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आलोचना

'और तब भी खाता और पीता हूँ !'
अमरेंद्र कुमार शर्मा


सच है कि मैं अब भी रोटियों से वंचित नहीं हुआ हूँ
    मगर, यकीन करो, यह केवल संयोग है।
    मैं कुछ भी करूँ, मुझे कोई अधिकार नहीं पेट भरने का 
    यह एक संयोग है कि मैं बचा रहा गया हूँ   
    (जिस दिन तकदीर दगा देगी मैं भी गुजर जांऊँगा)

    मुझसे कहा जाता है, खाओ और मौज करो, खुश रहो
    कैसे खुश रहूँ, पियूँ, मौज करूँ ऐसे समय में
    यह रोटी का टुकड़ा जो मेरे हिस्से है,
    किसी भूखे का छीना हुआ कौर था
    यह पानी का गिलास जो थामे हुए हूँ मैं हाथ में
    प्यास से मरते हुए आदमी से
    छीना ही तो गया था
    और तब भी खाता और पीता हूँ

यह कविता कभी भी लिखी गई हो, हमारे समय की कविता है। हमारे समय अर्थात महीने के तयशुदा पैसे पर जीने (जीने के कोई दार्शनिक या सैद्धांतिक अर्थ के बगैर) वाले वर्ग का समय, जो सुबह-शाम के एक निश्चित समय में अपना कथित श्रम बेचते हैं और जो तमाम सामाजिक विसंगतियों पर दु:खी होते हुए किसी 'क्रांति की आवश्यकता' पर बल देते या ठीक इसके उलट सबकुछ को देखते हुए 'चुप रहने में ही भलाई है' जैसे सरलीकृत और नपुंसक हो गए या बना दिए गए वाक्यों के साथ किसी रंगीन शाम का इंतजार करते हुए जीवन गुजार देने की हसरत लिए जीते हैं 'जीवन गुजार देने' जैसा फलसफा हमारी पीढ़ियों में विरासत के तौर पर जीवित है। यह विरासत हमारे भीतर कोई 'क्रिटिकल सेंस' पैदा नहीं करती। दरअसल, हमारा समय औरंगजेब के जमाने में हिंदुस्तान आए फ्रांसीसी इतिहासकार 'ज्याँ दे थवनो के लिखे का समय है - 'हिंदुस्तान का बादशाह जितना अमीर है, उसकी रियाया उतनी ही गरीब।' भारत, जो 'लोककल्याणकारी राज्य' है, हमेशा से अंतर्विरोधों में जीनेवाला राज्य रहा है। अवाम के पास खाने, पहनने, रहने जैसी बुनियादी चीजों का अभाव है, वे आदिम तरीकों से जीवित रहने के लिए भारत के प्रत्येक हिस्से में पसरे हुए हैं। कहते हैं, इतिहास स्वयं को दुहराया करता है। झारखंड, उड़ीसा, छतीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के आज का समय हमें औरंगजेब के समय की याद दिलाता है। यथार्थ के आभासी अर्थों में चाहे जितने बदलावों की बात कही जाए, यथार्थ का वास्तविक अर्थ वही है जो आज से पाँच-छह सौ वर्ष पहले था। दरअसल, पूँजी के चरित्र की यह विशेषता होती है कि वह यथार्थ का एक आभासी अर्थ हमेशा बनाए रखे। प्रसिद्ध विचारक अंतोनियो ग्राम्शी ने जिस 'क्रिटिकल सेंस' की बात कही थी, भारत में इस 'क्रिटिकल सेंस' का समय अब तक आरंभ नहीं हुआ है। हम अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह कर फासीवादी मूल्यों को जीते हैं। बीसवीं सदी के उदारीकरण ने 'उदार' के तमाम प्रचलित और ग्राहय अर्थों को अपने 'पूँजी' के अर्थों में समेटा है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में 'उदार' शब्द को पूँजी ने एक 'षडयंत्र' के अर्थों में बदल दिया है। सबकुछ को समेट लेने जैसे पूँजी के ऑक्टोपसीय चरित्र के विरुद्ध खड़े होने/रहनेवाले वर्ग का लोप होता जा रहा हे। अंतर्विरोधों में जीनेवाले इस समाज में, जिसकी रीढ़ की हड्डी धीरे-धीरे घिसती जा रही हो, सीधे तन कर खड़ा रहना कोई अपराध बनता जा रहा हो ऐसे समय में बर्तोल्त ब्रेख्त को पढ़ना, बर्तोल्त ब्रेख्त को जानना एक उम्मीद जगाता है। यह उम्मीद पूँजी के ऑकटोपसीय चरित्र के विरुद्ध की उम्मीद है। हम यहाँ बर्तोल्त ब्रेख्त के नाट्य संबंधी चिंतन के माध्यम से पूँजी की दास्तान को समझने के लिए आपको आमंत्रित करते है।

