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लोकसाहित्य का संवर्धन : समस्या और समाधान
डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव


लोकसाहित्य भारतीय संस्कृति की धरोहर है, जो किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। लोकसाहित्य के अंतर्गत जहाँ व्यक्ति के सुख-दुख, राग-आह्लाद, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद विद्यमान होते हैं, वहीं सामाजिक, सांस्कृतिक संदर्भ भी, जो राष्ट्र को अपनी पहचान देते हैं।

भारतीय संस्कृति अनेकानेक क्षेत्रीय संस्कृतियों का सम्मिश्रण है, किंतु वर्तमान में आधुनिकता तथा वैश्वीकरण के कारण सामाजिक संस्कृतियों में संक्रमण आ गया है साथ ही परंपरा को पुरातनता या आउटडेटेड कहकर अवरोध के स्वर भी प्रखर हुए हैं। नई सामाजिक संरचना में विकसित उपभोक्तावादी एवं भोगवादी संस्कृति ने भारत को ही नहीं, अन्यान्य राष्ट्रों को भी प्रभावित किया है। परिणामतः प्रत्येक राष्ट्र, राज्य, क्षेत्र की संस्कृति दूसरे से प्रभावित होकर अपनी निजता खोती जा रही है। इस संबंध में प्रो. सुरेंद्र दुबे कहते हैं "वैश्वीकरण के दौर में आधुनिक पीढ़ी लोकसाहित्य से परिचित नहीं हो पा रही है, जो लोग देश के बाहर हैं वे अपनी जमीन खोज रहे हैं और हम यहाँ रहकर भी अपनी जमीन खोद रहे हैं। विदित है कि लोकसाहित्य के अंतर्गत आमजन के हित, राग, संवेग सभी सुरक्षित रहते है। लेकिन कालांतर में लोक और वेद के बीच की खाईं ने लोकसाहित्य को उपेक्षित किया 'लोक' को सभ्यजन समुदाय की तुलना में अशिक्षित वर्ग माना जाता है, जबकि परिनिष्ठित साहित्य और लोकसाहित्य का अंतःसंबंध है। यदि हिंदी साहित्य पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट बोध होता है कि मध्य युग में प्रभावी भक्ति साहित्य लोक संवेदना से ही फलीभूत हुआ है और उसमें भक्ति के साथ-साथ सामंतवादी व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह के स्वर भी विकसित हुए जिसका आधार लेकर ही आधुनिक साहित्य में विद्रोहात्मक और आमजन का प्रतिनिधित्व विकसित हुआ। लोकसाहित्य ने पूर्व से ही विशिष्ट को उपेक्षित करके जननायकों को प्रश्रय दिया। उन्हें वह राजा नहीं बना पाया किंतु 'लोक देवता' अवश्य बना दिया, लोक गाथाओं के नायक इसके प्रमाण हैं। केवल विषय के स्तर पर ही नहीं शिल्प के स्तर पर भी लोकसाहित्य, परिनिष्ठत साहित्य का पाथेय बना।"1

वर्तमान दौर में नई संस्कृतियों के प्रभावी होने से जातीयता, कट्टरता विकसित हुई है, वहीं अपभ्रष्ट होती क्षेत्रीय संस्कृति को बचाने के प्रयास बढ़े हैं। क्षेत्रीय संस्कृति को सुरक्षित करने के लिए लोकसाहित्य और लोककलाओं की ओर ध्यान आकर्षित हुआ है।

लोकसाहित्य के संवर्धन में एक प्रमुख बाधा है, उसे कालातीत मानना। यह सच है कि 'लोकसाहित्य में 'प्राचीनता' का तत्व विशेष रूप से विद्यमान है, किंतु इस 'प्राचीनता' को केवल वाचक नहीं मानना चाहिए क्योंकि इसमें प्राचीनता के साथ तत्कालीन समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-धार्मिक सोच निहित होती है जो वर्तमान को संश्लिष्ट और समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। डॉ. रामाश्रय राय का मत है कि 'परंतु कठिनाई है कि 'प्राचीनता' मात्र काल वाचक नहीं है, इससे उस काल के लोगों, उनके समाज और उनकी सभ्यता-संस्कृति के संबंध में मूल्यबद्ध पूर्वाग्रह की भी बड़ी तेज गंध रची-बसी होती है।''2

