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कहानी

बाबूलाल तेली की नाक
स्वयं प्रकाश


एक दिन एक अतिमहान देश के एक अतिसामान्य नागरिक श्री बाबूलाल तेली के साथ एक अजीब-सा हादसा हो गया। हुआ यह कि एक बलिष्ठ व्यक्ति ने बाबूलाल तेली की नाक पर खामखाँ एक जोरदार घूँसा जड़ दिया। बाबूलाल तेली उस व्यक्ति का जानते तक नहीं थे। यही उनके पिटने का कारण बना। बलिष्ठ व्यक्ति बीच सड़क पर एक टूटे-फूटे से अधेड़ आदमी को निर्दयता से पीट रहा था और भीड़ चुपचाप तमाशा देख रही थी। बाबूलाल तेली के मुँह से 'अरे-अरे' निकल गया और बस, बलिष्ठ व्यक्ति ने उनकी नाक पर जोरदार घूँसा जड़ दिया। बलिष्ठ व्यक्ति सोचता था, बाबूलाल तेली जैसे हर व्यक्ति को उसे जानना चाहिए और उससे डरना भी चाहिए। बाबूलाल तेली को बलिष्ठ व्यक्ति को इस महत्वाकांक्षा की जरा भी खबर होती तो उसे जानते ही नहीं, उससे डरने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती जहाँ इतने लोगों से डर रहे हैं, एक इनसे भी डर लेंगे, क्या फर्क पड़ता है। किसी को इसी में खुशी मिलती है तो अपना क्या जाता है बाबूलाल तेली की नाक पर जोरदार घूँसा जड़ने के बाद बलिष्ठ व्यक्ति अपने रास्ते चला गया। झगड़े की कोई गुंजाइश बनी ही नहीं। बनती भी तो बाबूलाल तेली क्या लड़ते। उन्होंने सोचा शुक्र है उनकी गर्दन ही नहीं दबा दी गई। शुक्र है एक घूँसे में ही बात खत्म हो गई। शुक्र है...।

लेकिन उनकी नाक से खून बह रहा था। कमीज खराब हो रही थीं कमीज खराब होते देख कर कमजोरी-सी महसूस होने लगी टाँगें काँपने लगीं।

पीड़ा और जलन की लहरें नाक से खोपड़ी तक दौड़ने लगीं। तमाम कोशिशों के बावजूद जब खून बंद नहीं हुआ तो हार कर बाबूलाल तेली ने सोचा - अस्पताल जाना ही पड़ेगा।

सामने ही एक विशाल और शानदार अस्पताल था जो एक बड़े सेठ ने अपनी दिवंगत सेठानी की याद में बनवाया था। लिखा न होता अस्पताल तो वह पाँच सितारा होटल लगता। बाबूलाल तेली शहर के एक सामान्य-से कार्यालय में एक सामान्य-से क्लर्क थे और मजाक की भाषा में कहा जाए तो यह अस्पताल उनके स्टैंडर्ड का नहीं था। पर इस समय अपने स्टैंडर्ड का अस्पताल ढूँढ़ने निकलना भी आसान नहीं था। वह पता नहीं कितनी दूर हो और इसी स्थिति में टैंपो-रिक्शावाले भी पता नहीं उन्हें बैठाएँ या नहीं। बाबूलाल तेली कोई पाँच मिनट तक असमंजस में पड़े रहे, फिर सोचा मुझे कौन सा ऑपरेशन करवाना है, मरहम-पट्टी ही तो करनी है, दस-बीस रुपए लग भी गए तो क्या हो गया? वैसे भी कभी अपने पर कुछ खर्च करता नहीं। गन्ने का रस तक नहीं पीता। चलो चलते हैं, जो होगी देखी जाएगी तो बाबूलाल तेली रूमाल से नाक पकड़े-पकड़े रिसेप्शन पर पहुँचे। रिसेप्शन पर कुछ टेलीफोन, एक कंप्यूटर और एक सुंदर-सी लड़की एक साथ कार्यरत थे।

बाबूलाल तेली की सारी बात धैर्यपूर्वक सुनने के बाद, और इस निमित्त बाबूलाल तेली के मन में अपार कृतज्ञता उपजाने के उपरांत लड़की ने मासूम परेशानी से पूछा - इज इट इमरजेंसी?

