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आलोचना

विमर्शों के समय में ‘अनदेखा अंतस’
वंदना चौबे


अपनी लोकरंगी अभिव्यक्ति के लिए ख्यात राजस्थान के बातपोश रचनाकार विजयदान देथा जो साहित्य-जगत में 'बिज्जी' के नाम से भी जाने जाते हैं, वर्ष 2006 में प्रकाशित 'अनदेखा अंतस' उनकी बहुपठित कहानी रही है लेकिन उस स्तर पर बहुचर्चित नहीं हुई है। हिंदी में एक दशक से 'लोक' जब से विमर्श के केंद्र में आया, विजयदान देथा उससे बहुत पहले से अपनी सहज लेकिन सघन शिल्प के लिए चर्चित कथाकार के रूप में जाने जाते रहे हैं। ध्यान देना चाहिए कि विजयदान देथा का लोक यह विमर्शो दौड़ में अचानक उगता हुआ तथ्यात्मक या आँकड़ा आधारित लोक नहीं है। इस लोक में मनुष्य-मन की अच्छी-बुरी, कच्ची-पक्की, सरल-गरल भाव-अभाव हैं। यही दमक उनके पात्रों को 'चरित्र' कि बजाय मिट्टी में जीने वाला दुर्दमनीय मनुष्य बना देता है। उनकी कई रचनाओं पर बेहतरीन वृत्तचित्र और फिल्में बनाई गईं। प्रेम, त्याग, वीरता, साहस और अनन्य बलिदान की अनेक गाथाओं को रचने वाले राजस्थानी लोक-जीवन से विजयदान देथा गाथाएँ अपनेपन और लगाव से उठाते हैं। मूल-कथा की संवेदनशीलता और संस्पर्शता को अक्षुण्ण रखते हुए वे मानो बेपरवाह और बेबाक ढंग से बिलकुल नई कहानी रच देते हैं। अब वहाँ न कोई अतिरिक्त वैचारिक आग्रह होता है न ही लेखकीय सजगता का भान। वह राजस्थान जहाँ संस्कृति के नाम पर अनेक अतिश्योक्तिपूर्ण महागाथाएँ और भयावह युद्धों की ऐतिहासिक सूची है, सती और जौहर संस्कृति का महिमामंडन है, सामंती परिवेश की विडंबनाएँ और त्रासदियाँ हैं, राष्ट्रीय गौरव के नाम पर खोखले और क्रूर क्षेत्रीय युद्ध हैं। वह इतिहास जो इस पूँजीवादी समय में प्रदर्शन-प्रियता और लुभावने पर्यटन-स्थल में बदल चुका है, उसे नया पूँजीवाद पौराणिक-मिथकीय और ऐतिहासिक मूल्यों के आवरण के साथ अपनी परिभाषा में ढालकर लोगों तक पहुँचा रहा है, जिसमे छोटी-छोटी लोक-कथाओं को जल्दबाज जरूरतों और सतही उपदेशों के साथ प्रकाशित किया जा रहा है। आज यह कहानियाँ कॉमिक,एनिमेशन और बुकलेट फॉर्म में बच्चों के लिए भी उपलब्ध हैं। नए बनते समाज में इनके लिए जगह और विज्ञापन तो है लेकिन अर्थ और संभाव्यता के संदर्भ में ये इकहरी और उपदेशात्मक हैं। किसी भी स्थान का 'रीजनल' मनुष्य-जीवन की जटिलतर मनःस्थिति को भी दर्ज करता है। वह धीमे से एक ऐसे इतिहास की कथा कहता रहा है जो लिखे गए इतिहास का विषय नहीं है। हाशिये की कथाओं से लेकर लोक-गाथाओं तक सैकड़ों मुहाविरे और लोकोक्तियाँ आज आमजन की बोलियों में जुड़ गई हैं और भाषाओँ की ताकत बनती गई हैं। राजस्थानी लोक-कथाएँ, मौखिक या लिखित दोनों ही, किसी भी श्रेष्ठ साहित्य में स्थान पा सकती हैं। कुछ कथाओं में तो मानवीय परिस्थितियों, त्रासदियों और विडंबनाओं का ऐसा यथार्थ चित्रण है जिसमे महाकाव्यात्मक स्पर्श मिलता है। लोक-कथा में पाठक से अधिक श्रोता महत्वपूर्ण होता है जो कथा सुनते समय एक तरह से सहमति में 'हूँ' बोलता चलता है। कथा कुछ इस तरह से बुनी ही जाती है कि श्रोता उसमे सराबोर होते हुए अंत तक कथा के साथ बना रहे या यूँ कहें कि कथा पाठक के साथ बराबर बनी रहे। 'हुँकारी' भरना लोक-कथाओं का एक जरूरी तत्व है जो अब कहानियों में कम-से-कम बचा है। मध्यप्रदेश की लोक-नाट्य परंपरा की लोकप्रिय विधा 'पांडवानी' में कहानी के उतार-चढ़ाव के दौरान 'कोरस' द्वारा यह 'हुँकारी' बराबर भरी जाती है। विजयदान देथा की कहानियों की बुनावट भी कुछ इस तरह के 'हुँकार' की माँग करती हैं, यानी प्रत्येक पंक्ति के बाद सुनने वाला सहमति-असहमति देता चले, संवाद बना रहे तथा कहने और सुनने वाले की रुचि बनी रहे। कहन और कहानीपन कि यह शैली लोक कि जड़ों से आई है। हम कहानी पढ़ते हैं और कहानी कि व्याख्या करते हैं लेकिन वस्तुतः कहानी अपने ढाँचे में मूलतः कहने की कला है। विजयदान देथा कथा साहित्य की इस आदिम परंपरा के अनूठे किस्सागो हैं।

विजयदान देथा कि लगभग सभी कृतियाँ हिंदी में अनूदित हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद वे पहले भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें वर्ष 2011 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

यूँ विजयदान देथा कि अनेक कहानियाँ लोकप्रिय हैं। राजस्थान कि रग-रग में बसी कहानियाँ लेकिन कुछ कहानियाँ बिलकुल भिन्न पाठ और समझ बनाने के लिए कुरेदती हैं। ध्यान देना होगा कि यहाँ लोक निःसृत ये कहानियाँ प्रचलित और सैद्धांतिक रूप से विमर्शीय चर्चा में रहने वाला लोक नहीं है। समकालीन विमर्श जिस तरह हथियार की तरह आँकड़ों और तथ्यों को खोजता और प्रयुक्त करता है वैसा कोई सैद्धांतिक विमर्श विजयदान देथा की रचनाओं में नहीं मिलता। यही कारण है कि देथा की कहानियों का उपयोग इस हित साधन के लिए करना बहुत कठिन होगा।

