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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


मियाँ खोजी पंद्रह रोज में खासे टाँठे हो गए, तो कांसल से जा कर कहा - मुझे आजाद के पास भेज दिया जाय। कांसल ने उनकी दरख्वास्त मंजूर कर ली। दूसरे दिन खोजी जहाज पर बैठ कर कुस्तुनतुनियाँ चले। उधर मियाँ आजाद अभी तक कैदखाने में ही थे। हमीदपाशा ने उनके बारे में खूब तहकीकात की थी, और गो उन्हें इतमिनान हो गया था कि आजाद रूसी जासूस नहीं हैं, फिर भी अब तक आजाद रिहा न हुए थे।

एक दिन मियाँ आजाद कैदखाने में बैठे हुए थे कि एक फ्रांसीसी कैदी आया। उस पर भी जासूसी का इल्जाम था। आजाद ने पूछा - आपने अपनी सफाई नहीं पेश की?

फ्रांसीसी - अंधेर है, अंधेर? मैं तो इन तुर्कों का जानी दुश्मन हूँ।

आजाद - मुझे यह सुन कर अफसोस हुआ। मैं तो तुर्कों का आशिक हूँ। ऐसी दिलेर कौम दुनिया में नहीं है।

फ्रांसीसी - अभी आप इन लोगों को अच्छी तरह नहीं जानते। आप ही को बेवजह कैद कर लिया।

आजाद - लड़ाई के दिनों में सभी जगह ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं।

फ्रांसीसी - आप रूसी जबान नहीं जानते?

आजाद - बिलकुल नहीं।

फ्रांसीसी - रूस की सरकार ने बहुत मजबूर हो कर लड़ाई की है।

आजाद - मैं तो समझता हूँ, रूसवालों की ज्यादती है, सारा यूरोप टर्की का दुश्मन है।

इस तरह की बातें करके फ्रांसीसी चला गया और दूसरे ही दिन मियाँ आजाद आजाद कर दिए गए। यह कैदी फ्रांसीसी न था, हमीदपाशा ने एक तुर्की अफसर को आजाद के दिल का भेद लेने के लिए भेजा था।

शाम का वक्त था, आजाद बैठे हुए मीडा से बातें कर रहे थे कि एक आदमी ने आ कर कहा - हुजूर, एक नाटा सा आदमी बाहर खड़ा है, और कहता है कि हमें कोठी के अंदर जाने दो। आजाद ने कहा - आने दो। एक मिनट में मियाँ खोजी आ कर खड़े हो गए। आजाद ने दौड़ कर उन्हें गले लगा लिया और खैर-आफियत पूछने के बाद अपनी राम कहानी सुनाई। मियाँ खोजी ने, जब आजाद के कैद होने का हाल सुना, तो बिगड़ कर बोले - खुदा ने चाहा, तो हम तुम्हारा बदला लेंगे। खड़े-खड़े बदला न ले लें, तो नाम नहीं!

आजाद - खैर, अब इसका अफसोस न कीजिए। मिस मीडा अभी आती होंगी, जरा उनके सामने बेहूदगी न कीजिएगा।

खोजी - भई, अभी उन्हें मत आने दो। जरा हम बन-ठन लें। अफसोस यही है कि हमारे पास करौली नहीं। बे करौली के हमसे कुछ न हो सकेगगा।

आजाद - क्या उनसे लड़िएगा?

खोजी - नहीं साहब, लड़ना कैसा! बे करौली के जोबन नहीं आता। आप ये बातें क्या जानें।

इतने में मिस मीडा दूसरे कमरे से निकल आईं। खोजी ने अपना ठाट बनाने के लिए मेज पर का कपड़ा ओढ़ लिया, तौलिया सिर में बाँधा और एक छुरी हाथ में ले कर मीडा की तरफ घूरने लगे! मीडा ने जो उनकी सूरत देखी, तो मुसकिरा दी। खोजी खिल गए। आजाद से बोले - क्यों आजाद, सच कहना, मुझे देखते ही कैसा खिल गईं! मीडा ने आजाद से पूछा - यह कौन आदमी है?