सच यह है कि वर्तमान और अतीत का गहरा संबंध है। हमें समाज और राष्ट्र के संवर्धन के लिए 'हम कौन थे, क्या हो और क्या होंगे अभी, आओ मिलकर विचारें, समस्याएँ सभी, जैसे प्रश्नों का उत्तर यहीं से प्राप्त होता है। हमें यह विश्वास करना होगा कि निश्चित रूप से लोकसाहित्य कालातीत नहीं होता। अगर ऐसा होता लोक से उद्धृत साहित्य, मूल्य, संस्कृति, मौखिक परंपरा में अपने प्रजनन काल के सैकड़ों वर्षों के बाद भी प्रासंगिक नहीं होती। वास्तविकता यह है कि 'लोक' और उसकी 'अभिव्यक्तियाँ' (लोकसाहित्य) काल विशेष में न बंधकर, युग से कदमताल करती हुई बढ़ती है। यही कारण है कि आज के समय में लोकगाथा अथवा नाट्य सभी में प्राचीनता के साथ-साथ आधुनिकता का बोध प्राप्त होता है।

इस आधुनिकता ने न सिर्फ संस्कृति पर प्रभाव डाला, बल्कि मनुष्य के जीवन की भौतिक सुविधाओं एवं अकांक्षाओं में बदलाव लाया। 'आल्हा' जैसे लोकगाथा में तलवारों के अतिरिक्त बंदूक आदि की चर्चा क्या नए युग को आत्मसात करने की प्रवृत्ति नहीं है। इसी तरह आज के लोगगीतों में मोटर साईकिल, मोटर कार, जहाज, टेलीफून, रेल टिकट, बी.एम.डब्ल्यू., मर्सिडीज जैसी शब्दावली का प्रवेश क्या अतीत का मानदंड है? जरूरी यह है कि हमें समकालीन विमर्श, स्त्री, दलित, पर्यावरण आदि को लोकसाहित्य के फलक पर देखने पड़ेंगे मेरा मानना है कि लोक की अभिव्यक्ति को प्रगतिशील क्रम में देखना चाहिए।

लोकसाहित्य के संवर्धन में सबसे बड़ी समस्या है - 'जनसंचार माध्यम'। विशेषतः सिनेमा और दूरदर्शन। किंतु वर्तमान में इनके प्रभाव को देखकर, बिना इससे जुड़े लोकसाहित्य एवं लोकसंस्कृति को प्रचारित करना अत्यंत कठिन है। आज दूरदर्शन ने हमारी लोकसंस्कृति हो एक गतिशीलता प्रदान कर दी है हमारे व्रत, त्योहार, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक की विधाओं को भी जनसंचार ने अपना अंग बना दिया है, जिसका प्रतिफल विभिन्न रीति-रिवाजों को सिनेमा एवं दूरदर्शन में देखा जा रहा है।

यद्यपि मीडिया द्वारा प्रस्तुत की जा रही संस्कृति घातक है जो कि चाकचिक्यपूर्ण विकसित देशों के अनुकरण से प्रभावित है और उनके हितों को पूर्ण करती है और यह सब स्थितियाँ भूमंडलीकरण के प्रभाव से व्याप्त हैं। 'भूमंडलीकरण' से सामान्यतः भ्रम हो जाता है कि यह विश्वैक्य, वसुधैव कुटुंबकम्' जैसी अवधारणाओं को पुष्ट करता है जबकि वसुधैव कुटुंबकम् का भूमंडलीकरण से कोई लेना देना नहीं है, तात्पर्य यह कि 'भूमंडलीकरण' के मूल में जहाँ विकसित राष्ट्रों विशेषतः अमेरिका के आर्थिक हितों और बाजार की चिंता है वहीं 'वसुधैव कुटुंबकम्' मानवीय मूल्यों के साथ सौहार्द्र, प्रेम, ऐक्य की बात करता है। श्री सच्चिदानंद सिन्हा 'भूमंडलीकरण' के संदर्भ में लिखते हैं 'इस शब्द से यह भ्रम पैदा होता है कि यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें छोटे स्वार्थों से ऊपर उठ लोग सारे संसार के मंगल के लिए जुड़ जाएँगे। लेकिन भूमंडलीकरण के निहितार्थ इसके ठीक उल्टा हैं... संसार को एक करने की इसकी दृष्टि पूरी तरह एक आयामी है यह सिर्फ व्यापार के लिए दुनिया को एक करना चाहती है - बाकी सारी बातें आनुषांगिक हैं।'3 मीडिया द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली संस्कृति भूमंडलीकरण का परिणाम है जिसमें मानवीय मूल्यों की अपेक्षा आर्थिक मूल्य अधिक ग्राह्य हैं।