मैं नहीं जानता। बाबूलाल तेली ने जवाब दिया।

लड़की ने कृपापूर्वक स्वविवेक का प्रयोग किया, एक पर्ची काट कर दी और बोली -पाँचवाँ माला।

बाबूलाल तेली लिफ्ट की लाइन में खड़े हो गए।

पाँचवें माले पर इमरजेंसी थी। इमरजेंसी जमीनी माले पर भी थी, पर वह इमरजेंसी मरा चाहने वाले मरीजों के लिए थी, यह हमरजेंसी जिया चाहने वाले मरीजों के लिए।

पाँचवे माले के इमरजेंसी वालों ने दूर से ही बाबूलाल तेली को देख कर कहा - 'आठवाँ माला।' जैसे हकाल रहे हों।

आठवें माले पर ईएनटी इनडोर था। उन्होंने बाबूलाल तेली को सुन कर कहा - 'छौथा माला।'

चौथे माले पर ईएनटी आउटडोर था। उन्होंने बाबूलाल तेली को सूँघ कर कहा - 'सातवाँ माला।'

सातवें माले पर विशेषज्ञ था। उसने बाबूलाल तेली की नाक की सफाई करवाई और बोला - मैं नाक विशेषज्ञ हूँ। लेकिन मैं दाहिने नथुने का विशेषज्ञ हूँ। आपकी चोट बाएँ नथुने में हैं। बाएँ नथुने के जो विशेषज्ञ हैं वे विकासशील देशों के नाक संबंधी रोगों पर आयोजित एक सेमिनार में भाग लेने अमेरिका गए हैं। परसों तक आ जाएँगे। बेहतर है आप पल्ले रोज आ जाएँ।

पल्ले रोज फिर आना पड़ेगा? बाबूलाल तेली ने पूछा। वह इसके लिए तैयार नहीं थे।

हाँ, और इसमें लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

और मेरी नाक?

मीनवाइल... आप खून की जाँच, छाती का एक्स-रे और खोपड़ी का स्कैनिंग भी करवा लीजिए। बेहतर तो यह होगा कि एक बार ईसीजी भी करवा ही लें। मैं लिख देता हूँ।

लेकिन तक तब मेरी नाक?

उसकी फिलहाल ड्रेसिंग करवाए देते हैं। मैं लिख देता हूँ। बाजू की बिल्डिंग में चौथे माले पर हो जाएगी लेकिन पहले एचआईवी टेस्ट सर्टिफिकेट लाना होगा पैथेलॉजिकल लैब से।

सारा अस्पताल वातानुकूलित था। सारा काम कंप्यूटर से होता था। पान खाने और धूम्रपान की सख्त मनाही थी। मरीज काँच की दीवारों के पीछे जीवाणुमुक्त थे। सब कुछ अत्यंत आधुनिक और वैज्ञानिक था। ऐसा कि देख कर तबीयत खुश हो जाए। देश की प्रगति पर मन में वाह-वाह-सी होने लगे। पेट में खामखाँ राष्ट्रप्रेम की मरोड़ उठने लगे। लेकिन बाबूलाल तेली को ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह बुरी तरह थक और ऊब गए थे। लाऊंज में पड़े सोफे में धँस गए। खून अपने आप ही बंद हो चला था। साँस लेने के लिए मुँह खुला रखना पड़ता था। नाक से साँस लो तो खोपड़ी में बिजली दौड़ती थीं बाबूलाल तेली को प्यास भी लगी थीं पानी कहीं दिखता नहीं था।

हार कर वह बाहर निकलने को हुए। अपने आप ठीक हो जाएगा। घर जा कर आराम कर लेते हैं थोड़ा, बस।

रिसेप्शनवाली लड़की ने उन्हें जाते देखा तो एक आदमी भिजवा कर उन्हें बुलवाया और कंप्यूटर से बना एक सुंदर-सा बिल उन्हें पकड़ा दिया।

बिल की रकम देख कर बाबूलाल तेली के होश उड़ गए। जेबों की झड़ती हो गई। लगा जीवन में पहली बार इतनी बुरी तरह ठगे गए हैं।

बाहर निकले तो कुछ लट्ठमार किस्म के लोगों ने उन्हें सहानुभूतिपूर्वक घेर लिया। क्या हुआ?

