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लेख

घरेलू महिला कामगार बनाम मानवाधिकार
ममता कुमारी


घरेलू महिला कामगार की बात करते ही हमारे मन में एक जरूरी सवाल यह उत्पन्न होता है कि आखिर उनके लिए मानवाधिकार के क्या मायने, जो दो जून की रोटी के लिए दूसरों के घरों में 'निम्‍न स्‍तर का समझे जाने वाला' कार्य करती हैं और उन्हें मिलता है बहुत ही कम मेहनताना व ऊपर से गाली-गलौज भी। हमारे देश में घरेलू महिला कामगारों की संख्या करोड़ों में है। आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि 'भारत में 4.75 मिलियन घरेलू कामगार हैं, जिनमें से शहरी क्षेत्रों में तीन मिलियन महिलाएँ हैं।'1 दिल्ली श्रम संगठन द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार, भारत में पाँच करोड़ से अधिक घरेलू कामगार हैं, जिनमें से अधिकांश महिलाएँ हैं। बड़े शहरों में प्रायः हर पाँचवें घर में कामवाली 'बाई' बहुत ही सस्ते दरों में काम करते हुए दिख जाएँगी।

सामाजिक सुरक्षा के लिहाज के से जब घरेलू महिला कामगारों की बात की जाती है तो कुछ दर्द सीने में अंतर्विन्यस्त हैं। सो यह लेख उसी दर्द का एक हिस्सा मात्र है। हम यहाँ दो उदाहरणों के माध्यम से इस बात की पुष्टि करने का प्रयास करेंगे कि इतनी बड़ी आबादी वाले घरेलू कामगारों के लिए कोई कानून क्यों नहीं? आखिर लोकतंत्र के पहरुओं को इनके भविष्‍य के बारे में चिंता क्यों नहीं है? रधिया के पति बीमार हैं, घर चलाने के लिए बाई के रूप में काम कर रही थी। बर्तन धोते वक्त एक कप टूट गया, मालकिन ने कुपित होकर उन्हें काम से निकाल दिया। वह बेचारी रोती-बिलखती रही और अपने लिए काम की गुहार लगाती रही पर उनकी नहीं सुनी गई। बीमार पति को देखकर रधिया से रहा नहीं गया और उसने मानसिक अवसाद की स्थिति में आत्महत्या कर ली। बबली बिहार के सुदूरवर्ती इलाके से आकर बर्तन, झाड़ू-पोंछा का काम कर अपना गुजर-बसर करती थी। नौकरी से निकाल दिया, वह विक्षिप्‍त हो गई। रधिया या बबली के लिए कोई सामाजिक संगठन या मानवाधिकार कार्यकर्ता सामने नहीं आया। घरेलू महिला कामगारों के शोषण की संभावना घर की दहलीज के अंदर और बाहर समान रूप से एक जैसी होती है। घर के मालिक द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं के साथ तरह-तरह से क्रूरता, अत्याचार और शोषण किया जाता है। मीडिया के माध्यम से प्रकाश में आए दिल दहला देने वाले ऐसे कई उदाहरण हम सब की स्मृतियों में कैद हैं, जिसमें कुछ घरेलू महिला कामगारों को अपनी मुफलिसी और महिला होने की कीमत, अपना जिंदगी देकर चुकानी पड़ती है।

मध्य प्रदेश की सामाजिक कार्यकर्ता उपासना बेहार कहती हैं कि 'घरेलू कामगार महिलाओं के साथ तरह-तरह से क्रूरता, अत्याचार और शोषण होते हैं। कुछ समय पहले ही मीडिया में आए दिल दहला देने वाले केस भूले नहीं होंगे जिसमें कुछ घरेलू कामगारों को इसकी कीमत अपना जीवन देकर चुकानी पड़ी थी। जौनपुर से बसपा के सांसद धनंजय और उनकी पत्‍नी डॉ. जागृति सिंह को पुलिस ने घरेलू कामगार महिला की मृत्यु के सिलसिले में गिरफ्तार किया था तथा उन पर अपने अन्य घरेलू सहायकों को प्रताड़ना देने के भी आरोप लगे थे। उसी प्रकार मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक राजा भैया (वीर विक्रम सिंह) और उनकी पत्नी आशारानी सिंह को अपनी घरेलू नौकरानी तिजी बाई को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले मामले में सजा हुई थी। घरेलू कामगारों खासकर महिलाओं और नाबालिगों के साथ बढ़ते अत्याचार में सिर्फ राजनेता ही शामिल नहीं हैं, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले, बैंक, बीमा कर्मचारी, प्रोफेसर, चिकित्सक, इंजीनियर, व्यापारी, सरकारी अधिकारी इत्यादि सभी शामिल हैं। कॉरपोरेट जगत की वंदना धीर घरेलू कामगार किशोरी को अधनंगा रखती थी ताकि वह भाग न जाए, उसके शरीर पर चाकू और कुत्ते के दाँत से काटने के जख्म थे वहीं एयर होस्टेस वीरा थोइवी अपनी घरेलू काम करने वाली एक किशोरी को बेल्ट से पीटती और भूखा रखती थी, बाद में उसे पुलिस ने छुड़ाया।' 2

