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लेख

विधा के रूप में कहानी की संरचना
राजीव कुमार


आधुनिकता के विकास के साथ ही गद्य की विभिन्न विधाओं का विकास हुआ। कथा इन्हीं विधाओं में से एक है। पश्चिम में इसके लिए Fiction शब्द का प्रयोग किया जाता है। कथा अथवा 'फिक्शन' के सामान्यतः दो रूप पाए जाते हैं - उपन्यास तथा कहानी। कहानी के लिए पश्चिम में 'Short-story' शब्द का इस्तेमाल होता है। भारत में कहानी के लिए प्रारंभ में 'गल्प', 'आख्यायिका' आदि शब्द का इस्तेमाल होता रहा परंतु अब कहानी संज्ञा को सर्वस्वीकृति प्राप्त हो गई है। कथा विधा के अंतर्गत उपन्यास के विकास की एक निश्चित और सुस्पष्ट सैद्धांतिकी विकसित हुई है, लेकिन वैसी स्पष्टता कहानी को लेकर कदाचित नहीं है। उपन्यास को महाकाव्य का स्थानापन्न माना गया और कहानी को उपन्यास कोटि की एक लघु विधा। हिंदी में प्रेमचंद आदि कथाकारों ने उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में ही कहानी की विशिष्टताओं को रेखांकित किया है। हालाँकि आगे चलकर कई आलोचकों ने इस मानदंड की समीक्षा की है। पश्चिम में इस विधा के संरचनागत विकास के संदर्भ में ज्यादा स्पष्टता दिखाई देती है। प्रारंभ में जहाँ इसे 'प्रभाव', 'थीम' और 'विचार' को विभिन्न संदर्भों से व्याख्यायित करने का प्रयास किया, आगे चलकर इसके विकास की अन्य दिशाओं - संवेदना का दायरा तथा उत्पत्ति की पृष्ठभूमि पर भी विचार गया। इस विधा को परिभाषित करने तथा उसके स्वरूप को निर्धारित करने का प्रथम प्रयास एडगर एलन पो ने किया। आगे चलकर फ्रैंक ओ कोन्नोर, आइकेनबॉम, चेखव आदि ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए। हिंदी में प्रेमचंद आदि की शास्त्रीय धारणा के बरक्स मोहन राकेश, नामवर सिंह, सुरेंद्र चौधरी आदि ने नए आयाम को उद्घाटित किया।

> पश्चिम में कहानी ( Short Story ) की संरचना का अध्ययन

उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में रूस, जर्मनी, फ्रांस एवं अमेरिका में कहानी (Short Story) एक विधा के रूप में उभरने लगी थी। 1825 ई. के आस-पास कहानी (Short Story) एक संक्रमणशील विधा के रूप में फ्रांस के बाल्जाक, अमेरिका के वाशिंगटन इरविन, जर्मनी के हॉफमैन एवं रूस के पुश्किन की रचनाओं में दिखाई देने लगा। 'लेकिन इस विधा में प्रथम मील का पत्थर उस समय की साहित्यिक राजधानियों - इंग्लैंड एवं फ्रांस में न उभरकर लगभग एक साथ रूस एवं अमेरिका से आए। इसके तीन निर्णायक पुरस्कर्त्ता थे - निकोलाई गोगोल, नायनेल हॉथर्न एवं एडगर एलन पो।'1

हॉथर्न का संग्रह 'ट्वाइस टोल्ड टेल्स' 1837 ई. में प्रकाशित हुआ तथा पो की 'टेल्स ऑफ द ग्रोटेस्क एंड अरबीक्क' (Tales of Grotesque and Arabesque) 1840 ई. में। गोगोल की प्रसिद्ध कहानी 'ओवरकोट' 1842 ई. में प्रकाशित हुई थी। हॉथर्न की पुस्तक 'ट्वाइसटोल्ड टेल्स' की समीक्षा करते हुए ही 1842 ई. में पो ने कहानी के लिए 'प्रभाव की एकता' (unity of effect) प्रतिमान के रूप रखे थे। पो ने कहानी (Short Story) के लिए 'टेल' (tale) शब्द का प्रयोग किया था। पो ने 'टेल' के प्रतिमान को रखते हुए कहा, "इस मुद्दे पर यहाँ सिर्फ इतना कहने की जरूरत है कि लगभग सभी तरह के निर्माण (Composition) में प्रभाव और छवि की एकता सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यह एकता ऐसी किसी कृति में पूरी तरह संरक्षित नहीं रह सकती जिसका पठन एक बैठक में पूरा न हो।" 2