आज भूमंडलीकरण के दबाव में मीडिया द्वारा बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य में अपसंस्कृतियों का उदय हो रहा है। नए परिदृश्य में सामाजिक सरोकारों से कटकर व्यक्ति केंद्रित भोगवादी जीवनदृष्टि विकसित हो रही है। स्वछंदता के नाम पर मौन अनुशासन क्षीण हो रहा है। परिवार में विघटन का दौर बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। मनोरंजन के नाम पर मानसिक-शारीरिक विकृतियाँ बढ़ रही हैं। विज्ञापन ने दिन-प्रतिदिन भौतिक विलासिताओं को समाज के समक्ष परोसकर भारतीय संस्कृति नष्ट कर रही है। महँगे उपकरणों से लेकर स्लिम सेंटर, अर्बासन-पिल्स, मेकअप पर अनाप-शनाप खर्चे, नित्य बदलते फैशन ने समाज को सम्मोहित कर चकाचौंध के जाल में डाल दिया है।

बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य को आधुनिकता के देन मानते हुए श्यामाचरण दुबे लिखते हैं ''समृद्धि की झीनी परत के पास इस 'सुख' की प्राप्त के साधन हैं, पर बहुजन समाज उसकी ओर सिर्फ ललचाई निगाहों से देख सकता है। बड़े व्यापक पैमाने पर उसे लक्ष्य भ्रम होता है। समाज दिशाहीन और धुरीहीन हो जाता है। यह अपसंस्कृति अनियंत्रित विकास और छद्म आधुनिकता की देन है, जिनस समृद्ध और विकासशील देश त्रस्त है और सार्थक विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।"4

लोकसाहित्य के सृजन के संदर्भ एक अवधारणा यह है कि इसका रचयिता अज्ञात होता है, जिसे नई पीढ़ी अपने लिए लोक कवि नाम संबोधित करने से बचती है। हमें इस भ्रम से निकलना होगा कवि रोड़ा, कबीर, तुलसीदास आदि भक्ति काल के कवियों की रचनाएँ लोकमय बन गई हैं जिसमें कवि की पहचान आज भी सुरक्षित है। कहने का तात्पर्य यह कि नए कवियों को भी समझना होगा कि कोई भी रचना वैयक्तिक समूह में विलीन करने में सौ-डेढ़ सौ वर्ष लग जाते हैं, पर जैसे-जैसे रचना का लौकिक जुड़ाव बढ़ता है रचचिता छूटता जाता है, किंतु यह विस्मृत भी सरल नहीं है क्योंकि मौखिक परंपरा अब मुद्रण और अधुनातन तकनीकों से जुड़ चुकी है।

लोकसाहित्य के संवर्धन में एक अवरोध यह है कि नई पीढ़ी को इन विधाओं और कलाओं के प्रति कोई रुचि नहीं है। जिससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी, गुरु-शिष्य परंपरा में विकसित कलाओं के लोप होने का खतरा है इस उदासीनता का कारण यह है कि इन कलाओं के द्वारा आर्थिक लाभ न होना तथा प्रश्रयदाता को सम्मान न मिलना। सामान्यतः देखा गया है कि फिल्म, रंगमंच या धारावाहिक में कार्य करने वाले पटकथा, लेखक, गीतकार, संगीतकार और अभिनेता आर्थिक दृष्टि से अधिक संपन्न होते हैं, जो लोक के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं। जन सामान्य के बीच का कलाकार भी वैसी ही प्रतिष्ठा और समृद्धि की कामना करता है किंतु मनोरंजन के अधुनातन साधनों से बदली रुचि के समाज में संपन्न लोग इसको पूर्व की भाँति प्रश्रय न देकर, अपने अन्य साध्यों के प्रति अधिक सजग हो गए हैं।