नाट्य-चिंतन के संदर्भ में बर्तोल्त ब्रेख्त की दो अवधारणाएँ बताई जाती हैं। पहला 'एपिक थियेटर' व दूसरा 'एलियनेशन थियरी'। सवाल यह है कि बर्तोल्त ब्रेख्त को नाटय-साहित्य में इन दो नवीन अवधारणाओं के बारे में चिंतन करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी? आखिर ऐसा क्यों होता है कि प्रत्येक युग में प्रचलित चिंतन पद्धति के बरक्स कोई नवीन चिंतन पद्धति आरम्भ हो जाती है, जो या तो प्रचलित चिंतन पद्धति को समर्थन देते हुए उसका अर्थ विस्तार करती है या उसे नकारते हुए एक समानांतर चिंतन पद्धति के रूप मेंअपने को स्थापित करती है। बर्तोल्त ब्रेख्त की नाट्य-चिंतन पद्धति प्रचलित 'अरस्तू की नाट्य चिंतन पद्धति को नकारते हुए अपना स्वतन्त्र चिंतन प्रस्तुत करती है। निश्चित रूप से इसे नकारने के अपने सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक कारण रहे हैं। यदि इसे सरलीकृत ढंग से कहें तो कहना होगा कि बर्तोल्त ब्रेख्त की इस नाट्य-चिंतन पद्धति की पृष्ठभूमि में, दो महायुद्ध, जर्मनी की फासिस्ट शक्ति और समाजवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा रही है। दो महायुद्धों ने जहाँ 'व्यक्ति' को हर स्तर पर चुनौती दी और उसे हताशा व निराशा के गर्त में ढकेला, वहीं फासिस्ट शक्तियों ने उसके स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकारों का हनन करते हुए उसकी इयत्ता को समाप्त कर दिया। ऐसे में समाजवादी विचारधारा लगभग त्राण देनेवाली साबित हुई। आगे चल कर यह विचारधारा भी नए संदर्भों में पूँजी के हमले के साथ आम व्यक्ति से दूर होता गया। यूरोप की जनता जहाँ एक ओर उभरते पूँजीवाद से त्रस्त हो रही थी, वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था में भी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थी। हम यहाँ अलग से उन कारणों की पहचान नहीं कर रहे हैं जिनकी पृष्ठभूमि में बर्तोल्त ब्रेख्त की अवधारणाएँ नाट्य-परंपरा में शामिल हुई हैं, बल्कि इन दो अवधारणाओं पर बात करते हुए हम साथ ही उन कारणों की चर्चा करते जाएँगे जिनसे इनकी प्रेरणा मिलीं। इस संदर्भ में यह अच्छा होगा कि हम बर्तोल्त ब्रेख्त के बारे में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त कर लें।

बर्तोल्त ब्रेख्त के बारे में

बर्तोल्त ब्रेख्त का जन्म जर्मनी में 19 फरवरी 1898 को और मृत्यु 14 अगस्त 1956 को हुई। उसके पिता कैथलिक और माता प्रोटेस्टेंट थी। पिता कागज के एक कारखाने में प्रधान क्लर्क थे। उनकी जीवन-प्रणाली एक 'बूर्जुआ' की थी। बर्तोल्त ब्रेख्त के जीवन में कई महिलाओं की उपस्थिति ब्रेख्त के चिंतन को एक दूसरे स्तर से प्रभावित करती रही थी। उनके लेखन में इन महिलाओं का प्रमुख स्थान था। ब्रेख्त ने चीन, जापान और भारतीय थियेटर का भी गंभीर अध्ययन किया था। उन्होंने शेक्सपियर एवं एलिजाबेथियन नाटककारों का विशेष अध्ययन किया। साथ ही अपने नाटकों में ग्रीक ट्रेजडी के कई तत्वों को भी अपनाया। उनकी रचनाधार्मिता पर बवेरियन लोक नाट्य का भी प्रभाव था। ब्रेख्त का पहला नाटक बाल (Baal) है जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1918 में प्रकाशित हुआ। उनका दूसरा नाटक 1922 में 'ड्रम्स इन द नाइट' प्रकाशित हुआ। इसके अलावा 'मदर करेज' उनका प्रसिद्ध नाटक है। बर्तोल्त ब्रेख्त के वाल्टर बेंजामिन और टॉमस मान से अच्छे संबध थे। वाल्टर बेंजामिन से वे अपनी रचनाप्रक्रिया के बारे में विस्तृत बातचीत किया करते थे।

बर्तोल्त ब्रेख्त पर मार्क्सवादी विचारधारा का सधन प्रभाव रहा है। इस प्रभाव ने उन्हें 'समाज' और 'व्यक्ति' के बीच के अंतर्संबंधों को समझने की नवीन पद्धति दी। दरअसल, इस पद्धति की ही आवाज 'एपिक थियेटर' है जिसका एक प्रमुख सैद्धांतिक औजार 'एलियनेशन थियरी' या 'वी-इफैक्ट' है जिसे जर्मन में 'वरफ्रेमडंग्सइफेकेट' (Verfremdungseffekt) कहा जाता है।

दरअसल, बर्तोल्त ब्रेख्त का नाट्य-चिंतन मात्र साहित्यिक उपादेयता के लिहाज से नहीं था, बल्कि यह उनकी राजनीतिक दृष्टि का प्रतिबिंबन था। मुझे कह लेने दीजिए कि 'एपिक थियेटर' और 'अलगाव सिद्धांत ' बर्तोल्त ब्रेख्त की एक राजनीतिक आवाज थी और यह आवाज पूँजी पर आधारित संबंधों के विरुद्ध थी। जाहिर है, वे साहित्यिक सरोकारों को राजनीति से जोड़ कर देख रहे थे। यदि हम उस समय के इतिहास को देखें तो जान सकेंगे कि एक राजनीतिक आवाज बनना कितना जरूरी था। वैसे, हमारा यह भी मानना है कि साहित्य को अन्य सरोकारों के अलावा राजनीतिक सवालों व सरोकारों से अवश्य जूझना चाहिए। यह जूझने की पद्धति, जुझने का शिल्प और कौशल नाटक में अन्य साहित्यिक विधाओं से अलग और प्रखर होता है और साथ ही जनता से सीधे संवाद बनाने का माध्यम और 'वर्चस्व' के विरुद्ध 'प्रतिरोध' को चेतना उत्पन्न करने का एक धारदार हथियार होता है।