लोक से सिरजी बेहद सधी हुई कहानी 'अनदेखा अंतस' राजस्थान और गुजरात में रहने वाली ओंड जाति के घुमक्कड़ मजदूरों के माध्यम से एक मजदूर औरत 'जसमा' की कहानी है। वहाँ के एक क्षेत्रीय राजा 'राव खंगार' के बरक्स जसमा ओड़न की कहानी! राजस्थानी लोक-जीवन में जसमा और राव खंगार की कथा एक मुहाविरे की तरह प्रचलित है क्योंकि मूल कथा में राव खंगार द्वारा सामंती प्रेम-प्रस्ताव के अस्वीकार और विरोध के कारण जसमा अंततः सती हो जाती है। जसमा के सौंदर्य का बखान मूल कथा में इस तरह है कि - "चाँदी के घुँघरू लगी ओढ़नी के पल्ले से चेहरे का पसीना पोछती तो घुँघरुओं की झनक के साथ देखने वाले के मन में घुँघरू बजने लगते। दोनों हाथों में फावड़ा उठा जमीन पर मारती तो लगता हवा से चंपे की डाल हिल रही है। गधे पर से मिट्टी की गूणती उठाकर नीचे खाली करती तो उसकी पतली कमर बेंत की तरह झुक जाती।" ('राजस्थानी प्रेम-कथाएँ, लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, पृष्ठ-101)

इस कहानी के लोकप्रिय होने का मुख्य कारण जसमा का अपनी अस्मत बचाते हुए सती हो जाने से है। अधिकांशतः राजस्थान और आस-पास के क्षेत्रों की लोक-कथाओं की परिणति यही होती रही है। फिर भी सती होना कोई साधारण बात नहीं है। इसके अतिरिक्त सती का आदर्शीकरण करके समाज के बीच एक एकनिष्ठता का संदेश देना भी पुरुष-प्रधान समाज की अंदरूनी मंशा रही है। सामंती समाज ने आने वाले समय तक 'सती' का महिमामंडन कथा-कहानियों के माध्यम से खूब किया है। 'अनदेखा अंतस' में 'सती' के इस रूप और लोक के इस खोखले गर्व को विजयदान देथा ने सहज, सशक्त और तार्किक परिणति दी है। उन्होंने मूल कथा के पारंपरिक 'सतीत्व' के घेरे को तोड़ स्त्री के स्त्रीत्व या 'फेमिनिटी' को अपनी कहानी का केंद्रीय कथ्य बनाया है, जिसमें लाजवाब शिल्प के साथ एक साधारण मजदूर स्त्री के स्वतःस्फूर्त सवाल-जवाबों ने राव खंगार के साथ-साथ जैसे समूची सामंती व्यवस्था को जड़ से हिला दिया है। स्त्री की 'फेमिनिटी' की बात बहुत पहले सैद्धांतिक रूप से बेटी फ्रीडन जैसी चिंतक ने भी उठाया था। जब 'ब्रा-बर्निंग' जैसे प्रतिक्रियात्मक आंदोलन जोर-शोर से चल रहे थे, जहाँ प्रतिक्रिया के कई स्तरों पर तो प्रकारांतर से स्त्री होने के जैविक लक्षणों को भी सिरे से नकारा जा रहा था। ऐसे समय में 'फेमिनिटी' की नई और गंभीर परिभाषा देकर फ्रीडन ने स्त्री-विमर्श को अपनी तरह से स्थिरता दी। आने वाली लेखिकाओं में विशेष रूप से जर्मेन ग्रीयर ने 'फेमिनिटी' के इसी सिद्धांत के कारण फ्रीडन का प्रतिवाद किया। देह-रचना को लेकर दोनों लेखिकाओं में परस्पर विरोधी टकराहटें हुईं लेकिन अपने समूचे सिद्धांत में निष्कर्ष लगभग एक जैसा ही सामने आया। जिस 'फेमिनिटी' को नए स्वर में फ्रीडन ने परिचित कराया उसे लेकर 'बधिया स्त्री'' की मुखर लेखिका जर्मेन ग्रीयर ने कहा है - "श्रीमती फ्रीडन के विचार जरा भी क्रांतिकारी नहीं हो सकते। उनके विमर्श का आधार देह-रचना को नियति मानने की फ्रॉयडवादी धारणा से मुग्ध पढ़ी-लिखी स्त्री द्वारा झेली जाने वाली हताशा है। लगता है श्रीमती फ्रीडन के लिए लैंगिकता का अर्थ मातृत्व है। बाकी स्त्रीवादी लैंगिक भूमिका को रद्द करते हुए उन्हें स्त्री की कामवासना की कीमत पर उसकी नियति के अलैंगिक पक्षों पर बल देना पड़ता है।" लेकिन सही मायनों में बहुत कम लेखकों-विचारकों ने स्त्री की 'फेमिनिटी' पर गंभीरता से सोचा है, यदि सोचा भी तो उसकी परिणति लगभग प्रतिक्रियात्मक या आत्म-केंद्रित और भावुक स्त्रियों के रूप में हुआ है। हिंदी साहित्य में जैनेंद्र कुमार ने भी इस पर काम किया है, हालाँकि उनके समूचे साहित्य में जिस तरह का प्रेम-त्रिकोण बनता है वह एक विशेष भाव-भूमि पर बनी अतिरिक्त त्यागमयी और आत्मकेंद्रित नायिकाएँ हैं, वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। उनकी सामिजिक भूमिका को लेकर जैनेंद्र कुमार स्वयं भारी ऊहापोह में रहते हैं और अंततः उन्हें पारंपरिक स्थितियों में ही ले जाते हैं। फिर भी जिस समय जैनेंद्र लिख रहे थे,उसे देखते हुए जैनेंद्र के 'स्त्रीत्व' या 'सतीत्व' संबंधी विचारों से जरूर उलझना चाहिए। विशेष रूप से उनके पहले उपन्यास 'परख', दूसरा 'सुनीता' और 1985 में प्रकाशित महत्वपूर्ण अंतिम उपन्यास 'दशार्क' से।

