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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


मियाँ आजाद मिरजा साहब के साथ जहाज की फिक्र में गए। इधर खोजी ने अफीम की चुस्की लगाई और पलंग पर दराज हुए। जैनब लौंडी जो बाहर आई, तो हजरत को पिनक में देख कर खूब खिलखिलाई और बेगम से जाकर बोली - बीबी, जरी परदे के पास आइए, तो लोट-लोट जाइए। मुआ खोजी अफीम खाए औंधे मुँह पड़ा हुआ है। जरी आइए तो सही। बेगम ने परदे के पास से झाँका; तो उनको एक दिल्लगी सूझी। झप से एक बत्ती बनाई और जैनब से कहा कि ले, चुपके से इनकी नाक में बत्ती कर। जैनब एक ही शरीर; बिस की गाँठ। वह जा कर बत्ती में तीता मिर्च लगा लाई और खोजी की खटिया के नीचे घुस कर मियाँ खोजी की नाक में आधी बत्ती दाखिल ही तो कर दी। उफ! इस वक्त मारे हँसी के लिखा नहीं जाता। खोजी जो कुलबुला कर उठे, तो आःछी, छीं-छीं, ओ गेद-अःछीः। ओ गीदी कहने को थे कि छींक ने जबान बंद कर दी। इत्तिफाक से पड़ोस में एक पुराने फैशन के भले आदमी नौकरी की तलाश में एक हाकिम के पास जानेवाले थे। वह जैसे ही सामने आए, वैसे ही खोजी ने छींका। बेचारे अंदर चले गए। पान खाया, जरा देर इधर-उधर टहले। फिर ड्योढ़ी तक पहुँचे कि छींक पड़ी। फिर अंदर गए। चिकनी डली खाई। रवाना होने ही को थे कि इधर आःछीं की आवाज आई और उधर बीवी ने लौंडी दौड़ायी कि चलिए, अंदर बुलाती हैं। अंदर जाके उन्होंने जूते बदले, पानी पिया और रुख्सत हुए। बाहर आ कर इक्के पर बैठने ही को थे कि खोजी ने नाक की दुनाली बंदूक से एक और फैर दाग दी। तब तो बहुत ही झल्लाए। हत तेरी नाक काटूँ और पाऊँ तो कान भी साफ कतर लूँ। मर्दक ने मिर्चों की नास ली है क्या? नाक, क्या नाक छीनकी की झाड़ी है। मनहूस ने घर से निकलना मुश्किल कर दिया। बीवी अंदर से बोली कि नाक ही कटे मुए की। जरी जैनब को बुला कर पूछो तो कि यह किस नकटे को बसाया है? अल्लाह करे, गधे की सवारी नसीब हो।

मियाँ-बीवी पानी पी-पी कर बेचारे को कोस रहे थे। उधर खोजी का छींकते-छींकते हुलिया बिगड़ रहा था। बेगम साहबा घर के अंदर हँसी के मारे लोटी पड़ती थीं। मगर वाह री जैनब! वह दम साधे अब तक चारपाई के नीचे दबकी पड़ी थी। मगर मारे हँसी के बुरा हाल था। जब छींकों का जोर जरा कम हुआ, तो उन्होंने गुल मचाया, ओ गीदी, भला बे बहुरूपिए, निकाली न कसर तूने! अच्छा बचा, चचा ही बना कर छोड़ूँ तो सही। चारपाई से उठे, मुँह-हाथ धोया। ठंडे-ठंडे पानी से खूब तरेड़े दिए; खोपड़ी पर खूब पानी डाला, तब जरा तसकीन हुई। बैठ कर बहुरूपिए को कोसने लगे - खुदा करे, साँप काटे मरदूद को। न जाने मेरे साथ क्या जिद पड़ गई है। कल तेरे छप्पर पर चिनगारी न रख दी, तो कहना।

यों कोसते हुए उन्होंने सब दरवाजे बंद कर लिए कि बहुरूपिया फिर न आ जाय। अब तो जैनब चकराई। कलेजा धक-धक करने लगा और करीब था कि चीख कर निकल भागे, मगर जब मियाँ खोजी चारपाई पर दराज हो गए और नाक पर हाथ रख लिया, तो जैनब की जान में जान आई। चुपके से खिसकती हुई निकली और अंदर भागी।