लोकसाहित्य के संवर्धन में कलाकारों की अहं एवं रूढ़िवादिता ने भी बाधा उत्पन्न की। कुछ विशेष कलाओं को कलाकारों ने परिवारवाद के मोह के कारण, अन्य जन को हस्तांतरित नहीं किया।

लोकसाहित्य के संवर्धन में सरकारी तंत्र द्वारा भेदभाव करना भी बाधा पहुँचाती है। सरकार द्वारा सांस्कृतिक मंत्रालयों की स्थापना की गई, अकादमियाँ खोली गईं, लेकिन उचित सफलता नहीं मिली, इसका कारण यह है कि सरकारी तंत्र की अनियोजित नीतियाँ रहीं साथ ही जीवन-यापन करने के लिए जो अपेक्षाएँ कलाकारों की थीं, वह भी पूरी नहीं हुई, वहीं प्रोत्साहन योजनाएँ भाई-भतीजावाद, बंदरबाँट की शिकार हो गई, परिणामतः इन कलाओं को प्रश्रय देने वाले 'वास्तविक कलाकार' भुखमरी के कगार पर पहुँच गए। सवाल यह उठता है कि लोकसाहित्य के संवर्धन में बाधक तत्वों से कैसे निपटा जाए? इसके लिए मेरी दृष्टि में दो प्रकार की प्रक्रिया से समाधान किया जा सकता है एक मनोवैज्ञानिक और दूसरी भौतिक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के अंतर्गत हमें बाधक तत्वों को दुश्मन न मानकर, तर्कों द्वारा सिद्ध करना होगा और उनसे फ्रेंडली लेना होगा, जिससे उनको समझकर निष्प्रयोजनीय तत्वों को लोकानुकूल बनाया जाय। वहीं भौतिक प्रक्रिया के माध्यम से लोकसाहित्य को आधुनिक संयंत्रों से जोड़कर इतना सक्षम बनाने का प्रयास करना पड़ेगा जिससे पूर्व धारणाएँ बौनी हो जाएँ और यह साहित्य आधुनिक संसाधनों एवं माध्यमों में अपनी जगह बना ले।

लोकसाहित्य को असभ्य, असंस्कृत कहने वालों को रूसों के स्तर में जवाब देना होगा, जो आदिम जातियों को 'श्रेष्ठ महानुभावी जंगली' की संज्ञा देता है। उसका मानना था कि ये आदिम जातियाँ सभ्य और आधुनिक न होते हुए भी भद्र और उदार चेतना की मानव जाति की अक्षत, अविकृत महानता का प्रतिनिधि स्वरूप है। वहीं एंड्रयू लेंग का मानना था कि लोकसाहित्य प्रगतिशील लोगों के बीच गैर प्रगतिशील लोगों के द्वारा संरक्षित सवंर्धित धरोहर था जो लोगों के बीच असभ्य लोगों के कलात्मक स्फुरण की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, ऐसा स्फुरण जिसके उदर से सभ्यता प्रसूत हुई है। हर्डर ने भी लोक को संस्कृति का स्रोत मानकर, बुद्धिजीवियों के मध्य समादर का स्थान दिलाया यहाँ इन तथ्यों का उल्लेख करने का मंतव्य है कि हमें कथनों से प्रेरणा लेकर गर्वोक्ति के साथ कुंठा से मुक्त होना चाहिए।