पृष्ठभूमि के लिए

असल में, नाटक का शिल्प उपन्यास के शिल्प से कठिन होता है, क्योंकि उपन्यासकार को केवल अपने पाठकों का ध्यान रखना होता है, और नाटककार को अभिनेताओं, रंगमंच और दर्शक वर्ग, तीनों का। बर्तोल्त ब्रेख्त का चिंतन इन तीनों को ले कर हुआ है। जब हम नाटक-रचयिता की रचना शक्ति की तुलना उपन्यास-लेखक से करते है तो हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि उपन्यास उस व्यक्ति के द्वारा भी रचा जा सकता है जो शिल्प-कुशल नहीं है, पर नाटक की रचना तो ऐसे ही साहित्य-शिल्पी द्वारा संभव है जो अपना शिल्प ठीक से सीख चुका है और जिसका अपने उपकरणों पर पूरा अधिकार है। साथ ही यह भी आवश्यक होता है कि किसी भी नाटककार के नाटकों को समझने के लिए उन लोगों के बारे में कुछ जानकारी हो जिनके लिए नाटक लिखा जाता है और जिनके साथ उसके सामाजिक संबंध होते हैं। इसका एक फायदा यह होता है कि, किसी भी देश और काल के नाटक-साहित्य के अध्ययन से हमें उस देश और काल के आचार, रीतियों, विचारधाराओं और लोगों की भाव-दशाओं के बारे में जानकारी होती है।

जैसा कि हम जानते हैं, मध्ययुगीन नाटक का विकास सर्वप्रथम फ्रांस में हुआ, और शायद इसी कारण पूरे यूरोप में 'मिस्टरी नाटक' लगभग एक ही प्रकार के रहे हैं। दरअसल, नाटक एक रचना समूह के लिए होता है और नाटककार की कृति उसके संभावित दर्शकों की रुचियों से प्रभावित रहती है। यह प्रभाव प्रमुख रूप से अच्छा ही रहता है, क्योंकि इसके कारण सार्वभौम रुचियों के कथानक का निरूपण किया जा सकता है। कुछ सीमा तक यह प्रभाव हानिकारक भी हो सकता है, लेकिन कहाँ तक, इसका निर्णय हम नहीं कर सकते। क्योंकि, हम जानते हैं कि स्त्रियों और पुरुषों के एकत्र समूह की एक विशिष्ट मानसिक इकाई होती हैं। इस समूह की अपनी एक आत्मा होती है - ऐसी आत्मा जो सभी उपस्थित व्यक्तियों की आत्मा का योग मात्र नहीं होती। बर्तोल्त ब्रेख्त की नाट्य-चिंतन पद्धति के संदर्भ में यदि हम नाटक के क्रमिक विकास को देखते हैं तो पाते हैं कि इसका विकास अपने युग संदर्भों से जुड़ा रहा है। मिस्टरी नाटक, मोरैलरी नाटक, वृत्त-नाटक, रक्त-त्रासदी, त्रासदी-कामदी, हास-कामदी, वीरता-प्रधान नाटक, गाथा-ऑपेरा, भावात्मक कामदी, पाठ्य-नाटक, समस्या नाटक आदि का एक सोपानगत विकास क्रम है। इन सभी नाटक रूपों के अपने-अपने कथा-विन्यास और उनके अपने सरोकार रहे हैं। इनके विश्लेषण में गए बिना हम बर्तोल्त ब्रेख्त की नाट्य-चिंतन पद्धति पर बात करते हैं।

जैसा कि हमने पहले कहा है, वाल्टर बेंजामिन ब्रेख्त के अच्छे मित्र थे। ब्रेख्त की चिंतन पद्धति को हम वाल्टर बेंजामिन की डायरी के हवाले से जानें, जिसे बेंजामिन ने 24 जुलाई 1937 को दर्ज किया था, तो हमें एक रोचक जानकारी मिलती है। बेंजामिन ने लिखा है, 'ब्रेख्त के अध्ययन कक्ष में छत की टेक लिए खड़ी शहतीर पर कुछ रंगीन शब्द लिखे हुए थे : सत्य ठोस है। खिड़की की देहली पर एक छोटा-सा लकड़ी का गधा रखा है, जिसका सिर हिलडुल सकता है। ब्रेख्त ने उसके गले में एक तख्ती टाँग रखी है जिस पर उन्होंने लिख रखा है, 'मुझे भी यही समझना चाहिए।' (पहल - 69, पृष्ठ 126)

एपिक थियेटर यहाँ है

'सत्य ठोस है, मुझे भी यही समझना चाहिए' दरअसल वह 'थ्रस्ट प्वांइट' है जहाँ से ब्रेख्त का 'अलगाव का सिद्धांत' उभरता है। 'अलगाव सिद्धांत' 'एपिक थियेटर' का एक प्रमुख औजार है। इसलिए जब हम 'एपिक थियेटर' के बारे में बात कर रहे होते हैं तो हम लगभग 'अलगाव सिद्धांत' के बारे में भी बात कर रहे होते हैं और जब 'अलगाव सिद्धांत' पर विचार कर रहे होते हैं तब हम 'एपिक थियेटर' को भी समझ रहे होते है।