यह दीगर है कि इनके साथ होने वाले अत्याचार के कुछ मामले तब उजागर हुए जब मीडिया ने सुध ली। वरना हमारे समाज में हजारों की संख्या में ऐसे घरेलू महिला कामगार होंगी जो अपने नियोक्ता के अत्याचार चाहे वो शारीरिक, मानसिक, शाब्दिक हो, सब कुछ बिना दर्द बताए सह रही होगीं। घरेलू कामगार महिलाओं के साथ गाली-गलौज, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण, चोरी का आरोप, घर के अंदर शौचालय आदि का प्रयोग न करने, इनके साथ छुआछूत करना जैसे चाय के लिए अलग कप एक सामान्य सी बात है। 'घरेलू कामगार महिलाएँ ज्यादातर आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित समुदाय से होती हैं। उनकी यह सामाजिक स्थिति उनके लिए और भी विपरीत स्थितियाँ पैदा कर देती है। दरअसल ये हिंसा चारदीवारी के भीतर होने से हमें पता भी नहीं चलता है, जब तक की कोई बड़ी और भयानक दुर्घटना न हो जाए।' 3 घरेलू कामगार महिलाओं को अपने साथ हो रहे हिंसा की शिकायत करने पर न सिर्फ रोजी-रोटी छिन जाने का डर रहता है बल्कि पूरे परिवार का भरण-पोषण की चिंता उन्‍हें सताती है, इसी कारण वह शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पाती हैं, उनके सीने में जो दर्द छिपे हैं उसे देखने वाला कोई नहीं। घरेलू महिला कामगार पर मालिक द्वारा मानसिक व शारीरिक हिंसा की जाती है, शारीरिक शोषण होता है तो महिला कर्मी स्‍वयं और यदि शारीरिक रूप से अक्षम हैं तो किसी अन्‍य के माध्‍यम (मित्र, साथी कामगार, राज्‍य महिला आयोग के किसी अधिकारी द्वारा या जो घटना का जानकार हो) से पीड़ित की लिखित सहमति के बाद शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। घटना होने के दिन से लेकर तीन महीने तक पीड़िता अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

एनएसएसओ (National Sample Survey Office) के आँकड़े बताते हैं कि 'उदारीकरण के अगले दशक में देश में घरेलू कामगारों की संख्या में 120 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस असंगठित क्षेत्र में कार्यबल का दो तिहाई हिस्सा महिलाएँ भरती हैं और उनमें से अधिकतर झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे देश के पिछड़े इलाकों से आती हैं। अधिकांश घरेलू सहायिकाएँ अल्पायु में ही काम शुरू कर देती हैं और उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया जाता है। उन्हें नौकरी देने वाले लोगों में देश के धनाढ्य वर्ग से लेकर नव धनाढ्य होते हैं, जिनमें से अधिकतर अभी भी मालिक और कामगार के बीच के पारंपरिक अंतर में विश्वास करते हैं। दरअसल दास प्रथा की समाप्ति भले ही कागजी तौर पर हुई हो पर इसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है।'4 घरेलू कामगारों की बदहाली के लिए मुख्य रूप से राज्य-सत्‍ता के उदासीन रवैये को ही जिम्मेवार माना गया है। इस उदासीनता के कारण ही मालिकों को लगभग-न्यायिक ताकत आजमाने की खुली आजादी मिल जाती है। इस प्रकार की तानाशाही शक्ति आरंभिक औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने मालिकों को अर्ध-दंडदायक अधिकार के तौर पर दे रखी थी, जिसमें मालिकों को कार्य-निर्धारण का पूरा अधिकार होता था और कामगारों की काम छोड़ने या श्रम-संबंध को पुनःनियोजन करने की कोशिश को आपराधिक कृत्य घोषित कर दिया जाता था। कई महीनों तक लगातार वेतन न दिया जाना और काम छोड़ने में बंदिशें लगाया जाना, घरेलू काम को एक प्रकार की बंधुआ मजदूरी के समान बना देते हैं।