इस प्रकार पो ने 'एक बैठक' की चर्चा करते हुए विधा के रूप में 'टेल' की संक्षिप्तता को भी आवश्यक बताया। 'प्रभावान्विति' पर पो का इतना जोर था कि वे टेल (tale) को पहले वाक्य से ही प्रभावशाली बनाया जाना आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार, "एक कुशल साहित्यिक कलाकार जब 'टेल' गढ़ता है, अगर वह समझदार है, वह अपनी समझ को घटनाओं के नियोजन में नहीं लगाता, पूरी सावधानी के साथ निश्चित एकल प्रभाव को गढ़ने की परिकल्पना कर लेता है, तब वह उसके अनुरूप घटनाएँ ईजाद करता है। उसके बाद वह उन घटनाओं को इस तरह संयोजित करता है कि इस पूर्व कल्पित प्रभाव को सामने लाने में वह सबसे बेहतर तरीके से मदद करे। अगर उसका बिल्कुल पहला वाक्य इस प्रभाव को सामने लाने में सक्षम नहीं होता है, तो वह अपने पहले कदम पर ही असफल हो जाता है।"3

ब्रांडर मैथ्यूज का मुख्य जोर कहानी को उपन्यास से अलगाते हुए उसके प्रभाव की एकता दर्शाने पर था। उसने कहानी में भाव एवं चरित्र के स्तर पर एकलपन (Singleness) पर जोर दिया, "सही अर्थों मे जो कहानी होगी वह मुख्यतः प्रभाव की सारभूत एकता के कारण उपन्यास से भिन्न होगी। अगर शब्दों का बिल्कुल सही तरीके से इस्तेमाल करें तो कह सकते हैं कि कहानी में वह एकता मिलती है जो उपन्यास में संभव नहीं है। ...कहानी किसी एकल चरित्र, एकल घटना, एकल भावना से या एकल परिस्थिति द्वारा उपयोग में लाई गई भावनाओं की शृंखला से संबंध रखती है।" 4

हडसन ने कहानी को एक विचार पर निर्भर बताया, "कहानी में निश्चित रूप से एक और सिर्फ एक सूचनात्मक विचार होना चाहिए और उस विचार को इस तरह विकसित किया जाना चाहिए कि वह पूर्णतः एकल लक्ष्य के अनुरूप तर्कपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँच सके।" 5 आगे कहानी (Short Story) के विकास के साथ एकलपन (Singleness) के स्थूल प्रतिमान में परिवर्तन आया, लेकिन उसका संदर्भ उपन्यास की व्यापकता के बरक्स सीमित परिदृश्य का मानंदड बना रहा। सेरा (Edelweis Serra) ने इसे एक घटना पर केंद्रित करने की बजाय इसे 'सीमित अनुभवों की शृंखला' के रूप में देखा तथा इसके निर्माण में संश्लिष्टता पर जोर दिया, "कहानी घटनाओं, अनुभवों और परिस्थितियों की सह-संबंधित तारतम्यता की एक सीमितशृंखला का कलात्मक निर्माण एवं संप्रेषण है। यह शृंखला संपूर्णता का एक अपना ही बोध रचती है। ...कहानी पृथक और संश्लिष्ट बोध से निर्मित तारतम्यता है, उपन्यास अधिक विश्लेषणपरक रूप से देखी गई बहुलता की तारतम्यता।"6

फ्रैंक ओ कोन्नोर कहानी (Short story) के उन प्रारंभिक विचारकों में थे, जिन्होंने कहानी के सामाजिक संदर्भ की ओर ध्यान दिया। कोन्नोर ने कहानी को समाज से कटे लोगों की आवाज बताया। कोन्नोर के अनुसार, "उपन्यास सभ्य समाज की क्लासिक धारणा से अभी भी चिपका रह सकता है, जिसके अनुसार- मनुष्य समुदाय में रहने वाला प्राणी है...। लेकिन कहानी की खास प्रवृत्ति समुदाय से दूर रहने की है - रूमानी, व्यक्तिवादी एवं दुराग्रही।"7

कोन्नोर ने कहानी लेखक के लिए चुनौती उस बिंदु का चुनाव माना जिसके द्वारा वह मानव जीवन को दर्शा सके। उसका मानना था कि हर चुनाव के साथ एक नया शिल्प पाने या पूर्णतः असफल होने, दोनों प्रकार की संभावनाएँ रहती हैं, "कहानी लेखक के लिए सारभूत रूप (essential form) जैसी कोई चीज नहीं होती है, इसका कारण यह है कि मानवीय जीवन की संपूर्णता कभी भी उसका संदर्भ नहीं हो सकता, उसे हमेशा उस बिंदु को चुनने की प्रक्रिया में रहना चाहिए, जहाँ से मानव जीवन तक पहुँच सके, और हर चुनाव के साथ एक ओर नए शिल्प की प्राप्ति की संभावना रहती है, दूसरी ओर पूर्णतः असफलता की।"8 कोन्नोर ने हर चुनाव के साथ शिल्प की संभावना की बात की है। हिंदी में नई कहानी के दौर में कुछ इसी तरह की बात करते हुए मोहन राकेश ने कहा था कि हर अनुभव का अपना शिल्प होता है।