'अनदेखा अंतस' कहानी स्त्री की लैंगिक अस्मिता पर बात करती हुई बने-बनाए स्त्रीवादी सिद्धांतों के परे की बात करती है। कहानी में पात्र मुख्यतः मात्र दो ही हैं। एक स्त्री और श्रमिक जसमा दूसरे एक पुरुष और पाटन के राजा राव खंगार। इन दोनों के बीच सामान्य बातचीत में कहानी खुलती चलती है। साहित्य के फलक पर आज जिस तरह भिन्न-भिन्न शिल्प और शैलीगत प्रयोग हो रहे हैं, इस आधार पर भी इस कहानी पर बात होनी चाहिए। कहानी के रूप में यह कथा राजस्थान और गुजरात की चौहद्दियों से गुजरी जरूर है लेकिन लोक-कहावत के रूप में कथा इन चौहद्दियों को पार कर चुकी है। राजस्थान में तो जसमा ओड़न पर कई गीत महिलाएँ गाती हैं।

'अनदेखा अंतस' की मूल कथा राजस्थानी लोक में पहले से ही लिखित और मौखिक रूपों में मौजूद है। कहानी में जसमा मजदूरन दूर कहीं से अपने कबीले-कुनबे के साथ आई है। राजा राव खंगार जो एक विशाल बावड़ी खुदवाना चाहते हैं, उनके यहाँ मजदूरी करती है। जसमा बला की हद तक खूबसूरत है। अब आदतन राजा जसमा को अपना हृदय दे देते हैं। समूची कहानी राजा के प्रेम-प्रस्ताव पर जसमल की मनाही और सहज और नारी-सुलभ विरोध है। राजा यह समझने में अक्षम है कि जसमल मजदूरन का किसी राजा के प्रस्ताव के विरोध के पीछे जसमा के सौंदर्य की शक्ति है या श्रम का विश्वास। सामंती समाज में चूँकि राजा 'राजा' ही है और मजदूरन 'मजदूरन' है सो जसमा मजदूरन सती होती है और राजा के पास अहंकार और पराजय की राख छोड़ जाती है। कहानी अपने छोटे कलेवर में अनेक सूत्र दे जाती है। इस लोक-कथा को तेवर-तल्खी और धार मिलती है 'अनदेखा-अंतस' में। परंपरा और लोक की थाती को नए संदर्भ और समाज से किस तरह सहज ही जोड़ा जा सकता है कि दोनों एक दूसरे से भिन्न होकर भी अभिन्न हो जाएँ, यह कहानी उसकी मिसाल है। जिस जसमा का सौंदर्य मध्यकालीन रीतियों और दरबारी रंजन के लिए सुविधाजनक लगता है। वह सौंदर्य विजयदान देथा की 'अनदेखा अंतस' की जसमा के यहाँ सुंदर होकर भी सुविधाजनक और रंजक नहीं रह पाता है - "लेकिन राजा की मनचीती नहीं हुई। उसके चेहरे की झलक देखते ही उसे लगा कि आज दिन तक उसने किसी स्त्री का स्वाद ही नहीं चखा। औरत का रूप तो जैसे आज पहली बार ही देखा हो! फकत औरत जात के भरम ही भरम में लिपटा रहा। अभी-अभी घोड़े पर सवार राजा ने सरोवर की तीन बार परिक्रमा लगाई। तमाम ओड़-ओड़नियों ने 'खम्मा-घड़ी, खम्मा-घड़ी' की जय-जयकारों से आसमान सर पर उठा लिया, मगर जसमा तो जैसे निपट अंधी और बहरी हो... धूल से सटी सूरत ऐसी दिखाई दी मानों चाँद पर छितरी बदरिया छाई हो। उसके रूप की झाँकी मिलते ही राजा-वाजा और सिंहासन-विंहासन का पूरा मद झड़ गया। राज्य की हेकड़ी मिट्टी में मिल गई। उसने आवाज देने की व्यर्थ चेष्टा की, पर जिह्वा तो मानों तालू से चिपक गई हो। आखिर घोड़े से उतर कर वह पास आया। हकलाते पूछा - 'रूपसी-तेरा नाम तो बता...' "(दासी की दास्तान-विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-14)।

स्त्री-मजदूरों की अस्मिता से मार्क्स-एंगेल्स ने वर्ग-चेतना के महत्वपूर्ण हिस्से को जोड़ा है और इसे मजदूर-अस्मिता की पहली शर्त के रूप में महत्त्व दिया है। श्रमिक स्त्रियाँ तमाम शोषण और बंधन के बावजूद मध्यवर्गीय और कुलीन स्त्रियों से ज्यादा प्रखर और ओजस्वी है। वे 'फील्ड' पर बुनियादी रूप से काम करने का साहस और माद्दा रखती हैं। उनकी पिछली पीढ़ियाँ भी सामाजिक क्षेत्र में बाहर निकल कर काम करने की अभ्यस्त रही हैं। वे कई स्तरों पर आत्म-निर्भर है। इसीलिए मार्क्स इन प्रभु वर्ग की महिलाओं से अधिक तवज्जो देते हैं और खा-पीकर उबासियाँ लेती घर में बैठी स्त्रियों की मुक्ति के लिए भी श्रमिक-स्त्रियों को महत्व देते हैं। स्टुअर्ट मिल ने इस संदर्भ में लिखा है। - "निजी संपत्ति पर आधारित सामजिक संबंधों-संस्थाओं-मूल्यों के अस्तित्व में आने के साथ ही स्त्री-समुदाय की दासता शुरू होती है। पूँजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ ही यौन आधार पर शोषण-उत्पीड़न का शिकार होती हैं और संपत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुईं या तो घरेलू दासता और पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हैं या फिर बुर्जुवा समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ खास अपमानजनक पेशों में लगी हुई पुरुष-स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं"। (स्त्रियों की पराधीनता - जॉन स्टुअर्ट मिल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। पृष्ठ-19)।

मिल ने स्थितियों को स्पष्ट करते हुए मार्क्सवादी और समाजवादी अवधारणाओं के आधार पर स्त्री-मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक उपस्थिति को विश्लेषित किया है। इस विवेचन में मार्क्स के माध्यम से वे स्त्री के साथ-साथ समूचे मजदूर-आंदोलन स्त्रियों के विश्वास और आत्म-सम्मान से जोड़ते हैं। मिल जोड़ते हैं - "मार्क्स-एंगेल्स का विचार था कि स्त्री-मुक्ति की दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि स्त्री-मुक्ति की वर्ग-चेतना को उन्नत किया जाए, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाए और उन्हें मजदूरों के संघर्षों-आंदोलनों में शामिल किया जाए।" (स्त्रियों की पराधीनता - जॉन स्टुअर्ट मिल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-20)।