आईएलओ (ILO, 2015) का अनुमान है कि 'वैश्विक स्तर पर 67 मिलियन लोग घरेलू कामगार के रूप में कार्यरत हैं। दुनिया भर में यह संख्या लगातार बढ़ रही है। 2010 में, रूढ़िवादी अनुमानों में पाया गया कि 52.6 मिलियन लोग इस काम को कर रहे हैं, 3.6% वैश्विक मजदूरी रोजगार (ILO और WIEGO 2013) के लिए जिम्मेदार है। हालाँकि, घरेलू श्रमिकों को श्रम बल सर्वेक्षणों में शामिल किया गया है, इसलिए संख्या कहीं अधिक हो सकती है।'5 आजादी के पूर्व '1931 की जनगणना में देश की करीब 27 लाख आबादी को 'घरेलू कामगार' के रूप में चिह्नित किया गया था। वहीं 1971 में हुई जनगणना में यह संख्या घटकर महज 67,000 रह गई। लेकिन, 1991 से 2001 के बीच अचानक घरेलू कामगारों की संख्या में 120 फीसदी की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। घर से बाहर निकलकर काम करने वाली महिलाओं की संख्या में सर्वाधिक वृद्धि देखी गई। विदित हो कि अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच देश में घरेलू कामगार के तौर पर काम करने वाली 15-59 आयुवर्ग की महिलाओं की संख्या में 70 फीसदी की वृद्धि हुई। 2001 में जहाँ देश में महिला घरेलू कामगारों की संख्या 1.47 करोड़ थी, वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर 2.5 करोड़ हो गई। 21वीं शताब्दी के पहले दशक में जहाँ आधिकारिक आँकड़े कार्यबल में महिलाओं की संख्या घटने की बात कर रहे थे, वहीं अन्य आधिकारिक अध्ययनों में सामने आया कि इस दौरान महिलाएँ बड़ी संख्या में बिना वेतन के घरेलू कामों में लगी हुई हैं।'6

यहाँ यह कहना समीचीन है कि हमारे देश में करोड़ों की संख्या में महिलाएँ घरेलू कामगार के रूप में देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में लगी हैं लेकिन इनकी मेहनत को नजरअंदाज करके देश की अर्थव्यवस्था में इसे गैर उत्पादक कामों की श्रेणी में रखा जाता है। यही वजह है कि देश की अर्थव्यवस्था में घरेलू कामगारों के योगदान का कभी कोई सही आकलन नहीं किया गया। जबकि इनकी संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। इन महिलाओं को घर के काम में मददगार के तौर पर माना जाता है। इस वजह से उनका कोई वाजिब एक सार मेहनताना नहीं होता है। यह पूर्ण रुप से नियोक्ता पर निर्भर करता है कि वह उन्‍हें कितनी मजदूरी पर काम करवा सके।

देश में केवल दो ऐसे कानून हैं जो मोटे तौर पर घरेलू कामगारों को भी 'श्रमिक' का दर्जा देते हैं, पहला 'असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008' और दूसरा कार्यस्थल में महिलाओं के साथ होने वाली लैंगिक हिंसा को रोकने के लिए 'महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' बनाया गया है, जिसमें घरेलू कामगार महिलाओं को भी शामिल किया गया है। ये दोनों ही अधिनियम महिलाओं को हक प्रदान करने वाले हैं - पहला, असंगठित मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा और कल्याण से जुड़े मामलों में काम करता है और दूसरा काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए लाया गया था, लेकिन अभी तक ऐसा कोई व्यापक और राष्ट्रीय स्तर पर एक समान रूप से सभी घरेलू कामगारों के लिए कानून नहीं बन पाया है, जिसके जरिए घरेलू कामगारों की कार्य दशा बेहतर हो सके और उन्हें अपने काम का सही भुगतान मिल पाए।

