपनी दुआओं में ऊपर वाले से जल्दी गिरफ्तारी की इल्तजा करते और रात होने पर सड़क के किनारे चादर ओढ़कर सो जाते।

उस दौरान पूरे एक महीने तक इलियास भी इसी भीड़ का एक हिस्सा बना रहा। उसका सारा दिन रोने और दुआओं में बीतता। धीरे-धीरे उसकी सारी जमा पूँजी खत्म हो गई। एक दिन उसने किसी तरह अपने साथियों से पैसे माँग कर काम चलाया। लेकिन वहाँ पर तो सभी उसी के जैसे थे। किसी के पास कारूँ का खजाना तो था नहीं। थक-हार कर वे लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि पुलिस वाले अब हमें गिरफ्तार करने से रहे। यहाँ पर पड़े रहने से अब कोई फायदा नही। लिहाजा धीरे-धीरे करके लोग वहाँ से खिसकने लगे। इलियास के सामने भी और कोई रास्ता नहीं था। थक-हार कर वह भी वापस अपने मोअल्लिम यानी कारखाने के मालिक के पास लौट गया।

आने वाला कल अपने साथ क्या-क्या लेकर आने वाला है, यह किसी को नहीं मालूम। इलियास को भी यह बात कहाँ मालूम थी। और अगर मालूम होती, तो शायद वह अशर्फिया में जाकर अपना एक महीना बरबाद नहीं करता। जिस बनीमान जेल से बचने के लिए उसने अपना पूरा एक महीना होम कर दिया था, वही बनीमान अब उसकी हकीकत थी। और कौन जाने उसे कब तक इस हकीकत से जूझना था।

वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूम रहा था। सारी घड़ियाँ अपनी लय में चल रही थी। सारा संसार अपने आप में मगन था। लेकिन इलियास का वक्त जैसे अपनी जगह पर ठहर गया था। कब सूरज निकलता और कब डूबता, इसका उसे पता ही न चलता। उसके पास बस दो ही काम थे, नमाज पढ़ना और दुआ माँगना। अक्सर दुआ माँगते-माँगते उसके गाल आँसुओं से तर हो जाते, गला भर आता और ठीक से खाना न खाने के कारण पैदा हुई कमजोरी से चक्कर आ जाता। लेकिन इसके बावजूद उसकी दुआओं का असर न दिखता। पता नहीं माँगने वाले के ही जज्बे में कोई कमी रह गई थी या फिर देना वाला कुछ और ही चाह रहा था?

पच्चीसवें दिन इलियास के मामू उससे मिलने आए। इलियास की हालत देखकर वे एकदम सन्न रह गए। सींखचों के अंदर हाथ डालकर उन्होंने इलियास को अपनी बाँहों में भींचने की कोशिश की। काफी देर के बाद वे अपने आप को सहज कर पाए, ''कल जब मैंने तुम्हारे कारखाने में फोन किया, तो पता चला। ...बड़ी मुश्किल से यहाँ का पता...''

इसके आगे उनका गला रुँध गया। मामू को देखकर इलियास अपने आपको रोक न सका। कई दिनों से उसके भीतर जमा हुआ गुबार आँसुओं के रूप में बह चला।

''चलो समय हो गया।'' सिपाही ने मामू का हाथ पकड़ कर अलग किया।

जल्दी में उन्होंने जेब से एक लिफाफा निकाल कर इलियास की ओर बढ़ाया, ''तुम्हारा खत है, कल ही आया था। ...मैं जेलर से तुम्हारे बारे में बात करता हूँ।''

कहते हुए वे बाहर निकल गए। बेबस निगाहों से इलियास मामू को जाते हुए देखता रहा। मामू के नजरों से ओझल होते ही उसने लिफाफा फाड़ा और खत को निकाल कर पढ़ने लगा। उसकी आँखों से आँसू झरने लगे। जैसे-जैसे खत आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे उसके आँसुओं की रफ्तार भी बढ़ती गई।

इलियास ने खत को एक बार पढ़ा, दो बार पढ़ा, ...पूरे सात बार पढ़ा। उसका मन विचलित हो उठा। उसने सोचा काश वह उड़कर अपनी अम्मी के पास पहुँच जाए और उनकी गोद में सिर छिपाकर खूब जोर-जोर से रोए। अभी वह यह सोच ही रहा था कि अस्र की अजान उसके कानों में पड़ी। अजान सुन कर उसका ढाँढ़स बँधा। उसने खत को जेब में रखा और नल के पास जाकर वजू करने लगा। वजू करते समय भी उसके दिमाग में खत की बातें गूँजती रहीं। वजू करके उसने रूमाल से अपना हाथ-मुँह पोंछा और टोपी लगाकर नमाज पढ़ने की नियत करने लगा।

एक तरफ इलियास नमाज की नियत कर रहा था, दूसरी तरफ उसका मन तमाम दुश्चिंताओं में फँसा हुआ था। कब हमें इस जेल से मुक्ति मिलेगी? कब हम अपने घर पहुँचेंगे? घर का खर्च कैसे चलेगा? अम्मी को जब यह सब पता चलेगा, तो उनके दिल पर क्या बीतेगी? खेतों को गिरवी रख कर जो पैसा जुटाया गया था, उसे कैसे वापस किया जाएगा?

तभी एक पुलिस वाले ने बैरक में आकर आवाज दी। आज शाम की फ्लाइट से जाने के लिए जिन लोगों चुना गया था, वह उनके नाम लेकर बुला रहा था। नियत बाँधने के लिए इलियास के हाथ कान की तरफ उठ ही रहे थे कि उसके कान में आवाज पड़ी, ''मोहम्मद इलियास सिद्दीकी!''

आगे की बात इलियास ने सुनी ही नहीं। सदियों से पिंजरे में कैद पंछी को उसकी आजादी का फरमान मिल गया था। उसे लगा उसकी अम्मी सामने खड़ी हैं और वे अपने दोनों हाथ फैलाकर उसे अपने पास बुला रही हैं। उसके पैरों में पंख लग गए। न तो उसे नमाज का ध्यान रहा और न ही उससे होने वाले बेअदबी का। एक झटके में उसने अपनी गर्दन गेट की ओर घुमाई और फिर पूरी ताकत के साथ उस ओर दौड़ पड़ा।


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