आजाद - एक पागल है। इसको यह खब्त है कि जो औरत इसे देखती है, रीझ जाती है। तुम जरा इसको बनाओ।

मीडा ने खोजी को इशारे से करीब बुलाया। आप जा कर एक कुर्सी पर डट गए।

मीड़ा - (हाथ में हाथ दे कर) आपका नाम क्या है?

खोजी - (आजाद से) मुझे समझाते जाओ जी!

आजाद ने दुभाषिये का काम करना शुरू किया। मीडा जो कहती थी, उनको समझाते थे, और वह जो कुछ कहते थे, इसे समझाते थे।

मीडा - कल आपकी दावत है। आप शराब पीते हैं?

खोजी - हाँ - नहीं। मगर अच्छा; नहीं-नहीं। कह दो अफीम पीता हूँ।

मीडा - यह आपका गुलाब सा चेहरा कुम्हला जायगा!

खोजी ने अकड़ कर आजाद की तरफ देखा।

मीडा - आप कुछ गाना भी जानते हैं।

खोजी - हाँ, और नाचना भी जानता हूँ।

मीडा - अहो-हो, तो फिर नाचो।

खोजी ने नाचना शुरू किया। अब मीडा हँसने लगी, तो आप और भी फूल गए। थोड़ी देर में मीडा होटल से चली गई। तब आजाद ने कहा - भई खोजी, यह बात अच्छी नहीं। मैं तुमको ऐसा नहीं जानता था।

खोजी - तो मैं क्या करूँ? जब वह खुद ही मेरे पीछे, पड़ी हुई है, तो रुखाई करना भी तो अच्छा नहीं मालूम होता।

थोड़ी देर में मीडा का खत आया। आजाद ने कहा - जनाब ख्वाजा साहब, हमको तो जरा खत दिखाना।

खोजी - बस, बस, चलिए, अलग हटिए।

आजाद - लाओ, हम पढ़ दें। तुमसे भला क्या पढ़ा जायगा?

खोजी - अजब आदमी हैं आप! आप कहाँ के ऐसे बड़े आलिम हैं!

खोजी ने खत को तीन बार चूमा और आजाद को अलग बुला कर पढ़ने को दिया। लिखा था -

'मेरे प्यारे जवान, तुम्हारी एक-एक अदा ने मेरे दिल में जगह कर ली है। तुम्हारी सारस की सी गर्दन और बंदर की सी हरकतें जब याद आती हैं, तो मैं उछल-उछल पड़ती हूँ। अब यह बताओ कि आज किस वक्त आओगे? यह खत अपने दोस्त आजाद को न दिखाना और वादे पर जरूर आना।'

खोजी - यार, तुम्हें तो सब हाल मालूम हो गया, मगर उससे कह न देना।

आजाद - मैं तो जा कर शिकायत करूँगा कि हमसे छिपाया क्यों? अभी-अभी खत भेजता हूँ।

खोजी - खैर, जाइए, कह दीजिए। वह हम पर आशिक हैं। तुम ऐसे हजार लगी-लिपटी बातें करें, होता क्या है। आपकी हकीकत ही क्या है!

आजाद - यार, अब तुम्हारे साथ न रहेंगे।

खोजी - आखिर, सबब बताइए।

आजाद - गजब खुदा का! मीडा सी माहरू और हमारे सामने तुम्हें यह खत लिखे।

खोजी खिलखिला कर हँस पड़े। बोले - यह बात है? हम जवान ही ऐसे हैं, इसको कोई क्या करे। लेकिन अगर तुम खिलाफ हो गए, तो वल्लाह, मैं मीडा से बात तक न करूँगा। मुझे जान से भी ज्यादा प्यारे हो। कसम खुदा की, अब दुनिया में तुम्हारे सिवा मेरा और कोई नहीं। बस फकत तुम! और हम तो बूढ़े हुए। यह भी मिस मीडा की मेहरबानी है। अजी, मिसर में तो तुम न थे। वहाँ पर भी एक औरत मुझ पर आशिक हो गई थी! मगर खराबी यह थी कि न हम उसकी बात समझें, न वह हमारी! हाँ इशारों में खूब बातें हुई।

अच्छा, फिर एक हज्जाम तो बुलाओ। आज जाना है न!