घरेलू महिला कामगार से आशय है, वह महिला जो किसी घर में घरेलू कार्य के लिए नियुक्‍त होती है तथा पारिश्रमिक के रूप में नकद रुपये या अन्‍य वस्‍तु लेती है, चाहे वह सीधे या किसी एजेंसी के द्वारा नियुक्‍त हो, घरेलू कामगार की श्रेणी में आती है। घरेलू कामगार के अंतर्गत आते हैं : क. अंशकालिक कामगार - जो प्रति दिन निर्दिष्ट घंटे के लिए एक या एक से अधिक नियोक्ताओं के लिए काम करता है या प्रतिदिन कई नियोक्ताओं में से प्रत्येक के लिए विशिष्ट कार्य करता है। ख. पूर्णकालिक कामगार - जो किसी नियोजक के लिए प्रतिदिन एक निर्दिष्ट संख्या में घंटों (सामान्य पूर्ण दिन का काम) करता है और जो काम के बाद प्रतिदिन अपने घर वापस लौटता है और ग. लिव-इन वर्कर - जो किसी एक नियोक्ता के लिए पूरा समय काम करता है और नियोक्ता के परिसर में या नियोक्ता द्वारा प्रदान किए गए आवास में भी रहता है (जो नियोक्ता के घर के करीब या बगल में है) और काम के बाद हर दिन अपने घर वापस नहीं आता है। महिला घरेलू कामगार, विशेषकर जो अपने नियोक्ता के घर में रहती हैं, यौन शोषण की चपेट में हैं।

गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों से सरकार द्वारा समय-समय पर घरेलू कामगार को लेकर कानून बनाने का प्रयास किया गया, आजादी के उपरांत सन 1959 में घरेलू कामगार बिल (कार्य की परिस्थितियाँ) बनाया गया, जो सिर्फ कागजों पर सिमटकर रह गया, इसके उपरांत नई सहस्राब्‍दी में सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों ने वर्ष 2004-07 में घरेलू कामगारों के लिए 'घरेलू कामगार विधेयक' का खाका बनाया था। इस विधेयक में इन्हें कामगार का दर्जा देने के लिए एक परिभाषा प्रस्तावित की गई है "ऐसा कोई भी बाहरी व्यक्ति जो पैसे के लिए या किसी भी रूप में किए जाने वाले भुगतान के बदले किसी घर में सीधे या एजेंसी के माध्यम से जाता है तो स्थायी या अस्थायी, अंशकालिक या पूर्णकालिक हो तो भी उसे घरेलू कामगार की श्रेणी में रखा जाएगा।" इसमें उनके वेतन, साप्ताहिक छुट्टी, कार्यस्थल पर दी जाने वाल सुविधाएँ, काम के घंटे, काम से जुड़े जोखिम और हर्जाना समेत सामाजिक सुरक्षा आदि का प्रावधान किया गया है। लेकिन इस विधेयक को आज तक लागू नहीं किया जा सका है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के नायक हैं। उन्‍हें इस बात का भान है कि घरेलू कामगार महिलाएँ कितनी विपरीत परि‍स्थितियों में जीवन बसर करती हैं। देर-सबेर घरेलू महिला कामगारों के हक-हकूक के लिए सरकार कानून लाएगी। यहाँ यह बताना जरूरी है कि नई सरकार ने कुछ समय पहले ही घोषणा की है कि वे घरेलू कामगार के लिए एक विधेयक लानेवाले हैं। अगर घरेलू काम करनेवालों को कामगार का दर्जा मिल जाए तो उनके स्थिति बहुत बेहतर हो सकेगी। वे भी गरिमा के साथ सम्मानपूर्ण जीवन जी सकेगीं। यह भी अन्य कामों की तरह ही एक काम होगा ना कि नौकरानी का दर्जा।