बेगम - जाओ, फिर नाक में बत्ती करो।

जैनब - ना बीबी, अब मैं नहीं जाने की। सिड़ी-सौदाई आदमी के मुँह कौन लगे।

जैनब का देवर दस बरस का छोकड़ा बड़ा ही शरीर था। नस-नस में शरारत भरी हुई थी। कमरे में जाके झाँका, तो देखा, हजरत पिनक ले रहे हैं। कुत्ता घर में बँधा था। झट उसको जंजीर से खोल जंजीर में रस्सी बाँधी और बाहर ले जा कर चारपाई के पाए में कुत्ते को बाँध दिया। खोजी की टाँग में भी वही रस्सी बाँध दी और चंपत हो गया। कुत्ते ने जो भूँकना शुरू किया, तो खोजी चौक कर उठे। देखते हैं तो टाँग में रस्सी और रस्सी में कुत्ता। अब इधर खोजी चिल्लाते हैं, उधर कुत्ता चिल्ल-पों मचाता है। जैनब दौड़ी हुई घर में से आई। खैर तो है! क्या हुआ? अरे, तुम्हारी टाँग में कुत्ता कौन बाँध गया?

खोजी - यह उसी बहुरूपिए मर्दक का काम है, किसी और को क्या पड़ी थी?

जैनब - मगर, मुआ आया किधर से? किवाड़े तो सब बंद पड़े हुए हैं।

खोजी - यही तो मुझे भी हैरत है। मगर अब की मैंने भी नाक पर इस जोर से हाथ रखा कि बहुरूपिया भी मेरा लोहा मान गया होगा। मगर यह तो सोचो कि आया किस तरफ से?

जैनब - मियाँ, कहते डर मालूम होता है। इस जगह एक शैतान रहता है।

खोजी - शैतान! अजी नहीं, यह उस बहुरूपिए ही का काम है।

जैनब - अब तुम यों थोड़े ही मानोगे। एक दिन शैतान चारपाई उलट देगा, तो मालूम होगा।

खोजी - यह बात थी, तो अब तक हमसे क्यों न कहा भला! जान लोगी किसी की?

जैनब - मैं भी कहूँ कि बंद दरवाजे से कुत्ता आया कैसे? मेरा माथा ठनका था, मुदा बोली नहीं।

खोजी - अब आजाद आए, तो उनको आड़े हाथों लूँ। वह भूत चुड़ैल एक के भी कायल नहीं। सोएँ तो मालूम हो।

खोजी तो इसी फिक्र में बैठे-बैठे पिनक लेने लगे। आजाद और मिरजा साहब आए, तो उनहें ऊँघते देख कर दोनों हँस पड़े।

आजाद - (खोजी के कान में) क्या पहुँच गए?

खोजी ने हाँक लगाई - 'बहुरूपिया, बहुरूपिया', और इस जोर से आजाद का हाथ पकड़ लिया कि अपने हिसाब चोर को गिरफ्तार किया था। आँखें तो हजरत की बंद है, मगर बहुरूपिया बहुरूपिया गुल मचाते जाते हैं। मियाँ आजाद ने इस जोर से झटका दिया कि हाथ छूट गया और खोजी फट से मुँह के बल जमीन पर आ रहे। आजाद ने गुल मचाया कि भागा, भागा, वह बहुरूपिया भागा जाता हे। खोजी भी 'लेना-लेना' कहते हुए लपके। दस ही पाँच कदम चल कर आप हाँफ गए और बोले - 'निकल गया, निकल गया।' मैंने तो गर्दन नापी थी, मगर नाली बीच में आ गई इससे बच गया, वर्ना पकड़ ही लेता।

आजाद - अजी, मैं तो देख ही रहा था कि आप बहुरूपिए के कल्ले तक पहुँच गए थे।

इतने में एक काजी साहब मियाँ आजाद से मिलने आए। आजाद ने नाम पूछा, तो बोले - अब्दुल कुद्दूस।

खोजी - क्या! उस्तु खुद्दूस! यह नई गढ़त का नाम है।

आजाद - निहायत गुस्ताख आदमी हो तुम। बस, चोंच सँभालो।

खोजी की आँखें बंद थीं। जब आजाद ने डाँट बताई तो आपने आँखें खोल दीं। काजी साहब पर नजऱ पड़ी। देखते ही आग हो गए और बकने लगे - और देखिएगा जरी, मरदूद आज मौलाना बन कर आया है। भई, गिरगिट के से रंग बदलता है। उस दिन घसियारा बना था; आज मौलवी बन बैठा।