पश्चिम में कहानी को लेकर जो शुरुआती तर्क-वितर्क है, उसमें कहानी की संरचना को उपन्यास की संरचना से पृथक साबित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आगे चलकर बोरिस आइकेनबॉम (Boris Eikhenbaum) ने कहानी को उपन्यास के संदर्भ से परखने की प्रवृत्ति पर आपत्ति की। आइकेनबॉम के अनुसार, "उपन्यास और कहानी सिर्फ अलग तरह के रूप ही नहीं है, बल्कि आंतरिक रूप से बिल्कुल भिन्न हैं और अलग-अलग विरासत से आए हैं, इसीलिए वे कहीं के भी साहित्य में साथ-साथ और समान तीव्रता के साथ विकसित होते दिखाई नहीं पड़ते। ...उपन्यास इतिहास और यात्रा-वृत्तातों से निकला है, कहानी लोक-कथा और नीति-कथा से।"9 मेरी लुइस प्रैट (Mary Louise Pratt) ने अपने लेख 'The short story: The Long And The Short of It में बेर्डन (Berdan) के हवाले से कहानी के उपन्यास सापेक्ष दूसरी विधा (countergenre to the novel) होने से इनकार किया है, "बेर्डन का यह कहना है कि एकलपन का मानदंड टेल (Tale) पर लागू नहीं होता, अर्थ गर्भित है। पुराना 'टेल' कभी भी उपन्यास सापेक्ष दूसरी विधा (countergenre) नहीं था। जबसे ऐसा हुआ वह आधुनिक कहानी (modern short story) में बदल गया।" 10 प्रैट कहानी के 'एकलपन' के मानदंड को एल.एल. बाडर के हवाले से अस्वीकार करती हैं, "इस विधा के लिए 'एकलपन' (singleness) के मानदंड को आगे बढ़ाना निश्चित रूप से एक गलती है। उदाहरण के लिए ए.एल. बाडर ने यह दिखाया है कि कहानियों में दो समानांतर घटनाओं को आमने-सामने (juxtapose) रखना बहुत आम है, उदाहरणस्वरूप मोपासाँ की 'ए कंट्री एक्सर्सन' एवं मेन्सफिल्ड की 'द गार्डेन पार्टी', यद्यपि इनका शीर्षक एक घटना की ओर संकेत करता है। 11 एलिस बी. नील हेवेन ने कहानी में विवरण से इनकार नहीं किया, परंतु उसने स्वाभाविकता पर जोर दिया, "कहानी लेखन (Tale writing) का पहला घटक किसी विवरण के साथ उसकी स्वाभाविकता है, जिसको भुला देने पर उसका आनंद नष्ट हो जाता है, भले ही वह बहुत अच्छी तरह की भाषा में लिखी गई हो या विचार कुशलतापूर्वक व्यक्त किया गया हो।"12

फ्रैंक ओ कोन्नोर ने कहानी की विषय-वस्तु को मुख्य-धारा से कटे लोगों से जोड़ा था, आगे चलकर रीड ने भी उसका समर्थन करते हुए उसे ग्रामीण जीवन से जोड़ा एवं उसे एक महत्वपूर्ण कदम के रूप देखा, "ग्रामीणों और सरल लोक-जीवन के प्रति पक्षधरता बाद के लेखकों (डॉडेट, फ्लॉबेयर, मोपासाँ) की कोई कम महत्वपूर्ण प्रवृत्ति नहीं थी। उन वृहत सामाजिक पैटर्नों का चित्रण, जो शहरी जीवन में प्रचुरता से थे, मुख्यतः उपन्यासों के जिम्मे छोड़ दिया गया। कहानी विशेष रूप से क्षेत्रीय जीवन या उन व्यक्तियों का चित्रण के लिए उपयुक्त मानी गई जो शहर में रहते हुए भी वहाँ परायों की तरह थे।"13

पश्चिम में कहानी की संरचना पर हुई बहस में प्रारंभिक चिंता (concern) उसके स्वरूप के संदर्भ में थी, तो आगे चलकर उसके गठन पर विचार होने लगा। यद्यपि इनमें विकास की कोई निश्चित दिशा अथवा तारतम्यता नहीं है फिर भी इनसे कुछ संदर्भ प्राप्त किया जा सकता है।

ए.एल. बाडर ने आधुनिक कहानी की संरचनात्मक विशिष्टता को रेखांकित करते हुए इसकी संरचना को पुरानी कहानी से 'टेकनिक' के आधार पर अलग किया, "ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक कहानी कथानक से लिए गए आख्यान संरचना को अपनाने के दावे का प्रदर्शन करती है। मूलतः इसकी संरचना पुरानी और अधिक पारंपरिक कथाओं की संरचना से बहुत भिन्न नहीं है, लेकिन इसकी तकनीक (technique) भिन्न है, और तकनीक का यही फर्क है कि अक्सर गलती से पाठकों और आलोचकों द्वारा संरचना का अभाव मान लिया जाता है।"14 बाडर, बोनारो ओवरस्ट्रीट के हवाले से कहानी की संरचना में शिल्प के ऐतिहासिक बदलाव को रेखांकित करते हैं, "उन्नीसवीं सदी के कहानी के वक्ता (story teller) कथानक (plot) के विशेषज्ञ थे। बीसवीं सदी के साथियों ने देखा कि जीवन को सफाई से निर्मित घटनाओं के 'पार्सल (Parcelled) संग्रह' के रूप में नहीं देखा जा सकता, इस कारण से विद्रोही रवैया अपना लिया।" 15