मिल ने कोई नई बात नहीं कही है लेकिन वह भी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि श्रमिक वर्ग की महिला के श्रम की अवमानना और अपमान करना तथा संपत्तिशाली वर्ग की महिलाओं को सामाजिक श्रम से काट कर रखना, प्रभुवर्ग ने इसे सदैव मजबूत किया है। यह स्थिति आज भी बनी हुई है। स्त्रियों की सामाजिक और आर्थिक निर्भरता आज भी अधिकांशतः उनके अपने व्यक्तित्व विकास और निर्णय लेने की क्षमता से नहीं जुड़ता है।

विजयदान देथा के यहाँ कोई बना-बनाया स्त्री-विमर्श सीधे तौर पर नहीं मिलता है। कहानी अपने ही प्रवाह में चलती जाती है लेकिन ऐसा नहीं कि कथा का कोई भी संवाद एकरेखीय हो। जसमा का सौंदर्य असह्य है तो व्यक्तित्व अझेल। जिस पृष्ठभूमि पर यह कहानी लिखी गई है, वहाँ कथा-कहानियों में अक्सर ही सौंदर्य देखकर लोग-बाग मूर्छित हो जाया करते थे। जसमा का सौंदर्य भी ऐसा ही है। इतना भरपूर, खरा और पारदर्शी कि आँखे टिक ना पाएँ। इस सौंदर्य में विलास की मदहोशी देखने वाला राजा अपने जाल में स्वयं उलझ जाता है, फिर वह आध्यात्म और रहस्य के साए में जाता है। जसमा की सुंदरता न तो कमनीय है न ही आध्यत्मिक ढंग की रहस्यवादी और निष्क्रिय। राजा ने अपनी संपत्ति और समृद्धि के दायरे में ऐसी ही स्त्रियाँ देखी थीं। जसमा के सामने उसके सारे हथियार एक-एक कर उतर जाते हैं। कथाकार ने जसमा के सौंदर्य को प्रतीकात्मक तरीके से बुना है, जिसके अपने मानक हैं, जो ज्यादा जमीनी और मानवीय है। विश्वास से भरा हुआ है। यही कारण है कि जसमा और जसमा का सौंदर्य दोनों ही राजा और राजा के अहंकार की पकड़ से बाहर हो जाते हैं। जसमा राजा के लिए चुनौती बन जाती है - "इसी आवेश में जाने कब रेशमी लिबास और सुनहरी मोंजड़ियाँ पहनकर निकला, इत्र-फुलेल से सना हुआ राजा घोड़े से उतरकर जसमा के पीछे-पीछे चलने लगता है और रूपसी से उसके सौंदर्य का बखान कर उसे आठों पहर जपने की बनी-बनाई बात कहने लगता है और जवाब अप्रत्याशित - "मेरा नाम क्यों जपोगे? ...और वह भी आठों पहर, तुम्हारी अक्ल भाँग तो नहीं चरने लगी...?" राजस्थान के मध्यकालीन परिवेश के लिए किसी साधारण स्त्री का सामंती समाज को यह खरा जवाब अचरज का विषय है। इसे स्पष्ट करने के लिए विजयदान देथा ने जसमा और राजा के परिचय के माध्यम से एक दूसरे के आमने-सामने खड़ा किया है - "मेरा नाम राव खंगार है... राव खंगार! पाटन का राजा हूँ। तुम लोगों को काम पर लगाने की खातिर यह सरोवर खुदवाने की इच्छा हुई। तू कहे तो मैं हर रोज तुझे सोने की मुहर मजूरी में दूँगा..." प्रतिवाद में जसमा अपना परिचय देती है - मेरा नाम जसमा ओड़न है - जसमा ओड़न। सब जानते हैं कि ऐसी बेहूदी बातें मुझे सपने में भी नहीं सूझती। मजूरी से एक कौड़ी भी अधिक लेना गाय का लहू समझती हूँ। मेरे गधे भले, लकड़ी का ढाँचा भला और यह माटी भली। मैं बामन पंडितों की तरह पढ़ी लिखी भी नहीं पर तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लगा कि जानना चाहो तो तुम्हें बहुत कुछ बता सकती हूँ। समझ नहीं पड़ता कि तुम जैसा ठोंट राजा क्यों कर राज चलाता है? कैसे न्याय करता होगा...?" (दासी की दास्तान - विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-15)।

