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उपन्यास

अद्वैत आश्रम
स्वामी विवेकानंद


ऐतिहासिक जगत के प्रारंभ से लेकर वर्तमान काल तक मानव-समाज में अनेक अलौकिक घटनाओं के उल्‍लेख देखने को मिलते हैं। आज भी, जो समाज आधुनिक विज्ञान के भरपूर आलोक में रह रहे हैं, उनमें भी ऐसी घटनाओं की गवाही देने वाले लोगों की कमी नहीं। पर हाँ, ऐसे प्रमाणों में अधिकांश विश्‍वास योग्‍य नहीं; क्‍योंकि जिन व्‍यक्तियों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं, उनमें से बहुतेरे अज्ञानी हैं, अंधविश्‍वासी हैं अथवा धू‍र्त हैं। बहुधा यह भी देखा जाता है कि लोग जिन घटनाओं को अलौकिक कहते हैं, वे वास्‍तव में नकल हैं। पर प्रश्‍न उठता है, किसकी नक़ल? यथार्थ अनुसंधान किए बिना कोई बात बिल्‍कुल उड़ा देना सत्‍यप्रिय वैज्ञानिक-मन का परिचय नहीं होता। जो वै‍ज्ञानिक सूक्ष्‍मदर्शी नहीं, वे मनोराज्‍य की नाना प्रकार की अलौकिक घटनाओं की व्‍याख्‍या करने में असमर्थ हो, उन सबका अस्तित्‍व ही उड़ा देने का प्रयत्‍न करते हैं। अतएव वे तो उन व्‍यक्तियों से अधिक दोषी हैं, जो सोचते हैं कि बादलों के ऊपर अवस्थित कोई पुरूष विशेष या बहुत से पुरूषगण उनकी प्रार्थनाओं को सुनने हैं और उनके उत्तर देते हैं- अथवा उन लोगों से, जिनका विश्‍वास है कि ये पुरूष उनकी प्रार्थनाओं के कारण संसार का नियम ही बदल देंगे। क्‍योंकि इन बाद के व्‍यक्तियों के संबंध में यह दुहाई दी जा सकती है कि वे अज्ञानी हैं, अथवा कम से कम यह कि उनकी शिक्षा-प्रणाली दूषित रही है, जिसने उन्‍हें ऐसे अप्राकृतिक पुरूषों का सहारा लेने की सीख दी और जो निर्भरता अब उनके अवनत-स्‍वभाव का एक अंग ही बन गई है। पर पूर्वोक्‍त शिक्षित व्‍यक्तियों के लिए तो ऐसी किसी दुहाई की गुंजाइश नहीं।

हजारों वर्षों से लोगों ने ऐसी अलौकिक घटनाओं का पर्यवेक्षण किया है, उनके संबंध में विशेष रूप से चिंतन किया है और फिर उनमें से कुछ साधारण तत्त्व निकाले हैं; यहाँ तक कि, मनुष्‍य की धर्म-प्रवृत्ति की आधारभूमि पर भी विशेष रूप से, अत्यंत सूक्ष्‍मता के साथ विचार किया गया है। इन समस्‍त चिंतन और विचारों का फल यह राजयोग-विद्या है। यह राजयोग आजकल के अधिकांश वैज्ञानिकों की अक्षम्‍य धारा का अवलंबन नहीं करता, वह उनकी भाँति उन घटनाओं के अस्तित्‍व को एकदम उड़ा नहीं देता, जिनकी व्‍याख्‍या दुरूह हो; प्रत्‍युत वह तो धीर भाव से, पर स्‍पष्‍ट शब्‍दों में, अंधविश्‍वास से भरे व्‍यक्ति को बता देता है कि य‍द्यपि अलौकिक घटनाएँ, प्रार्थनाओं की पूर्ति और विश्‍वास की शक्ति, ये सब सत्‍य हैं, तथापि इनका स्‍पष्‍टीकरण ऐसी कुसंस्‍कार भरी व्‍याख्‍या द्वारा नहीं हो सकता कि ये सब व्‍यापार बादलों के ऊपर अव्‍यस्थित किसी व्‍यक्ति या कुछ व्‍यक्तियों द्वारा संपन्न होते हैं। वह घोषणा करता है कि प्रत्‍येक मनुष्‍य, सारी मानव-जाति के पीछे वर्तमान ज्ञान और शक्ति के अनन्‍त सागर की एक क्षुद्र कुंठा मात्र है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानव के अन्‍तर में हैं, उसी प्रकार उसके भीतर ही उन अभावों के मोचन की शक्ति भी है; और जहाँ कहीं और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा कि वह इस अनंत भण्‍डार से ही पूर्ण होती है, किसी अप्राकृतिक पुरूष से नहीं। अप्राकृतिक पुरूषों की भावना मानव में कार्य की शक्ति को भले ही कुछ परिमाण में उद्दीप्‍त कर देती हो, पर उससे आध्‍यात्मिक अवनति भी आती है। उससे स्‍वाधीनता चली जाती है, भय और कुसंस्‍कार हृदय पर अधिकार जमा लेते हैं तथा 'मनुष्‍य स्‍वभाव से ही दुर्बल प्रकृति है', ऐसा भयंकर विश्‍वास हममें घर कर लेते हैं। योगी कहते हैं कि अप्राकृतिक नाम की कोई चीज नहीं है; पर हाँ, प्रकृति में दो प्रकार की अभिव्‍यक्तियाँ हैं- एक है स्‍थूल और दूसरी सूक्ष्‍म। सूक्ष्‍म कारण है और स्‍थूल कार्य। स्‍थूल सहज ही इंद्रियों द्वारा उपलब्‍ध की जा सकती है, पर सूक्ष्‍म नहीं। राजयोग के अभ्‍यास से सूक्ष्‍मतर अनुभूति अर्जित होती है।

भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्‍त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्‍य है, और वह है- पूर्णता प्राप्‍त करके आत्‍मा को मुक्‍त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्‍द बहुभावव्‍यापी है। संख्‍य और वेदांत उभय मत किसी न किसी प्रकार के योग का समर्थन करते हैं।

प्रस्‍तुत पुस्‍तक का विषय है-राजयोग। पातंजलसूत्र राजयोग का शास्‍त्र है और उस पर सर्वोच्‍च प्रामाणिक ग्रंथ है। अन्यान्य दार्शनिकों का किसी किसी दार्शनिक विषय में पतंजलि से मतभेद होने पर भी, वे सभी, निश्चित रूप से, उनकी साधना-प्रणाली का अनुमोदन करते हैं। लेखक ने न्‍यूयार्क में कुछ छात्रों को इस योग की शिक्षा देने के लिए जो वक्‍तृताएँ दी थीं, वे ही इस पुस्‍तक के प्रथम अंश में निबद्ध हैं। और इसके दूसरे अंश में पतंजलि के सूत्र, उन सूत्रों के अर्थ और उन पर संक्षिप्‍त टीका भी सन्निविष्‍ट कर दी गई है। जहाँ तक संभव हो सका, पारिभाषिक शब्‍दों का प्रयोग न करने और वार्तालाप की सहज और सरल भाषा में लिखने का यत्‍न किया गया है। इसके प्रथमांश से साधनार्थियों के लिए कुछ सरल और विशेष उपदेश दिए गए हैं, ''पर उन सबों को यहाँ विशेष रूप से सावधान कर दिया जाता है कि योग के कुछ साधारण अंगों को छोड़कर, निरापद योग-शिक्षा के लिए गुरु का सदा पास रहना आवश्‍यक है।'' वार्तालाप के रूप में प्रदत्त ये सब उपदेश यदि लोगों के हृदय में इस विषय पर और भी अधिक जानने की पिपासा जगा दें, तो फिर गुरु का आभाव न रहेगा।

पातंजल दर्शन सांख्‍य मत पर स्‍थापित है। इन दोनों मतों में अंतर बहुत ही थोड़ा है। इनके दो प्रधान मतभेद ये हैं- पहला तो, पतंजलि आदिगुरु के रूप में एक सगुण ईश्‍वर की सत्ता स्‍वीकार करते हैं, जबकि सांख्‍य का ईश्‍वर लगभग पूर्णता प्राप्‍त एक व्‍यक्ति मात्र है, जो कुछ समय तक सृष्टि-कल्‍प का शासन करता है। और दूसरा, योगीगण आत्‍मा या पुरूष के समान मन को भी सर्वव्‍यापी मानते हैं, पर सांख्‍य मतवाले नहीं।

स्वामी विवेकानंद


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