ए.एल. बाडर कथानकहीनता को आधुनिक कहानी की विशेषता के रूप में देखते हैं, "आधुनिक कहानी के खिलाफ कथानकहीनता, शिथिल संरचना आदि के जो आरोप लगाए जाते हैं, उन्हें मेरे ख्याल से आधुनिक शिल्प (Technique) में आए परिवर्तन के रूप में बेहतर दिखाया जा सकता है। इन परिवर्तनों में मुख्य है - विषय का अधिक सख्ती से परिसीमन और परोक्षता की विधि।"16

एल.ए.जी. स्ट्राँग का मानना है कि आधुनिक कहानी में लेखक ही नहीं पाठक की समझ की भी भूमिका है, "आधुनिक लेखक संतुष्ट हो जाता है अगर, पाठक को मानो किसी झरोखे से चरित्रों की छवि दिखाते हुए वह उन चरित्रों की ऐसी मुद्राएँ दे पाता है जो प्रारूपिक हैं, अर्थात ऐसी मुद्रा जो पाठक को अकथित छोड़ दी गईं चीजों को अपनी कल्पना से भर देने में सक्षम बनाती है। ...संभव है कि वह हमें मोजाएक (mosaic) का सिर्फ प्रतिनिधि टुकड़ा दे, जिसके इर्द-गिर्द हम अपने मुकम्मल हो चुके पैटर्न की छायाभासी बाह्य रेखाएँ देख पाएँ।"17

शिल्प के स्तर पर इन विचारों के केंद्र में कथानक ही मुख्य रूप से है। इसी के होने-न-होने पर विचारकों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से अपना विचार व्यक्त किया है। थियोडोर स्ट्राउड के अनुसार, "वर्तमान में प्लॉट एक निंदात्मक शब्द बन गया है, जो सरल किस्म के सस्पेंस की रचना करने वाली कथाओं के लिए आरक्षित है। इसकी बजाय उन कहानियों को अधिक इज्जत से देखा जाता है जिनमें एक थीम है, जिसे प्रतीकों की एक व्यवस्था के रूप में चिह्नित किया जा सके और जिसमें कोई मुखर नीति कथा न हो।"18

सुजेन फर्ग्युसन (Suzanne C. Ferguson) ने भी कार्य-व्यापार एवं विस्तृत चरित्रांकन की बजाए 'थीम' को महत्व दिया है, "बाहरी समरूपता, भौतिक कार्य-व्यापार और सुविस्तृत चरित्रांकन से हम जितना ही कम उलझते हैं, उतना ही यह स्वाभाविक हो जाता है कि वह तत्व, जो संपूर्ण को संपूर्ण में निबद्ध करता है, ही वह चीज है, जिससे पाठक चालक थीम के रूप में ग्रहण करता है और लेखक की मंशा के रूप में अभिव्यक्त करता है।"19

कहानी की संरचना के विकास क्रम की दृष्टि से चेखव के हस्तक्षेप का महत्वपूर्ण योगदान है। पो ने कहानी के आदि, मध्य और अंत होने की बात की थी, लेकिन चेखव ने कहा, "कहानी का कोई आदि, मध्य और अंत नहीं होता। कहानी केवल कहानी होती है।" 20 उसने कहानी में वर्णन की जगह वातावरण एवं बिंब को महत्व दिया, "कहानी में घिसे-पिटे, बेकार ओर अर्थहीन वर्णन मत दो। केवल अपने निरीक्षण से कुछ बिंब चुन लो, उन्हें संपादित करके इस तरह रख दो कि चित्र खुद बोल उठे... चाँदनी रात में कुएँ पर लेटी रहट की परछाईं और टूटी बोतल के काँच पर झिलमिलाती किरणें, रात का जैसा सजीव, भव्य वातावरण उपस्थित कर सकती है, वह लंबे-लंबे वर्णन नहीं कर पाएँगे।"21 चेखव ने कहानियों में वर्णन की बजाय पाठक के विवेक को महत्व दिया, "घोड़ों के चोरों का सात सौ पंक्तियों में चित्रण करने के लिए मुझे पूरे समय उनके टोन और एहसास में बोलना एवं सोचना पड़ेगा अन्यथा अगर मैं आत्मपरकता दिखलाऊँ तो छवि धुँधली हो जाएगी और कहानी वैसी सुगठित नहीं रह जाएगी जैसी हर कहानी को होना चाहिए। जब मैं लिखता हूँ तो इस बात के लिए पूरी तरह पाठक के भरोसे रहता हूँ कि कहानी में जो आत्मपरक तत्व छूट गए हैं, वह उन्हें खुद से शामिल कर ले।"22