'एपिक थियेटर' 'एरिस्टोटेलियन थियेटर' से भिन्न है। 'एपिक थियेटर' अपने शाब्दिक अर्थों में आख्यिकामूलक थियेटर है जिसका 'नैरेशन' बिल्कुल ही भिन्न किस्म का होता है। वस्तुत: ब्रेख्त अपने नाट्य-चिंतन में मुख्य रूप में इस पर विचार करते हैं कि 'थियेटर' पर्यवेक्षक से इस बात की अपील करता है कि वह भावुकता या भावनाओं के बरक्स तर्क को प्रधानता दे। 'थियेटर' मनोरंजन के साथ इस बात के लिए सामर्थ्यशाली हो कि वह 'सामाजिक परिवर्तन' की अवधारणा को मजबूती के साथ लोगों तक पहुँचाने का कार्य करें।

बर्तोल्त ब्रेख्त का 'एपिक थियेटर' मार्क्सवादी सिद्धांत की ऐतिहासिक विशिष्ट पृष्ठभूमि की देन है। ब्रेख्त इस बात में गहरी दिलचस्पी रखता था कि किसी भी विशिष्ट ऐतिहासिक दशा (स्थिति) में किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति, उसकी आदतें कैसे बदल जाती है, वह कैसे दूसरी चीजों को स्वीकार (ग्रहण) कर लेता है। ब्रेख्त इस बात की पहचान करना चाहता था कि एक पूँजीवादी समाज में व्यक्तियों का एक दूसरे के साथ किस तरह से संबंध बनता है। अपने प्रसिद्ध नाटक 'मदर करेज' में उसने युद्ध के समय, पूँजीवादी व्यवस्था में एक सैनिक और एक 'सिविलयन' के बीच के संबंधों को व्यक्त किया है। ब्रेख्त का 'एपिक थियेटर' एक विशिष्ट सामाजिक दशा के भीतर पनपनेवाली भावनाओं, विचारों, संकल्पनाओं और उसकी आदतों को रेखांकित करता है। परंपरागत थियेटर (अरस्तू मॉडल के थियेटर) के भ्रमजाल से हट कर ब्रेख्त ने यथार्थवादी थियेटर के रूप में 'एपिक थियेटर' की स्थापना की। भारत के संदर्भ में यदि इसे देखें तो यह भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की संकल्पना 'रस निष्पति' के विरुद्ध ठहरता है। अरस्तू और भरत मुनि के नाटय-चिंतन में 'त्रासदी' एवं 'आनंद' की संकल्पना प्राथमिक व अंतिम है। अरस्तू की त्रासदी भी अन्ततः आनंद में परिवर्तित हो जाती है। भरत जहाँ एक ओर अंततः नाटक से 'रस-निष्पति' की दशा को प्रतिपादित करते हैं जिससे दर्शक को आनंद की प्राप्ति हों, वहीं 'अरस्तू का त्रासदी-विवेचन, विरेचन के माध्यम से दर्शक को शांति प्रदान करनेवाली अवधारणा के रूप में नाट्य-चिंतन में स्थापित होता है। यदि इसे और गहरे रूप में देखें तो यह कहना होगा कि '...विरेचन कोई तत्व नहीं है। यह तो एक प्रक्रिया है जो अंततः त्रासदी के प्रेक्षणकाल में प्रेक्षक के मन में घटित होती है। यही त्रासदी का साध्य भी है और त्रास तथा करुणा आदि त्रासद तत्व साधन हैं। किंतु इन साधनों का अपना कोई पृथक मूल्य नहीं है। केवल त्रास ओर करुणा की उद्बुद्धि करके प्रेक्षक को क्षुब्धावस्था में छोड़ देना त्रासदी का उद्देश्य नहीं' - घोर विफलता है। उसका उद्देश्य है इन मनोविकारों का विरेचन और इस प्रक्रिया से प्रेक्षक को प्राप्त होनेवाली मन:शांति। इस प्रकार विरेचन का स्वतंत्र महत्व और इसका संबंध आनंद की भूमिका से है। किंतु इतने पर भी विरेचन स्वयं आनंद नहीं है, आनंद का कारण ही है। इसलिए इसे आनंद की भूमिका कहा गया है, और यह आनंद हमें प्रस्तुत की जानेवाली घटनाओं से नहीं वरन त्रासदी के समग्र रूप से प्राप्त होता है। यह भी साथ ही कहना होगा कि त्रासदी से हम विशिष्ट प्रकार के आनंद की ही अपेक्षा कर सकते हैं।' (रंग-प्रसंग -11, पृष्ठ -33)

उपर्युक्त उद्धरण को यदि गौर से देखें तो यह लगता है कि प्रेक्षक में करुणा और त्रास उत्पन्न कर उसे क्षुब्धावस्था में ला कर छोड़ देना परंपरागत नाट्य-पद्धति का उद्देश्य नहीं रहा है, बल्कि आगे बढ़ कर उसका शमन करना और आनंद प्रदान करना उद्देश्य रहा है। क्षुब्धावस्था में लाना तो आनंद प्राप्त करने की प्रक्रिया (विरेचन) है। यहीं पर यदि ब्रेख्त के 'एपिक थियेटर' को देखें तो यह कहना होगा कि 'एपिक थियेटर' किसी चीज का शमन नहीं करता, बल्कि वह विचार करने की कई संभावनाओं के साथ प्रेक्षक को स्वतंत्र छोड़ देता है। विचार करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना वस्तुत: ब्रेख्त की राजनीतिक चिंतन पद्धति की देन है।