आजाद ने एक हज्जाम बुलवाया। हजामत बनने लगी।

खोजी - घोटो, घोटो। घोटे जा। अभी खूँटी बाकी हैं। खूब घोटो।

हज्जाम ने फिर छुरा फेरा। खोजी ने फिर टटोल कर कहा - अभी खूँटी बाकी है, घोटो।

हज्जाम - तो हुजूर, कब तक घोटा करूँ!

खोजी - दूने पैसे देंगे हम।

हज्जाम - माना, मगर कोई हद भी है?

खोजी- तुमको इससे क्या मतलब!

हज्जाम - खून निकलने लगेगा।

आजाद - और अच्छा है; लोग कहेंगे, नौसा के चेहर से खून बरसता है।

खोजी - हाँ, खूब सोची।

हज्जाम - (किसबत सँभाल कर) अब किसी और नाई से घुटवाइए।

आजाद - अच्छा, पट्टे तो कतरते जाओ।

हज्जाम ने झल्ला कर आधे बाल करत डाले। एक तरफ की आधी मूँछ उड़ा दी। खोजी एक तो यों ही बड़े हसीन थे, अब हज्जाम ने बाल कतर कर और भी ठीक बना दिया। खोजी ने जो आईने में अपनी सूरत देखी, तो मूँछें नदारद। झल्ला कर कहा - ओ गीदी, यह क्या किया? हज्जाम डरा कि कहीं यह साहब मार न बैठें।

आजाद - क्यों, क्यों खफा हो गए भई!

खोजी - इसने पट्टे ऊल-जलूल करते, और आप बोले तक नहीं?

आजाद - मैं सच कहता हूँ, आप इतने हसीन कभी न थे।

खोजी - और चेहरे की तो फिक्र करो!

आजाद - हाँ, हाँ, घबराते क्यों हो?

खोजी - हमको याद आता है कि नौशा के सामने छोटे-छोटे लड़के गजलें पढ़ते हैं। दो-एक लौंडे बुलवा लीजिए, तो उनको गजलें रटा दें।

आजाद ने दो लड़के बुलवाए, और मियाँ, खोजी उनको गजलें याद कराने लगे। एक गजल मियाँ आजाद ने यह बतलाई -

भला यह तो बताओ कि यह कौन बशर है;

सब सूरते लंगूर, फकत दुम की कसर है।

खोजी - चलिए, बस अब दिल्लगी रहने दीजिए। वाह, अच्छे मिले!

आजाद - अच्छा, और गजल लिखवाए देता हूँ -

फुगाँ है, आह है, नाला है, बेकरारी है;

फिराके-यार में हालत अजब हमारी है।

खोजी - वाह, शादी को इस शेर से क्या वास्ता!

आजाद - अच्छा साहब, गजल याद करवा दीजिए

कहा था बुलबुल से हाल मैंने

तेरे सितम का बहुत छिपा कर;

यह किसने उनको खबर सुनाई

कि हँस पड़े फूल खिलखिला कर।

मेरे जनाजे को उनके कूचे में

नाहक अहबाब लेके आए;

निगाहे-हसरत से देखते हैं।

वह रुख से परदा उठा-उठा कर।

खोजी - वाह, जनाजे को शादी से क्या मतलब है भला!

आजाद - ऊपरवाला शेर पसंद है?

खोजी - हाँ, हँसना और खिलखिलाना, ऐसे लफ्ज हों, तो क्या पूछना!

आजाद - अच्छा, और सुनिए।

खोजी - नहीं, इतना ही काफी है। जरा बाजेवालों की तो फिक्र कीजिए। हाथी, घोड़े, पालकी, सभी चाहिए। मगर हमारे लिए जो घोड़ा मँगवाइएगा, वह जरा सीधा हो।

आजाद - भला, घोड़ा न मिले, तो खच्चर हो तो कैसा?

खोजी - वाह, आपने मुझे कोई गधा समझा है?

इतने में होटल का मैनेजर आ गया और यह तैयारियाँ देख कर हँसने लगा।

खोजी - क्यों साहब, यह आप हँसे क्यों?