लोक से निःसृत इस कहानी में अनेक ऐसे सिरे मिलते हैं जो मौजूदा समय में, विशेष रूप से मध्यवर्गीय स्त्री के लिए प्लेटफ़ॉर्म बनाता है। पढ़ी-लिखी कामकाजी और सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली स्त्रियों के लिए आज भी पुरजोर प्रयास यही रहता है कि वे अपने शारीरिक और भौतिक जरूरतों में उलझी रहें। फिर चाहे वह घर में रहने वाली स्त्री हो, किसी बड़े पद पर काम करने वाली स्त्री हो अथवा कोई श्रमिक स्त्री हो। सदियों से सौंदर्य के गढ़े मानदंडों को स्वयं आत्म-सजग स्त्री भी शाश्वत मानकर चलती है। इसी तरह धार्मिक प्रवृत्तियाँ भी स्त्री-जीवन के साथ आवश्यक रूप से जोड़ दी गई हैं। वे अपने भीतर 'इंजेक्ट' की हुई चीजें इतनी आसानी से नहीं निकाल पाती हैं और न ही बदलते हुए आधुनिक जीवन की जरूरतों से कट सकती हैं। चूँकि पितृसत्ता केंद्रीय व्यवस्था के रूप में ही नहीं धर्म और संस्कृति के रूप में भी मानी जाती रही है। तमाम रूढ़ियों के छँटने के बाद भी पितृसत्ता के अवशेष बहुत मजबूत और लगभग सर्वमान्य रूपसे समाज में काबिज हैं। परिणामतः वे परंपरा (पितृसत्ता) और आधुनिकता के बीच वे स्वयं बिचौलिए का काम करती हैं। इन सभी परिस्थितियों पर यह कहानी बात करती है। जसमा के संवाद में बार जिस माटी का जिक्र आता है वह स्त्री की अपनी 'माटी' यानी उसका अपना 'स्वत्व' है, 'निजत्व' है। जिसकी ताकत से वह राजा को अपने आस-पास टिकने नहीं देती। समाज द्वारा गढ़ा और थोपे गए बनावटी-सजावटीपन को स्त्रियों ने अपनी अक्षमता और असुरक्षाबोध के ऊपर आवरण डालने के लिए सदियों से अपना रखा है। इस हद तक कि कई बार अपने अंदाज, वेशभूषा, जबरदस्ती की चंचलता से वे स्वयं को विद्रूप तक बना डालती हैं। जसमा का वक्तित्व उस बनावटी और ऊपरी सुंदरता का प्रतिवाद करता है। राजा जो बार-बार अपने धन ऐश्वर्य की बात करता है, सामंती मानसिकता के साथ पितृसत्तात्मक ताकत का जोर दिखाता है। यहाँ जसमा के श्रम और उसकी योग्यता की अवमानना कर वह उसके रूप-सौंदर्य का बार-बार बखान करता है। कार्यस्थल पर आज भी स्त्रियों के काम और उसकी योग्यता की उपेक्षा कर जान-बूझकर उसके शारीरिक सौंदर्य को मनमाफिक ढाँचे में ढालकर उसे निष्क्रिय साबित किया जाता रहा है। इस प्रक्रिया में स्वयं उस स्त्री को शामिल कर धीरे-धीरे इस पूरी मानसिकता को सर्वमान्य बना दिया जाता है। जहाँ कहीं स्त्री अपनी देह से ऊपर योग्यता के बल पर जानी जाती है वहाँ बड़े-बड़े बौद्धिक, स्त्रीवादी और समझदार पुरुष तक पलायन कर जाते हैं या किसी न किसी तरह पुनः उसे पितृसत्तात्मक मानसिकता के खोखल सौंदर्य में ढालने की कोशिश में लगे रहते हैं।

जसमा राजा की जाहिली और कंगाली का नमूना चलती जाती है साथ ही अपने काम में तल्लीन रहती है। जीवन और संसार को देखने जसमा का दृष्टिकोण उसका अपना है। अपढ़ जसमा के इस आत्म-विश्वास पर राजा चकित है और परेशान है। जसमा धरती को बाँचने की बात करती है, कुदरत को अनुभूत करने, हवा में उड़ते पंछियों को बाँचने का हुनर बताती है, झाल-बिरछ, फूल और चाँदनी को बाँचने की सलाह देती है। गरज की राजा की समूची बनावट पर वह सशंकित होकर प्रश्न चिह्न लगा देती है। रामायण, महाभारत, गीता और पंचतंत्र रटने वाले राजा को जसमा की इन बातों पर हँसी ही आ सकती है। अपनी निर्दोष और सहज सवालों से जसमा राजमद की दोगली मर्यादा पर गहरी चोट करती है। तब राजा उसके निजी जीवन पर मालिकाना अधिकार जताकर दखल करता है। ताकतवर वर्ग यह भली-भाँति जानता है कि स्त्री आपके परे जाती हो तो उसके चरित्र को आरोपित कर आप उसे कमजोर कर सकते हैं। अलबत्ता वह स्वयं ही कमजोर हो जाएगी लेकिन जसमा का जवाब स्पष्ट है - "खाट पर तो हम अब तक नहीं सोए! साफ-सुथरा आँगन ही हमारी सेज है। सहवास की बेला में एक-एक तारे को बीनकर अपने हृदय में जड़ती हूँ। तुम कभी इस तरह के आनंद को बरतकर तो आजमाओ! जब दो बार मेरी कोख में आशा का संचार हुआ तो पहले तेरस का चाँद कोख में जड़ा और दूसरी बार पूनम का। मेरे कहने से ही रानीजी को पूछना कि उन्होंने अपनी कोख में किस चाँद या सितारे को धारण किया?" (दासी की दास्तान - विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-18)।

अपनी ताकत के अंतिम हथियार के रूप में राजा जसमा के निजी जीवन की जाँच-परख की धमकी देता है, तिस पर जसमा के जवाब में न कोई प्रतिहिंसा है न ही किसी तरह की कुंठा। इसीलिए राजमद में चूर राजा खीझ उठता है और यह देखकर अवाक रह जाता है कि जसमा यह सब अपने पति के सामने कह रही है। पति नहीं मानों अपने सखा के साथ निर्द्वंद्व भाव से खड़ी हो। इस स्त्री में तनिक भी लज्जा क्यों नहीं है? जसमा की निडरता के सामने वह न तो जसमा के समक्ष ठहर पा रहा है ना ही उसके पति के समक्ष। जसमा अपने पति के रूप में जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण और अपने अनूठे चयन से राजा का परिचय कराती है। साँवल मुखी, घुँघराले बालों वाला, पसीने से तर-बतर बजर-बट्ट मजदूर पति के लिए भी जैसे राजा और उसकी पत्नी की बातों का न कोई प्रभाव है न ही प्रतिहिंसा की भावना। इसके विपरीत जसमा की बातें सुनकर वह कहता है - "प्रेम तो बदले में निखालिस प्रेम की ही माँग करता है! तू इनसे प्रेम करे तो मुझे ऐतराज नहीं होना चाहिए! यह बहुत बेजा बात है!" इस कहानी से सीधे संदर्भ न जुड़ते हुए भी मुक्तिबोध की कहानी 'विपात्र' की कुछ पंक्तियाँ जोड़ना जरूरी है जहाँ एक किसान औरत का दुर्लभ वर्णन मुक्तिबोध ने किया है - "एक साँवली औरत दिखाई दी जिसका नाक-नक्श संगमूसा की चट्टान में से काटा गया दिखाई देता था। वह इतनी मजबूत थी, उसका स्नायु-संस्थान इतना दृढ़ था कि लगता उसका चेहरा भी, जिसकी रेखाकृति सरल और निर्दोष थी, उसी शक्ति और दृढ़ता का परिचायक ही। कोई भी कह देता कि उसके श्यामल मुखमंडल पर एक गौरवपूर्ण अभिमान, एक मजबूत गुस्सा और एक थमी हुई रफ्तार है! मुझ पर उसके सौंदर्य (यदि वह सौंदर्य कहा जाए तो) का हल्का सा आघात हुआ।'' (प्रतिनिधि कहानियाँ - मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 129)।