लोकसाहित्य के संवर्धन के लिए आवश्यकता इस बात की है कि लोकसाहित्य को कैसे बचाया जाए तो मेरा मानना है कि परिनिष्ठित साहित्य की भाँति लोकसाहित्य को पठन-पाठन के क्षेत्र में स्थान दिलाने के लिये पाठ्यक्रम बनाएँ जाएँ। उल्लेखनीय है कि विभिन्न आयोगों द्वारा सरकार को प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में प्रदान करने की सलाह दी गई, लेकिन सेम पित्रोदा के ज्ञान आयोग के प्रभाव से यह लागू नहीं हो सका। परिणामस्वरूप नवपीढ़ी का क्षेत्रीय भाषाओं एवं संस्कारों से परिचय दुर्लभ हो गया है। आज जरूरत इस बात की प्राथमिक स्तर पूर्ण रूप से नहीं तो आंशिक रूप से इन्हें पढ़ाने का प्रावधान होना चाहिए। क्षेत्रीय भाषाओं से बालकों को परिचित कराने हेतु पाठ्य-पुस्तकें बननी चाहिए जिसमें उस क्षेत्र विशेष की संस्कृति रहन-सहन, खान-पान, धर्म आदि के साथ लोक प्रचलित गीतों (प्रार्थना या श्रम) को महत्व दिया जाए। लोक चर्चित नैतिक कथाओं को महत्व दिया जाए। जिसमें समाज के जनमानस के लिए उत्सर्ग करने वाले जननायकों की गाथाएँ हों। प्रायोगिक कार्य के अंतर्गत क्षेत्र विशेष में प्रचलित वाद्यों तथा कलाओं के प्रति छात्र की अभिरुचि तथा क्षमता को देखकर सप्ताह में दो-तीन दिन अवश्य प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

लोकसाहित्य के संवर्धन में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी अनेक संभावनाएँ हैं। हालाँकि बुद्धिवादियों के दबाव में मध्यकालीन कवियों को पाठयक्रम से बाहर करने का षड्यंत्र रचा जाने लगा, जो उचित नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में राष्ट्रीयता को लेकर समाज सजग है और यकीन है कि विस्मृत की जा रही लोक परंपरा को पुनः उचित स्थान मिलेगा। आवश्यकता इस बात की है कि उच्च शिक्षा में लोकसाहित्य की समस्त क्षमताओं को मापते हुए, उसके वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य निर्धारित करके, स्नातक-स्नातकोत्तर में एक विषय के रूप में सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाए। यद्यपि कि यू.जी.सी. द्वारा संचालित राष्ट्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा में भी एकल विषय में परीक्षा कराई जा रही है इसीलिए स्नातकोत्तर स्तर पर लोक साहित्य केंद्रित पाठ्यक्रम बनाकर एकल विषय के रूप में मान्यता दी जाय, साथ ही छात्रों की रुचि लोकसाहित्य के प्रति जागृति करने के लिए पठन-पाठन की पारंपरिक तकनीक से हटकर नई तकनीक विकसित की जाय। पाठ्यक्रम को अधिक से अधिक प्रायोगिक बनाया जाय। लोकगाथाओं, लोकगीतों, लोक नाट्यों, लोक कलाओं में एक-एक विधा की विशेषज्ञता सुनिश्चित होनी चाहिए साथ ही इन विधाओं पर अलग-अलग प्रश्न-पत्र बने। इसी तरह प्रशिक्षण के लिए, सर्वेक्षणोपरांत दृश्य-श्रव्य पाठ तैयार किया जाए। प्रायोगिक कार्य में छात्रों से किसी न किसी लोक-समारोह की संयोजना और सहभागिता सुनिश्चित की जाए दृश्य-श्रव्य कैसेट, पाठ निर्मित होने चाहिए लोक कला प्रशिक्षण केंद्र खोले जाने चाहिए।

लोकसाहित्य के सवंर्धन के शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ। जहाँ शोधर्थियों को स्कालर प्रदान करके, लुप्तप्राय संपदा को व्यवस्थित किया जाए। विभिन्न विश्वविद्यालयों में लोकसाहित्य पर शोध कार्य को और बढ़ावा दिया जाए। साथ लोकसाहित्य में पुस्तकीय शोध की अपेक्षा सर्वेक्षणपरक शोध को महत्व दिया जाए।