काजी साहब बहुत झेंपे। मगर आजाद ने कहा कि जनाब, यह दीवाना है। यों ही ऊलजलूल बका करता है।

जब काजी साहब चले गए, तब आजाद ने खोजी को खूब ललकारा - नामाकूल! बिना देखे-भाले, बेसमझे-बूझे, जो चाहता है, बक देता है। कुछ पढ़े-लिखे होते, तो आदमियों की कद्र करते। लिखे न पढ़े, नाम मुहम्मद फाजिल।

खोजी - जी हाँ, बस, अब आप ही बड़े लुकमान बने हैं। हमको यह समझाते हैं कि कोई गधा है। और यहाँ अरबी चाटे बैठे हैं। अफआल, फालुआ मा फालअत। और सुनिए -गल्लम्, गल्लमा, गल्लूम।

मिरजा - यह कौन सीगा है भाई?

खोजी - जी, यह सीगा अल्लम-गल्लम है। यहाँ दीवान के दीवान जबान पर हैं। मगर मुफ्त की शेखी जताने से क्या फायदा!

मिरजा साहब के घर के सामने एक तालाब था। खोजी अभी अपने कमाल की डींग मार ही रहे थे कि शोर मचा - एक लड़का डूब गया। दौड़ो, दौड़ो। पैराक अपने करतब दिखाने लगे। कोई पुल पर से कूदा धम। कोई चबूतरे से आया तड़। कोई मल्लाही चीरता है, कोई खड़ी लगा रहा है। नौसिखिये अपने किनारे ही पर हाथ पाँव मारते हैं, और डरपोक आदमी तो दूर से ही सैर देख रहे हैं। भई, पानी और आग से जोर नहीं चलता, इनसे दूर ही रहना चाहिए।

आजाद ने जो शोर सुना तो दौड़े हुए पुल पर आए और धम से कूद पड़े। गोता लगाते ही उस लड़के का हाथ मिल गया। निकाल कर किनारे लाए, तो देखा, जान बाकी है। लोगों ने मिल कर उसको उलटा लटकाया। जब पानी निकल गया, तो लड़के को होश आया।

अब सुनिए कि वह लड़का बंबई के एक पारसी रईस रुस्तम जी का एकलौता लड़का था। अभी आजाद लड़के को होश में लाने की फिक्र ही कर रहे थे कि किसी ने जाकर रुस्तम जी को यह खबर सुनाई। बेचारे दौड़े आए और आजाद को गले से लगा लिया।

रुस्तम - आपने अपने लड़के को डूबने से बचाया। बंदा आपका बहुत शुक्रगुजार है।

आजाद - अगर आपस में इतनी हमदर्दी भी न हो, तो आदमी ही क्या?

खोजी - सच है, सच है। हम ऐसे शेरों के तुम ऐसे शेर ही होते हैं। मैं भी अगर यहाँ होता, तो जरूर कूद पड़ता। मगर यार, अब दुआ माँगनी पड़ी कि यह मोटी तोंदवाला भी किसी दिन गोता खाय, तो फिर यारों के गहरे हैं।

आजाद - (पारसी से) मैं बड़े मौके से पहुँच गया!

रुस्तम - अपने को बड़ी खुशी का बातचीत।

खोजी - कुछ उल्लू का पट्ठा मालूम होता है।

रुस्तम - काल आप आवे, तो हमारा लेडी लोग आपको गाना सुनावें।

खोजी - अजी, क्या बेवक्त की शहनाई बजाते हो? अजी, कुछ अफीम घोलो, चुस्की लगाओ, मिठाई मँगवाओ। रईस की दुम बने हैं।

आजाद - कल मैं जरूर आऊँगा।

रईस - आप तो अपना का बाप है।

खोजी - बल्कि दादा। खूब पहचाना, वाह पट्ठे!

रुस्तम जी आजाद से यह वादा ले कर चले गए, तो खोजी और आजाद भी घर आए। शाम को रुस्तम जी ने पाँच हजार रुपयों की एक थैली आजाद के पास भेजी और खत में लिखा कि आप इसे जरूर कबूल करें। मगर आजाद ने शुक्रिये के साथ लौटा दिया।


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