ब्रेख्त का 'एपिक थियेटर' वस्तुत: आधुनिक 'अवाँगार्द' की तरह समझे जाने व देखे जाने की वकालत करता है। पूँजी की विचार सरणि की निर्मिति के समय में 'एपिक थियेटर' का विकास राजनैतिक महापरिवर्तन के रूप में हुआ है। 'एरविन फिसकैटर' ने सर्वप्रथम 'एपिक थियेटर' शब्द का प्रयोग किया था। जर्मनी के राजनीतिक समाज-कल्याण की अवधारणा से थियेटर अभिन्न रूप से जुड़ा रहा है। इसका उपयोग प्रोपेगेंडा के लिए एक औजार की तरह किया जाता रहा है। यह सामान्य जनजीवन को प्रभावी ढंग से प्रभावित करनेवाला सुदृढ़ मीड़िया है। जर्मनी में हिटलर के सत्ता में आने से पूर्व थियेटर की दो अवधारणाएँ या विचार या सिद्धांत काम कर रहे थे जो बुर्जुआ यथार्थवाद के विरुद्ध थे। एक, सामाजिक यथार्थवाद और दूसरा कल्ट (नाजी) थियेटर। यह दोनों थियेटर नई किस्म के थियेटर निर्माण के लिए प्रयोग कर रहे थे जिसमें प्रोलेतेरियत के द्वारा की जा रहे क्रांति की वकालत थी। क्रांति की वकालत के बावजूद भी 'कल्ट थियेटर' को 'नेशनल सोशलिस्ट पार्टी' जर्मनी की विशुद्ध और प्रामाणिक संस्कृति के विकास और उसके समर्थ में जुटाए जानेवाले विचार को प्रेषित करने के लिए उपयोग कर रहे थे। ब्रेख्त 'कल्ट थियेटर' के नाजी संस्करण से विक्षुब्ध थे। वे जर्मनी छोड़ कर डेनमार्क में 'एपिक थियेटर' की अवधारणा पर काम करने लगे। जब ब्रेख्त द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1948 में बर्लिन लौटे तो उनके 'एपिक थियेटर' की अवधारणा को एक तरफ 'समाजवादी यथार्थवाद' से एवं दूसरी तरफ 'प्रतीकवाद' एवं 'प्रकृतवाद' से चुनौती प्राप्त हुई। समाजवादी यथार्थ ने ही थियेटर को राजनीतिक प्रकृति का बनाया। ब्रेख्त का नाट्य-चिंतन ने यहीं से राजनैतिक रंग पकड़ा। लेकिन उसके 'एपिक थियेटर' का अर्थ राजनैतिक शक्ति प्राप्त करना नहीं था, बल्कि नाटक के 'स्पेक्टेटर' में विचार और तर्क पैदा करना था। वर्तमान व्यवस्था के ऊपर सवाल खड़ा करना ही 'एपिक थियेटर' को राजनैतिक संदर्भों में 'लोकेट' करता है। जाहिर है, इसमें पूँजी-समय की तस्वीरों को उनके सही रूपों में उपस्थित करना शामिल था। इसी आधार पर यह समाजवादी यथार्थवादी थियेटर पद्धति 'प्रोपेगेंडा थियेटर' के रूप में जाना जाता रहा है।

मार्क्सवादी थियेटर की अवधारणा में 'एपिक थियेटर' को निम्न रूप में समझा जा सकता है -

Ontology: Historical realism-virtual reality shaped by social, political, cultural value, crystallized over time

Epistemology : Knowledge (of reality) is value mediated and hence value ependent

Methodology : Dialectical

ब्रेख्त के 'एपिक थियेटर' में व्यक्ति का 'स्व'

कभी भी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक संरचना के सत्तामूलक दवाब में नहीं आता, बल्कि इस थियेटर में 'स्व' प्राकृतिक व स्वतंत्र होता है। 'स्व' मूल्याश्रित हो सकता है - मूल्य इस रूप में किसी के लिए भी अपनी अस्मिता, पहचान बना सके। यही वह जगह है, जहाँ से ब्रेख्त 'एपिक थियेटर' के माध्यम से अलगाव की प्रक्रिया को रेखांकित करता है और इस बात के लिए समझ बनाना चाहता है कि नाटक देखते वक्त क्यों जरूरी है कि नाटक से अलगाव महसूस किया जाए। इससे पहले कि हम बर्तोल्त ब्रेख्त के नाट्य-चिंतन में 'एलियनेशन थियरी' को विश्लेषित करें, हमें 'एपिक थियेटर' की 'परंपरागत थियेटर' से क्या भिन्नता रही है यह समझ लेना चाहिए। वस्तुत: यह भिन्नता 'एपिक थियेटर' को समझने का हमारा नजरिया और साफ करता है तो दूसरी और 'एलियनेशन थियरी' को समझने की पृष्ठभूमि की जानकारी देता है और आश्वस्त करता है कि यह 'थियरी' 'एपिक थियेटर' का एक औजार है - पूँजी-समय की आलोचना का एक रूप । बहरहाल, इस भिन्नता को एक स्पेक्टेटर के स्वर में कुछ इस प्रकार से ब्रेख्त ने स्पष्ट किया है --

The dramatic theater's spectator says : Yes, I have felt like that too - just like me- it's only natural--it'll never change-The sufferings of this man appall me, because they are inescapable-That's great art; it all seems the most obvious thing in the world - I weep when they weep, I laugh when they laugh.