अपने लेख 'चेखव एवं आधुनिक कहानी (Chekhov and the modern short story)' में चेखव के विश्लेषण के क्रम में चार्ल्स ई. मे (Charls E. May) ने कहानी की विशेषता बताते हुए लिखा है - "... चरित्र एक मनःस्थिति के अनुरूप हो न कि प्रतीकात्मक प्रेक्षण या यथार्थवादी चित्रण की तरह, कथा सुविस्तृत कथानक वाले 'टेल' (Tale) की बजाय न्यूनतम प्रगीतात्मक स्केच की तरह हों, वातावरण बाह्य व्यौरों और मानसिक प्रक्षेपण के अस्पष्ट मिश्रण के रूप में हो; और यथार्थ अपने आप में विशिष्ट नजरिए के प्रकार्य की तरह हो।"23

जहाँ तक कहानी की संरचनात्मक तत्वों की बात है, उसे अलग-अलग तरीकों से विश्लेषित किया गया। फ्रैंक ओ कोन्नोर ने कहानी का विश्लेषण करते हुए कहा, "कहानी में तीन तत्व होते हैं - उद्घाटन, विकास और नाटक।"24 जबकि जे. बर्ग. इसेंविन ने कहानी की सात विशिष्टताएँ बताई है - (1.) एकमात्र प्रधान घटना (2.) एकमात्र प्रमुख चरित्र (3.) कल्पना (4.) कथावस्तु (5.) कसाव-संक्षिप्रता (6.) गठन एवं (7.) प्रभाव की अन्विति।25 लेकिन हम देख चुके हैं कि एकलपन की धारणा, कथावस्तु का आग्रह वाला मानदंड प्रश्नांकित होता रहा है। समय के बदलाव के साथ संवेदना के जटिलतर होने के कारण यह मानदंड अक्षुण्ण नहीं रह सका। अंततः हम यही पाते हैं कि कहानी की संरचना की अवधारणा गतिशील अवधारणा है। समय के साथ इसमें परिवर्तन एवं संशोधन होता रहा है।

हिंदी में कहानी की संरचना का अध्ययन-विश्लेषण

हिंदी में कहानी की संरचना का अध्ययन विकसित रूप में नहीं है। प्रायः इसमें कोई मौलिकता अथवा नया प्रस्थान दिखाई नहीं देता। साहित्यशास्त्र के प्रारंभिक आलोचकों - आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुंदर दास, गुलाब राय आदि ने कहानी के छह तत्वों की चर्चा की एवं इन तत्वों की विशेषता को दर्शाया। डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल का शोध-ग्रंथ 'हिंदी कहानियों की शिल्प-विधि का विकास' में इन्हीं तत्वों के आधार पर कहानी का विश्लेषण किया गया है। स्वतंत्रता के पूर्व लगभग यही स्थिति है। हिंदी कहानी की विषय-वस्तु, संरचना में युगांतकारी परिवर्तन करने वाले प्रेमचंद भी कहानी की संरचना पर कोई विस्तृत विचार नहीं देते। वे कहानी को 'एक घटना' एवं 'मनोवैज्ञानिक विश्लेषण' से जोड़ते हैं। अपने प्रसिद्ध निबंध 'कहानी कला' में उन्होंने कहानी (Stort story) के लिए 'आख्यायिका' शब्द का प्रयोग किया है :

"...उपन्यास घटनाओं, पात्रों और चरित्रों का समूह है; आख्यायिका केवल एक घटना है- अन्य बातें सब उसी घटना के अंतर्गत होती हैं।"26 - कहानी कला

"वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येय समझती है। उसमें कल्पना की मात्रा कम, अनुभूतियों की मात्रा अधिक होती है, इतना ही नहीं, बल्कि अनुभूतियाँ ही रचनाशीलता से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती है।"27 - कहानी कला

स्वातंत्र्योत्तर दौर में कहानी के छह तत्वों के आधार पर विश्लेषण का विरोध हुआ। रमेश बक्षी ने इस शैली से अपनी असहमति जाहिर करते हुए लिखा, "...किसी आलोचक ने विदेशी समीक्षा से उधार लेकर, उन्हें बिना समझे-बूझे, कहानी-उपन्यास के छह शास्त्रीय तत्व बना दिए - यह सब उसी तरह का कार्य है जैसे मात्रा और वर्णों की गिनती लगा-लगाकर कोई छंद रचना करे।"28

लेकिन इस दौर में भी कोई वैकल्पिक पद्धति नहीं उभरी। मोहन राकेश ने सांकेतिकता की पुरजोर वकालत की, "जहाँ तक कहानी की आंतरिक उपलब्धियों का संबंध है, उनमें सांकेतिकता को कहानी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। यह सांकेतिकता आज की कहानी की या किसी एक भाषा की कहानी की ही उपलब्धि नहीं, कहानी मात्र की अनिवार्य उपलब्धि है।"29 नामवर सिंह ने कथानक में मौलिक परिवर्तन एवं कथानक के ह्रास की बात उठाई, "...कहानी में जो चीज पहले कथानक के नाम से जानी जाती थी, उसमें कहीं न कहीं कोई मौलिक परिवर्तन हुआ है। इसे यों भी कह सकते हैं कि कथानक की धारणा (कन्सेप्ट) बदल गई है : किसी समय मनोरंजक, नाटकीय और कुतूहलपूर्ण घटना-संघटन को ही कथानक समझा जाता था और आज घटना संघटन उतना विघटित हो गया है कि लोगों को अधिकांश कहानियों में 'कथानक' नाम की चीज मिलती ही नहीं।"30