यह सुखद संदेश है कि आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तमिलनाडु ने घरेलू सहायकों के लिए कदम उठाए हैं। कुछ राज्यों में इनके लिए न्यूनतम वेतन भी तय किया गया है, कुछ राज्यों में राज्य सरकार ने इनके लिए वेलफेयर बोर्ड भी गठित किए हैं, लेकिन एक समुचित कानून के अभाव में घरेलू कामगारों की एक बहुत बड़ी आबादी किसी भी तरह के मजदूर कानूनों के बगैर ही काम कर रही है। महाराष्ट्र और केरल जैसे कुछ राज्यों में घरेलू कामगारों के लिए कानून बनने से उनकी स्थिति में एक हद तक सुधार हुआ है। मध्य प्रदेश ने घरेलू कामगार महिलाओं के जॉब कार्ड बनवाए हैं और उन्हें कई सामाजिक सुरक्षा जैसे बच्चों की शिक्षा, कन्या की शादी इत्यादि सुविधाएँ दी जा रही हैं। लेकिन यह देशव्यापी नहीं है। 'मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घरों में काम करने वाली महिलाओं को कामवाली बाई के बदले बहन जी अथवा दीदी के संबोधन से पुकारने की अपील की है।'7

घरेलू महिला कामगार के अधिकार की बात करें तो मानवाधिकार की बात सबसे पहले करनी पड़ेगी, कायदे-कानून तो बाद में आते हैं। मानव को मानव की भाँति सम्‍मानित जीवन जीने का अधिकार ही मानवाधिकार है। संसार में हर किसी को सम्‍मान से जीने का अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा मानवाधिकार करते हैं। भारतीय संविधान में मानवाधिकारों से जड़ित निम्‍न अधिकारों को स्‍थान दिया गया है, यथा : सबको समान अधिकार, जात-पात, धर्म-वर्ण-वंश, जन्‍म स्‍थान के नाम पर भेदभाव न करना, जीने का अधिकार, स्‍वतंत्रता का अधिकार, जीविका का अधिकार, स्‍वस्‍थ रहने तथा उपचार का अधिकार, व्‍यवसाय चयन का अधिकार, अपने-अपने धर्मानुसार धार्मिक कर्म, आचारण एवं क्रिया-कलापों का अधिकार आदि।

दुनिया के तमाम देशों में महिलाओं के लिए विशेष अधिकार दिए गए हैं, ताकि वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकें। मानवाधिकारों के नजरिए से महिलाओं को विशेष रूप से व्यवहार करने के योग्य माना गया है। महिला आंदोलन द्वारा जहाँ एक तरफ महिलाओं को अधिकाधिक अधिकार दिए जाने की कवायद की जा रही है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के बीच भी अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूकता बढ़ी है। 'घरेलू महिला कामगार के मानवाधिकार का हनन मात्र अपराधी ही नहीं करते हैं अपितु पुलिस व अन्‍य एजेंसियाँ भी इस मामले में ज्यादा पीछे नहीं है। अपराध की दृष्टि से महिलाओं को बेहद आसान लक्ष्य माना जाता है इसीलिए महिलाओं के विरुद्ध दुनिया भर में अपराध बढ़ रहे हैं। चाहे घर हो या बाहर, स्कूल हो या कार्यस्थल महिलाओं को हर जगह विविध प्रकार के अपराधों का सामना करना पड़ता है।'8 महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी समय-समय पर काफी प्रयास किए हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना में कहा गया है कि 'हम संयुक्त राष्ट्र के लोग... मूलभूत मानवाधिकारों में, मानव व्यक्ति की गरिमा व मूल्यों तथा महिला व पुरुषों के समान अधिकारों में आस्था व्यक्त करते है...।' यहाँ यह कहा जा सकता है संयुक्त राष्ट्र चार्टर में महिलाओं की समानता के अधिकारों की घोषणा की गई है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ की 'मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषण-पत्र' में भी महिलाओं को बिना भेदभाव के अधिकारों की प्राप्ति का अधिकारी माना गया है। भारतीय संविधान में सभी को सम्‍मानपूर्वक जीने की आजादी तो दी गई है पर घरेलू महिला कामगार हर पल एक अलग असुरक्षा बोध की स्थिति में जीने को विवश हैं, इनके लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को पहल करने की जरूरत है।