जसमा छुई-मुई कोमलांगिनी नहीं है। दो बच्चों की माँ है, गृहणी है और मजदूरनी है। यही उसकी शक्ति है। इसी भीतरी जादू ने उसे अद्भुत सौंदर्य के साथ पारदर्शिता और निर्भयता दी है। ऐसी निर्भयता कि कोई भी पुरुष उससे आँखें नहीं मिला पाता है, वह चाहे उसका पति ही क्यों न हो। जसमा जब यह कहती है कि - "मेरे हिसाब से तो पहुँच के परे की औरत सबसे ज्यादा खूबसूरत होती है...!" यह संवाद स्पष्ट संकेत करता है कि राजाओं (सामान्यतः पुरुषों में भी) के यहाँ हरम (जीवन) में अनेक स्त्रियों को रखने या रखैलें बनाने की संस्कृति रही है, वह इतनी खोखली है कि वहाँ उन्हें न कभी प्रेम मिल सकता है न देह। वह न स्त्री को समझ पा रहे है ना यह तय कर पा रहे हैं कि वे स्वयं क्या चाहते हैं। इसीलिए जसमा राजा की परीक्षा लेती है। वह देखना चाहती है कि एक पुरुष के रूप में वह स्त्री से क्या चाहता है। जिस जसमा के आगे राजा 'सोलह आने सच्ची प्रीत' का रटा हुआ जुमला दुहराता रहता है, जसमा उसकी कलई उतार देती है -"मुझ से पहले कितनी रानियों और बांदियों से सोलह आने सच्ची प्रीत कर चुके हैं आप...?" जसमा जानती है वह इतना दयनीय है कि न मन ले सकता है और न ही देह। हार-जीत, प्रतिद्वंद्विता और खरीद-फरोख्त की इस दुनिया में स्त्री-पुरुष के संबंध भी वस्तुगत होते जा रहे हैं, मानवीय नहीं। 'पहुँच के परे की औरत' पंक्ति में जसमा ने सामंती समाज के प्रेम और दीवानगी की सचाई सामने रख दी है, जहाँ एक के बाद दूसरे की वासना, फिर किसी तीसरे की चाह और अपनी इस व्यक्तिगत यात्रा में अगले इच्छित को पाने के लिए पिछले का तिरस्कारपूर्ण अपमान और अवमानना। जसमा बखूबी जानती है कि यह प्रेम नहीं है, इसीलिए एक स्त्री होने की हैसियत से जसमा राजा की तमाम रानियों की प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए चिंतित होती है और राजा को सवालों के कटघरे में खड़ा कर देती है। ग्रीयर ने पुरुष-मन की मनोवैज्ञानिक पड़ताल में यह प्रमाणित किया है कि किस तरह सामंती पुरुष नई और अप्राप्य स्त्री की चाह में वह अपने जीवन की पिछली स्त्रियों को करीने से छाँटता है। इतिहास के कितने युद्ध तो इसी आधार पर लड़े गए हैं। अधिकांशतः वहाँ प्रेम जैसा भाव नहीं होता बल्कि अपनी व्यक्तिगत समृद्धि में एक और इजाफे के तौर रोमांचक और खतरनाक युद्ध से जैसे किसी वस्तु को जीत लेना होता है। जब वस्तु से ऊपर उठकर एक संवेदनशील और बुद्धिमती स्त्री उपस्थित होती है तो इतिहास भी उसे दैहिक और मानसिक रूप से अयोग्य साबित करने का प्रयास करता है। अपने 'पैरामीटर' से उसे खारिज करता है। उसी सत्ता की एक इकाई के रूप में पुरुष मानसिकता भी अप्राप्य स्त्री पर ताकत प्रदर्शित करता है और असफल होने पर सबसे पहले चारित्रिक दोष के आधार पर उसे आरोपी बनाता है। इस-"मोटी स्त्री भीषण मोटी, अकमनीय और हास्यास्पद है। अकमनीय रूप से पतली स्त्री सींक-सलाई, मरगिल्ली वगैरह है। उसके पैर अगर बहुत सुंदर नहीं हैं तो भयानक हैं। अगर उसकी देह से बहुत मजबूती, लचक झलकती हो तो वह सख्त, अ-स्त्रियोचित है। अगर वह कुशल, समर्थ या महत्वाकांक्षी है तो यह मान लिया जाता है कि वह एक सामान्य स्त्री के तौर पर संतोष नहीं पा सकी है, यहाँ तक कि उसे लैंगिक विकृति या अन्तःस्रावी ग्रंथियों की गड़बड़ी की शिकार भी माना जा सकता है।''(जर्मेन ग्रीयर)

कहानी के अंत में थका और हारा हुआ राजा अपनी बची रह गई थोड़ी-सी मानवीयता प्रदर्शित करने का प्रयास करता है हालाँकि यह भी एक प्रकार का लोभ देना ही होता है। पहली प्रक्रिया में वह राजा के रूप में आता है, फिर प्रेम-प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। धीरे-धीरे जब वह जसमा की पहचान कर लेता है तो शोषण और दबाव के औजारों को बदल देता है, लेकिन जसमा अपनी 'मिट्टी' पर लगातार काम करती है और राजा के औजार बेअसर होते जाते हैं। अब सचमुच राजा जीवन में पहली बार हार जाना चाहता है। पहली बार घोड़े से उतरकर मजदूर बन जाना चाहता है लेकिन नहीं कर सकता। वह जीवन के इस पक्ष से परिचित ही नहीं है। इसके एवज में वह मजदूरों की मजूरी तिगुनी कर देना चाहता है लेकिन नहीं कर सकता क्योंकि अब भी वह उस परिधि में है जहाँ से जसमा को सत्ता की गंध आती है - "यदि शुरुआत से ही मजदूरी खुल जाती तो हमें ऐतराज नहीं था लेकिन अब यह बात मानने पर हर व्यक्ति यही सोचेगा कि मेरी प्रीत की वजह से ही यह दक्षिणा मिल रही है। हम ओड हैं बामन नहीं! बेबात की यह दक्षिणा हमें नहीं पचेगी। होना चाहिए प्रीत की बजाय मेहनत और पसीने का मोल...!" (दासी की दास्तान - विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-20)।