The epic theatre's spectator says : I'd never have thought it - that's not the way - That's extraordinary it's hardly believable - It's got to stop-The sufferings of this man appal me, because they are unnecessary - That's great art, nothing obvious in it - I laugh when they weep, I weep when they laugh.

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि 'एपिक थियेटर' 'ड्रामेटिक थियेटर' से एकदम भिन्न है . दोनों में हँसने व रोने का समायोजन काफी दिलचस्प है . इस भिन्नता को हम इस तालिका से और अच्छी तरह से समझ सकते हैं :

 

ड्रामेटिक थियेटर

एपिक थियेटर

1.

इसमें कहानी के 'प्लॉट' की प्रधानता होती है।

इसमें प्रधानता कहानी के 'नैरेशन' की होती है

2.

इसमें 'स्पेक्टेटर' स्टेज की स्थिति के अनुसार ढल जाता है।

इसमें 'स्पेक्टेटर' एक 'आर्ब्जवर' के रूप में बदल जाता है

3.

यह संवेदना प्रदान करता है

 

यह निर्णय के लिए तैयार करता है

4.

इसमें पर्यवेक्षक शामिल हो जाता है

इसमें पर्यवेक्षक घटनाओं में शामिल न हो कर उन्हें चुनौती रूप में ग्रहण करता है।

5.

इसमें एक सलाह होती है

इसमें तर्क होता है

6.

इसमें 'स्पेक्टेटर' अपने अनुभव को बाँटता है

इसमें 'स्पेक्टेटर' अपने अनुभव की जाँच-पड़ताल करता है।

7.

इसमें बदलाव संभव नहीं होता है

यह बदलने योग्य होता है

8.

इसमें दर्शक की आँखें नाटक के अंत पर टिकी रहती हैं

इसमें आँखें मंच के हर कोने को 'आर्ब्जवर' करते है

9.

इसमें एक दृश्य दूसरें दृश्य का निर्माणकर्ता होता है

इसमें प्रत्येक दृश्य अपने आप में स्वतंत्र और पूर्ण होता है

10.

इसमें दृश्यों की वृद्धि होती है।

इसमें मोंताज होता है

11.

इसका विकास एकरेखीय ढंग से होता है

इसका विकास वक्र के रूप में होता है

12.

इसमें विचार अस्तित्व को निर्धारित करते हैं।

इसमें सामाजिक अस्तित्व विचार का निर्माण करते हैं

13.

इसमें एक विकासमूलक निश्चयात्मकता होती है

इसमें विकास एक छलाँग की तरह होता है

14.

इसमें दर्शक (व्यक्ति) एक निश्चित स्थान पर होता है।

इसमें व्यक्ति हमेशा एक प्रक्रिया में होता है।

उपर्युक्त तमाम विभिन्नताओं से स्पष्ट है कि 'एपिक थियेटर' अपने तर्कपूर्ण आग्रहों के साथ तत्कालीन समय की प्रचलित नाट्य -चिंतन पद्धति से एकदम भिन्न और लगभग उलट था। 'एपिक थियेटर' दर्शक को 'स्पेक्टेटर' और आगे चल कर उसे 'आर्ब्जवर' बनाता है। 'स्पेक्टेटर' व 'आर्ब्जवर' को हम ब्रेख्त के 'एलियेनेशन थियरी' से आसानी से समझ सकते है।

'एलियेनेशन थियरी' (अलगाव सिद्धांत ) दो महायुद्धों के बाद उत्पन्न मूल्य-संकट और एक आम व्यक्ति के लिए 'कोई जगह नहीं' कि धारणा से उत्पन्न 'अजनबीपन' के बोध से नहीं है और न ही अस्तित्ववादी चिंतन पद्धति (1935-1960) का वह कोई दार्शनिक आधार ग्रहण करता है। असल में, यह 'अलगाव सिद्धांत' बर्तोल्त ब्रेख्त के 'एपिक थियेटर' के संदर्भ में ही अपनी व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसलिए यह भाग नाट्य -चिंतन पद्धति के लिए एक विशिष्ट सिद्धांत है।

बर्तोल्त ब्रेख्त बीसवीं सदी का एक गंभीर लेकिन उतेजक नाटककार हैं। उसका संबध चीन की प्रसिद्ध नाट्य-परंपरा 'पेंकिग ऑपेरा' से रहा है। बर्तोल्त ब्रेख्त मॉस्को में 1935 में 'पेंकिग ऑपेरा' से जुड़े मी-लेन-फेंग

और उसकी कंपनी के साथ रह कर अभिनय के विविध आयामों को जाना। उन्होंने 1936 में एक निबंध 'एलियनेशन इफेक्ट इन चाइनीज एक्टिंग' नाम से लिखा। इसी निबंध में 'एलियनेशन इफेक्ट' पर विचार करने के अलावा इस बात को रेखांकित किया कि नाटक में क्रांतिकारी रूपरेखा को अभिव्यक्त करने की कितनी संभावनाएँ मौजूद हैं। ब्रेख्त ने इस पर भी विचार किया कि कोई दर्शक किसी नाटक को देखने के बाद किस तरह से और क्यों अपने समाज में एक निश्चित दिशा में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।