'घरेलू सहायकों के अधिकार सुरक्षित करने के लिए 'डोमेस्टिक वर्कर्स वेलफेयर एंड सोशल सिक्योरिटी बिल' बनाया गया है, जिसमें रेसीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, जिला स्तर से शुरू कर राज्य और केंद्र सरकार के स्तर तक एक बोर्ड बनाकर काम करने वालों के अधिकार सुनिश्चित करने की बात कही गई है, लेकिन कई सालों से लंबित पड़े इस बिल के अब तक पारित न होने के कारण न्यूनतम मजदूरी, तयशुदा काम के घंटे, छुट्टी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, पालनाघर, काम करने के माहौल, वेतन और बाकी सुविधाओं से जुड़े कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं।' 9 हालाँकि यह स्‍वागतयोग्‍य कदम है कि घरों में काम करने वाली बाई जैसे घरेलू कामगारों के लिए को न्यूनतम मजदूरी समेत कई अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए सरकार एक राष्ट्रीय नीति तैयार कर रही है। श्रम सुधारों को बढ़ावा देने के लिए इस नीति को तैयार किया जा रहा है। इस नीति को श्रम मंत्रालय की ओर से तैयार किया जा रहा है। 'श्रम मंत्रालय के अनुसार, श्रम सुधारों के तहत पहली बार घरेलू कामगारों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई जा रही है। इसमें घरेलू कामगारों को कामगार के रूप में पंजीकरण कराने का अधिकार मिल जाएगा। पंजीकरण कराने से घरेलू कामगारों को अन्य कामगारों की मिलने वाले अधिकार और लाभों का भी फायदा मिलेगा। इसके अलावा घरेलू कामगारों को संघ और ट्रेड यूनियन स्थापित करने का अधिकार मिल जाएगा। अभी तक देश में घरेलू कामगारों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई संघ या ट्रेड यूनियन नहीं है। अभी तक देश में घरेलू कामगारों के लिए मजदूरी तय करने का कोई मानक नहीं है। यही कारण है कि यह घरेलू कामगार कम दर पर मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। नई घरेलू कामगार नीति में इनके लिए न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान किया जा रहा है। नई नीति में घरेलू कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा, दुर्व्यवहार, उत्पीड़न, हिंसा से संरक्षण के लिए अधिकार दिए जा रहे हैं। इसके अलावा घरेलू कामगारों को विभिन्न न्यायालयों-अधिकरणों में मुकदमा दायर करने और नौकरी पाने के लिए प्लेसमेंट एजेंसियों के गठन का प्रावधान किया जा रहा है।'10 लेकिन यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि घरेलू कामगारों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए जब तक घरेलू कामगार महिलाएँ संगठित नही होगीं और अपने हक की लड़ाई के लिए आगे नहीं आएँगी, उन्हें वो सम्मान मिलना मुश्किल है जो कि उनका असली हक है। साथ ही इन्हें मजदूर वर्गों के संघर्ष के साथ भी अपने को जोड़ना होगा। फिर भी 'असली लड़ाई तो सामंती सोच के साथ है जिसे खत्म कर अमीर और गरीब, मालिक तथा नौकर का भेद खत्म करना होगा तभी समाज में समानता आएगी'11 और इसके लिए समाज के सभी तबकों को प्रयास करने की जरूरत है।

संदर्भ सूची

1. लोकसभा सचिवालय, शोध एवं सूचना प्रभाग, 'असंगठित कामगार : मुद्दे और चुनौतियाँ', दिसंबर, 2014

2. http://www.humsamvet.in/humsamvet/?p=2008

3. वही

4. https://www.drishtiias.com/hindi/printpdf/social-security-must-be-ensured-for-domestic-workers

5. http://www.wiego.org/informal-economy/occupational-groups/domestic-workers

6. https://www.drishtiias.com/hindi/printpdf/social-security-must-be-ensured-for-domestic-workers

7. https://yourstory.com/hindi/8416d1068d--39-kill-the-work-of-war-39-violence-39-and-injured-woman-39-worker-39-

8. http://rjhssonline.com/HTMLPaper.aspx?Journal=Research+Journal+of+Humanities+and+Social+Sciences%3BPID%3D2013-4-2-22

9. http://thewirehindi.com/45318/ground-report-plight-of-domestic-helps-in-delhi/

10. https://money.bhaskar.com/news/MON-ECN-POLI-now-kamwali-bai-will-also-get-the-registration-the-government-will-take-the-policy-soon-1563789042.html

11. http://www.humsamvet.in/humsamvet/?p=2008


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