दरअसल इस दौर की कहानियों में संवेदना, सरोकार, यथार्थ को लेकर जो नई जद्दोजहद शुरू हुई, उसने अभिव्यक्ति को नई भंगिमा दी। डॉ. इंदु रश्मि ने अपनी शोध-पुस्तक 'नई कहानी का स्वरूप विवेचन' में रमेश बक्षी के हवाले से 16 प्रकार 31 के शिल्प का उल्लेख किया है (हालाँकि पंद्रह की सूची ही दी है) :

(i) आंचलिक शिल्प का प्रयोग
(ii) विविध स्तरों वाले सूक्ष्म सांकेतिक का प्रयोग
(iii) प्रतीकात्मक शिल्प का प्रयोग
(iv) दूसरे कथा-शिल्प का साम्य-वैषम्य मूलक प्रयोग
(v) समाप्ति से आरंभन के शिल्प का प्रयोग
(vi) कथानक के ह्रास और कथा-सूत्र के विश्रृंखल शिल्प का प्रयोग
(vii) चरमोत्कर्ष पर बोध-सूत्र के स्पष्ट होने वाले शिल्प का प्रयोग
(viii) विचारोत्तेजक प्रलापीय शिल्प का प्रयोग
(ix) स्वेरकल्पना (फैंटेसी) शिल्प का प्रयोग
(x) व्यक्तित्व द्विविधा प्रस्तुतीकरण शिल्प का प्रयोग
(xi) एक कथा के अंतर्गत कई कथा नियोजन के शिल्प का प्रयोग
(xii) अवर्त्तक शिल्प का प्रयोग
(xiii) गाथा शिल्प का प्रयोग
(xiv) समीकरण शिल्प का प्रयोग
(xv) तांत्रिक शिल्प का प्रयोग

अपनी पुस्तक - 'हिंदी कहानी : पाठ और प्रक्रिया' में, सुरेंद्र चौधरी ने 'कथानक', 'निबंधना (Layout)' एवं कहानी की आंतरिक विशिष्टता की जो बात की है, उससे कहानी के शिल्प पर प्रकाश पड़ता है। सुरेंद्र चौधरी प्रांरभ, मध्य और अंत वाली परंपरागत धारणा का खंडन करते हैं, "...अधिकांशतः हम निरर्थक चीजों की ओर अपना ध्यान ले जाते हैं, क्योंकि कहानी की रचना-प्रक्रिया से उसका कोई संबंध नहीं होता। मसलन कहानी की रचना-प्रक्रिया में हम कथा-वस्तु के प्रारंभ, मध्य और अंत की चर्चा तो करते हैं किंतु जिस स्वाभाविक प्रक्रिया में कहानी एक पूर्ण स्थापत्य ग्रहण करती है, उसकी चर्चा हम नहीं करते।"32 वे कहानी के विभिन्न तत्वों के संश्लेषण को उसका महत्वपूर्ण गुण मानते हैं, "...कहानी वस्तुतः एक संश्लेषण है और यह संश्लेषण विभिन्न तत्वों के मिलने का अलग-अलग प्रक्रियाओं से भी-परिणाम है।"33 पो की 'प्रभावान्विति' को किसी न किसी रूप में सुरेंद्र चौधरी भी स्वीकार करते हैं। वे कहानी को घटनाओं का पुंज नहीं मानते, बल्कि उसकी संश्लिष्टता की बात करते हुए 'आंतरिक विशिष्टता' को स्थापत्य का सबसे अनिवार्य गुण मानते हैं, "कहानी घटनाश्रित प्रभावों का निर्माणहीन समुच्चय नहीं है। जब घटनाश्रित प्रभाव पाठक के मन में एक संश्लिष्टता लेकर उभरते हैं तब कहानी का एक ढाँचा हमें प्राप्त होता है। इसे आप कहानी की स्थापत्य संबंधी आंतरिक विशिष्टता भी कह सकते हैं।"34

 

स्पष्ट है कि कहानी के निर्माण के लिए कोई एक नियम नहीं है, लेकिन एक चीज जो कहानी में आवश्यक है, वह है जीवन के क्रियात्मक ढाँचे की उपस्थिति, वही कहानी के स्थापत्य में परिवर्तन लाता है और कथानक में भी। परंतु यह कहानी में सामाजिक वास्तविकता का तथ्य-निरूपण नहीं करता है, बल्कि उसका संकेत भर कर देता है। "कथा का स्थापत्य सामाजिक सत्यों के तथ्य-निरूपण की छूट नहीं देता। तथ्य-निरूपण के लिए छोटी कहानियों में गुंजाइश ही नहीं रहती, क्योंकि छोटी कहानियाँ निबंधना-क्षेत्र (Space) में निश्चित या सीमित रहती है। हम काल की दिशा में ही यह कार्य कर सकते हैं, फलतः कथा में सामाजिक वास्तविकता का संकेत भर होता है।"35