दरअसल, 'एपिक थियेटर' में वी-इफैक्ट

(v-effect) की अवधारणा नाटक के दृश्यों को तोड़ने (Breaking) से उपजती है। इसमें ब्रेख्त की यह अवधारणा रही है कि दर्शक, जो दर्शक नहीं एक 'पर्यवेक्षक' है, नाटक को देखते हुए नाटक की घटनाओं (दृश्यों) में शामिल हो कर उससे मंत्रमुग्ध न हो जाए, वह अपने 'स्व' को, अपने 'अस्तित्व' को उसमें एकाकार न करे बल्कि नाटक देखते हुए उसे बराबर एहसास रहे कि वह नाटक से अलग हो कर नाटक को देख रहा है - एक पर्यवेक्षक की भाँति एक अवलोकनकर्ता की भाँति। उसे यह भी स्मरण रखना चाहिए कि नाटक देखने के बाद उस पर बहस-विमर्श करना है, तर्क करना है, उस पर सवाल खड़े करना है, एवं उस पर विचार करना है। इसके लिए ब्रेख्त ने नाटक 'नैरेशन' के 'फॉर्म' पर विशेष ध्यान दिया। उसने नाटक के कथा-विन्यास को असंबद्ध दृश्यों के माध्यम से तोड़ा। वह कथा-प्रवाह को नैरंतर्य में नहीं चलाना चाहता, बल्कि उसे 'ब्रेक' कर पर्यवेक्षक में देखे गए दृश्यों के प्रति विचार उत्पन्न करना चाहता है। इस कारण से 'एपिक थियेटर' का हरएक दृश्य स्वयं में स्वतंत्र और पूर्ण होता है। यही वह भरत मुनि और अरस्तू के नाटकों के दर्शक से भिन्न किस्म का दर्शक उत्पन्न करना चाहता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि दर्शक पर्यवेक्षक के रूप में रूपायित हो जाए। वस्तुत: 'एलियनेशन इफेक्ट' मुख्य रूप से दर्शक पर विचार करता है 'एपिक थियेटर' कथा-विन्यास के 'नैरेशन फार्म' व उसके खंडन पर।

'एलियनेशन इफेक्ट' असल में एक सजग आलोचकीय अवलोकनकर्ता की सुदृढ़ दृष्टि बनने की प्रक्रिया को रेखांकित करता है। इस सुदृढ़ दृष्टि के लिए ब्रेख्त ने रंगमंच से 'फोर्थ वॉल' की अवधारणा को नकारा। 'चौथी दीवार' (रंगमंच पर सामने का पर्दा) वस्तुत: दर्शक और अभिनेता के बीच एक भ्रम जाल फैलाता है, वह दर्शक की वास्तविक दुनिया से अभिनेता की वास्तविक दुनिया को अलग करता है। ब्रेख्त इस दीवार को हटा कर अभिनेता की दुनिया की वास्तविक स्थिति को दर्शक के सामने लाना चाहता है जहाँ दर्शक अभिनेता के अभिनय एवं उसके द्वारा किए जा रहे अभिनय की तैयारी को देख सके। इसके पीछे ब्रेख्त का मंतव्य यह रहा है कि अभिनेता को हरदम एहसास रहे कि वह नाटक कर रहा है और लोग उसके अभिनय को देख रहे हैं। साथ ही, दर्शक सजगता से दखते हुए हरदम यह एहसास रखे कि वह एक रंगमंचीय घटनाओं को देख रहा है। अभिनेता 'स्व अस्तित्व' को अभिनेता के अस्तित्व से अलग हो कर अपनी पहचान रखे और दर्शक अभिनेता के अस्तित्व से स्वयं को पृथक रखे। दोनों में व्यक्तिगत सजगता अनिवार्य है। तात्पर्य यह कि ब्रेख्त ने 'एलियनेशन इफेक्ट' को नाटक के आवश्यक औजार के रूप में इस्तेमाल करने की वकालत की। वस्तुत: ब्रेख्त 'पेकिंग ऑपेरा' व अन्य नाट्य-परंपरा को देखते हुए यह गहरे स्तर तक समझा था कि नाटक को देखते हुए दर्शक 'हिपनोटाइज्ड' न हो जाए, बल्कि वह सजगता से एक 'ऑब्जर्वर' नाटक के नजदीक आते हुए उसे समझनेवाला, उस पर सवाल खड़े करनेवाला और उसका आलोचकीय विश्लेषण करनेवाला हो। ब्रेख्त ने इसके लिए विज्ञान का एक 'मेटाफर' ले कर इसे स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि 'Nobody can be a mathematician who takes it for granted that "two and two makes four", nor is anybody one who fails to understand it. The man who first looked with astonishment at a swinging lantern and instead of taking it for granted found it highly remarkable that it should swing, and swing in that particular way rather than any other, was brought close to understanding the phenomen on by this observation, and so to mastering it. Nor must it simply be exclaimed that the attitude here proposed is all right for science but not for art. Why shouldn't art try, by its own means of course, to further the great social task of mastering life?'