स्त्री-अस्मिता पर चल रहे मौजूदा विमर्शो में बहुत कुछ नया और परिपक्व जोड़ती चलती है यह कहानी। 2006 के शुरुआती दौर में आने वाली यह कहानी स्त्री-आंदोलन के उस दौर में आती है जब प्रतिक्रिया का स्वर काफी तल्ख था। तल्ख होना ही चाहिए था, लेकिन उस तल्खी में मात्र तात्कालिक चमक हो तो वह प्रतिक्रिया बनकर रह जाता है। दूसरे उस दौर में स्त्री-अस्मिता को श्रमिक-अस्मिता और इयत्ता से जोड़ना स्त्री-विमर्श को नई धार देना था। जिसे विजयदान देथा अपनी कहानियों में करते हैं। विजयदान देथा की "फितरती चोर" शीर्षक कहानी, जिसके आधार पर प्रख्यात नाटककार हबीब तनवीर ने 'चरनदास चोर' नाटक लिखा, वह कहानी अपने समय के आगे जाकर सामाजिक-विरोधाभासों को जबरदस्त ढंग से प्रश्नांकित करती है। 'फितरती चोर' का नायक व्यवस्था द्वारा निर्मित एक चोर है, जिसके रूपक के माध्यम से कथाकार ने ठोस और पैने ढंग से सामंती और पूँजीवादी व्यवस्था पर बहस खड़ी की है। स्त्री-गरिमा पर उन्होंने अपनी ही परंपरा से जुड़े अनेक आख्यानक रचे हैं। हिंदी-साहित्य में अपनी पानी-माटी से जुड़कर नए संदर्भ और अर्थ-गांभीर्य की संस्कृति जिस तेजी से क्षरण की कगार पर है, ऐसे में विजयदान देथा की रचनाएँ जमीन का काम करती हैं। उनकी रचनाओं की अपनी अलग ही चमक है।

'अनदेखा अंतस' जसमा के माध्यम से ऐसी स्त्रियों का अंतस या अंतर्मन है जिसे देखा नहीं गया है, जिसे देखने का शऊर या सलीका हमारे पुरुष-प्रधान समाज ने पुरुषों में विकसित ही नहीं होने दिया है। ऐसे अंतस को देखने में पितृसत्ता आज भी हकलाने लगती है, भयभीत होती है इसीलिए बंदिशें बनाती है, शोषण के नित नए औजार निर्मित करती है। जिसका हाथ मजबूत करने में बड़ी संख्या स्वयं स्त्रियों की भी है। ये वे सुविधाभोगी स्त्रियाँ हैं जिनमे व्यक्तित्व-बोध और स्वतंत्र-चेतना का अभाव है। पितृसत्ता ऐसी स्त्रियों को अपना सहयोगी बनाती हैं। उन्हें आरामतलबी बनाते हैं। सौंदर्य और सौंदर्य प्रसाधनों के नए मानक बनाकर खाकाबद्ध करते हैं इसीलिए जसमा कहती है - "ऐसे लिजलिजे आदमी की प्रीत फकत रानियों और बांदियों के भाग्य में ही लिखी होती है... दुनिया की किसी औरत को मँगते वाली प्रीत सपने में भी नहीं सुहाती। प्रीत करे तो रिरियाने की दरकार ही कहाँ होती है! भले ही वह राजा हो चाहे अखूट मायापति। सच पूछिए तो मुझे बेचारी रानियों और बांदियों पर तरस आता है कि उन्हें एक ढुलमुल राव-उमरावों से मुहब्बत करनी पड़ती है...!" (दासी की दास्तान - विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-20)

विचारणीय है कि समकालीन स्त्रीवाद दो खानों में विभक्त दिखाई पड़ता है। 'पेज-थ्री' स्त्रीवाद ने बड़े सुनियोजित तरीके से श्रमिक स्त्रियों को हाशिया दे दिया है। उनकी मौलिकता हथियाई है। दुनिया भर में स्त्री-चेतना को लेकर पहला आंदोलन मजदूर स्त्रियों ने किया है और आज महिला दिवस को श्रम और चेतना से काटकर उत्सवी बनाया जा रहा है। विजयदान देथा की विशिष्ट कहानी है 'कुदरत की बेटी'। यह कहानी एक राजा और भिखारिन की कहानी है। भिखारिन जिस पर राजा की भौतिक सुविधाओं का रंग ही नहीं चढ़ता। वह इतनी नैसर्गिक है कि तथाकथित सभ्यजन इस नैसर्गिकता से परेशान हैं। कहानी की नायिका भरे दरबार में में जिस प्रकार निर्वस्त्र होकर निकल जाती है वह हमें मध्यकालीन संत स्त्रियों कि ओर ले जाता है। वे स्त्रियाँ जिन्हें 'संत' आदि बनाकर हमने उनके वजूद, विचार, चिंतन और बोध पर आध्यत्मिकता, पवित्रता और शुचिता के ओट-आवरण डाल रखे हैं। ललद्यद नग्न रहा करती थीं। अक्क महादेवी ने दरबार में सम्राट के समक्ष उनके दिए वस्त्राभूषण उतार फेंके थे। ललद्यद (लल्लेश्वरी) और अक्क महादेवी जैसी मध्यकालीन स्त्रियों ने निर्वस्त्र होने/जीने के बारीक सूत्र दिए हैं लेकिन हम उन्हें बिना 'संत' के ठप्पे के स्वीकार नहीं कर सकते। यही कारण है कि विजयदान देथा की कहानियाँ भारतीयता और लोक के गहरे गुजरती है। स्त्रीवाद की पुरोधा स्त्रियाँ क्या विजयदान देथा को याद करती हैं? उनकी कहानियों से गुजरने की आवश्यकता समझती हैं?