चूँकि जीवन विविधताओं से भरा हुआ है, उसका कोई निश्चित नियम नहीं है, जीवन के कार्यात्मक रूप से सबसे अधिक नजदीक होने के कारण कहानी में शिल्पगत भिन्नताएँ बहुत ज्यादा होती है। इस संदर्भ में गोर्दों एवं एलेन टेट का मानना है, "कथा दूसरी कलाओं से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें मुख्य सरोकार जीवन की पद्धति से ही होता है। शायद यही कारण है कि हम उसके शिल्प की किसी पूर्व निर्धारित धारणा से स्वतंत्र होते हैं (ऐसी घोषणाओं से तो और भी अधिक), कथालेखन का कोई नियम नहीं होता, जैसे सफल जीवन का कोई निश्चित नियम नहीं होता, कथा की हर कृति, जैसा कि हर जीवन में होता है, एक न्यूनतम औसत होती है जिसका विश्लेषण मुश्किल है।"36 कहानी के शिल्प के संदर्भ में गोर्दों एवं एलेन टेट की यह मान्यता किसी हद तक सत्य होने के साथ यह भी सही है कि समय के साथ बदलती सामाजिक संरचना के साथ विचार एवं अनुभूति की संरचना भी बदलती है, तदनुरूप शिल्प भी और इसका विश्लेषण किया जा सकता है। प्रेमचंद-युग से नई कहानी के, आगे नई कहानी से साठोत्तरी दौर की कहानी के शिल्प में भिन्नता है। फिर आज की विमर्श की कहानियों में शिल्प की अलग-अलग भंगिमाएँ दिखाई देती हैं।

सारतः यह कहा जा सकता है कि कहानी (Short story) उपन्यास की अनुगामी विधा नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र विधा है जिसका विकास लोक कथा या नीति कथा जैसे प्राचीन कथा रूपों से हुआ। इसके विकास के प्रारंभिक चरण में कथा वस्तु के इकहरेपन पर भिन्न-भिन्न तरीकों से जोर दिया गया, लेकिन आगे चलकर यह इकहरापन आवश्यक मानदंड नहीं रहा। अभिव्यंजना की दृष्टि से प्रारंभिक ब्यौरे और आदि-मध्य-अंत वाली संरचना में भी कालांतर में बदलाव आ गया।

संदर्भ :

1. "Thefirst masterpieces of the short story appeared almost simultaneously not in England or France, the acknowledged literary capitals of the period, but at the extreme reaches of 'European' Culture in Russia and the United States. The three decissive innovators of the form were Nikolai Gogol, Nathaniel Howthorne, and Edgar Allan Poe.";The Longman anthology of short fiction, Ed. Dana gioia and R.S. gwynn, P. 1055

2. "We need only here say, upon this topic, that, in almost all classes of composition, the unity of effect or impression is a point of the greatest importance. It is clear, moreover, that this unity cannot be thoroughly preserved in productions whose perusal cannot be completed at one sitting."- The new short story theories, edited by Charles E. May, Ohio University Press, Athens, Ohio 45701; P. 60

3. "A skillful literary artist has constructed a tale, If wise, he has not fashioned his thought to accomodate his incidents; but having conceived, with deliberate care, a certain unique or single effect to be wrought out, he then invent such incidents- he then combines such event as may best aid him in establishing this preconceived effect. It his very initial sentance tend not to the outbringing of the effect, then he has failed in his first step." - The new short story theories, edited by Charles E. May, Ohio University Press, P. 61

4. "A true short story differs from the novel chiefly in its essential unity of impression. In a far more exact and precise use of the word, a short story has unity as a Novel cannot have it... A short story deals with a single character, a single event, a single emotion, or the series of emotion called forth by a single situation." - The new short story theories, edited by Chorles E. May, Ohio University Press, P. 73

5. "A short story must contain one and only one informing idea, and that the idea must be worked out to its logical conclusion with absolute singleness of aim and directness of method." - W.H. Hudson, An Introduction to the study of literature, Second edition, p. 454

6. "The short story is an artistic construction and communication of a limited sequence of events, experiences, or situations according to a closed correlative order which creates its own perception as a totality. ...The short story is a relatively closed order of internal association and correlation, and the novel a wide open order." - The new short story theories, p. 94-95

7. "The novel can still adhere to the classical concept of civilized society, of man as an animal who lives in community,... but the short story remains by its very nature remote from the community-romantic, individualistic, and intransigent." - The Lonely Voice, Melville House Publishing, Brooklyn, New York, Ed-2004, p. 20

8. "For the short-story writer there is no such thing as essential form. Because his frame of refrence can never be the totality of human life, he must be forever selecting the point at which he can approach it, and each selection he makes contains the possibility of a new form as well as the possibility of complete fiasco." - The Lonely voice, p. 21

9. "The novel and short story are forms not only different in kind but also inherently at odds, and for that reason are never found being developed simultaneously and with equal intensity in any one literature. ...The novel derives from history, from travels; the story-from folklore, anecdote." - The new short story theories, p. 97

