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कविता

भड़ास
प्रदीप जिलवाने


आकाश में विस्तार बहुत है
और हमारी आँखें छोटी
हम आँखों का विस्तार चाहते हैं


हमारी हथेलियाँ भी हैं छोटी
और हम मुट्ठी में बंद इतिहास चाहते हैं

हम अपनी भड़ास में
सिर्फ अपने नाखून ही नहीं चबाते बल्कि
भविष्य की अशेष उम्मीदों को भी कुतर जाते हैं अक्सर

यह हमारी भड़ास ही होती है कि
हम पुतले दहाते हैं
गर फिर भी नहीं बुझती हमारी भड़ास
तो उन जले हुए पुतलों पर थूकते, मूतते
और हाय-हाय चिल्लाते हैं

हमने कई बार अपनी भड़ास
सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों तक पर उकेरी है
हम अपनी भड़ास को लेकर कई दफे भागे हैं खुद से

हमारी भड़ास
हमारे अंदर की खामोशी का ऐसा कोलाहल है
जो हमारे कान में
हलाहल घोलता रहता है निरंतर

हमारी भड़ास
हमारे भीतर पैठी अँधी काल-कोठरी है
जिसके अँधेरे में कई बार पनाहें ली हैं हमने और
खुद को भगोड़ा साबित होने से बचाया है

हमारी भड़ास
हमारे अंदर मैल की तरह जमी हुई उदासी है
जो बूँदों की नहीं, समंदरों की प्यासी है

 


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