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कविता

ईश्वर
मिथिलेश श्रीवास्तव


ईश्वर वह दीवार कहाँ है
मैंने जहाँ पिछली दफा एक प्रार्थना लिखी थी
ईश्वर गाछ का वह तना कहाँ है
जहाँ मन्नतों के धागे मैंने बाँधे थे
आँखें मूँदे हाथ जोरे सिर झुकाए मैंने तुमसे क्या माँगा था
मुझे तो याद नहीं है तुम्हें याद हो तो देख लेना
मन्नतें पूरी होने लगती हैं तो
तुममें मेरी श्रद्धा अपार हो जाती है
इस गरीब देश में तुम्हारी बहुत जरूरत है
यह खापों पंचायतों कबीलों की दुनिया है
एक बाप अपनी बेटी की हत्या कर देता है
वह जब अपनी इच्छाओं के अनुरूप मन्नतें माँगती है
ईश्वर वह दीवार कहाँ है
मैंने जहाँ पिछली दफा एक प्रार्थना लिखी थी
देखना याद आए तो बताना
मेरी बेटी कहती है यहाँ
इतनी सारी दीवारें क्यों हैं
वह न कोई मन्नत माँगती है
न कोई प्रार्थना करती है
उसकी भी रक्षा करना ईश्वर |

 


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