कुछ नहीं। डॉक्टर नहीं है।

तकलीफ क्या है?

नाक फूट गई है?

आप हिंदू हैं?

बाबूलाल तेली को प्रश्न असंगत लगा। पर बहस करने की हिम्मत नहीं थीं बोले - हाँ। क्यों?

कौन जात?

फिर वही बेवकूफी बाबूलाल तेली को गुस्सा-सा आया। लेकिन चुपचाप अपनी जाति बता दी - तेली, बाबूलाल तेली।

आप ही हैं बाबूलाल तेली? अरे भई ये ही हैं। कोई बोला।

हम आपको ही ढूँढ़ रहे थे। हम लोग तेली समाज से आए हैं। देखिए बाबूलालजी, ऐसा है कि यह धाँधली कोई पहली बार आपके ही साथ नहीं हो रही है। ऐसा का ऐसा ही चार रोज पहले हुआ था। अपने समाज के एक भाई की टाँग टूट गई थी और वह भी गलती से यहीं आ गए थे, उनकी भी झड़ती करा ली गई थी और आखिर में कह दिया गया कि डॉक्टर नहीं है, सारी जाँच करा कर चार रोज बाद आइए। हो सकता है, वह बेचारे भी आज आएँ।

और यह धाँधली तभी खत्म होगी... दूसरा बोला... जब हमारा अलग अस्पताल होगा और उसमें हमारे समाज के डॉक्टर होंगे। और वह सिर्फ अपने समाज के लोगों के लिए होगा। ठीक है न? मानते हैं या नहीं।

आज हुलिया बताओ उस साले का... तीसरा बोला... जिसने आपकी ये हालत की है। उस साले को तो हम देख लेंगे। आपके ही हाथ से उसकी नाक पर घूँसा मरवाएँगे। पर पहले आपको हमारे साथ डॉ. लालूराम तेली के पास चलना होगा। अपने समाज का डॉक्टर है। वही आपकी नाक का सही इलाज करेगा।

बाबूलाल तेली चक्कर खा कर गिर पड़े। उनकी नाक से फिर खून बहने लगा। लट्ठमार किस्म के समाजसेवकों ने देर नहीं की। वे फौरन बाबूलाल तेली को उठा कर डॉ. लालूराम तेली के दवाखाने तक छोड़ आए।

डॉ. लालूराम सरकारी चिकित्सालय से सादर-साभार निलंबित हो कर अब अपना प्राइवेट क्लीनिक चला रहे थे। वे गॉज-रुई-पट्टी ही नहीं, दवाइयाँ तक अपने समाज के निर्माताओं-विक्रेताओं द्वारा दी हुई इस्तेमाल करते थे। यहाँ तक कि वह अकल भी अपनी ही इस्तेमाल करते थे।
डॉ. लालूराम ने बाबूलाल तेली के चेहरे को ध्यानपूर्वक मुआयना किया। बाबूलाल जी का चेहरा और खास कर उनकी रक्तरंजित नाक उन्हें इस कदर उत्तेजक, सेक्सी ओर आपरेशनीय लगी कि उन्होंने तुरत-फुरत बगैर एक्स-रे-ब्लड टेस्ट वगैरह का झंझट किए उनका आपरेशन करने का निर्णय कर लिया। खुद ही लोकल एनेस्थीसिया दिया और कार्रवाई चालू कर दी, नाक को काटा गया और 'ठीक' करके अंदर-बाहर से सी दिया गया और मरहम-पट्टी कर दी गई। दुर्भाग्य से वहाँ 'इनडोर' भी था और पैसे-वैसे पहले जमा करने की झंझट इसलिए नहीं थी कि मरीज अपने ही समाज का है भाग कर जाएगा कहाँ? घरवाले बेचारे पता लगाते-लगाते किसी तरह आए और तीमारदारी में जुट गए। दफ्तरवालों को पता चला तो दौड़े-दौड़े आए और बोले - कहाँ इस कसाई के यहाँ फँस गए? तुम्हें तो सरकारी अस्पताल जाना चाहिए था। पैसा जो भी खर्च होगा सरकार देगी। सरकारी नौकरी का यही तो फायदा है कि पूरे परिवार की हारी-बीमारी सरकारी जिम्मेदारी हो जाती है। चलो उठो। हम लिए चलते हैं।
एक-दो रोज और देख लेते हैं। बाबूलाल तेली ने कहा।