तात्पर्य यह कि ब्रेख्त की प्रस्तावना 'वी-इफैक्ट' में यह है कि आलोचकीय अवलोकन प्रक्रिया के द्वारा व्यापक पैमाने पर नाटक के बिंबों को मानव जीवन से जोड़ते हुए पुर्नमूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसके लिए ब्रेख्त ने इस बात की ओर संकेत किया कि उन्नीसवीं शताब्दी के पश्चिमी थियेटर के उस पद्धति को बदलना होगा जिसने कई वर्षों से दर्शक को एक निश्चित प्रकार से नाटक को देखने की दृष्टि और उसकी पद्धति को अपनी ताकत से स्थिर कर दिया है, दर्शक के सामान्य बोध को अपने कब्जे में कर लिया है। साथ ही नाटक को एक बुर्जुआ चौखटे में कैद कर लिया है। ब्रेख्त ने इस प्रकार के चौखटे से मुक्ति के लिए एक नवीन दृष्टिकोण अपनाया। वह दृष्टिकोण था - 'स्मोकर्स थियेटर' का।

स्मोकर्स थियेटर यह है

'स्मोकर्स थियेटर' की मूल अवधारणा दर्शक द्वारा सिगार पीते हुए बॉक्सिंग मैच को देखने के साथ विकसित हुआ। इसके द्वारा, जैसा कि ब्रेख्त का मानना था, दर्शक में अलगाव आलोचकीय दृष्टि आदि का विकास होगा जो तत्कालीन समय (अपने समय) के लिए जरूरी था। 'स्मोकर्स थियेटर' के निर्माण या संरचना के पीछे ब्रेख्त का एक अलग उद्देश्य था। उसका मंतव्य था कि दर्शक का सजग आलोचकीय दृष्टिकोण एक अलग तरह के 'मिडिल क्लास थियेटर' का निर्माण करेगा। यह थियेटर सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थिति का अपने समय में मानवीय परंपराओं और उसके क्रांतिकारी चुनौतियों से जोड़ कर देखने का आश्वासन ले कर निर्मित हुआ था। संभवत: इसी कारण ब्रेख्त का सिद्धांत अपने सौंदर्य निर्माण में जिस मॉडल को ग्रहण करता है वह सामाजिक कार्य प्रणाली के भीतर मजदूर परिषद के वास्तविक अंग से निर्मित हुआ है। सामुदायिक कार्य या 'सोशल प्रैक्टिस' के लिहाज से ब्रेख्त रेडियो, टेलिविजन और सिनेमा की ओर आकर्षित हुआ, क्योंकि यह अपने चरम विकास में उत्पादन की शक्ति के साथ सामुदायिक सेवा का एक महत्वपूर्ण प्रकार बनता है। इस संदर्भ में बर्तोल्त ने बहुत पहले कहा था कि सिनेमा के बदलने से लोग नहीं बदलेंगे, बल्कि लोगों का जीवन बदल जाए तो सिनेमा बदल जाएगा।

दरअसल, बर्तोल्त ब्रेख्त के नाट्य -चिंतन का सबसे बड़ा आधार लोगों की जीवन- पद्धति के बदलाव को ले कर रहा है। 'एपिक थियेटर' एवं 'एलियनेशन इफेक्ट' के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रेख्त के चिंतन के केंद्र में 'बुर्जुआ समाज' के बरक्स 'प्रोलेतरियत' की आवाज को नए संदर्भों में नई आवाज प्रदान करता था। इसके लिए उसने अपने नाटकों के अलावा छोटी-छोटी कहानियों व कविताओं को आधार बनाया। यदि हम इस आलेख के आरंभ की ओर लौटें, जहाँ हमने ब्रेख्त की कविता को उद्धृत करते हुए कहा था कि इस कविता के माध्यम से हमें कुछ सूत्र पकड़ में आएँगे जहाँ से उनके नाट्य -चिंतन संबंधी अवधरणा समझ में आएगी। उपर्युक्त समस्त विश्लेषणों से यह स्पष्ट है कि चाहे वह 'एपिक थियेटर' हो, 'एलियनेशन इफेक्ट' हो या 'स्मोकर्स थियेटर' सभी में दर्शक (आम व्यक्ति) की चिंताएँ ब्रेख्त के चिंतन में रीढ़ की तरह मौजूद है। मुझे कह लेने दीजिए (एक बार फिर से) कि इस चिंतन के पीछे बर्तोल्त ब्रेख्त की एक निश्चित राजनीतिक व वैचारिक दृष्टि थी - वह दृष्टि थी मार्क्सवाद की। 'एपिक थियेटर' व 'एलिएनेशन इफेक्ट' जैसे महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान के अलावा उसकी एक राजनैतिक आवाज भी थी - वह आवाज थी मार्क्सवाद की। दरअसल, पिछली सदी की तरह इस नई सदी में भी पूँजी की विचारधारा के विरुद्ध 'संघर्ष' को एक विचारधारा ( संघर्षवादी विचारधारा) के रूप में शक्तिशाली स्वरूप में रूपायित हो जाने की आवश्यकता है, जिसमें इस स्वर की गूँज हर बार और लगातार सुनाई पड़े कि

यह रोटी का टुकड़ा जो मेरे हिस्से है,

किसी भूखे का छीना हुआ कौर था...

( आभार : नाटक साहित्य का अध्ययन - ब्रैंडर मैथ्यू; पहल - 69 ; रंग-प्रसंग -11 का आभार)


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हिंदी समय में अमरेंद्र कुमार शर्मा की रचनाएँ