10. "Berdan's observation that this singleness criterions does not apply on the tale is suggestive. The older tale was never a dependent countergenre to the novel. When it become so, it turned into the 'modern short story'." - The new short story theories, p. 102

11. "It is equally certainly a mistake to elevate this singleness to a criterial feature of the genre. For example A.L. Bader has perceptively pointed out that it is common for short stories to juxtapose two parallel incident, as happen, for instance, in Maupassant's 'A country Excursion', or Mansfield's 'The Garden party', though their title suggest a single incident." - The new short story theories, p. - 102

12. "The first element of tale writing", said Alice B. Neal Haven, "indeed, of any description, is naturalness; forgetting this, the charm is destroyed, be the language ever so well chosen, or the thoughts daintily expressed." - The new short story theories, p. 173

13. "Not the least important tendency of those latter writers [Daudet, Flaubert, Maupassant], was their predilection for rural subjects and simple folk. Mostly it could be left to the novel to delineate those large-scale social patterns which were so amply extended in urban life; the short story seemed especially suitable for the portrayal of regional life, or of individuals who, though situated in a city, lived there as aliens. (Reid 1977: 24) - The new short story theories, p. 106

14. "It seems to me, the modern short story demonstrates its claim to the possession of narrative structure derived from plot. Basically, its structure is not very different from that of the older and more conventional type of story, but its technique is different, and it is this difference in technique that is frequently mistaken for lack of structure by readers and critics." - Critical approaches to Fiction - ed. Shiv K. Kumar & Keith Mckean. McGraw-Hill Book Company, New York; 1968; p. 75

15. "The nineteenth century story teller was a master of plot. The twentieth century fellow, seeing that life was not made up of neatly parcelled collection of incident, took his rebel stand". Critical approaches to fiction, ed.- Shiv K. Kumar & Keith Mckean, p. - 70

16. "The charges of plotlessness, of loose, invertebrate structure, that have been made against the modern story seem to me to better explained by changes in modern technique.

Chief among these changes are the stricter limitation of subject and the method of indirection." - Critical approahces to fiction, p. 70

17. "The modern short story writer is content if, allowing the reader to glance at his characters as through window, he show them making a gesture which is typical: that is to say, a gesture which enables the reader's imagination to fill in all that is left unsaid... he may give us only the key-piece of mosaic around which, it sufficiently perceptive, we can see in shadowy outline the complete pattern." - Critical approaches to fiction, p. 71

18. "At the present time 'plot' has become a pejorative term, reserved for stories intended to evoke a simple kind of suspense. Prestige attaches instead to the stories which have a 'theme', preferably discernible as a system of symbols and not as an explicit moral." - Critical approaches to Fiction. P. 114

19. "The less we are occupied with verisimilitude, with physical action, with extended characterization, the more obvious it is that the element which binds the whole into a whole is what readers perceive as a governing theme and often express as 'the author's intention'." - The New short story theories, p. 228

20. कहानी : स्वरूप और संवेदना, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, संस्करण-2000, पृ.26 पर उद्धृत

21. कहानी : स्वरूप और संवेदना, पृ.26 पर उद्धृत

22. "... to depict horse-thieves in seven hundred lines I must all the time speak and think in thier tone and feel in their spirit, otherwise, if I introduce subjectivity, the image becomes blurred and the story will not be as compact as all short stories ought to be. When I write, I reckon entirely upon the reader to add for himself the subjective elements that are lacking in the story". -The New short story theories, p. 195

23. "... Character as mood rather than as either symbolic projection or realistic depiction; story as minimal lyricized sketch rather than as elaborately plotted tale; atmosphere as an ambiguous mixture of both external details and psychic projections; and a basic impressionistic apprehension of reality itself as a function of perspectival point of view." - The New short story theories, P. 199

24. साहित्य विधाओं की प्रकृति, संपादक - देवीशंकर अवस्थी, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2/38, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002; संस्करण-1998, पृ. 122

25. वही, पृ. 140

26. प्रेमचंद के श्रेष्ठ निबंध, संपादक - सत्य प्रकाश मिश्र, ज्योति प्रकाशन, 'मानसी', 16/3, हेस्टिंग्स रोड, इलाहाबाद; संस्करण-2003, पृ. 100

27. वही, पृ. 103.

28. नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति, संपादक - देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., 1-बी, नेताजी शुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002; संस्करण-1973, पुनर्मुद्रण-1993, पृ. 106

29. नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति, पृ. 92

30. नामवर सिंह, कहानी : नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, 15-ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-1; संस्करण-1999, पृ. 14

31. नई कहानी का स्वरू विवेचन - डॉ. इंदु रश्मि, सन्मार्ग प्रकाशन, 16 यू.बी. बैंग्लो रोड, जवाहर नगर, दिल्ली-110007; संस्करण-1992, पृ 153-54

32. हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, सुरेंद्र चौधरी राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 7/31, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002; छात्र संस्करण-2010; पृ. 47

33. वही, पृ. 48

34. वही, पृ. 28

35. हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, पृ. 92

36. हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ, पृ. 60 पर उद्धृत


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हिंदी समय में राजीव कुमार की रचनाएँ