मैनेजर - जनाब, यहाँ शरीफ लोग शादियों में बाजे-गाजे नहीं ले जाते; और पैदल ही जाते हैं। हाँ एक बात हो सकती है, दस-पाँच आदमियों को थालियाँ दे दीजिए, बाँस की खपाचों से उन्हें बजाते जायँ। आवाज की आवाज और बाजे का बाजा।

खोजी - भई आजाद, सोच लो।

आजाद - वह जब यहाँ दस्तूर ही नहीं, तो फिर क्या किया जायगा? हाँ, नौशे का पैदल जाना जरा बदनामी की बात है।

मैनेजर - तो पैदल न जाइए। जिस तरह यहाँ के रईस लोग जाते हैं, उस तरह जाइए - आदमी की गोद में।

खोजी - मंजूर। मगर हमको उठा सकेगा कोई?

मैनेजर - हम इसका बंदोबस्त कर देंगे। आप घबराए नहीं।

दो घड़ी दिन रहे खोजी की बरात चली। तीन मजदूर आगे-आगे थालियाँ बजाते जाते हैं, दो लौंडे आगे पीछे साथ। खोजी एक मजदूर की गोद में, गेरुए कपड़े पहने, अकड़े बैठे हैं। एकाएक आप बोले - अरे रे रे रोक लो बरात। रोक लो। पंशाखेवाले कहाँ हैं? कोई बोलता ही नहीं। परदेश में भी इनसान पर क्या मुसीबत पड़ती है? अब मैं दूल्हा बन कर रहूँ, या इंतजाम करूँ! ये दोनों गीदी तो निरे जाँगलू ही निकले। फिर याद आया कि निशान का हाथी तो है ही नहीं। अरे! करौली भी नहीं। हुक्म दिया कि लौटा दो बरात। चलो होटल में।

आजाद - यह क्यों भई? क्या बात है? लौटे क्यों जाते हो?

खोजी - निशान का हाथी तो है ही नहीं।

आजाद - अजब आदमी हो भई, आप लड़ने जाते हैं, या शादी करने? और फिर यहाँ हाथी कहाँ? कहिए तो खच्चर पर एक झंडी रखवा दें।

इतने में मिस मीडा आती हुई दिखाई दीं। खोजी उन्हें देखते ही और भी अकड़ गए। क्या कहूँ, मेरे साथ के आदमी सब गोली मार देने लायक हैं। कोई इंतजाम ही न किया।

मीडा - खैर, कल आ जाइएगा। मगर आप से एक बात कहनी है। यहाँ एक रूसी बहुत दिनों से मेरा आशिक है। पहले उससे लड़ो, फिर हमारे साथ शादी हो।

खोजी - मजाल है उसकी कि मेरे सामने खड़ा हो जाय? हम पचास आदमियों से अकेले लड़ सकते हैं। अब बरात होटल पहुँची, तो मीडा ने कहा - तो उनसे कब लड़िएगा?

खोजी - जब कहिए। खून पी जाऊँगा।

मीडा - अच्छा, कल तैयार रहिएगा।

दूसरे दिन मीडा ने एक तुर्की पहलवान को ला कर होटल में बिठा दिया और खोजी से बोली - लीजिए, आपका दुश्मन आ गया। खोजी ने जब उसे देखा, तो होश उड़ गए। दुनिया भर के आदमियों से दो मुट्ठी ऊँचा। दिल में सोचने लगे, यह तो कच्चा ही खा जायगा। एक चपत दे, तो हम जमीन में धँस जायँ। इससे लड़ेगा कौन भला? मारे डर के जरा पीछे हट गए। मीडा ने कहा - आप तो अभी से डरने लगे। खोजी एकाएक धड़ाम से गिर पड़े और चिल्लाने लगे - इस तरह का दर्द हो रहा है कि कुछ न पूछो। अफसोस, दिल की दिल ही में रह गई! वल्लाह, वह पटकनी देता कि कमर टूट जाती। मगर खुदा को मंजूर न था। तुर्की पहलवान ने इनका हाथ पकड़ कर एक झटका दिया, तो दस कदम पर जा गिरे। बोले - ओ गीदी, जरा बीमार हो गया हूँ, नहीं तो कच्चा ही खा जाता, नमक भी न माँगता।

आखिर इस बात पर फैसला हुआ कि जब खोजी अच्छे हो जायँ, तो फिर किसी दिन कुश्ती हो।


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