कहानी से गुजरते हुए ध्यान जाता है कि राजा की उपस्थिति के बावजूद जसमा लगातार अपने काम मिट्टी ढोने में मशगूल है। जसमा स्त्री की नियति, भय, भ्रम और आकांक्षाओं से भली-भाँति परिचित लगती है। अपढ़ होने के बाद भी उसके पास एक भीतरी आवाज है। ऐसी कठपुतली स्त्रियों पर व्यंग्य कर भी वह उनके साथ खड़ी होती है। ऐसी बेबाक प्रतिक्रिया के बाद भी अंततः जसमा राजा की बेबसी महसूसती है। पहली बार वह राजा से बढ़कर एक साधारण पुरुष की तरह सच्चा और बेतरह बेबस दिखाई पड़ता है। यह सब जानकर भी जसमा पुनः अपने काम में लग जाती है। राजा जो पहली बार स्वयं का आकलन करने पर विवश हुआ था, जो अब तक सोच रहा था - 'किसी भी तरह के लोभ-लालच से दूर! या तो राज-दरबार के लोग मनुष्य नहीं हैं या ओड़ जाति के ये दोनों लोग-लुगाई मनुष्य नहीं हैं...! यह तो बानगी ही अलग है! यह तो किस्म ही दूसरी है। क्या करने से ये कब्जे में आ सकते हैं? सत्ता, माया और तलवार की शक्ति तो ये शक्ति ही नहीं मानते हैं! और भीतर की शक्ति का तो उसमें तनिक भी अंश नहीं है। किसी मंत्र या जादू-टोने से यह संपदा हाथ नहीं लगती। यह तो एक जन्मजात-अंदरूनी देन है। आया तो था राज्य सिंहासन का रुतबा जताने, पर जसमा और उसके पति ने तो उसे इल्ली से भी गया गुजरा साबित कर दिया। ऐसी बातें न तो उसने शास्त्रों में ही बाँची और न पंडितों के मुँह से ही सुनी। यह तो जैसे बादल-बरखा की वाणी हो...!" (दासी की दास्तान - विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ-20)

मूल राजस्थानी लोककथा 'जसमा ओड़न' में भी जसमल ने राजा का प्रतिवाद किया है लेकिन वहाँ न तो जसमा की सी दमक न ही किसी तरह की समझदारी। राजस्थान की मिट्टी जिसका आदर्श रचती रही है, जसमल उस पितृसत्ता की पोषित और उनकी नींव को पुष्ट करती एक नारी मात्र है। रानी लक्ष्मीबाई के साथ एक प्रसिद्ध वीरांगना झलकारी बाई का नाम लिया जाता है। झलकारी और लक्ष्मीबाई को किस तरह अपने-अपने खेमो में राजनीतिकरण और आदर्शीकृत किया जाता है, इसका प्रमाण अनुसंधान दे रहे हैं - "रानी लक्ष्मीबाई पर आयोजित कार्यक्रमों में उनके नारी-सुलभ गुणों पर जोर दिया जाता है, जिन्हें उच्च वर्ग प्रशंसा की दृष्टि से देखते हैं - त्याग, स्वार्थहीनता, मान-सम्मान की रक्षा की भावना और सौंदर्य। आज भी उच्च वर्ण स्त्रियाँ इन नारी-सुलभ गुणों को अपने आदर्श के रूप में देखती हैं। दूसरी तरफ बसपा के कार्यक्रमों में झलकारीबाई के पुरुषोचित गुणों वीरता, शौर्य और पराक्रम पर जोर दिया गया। भाजपा और संघ ने चुनाव-प्रचार के दौरान इन पुरुषोचित गुणों को हटाकर त्याग और ममता जैसे गुणों पर जोर दिया।" (दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह -बद्रीनारायण, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-118)।

ऐसा नहीं कि लक्ष्मीबाई में पराक्रम नहीं था या झलकारीबाई में त्याग और ममता नहीं थी लेकिन अपने समुदाय की पहचान और राजनीतिक प्रयोग के लिए इन वीरांगनाओं की भिन्न-भिन्न कहानियाँ रचकर उनका आदर्शीकरण किया जाता रहा है। ठीक उसी तरह जसमल या जसमा ओड़न की कहानी को राजस्थान में स्त्री को जाति और राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़कर 'सती' हो जाने की कथा को महत्व दिया गया है। मूल कथा में जसमल कहती है - "जसमल थर्रा गई - 'मुझे बाँध कर ले जाएँगे ये लोग! शील के बिना जीना मरने से भी बुरा! - हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाकर बोली - मेरी लाज बचाना। मैं जिंदा जल जाऊँगी पर उस हरामी राजा के घर नहीं बैठूँगी। चिता चुन दो। वह मुझे स्पर्श करे, इससे पहले मैं जलकर राख हो जाना चाहती हूँ।" ('राजस्थानी प्रेम-कथाएँ, लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, पृष्ठ-104)

एक जिम्मेदार लेखक के रूप में विजयदान देथा ने जसमा ओड़न को सती नहीं बनाया बल्कि बेहतरीन मनुष्य, बेबाक और निर्दवंद्व स्त्री के रूप में रचा है जिसने अपनी सोच से राजसत्ता के सामंती मानदंडों को परतें उधेड़ दीं जिसके पास समझ और परख के साथ निर्णय लेने की क्षमता भी है। विजयदान देथा की कहानियों के अंत की एक और विशेषता है कि ये कहानियाँ एक कगार पर आकर मनुष्य के जीवनगत फलसफे को बयाँ करती है और तब यह किसी भी वाद-विमर्श से ऊपर उठकर खाँटी-पक्के मनुष्य के तत्व-रसायन को उसकी खूबियों-खामियों के साथ सामने रख देती हैं। जसमा ओड़न की यह कहानी समकालीन विभाजित स्त्री-विमर्श जहाँ कामगार या काम में जुटी हुई स्त्री की जगह लगातार कम होती जा रही है, अपने कहन और शैली में सामंत-सत्ता की ही नहीं स्त्रीवाद के कर्मकांडों की भी पहचान करती है।

संदर्भ

1 . दासी की दास्तान, विजयदान देथा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
2 . राजस्थानी प्रेम कथाएँ, लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत, राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, जयपुर।
3 . क्रांति का युग (इतिहास-1789-1848) एरिक हॉब्सबॉम, अनु. - लाल बहादुर वर्मा, संवाद प्रकाशन, मुंबई।
4 . दलित वीरांगनाएँ एवं मुक्ति की चाह - बद्रीनारायण, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
5 . सपनप्रिया, विजयदान देथा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
6 . बधिया स्त्री-जर्मेन ग्रीयर (अनु - मधु बी. जोशी), राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली।
7 . एफ्रो-अमेरिकन साहित्य : स्त्री स्वर - विजय शर्मा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
8 . बोरुंदा डायरी, मालचंद्र तिवाड़ी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
9 . त्रिकोण, विजयदान देथा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
10. प्रतिमान (पत्रिका) जनवरी-जून 2017, वर्ष-5, अंक-9, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।


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हिंदी समय में वंदना चौबे की रचनाएँ