सहकर्मी उदास हो गए। देखो, कैसी मति मारी गई है। भला-बुरा तक अपना नहीं सोच पा रहा।

बात यह है... बाबूलाल जी बोले... मैं समाज को छोड़ कर नहीं चल सकता। अभी मुझे अपनी बेटियों की शादियाँ करनी हैं। नाक का क्या है। आज नहीं तो कल, ठीक हो जाएगी।

सहकर्मी चले गए।

तीसरे रोज बाबूलाल जी की हालत यह हो गई कि उन्हें न ठीक से सुनाई दे रहा था न दिखाई। नाक में मवाद पड़ गया था और चाय घुटकने में भी तकलीफ हो रही थीं। समाज के लोग देखने आ रहे थे।

आखिर सातवें रोज डॉक्टर लालूराम ने हाथ खड़े कर लिए। बोला - केस बिगड़ गया है। मरीज को फौरन बंबई ले जाना पड़ेगा।

यह नहीं कहा कि यहीं किसी और डॉक्टर या विशेषज्ञ को दिखा दो। कहा कि फौरन बंबई ले जाना पड़ेगा। समाज के लोगों ने सिर जोड़े। अब यह एक गंभीर समस्या थी। अब सवाल बाबूलाल तेली की नाक का नहीं, समाज की नाक का था। किसी ने इस बीच 'डॉक्टर की लापरवाही' शीर्षक से एक स्थानीय समाचारपत्र में खबर भी छपवा दी थी, जिससे डॉक्टर लालूराम भी परेशान जैसा दिखाई दे रहा था। शीघ्र कुछ करना जरूरी था।
तो समाज के लोगों ने बाबूलाल जी से कहा - तुम चिंता मत करो। तुम्हारी नाक अब तुम्हारी नाक नहीं, समाज की नाक है। चाहे जितना खर्च आए, समाज उसकी व्यवस्था करेगा। हम तुम्हारा अच्छे से अच्छा इलाज करवाएँगे। पर एक बात बताओ। हो तो तेली ही न? कोई और तो नहीं हो?

इस किस्म की सहानुभूति पा कर बाबूलाल तेली की हालत और बिगड़ गई।

समाज के लोगों ने चंदा किया और दो वॉलंटियरों के साथ बाबूलाल तेली को इलाज के लिए सपरिवार बंबई भिजवा दिया गया।

कोई महीने भर बाद बाबूलाल तेली बंबई से लौटे तो एकदम चंगे हो कर। बल्कि कुछ हट्टे-कट्टे भी हो कर। चलते-फिरते, खाते-पीते। बस, एक जरा-सी बात थी, सूखी-सड़ी, बासी पकौड़े जैसी, कैसी भी सही, जाते समय चेहरे पर एक नाक थीं, आते समय नहीं थीं उसे काट कर फेंक देना पडा था। नाक की जगह सिर्फ दो सूराख रह गए थे। बाबूलाल तेली को एक जुलूस के रूप में घर लाया गया। उनकी प्रशंसा में खूब अच्छी-अच्छी बातें की गई। सीमा पर जवान जिस तरह अपनी जान दे कर भी देश की आजादी की रक्षा करता है, भाई बाबूलालजी ने अपनी नाक दे कर समाज के लिए अद्भुत और अनुकरणीय त्याग का उदाहरण पेश किया है। समाज उनकी इस कुर्बानी को कभी नहीं भूलेगा। आदि-आदि। और बाबूलाल तेली घर में अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े सोच रहे थे - शुक्र है...!! शुक्र है उसने मेरी नाक पर ही घूँसा मारा।


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