लोकसाहित्य को केवल साहित्य में ही नहीं बल्कि नृतत्वशास्त्र, दर्शनशास्त्र, इतिहास, समजाशास्त्र आदि विषयों में तुलनात्मक शोध करने को प्रेरित किया जाए। साथ ही लोकसाहित्य में रोजगार के नए अवसर तलाश सरकार एवं निजी संस्थानों द्वारा करनी होगी। जिस तरह बी.टेक, एम.बी.ए. आदि के छात्रों को 'प्लेसमेंट' के लिए 'कैंपस सेलेक्शन' होता है उसी प्रकार लोक अध्येताओं को भी रोजगार दिलाने के लिए सरकार द्वारा संचालित संस्थानों, रंगमंच संस्थाओं, अकादमिक केंद्रों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

आवश्यकता इस बात की है लोक कलाकारों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों को रेखांकित कर ग्रामीण क्षेत्र के लोग बेचकर कमाते हैं। जबकि इसका पारिश्रमिक राशि लोक कलाकारों को नहीं मिलता। दृश्य-श्रव्य कैसेटों के अतिरिक्त लोकसाहित्य पर आधारित पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का प्रकाशन किया जाना चाहिए, यह सच है कि लोक साहित्य की पुस्तकें लिखी गई, लेकिन बेहतर पुस्तकों का अभी भी अभाव है, जिसके लिए लोकसाहित्य अध्येताओं की जिम्मेदारी है कि लोकसाहित्य के बारे में अधिक से अधिक लिखकर प्रकाशन कराएँ।

प्रभावी बाजार से घबराने के बजाए आधुनिकता से जोड़कर 'कम्युनिटी रेडियो' पाड कास्टिंग, ब्लागिंग, विकी, स्लाइड, प्रेजेंटेशन आदि के माध्यम से लोक कलाकर अपनी पहचान सुरक्षित रख सकते हैं। दूरदर्शन से जुड़ाव बनाकर सरकारी-गैर सरकारी स्तर पर 'लोक' आधारित चैनल प्रारंभ होना चाहिए जिससे भाषा के आधार पर नहीं, क्षेत्रीय संस्कृति का समन्वय राष्ट्रीय संस्कृति के रूप में करके संपूर्ण राष्ट्र की लोक संपदा को चौबीस घंटे प्रसारित किया जाए।

लोकसाहित्य के संवर्धन के लिए जरूरी है कि लुप्त होते वाद्यों, कलाओं को बढ़ावा देने के लिए संग्रहालय बनाये जाएँ। सरकार द्वारा प्रोत्साहित करने के लिए अनेक पुरस्कार/रोजगार/वजीफा/पेंशन आदि योजनाएँ अधिकाधिक चलाई जाएँ और उन्हें पारदर्शी बनाया जाए।

प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित कहते हैं 'लोकसाहित्य आज बाजारीकरण के कारण लुप्त होता जा रहा है, जो सांस्कृतिक रूप से नुकसानदायक है। आधुनिक युग में लोकसाहित्य का विकास करना तो पहले बचाओ फिर बढ़ाओ के फार्मूले पर चलना होगा।' 5

तात्पर्य यह है कि वर्तमान समय में लोकसाहित्य के संवर्धन के लिए विशेष कार्य योजना होनी चाहिए, जिसमें बुद्धिजीवी, सरकारी तंत्र के साथ लोक कलाकारों और उनके प्रश्रयदाताओं की सामूहिक सहभागिता हो, हमें आधुनिकीकरण के हथियारों-मीडिया, इंटरनेट आदि से भयभीत नहीं होना चाहिए बल्कि उसमें लोकसंवदेना का विस्फोट भरकर लोक को संरक्षित करना है आज इसी आधुनिकीकरण ने हमारी संस्कृति में गंगा-जमुनी का रस घोल दिया है, विभिन्न प्रांतों के लोकाचार समूचे देश में प्रचलित हो गए हैं। लोकसाहित्य आज भी उतना ही महत्व है जितना हमारी संस्कृति का है।

संदर्भ

1. प्रो. सुरेंद्र दुबे - 'हिंदुस्तान' दैनिक, 31 अक्टूबर 2010, बस्ती संस्करण।

2. डॉ. रामाश्रय राय - रंगायन, जुलाई-दिसंबर 2001, पृ. 6

3. डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा - भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ, भूमिका द्वारा

4. श्यामाचरण दुबे - समय और संस्कृति, पृ. 171

5. प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित - 'दैनिक जागरण' 31 अक्टूबर 2010, बस्ती संस्करण


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