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निबंध

‘मैंने मैं शैली अपनाई...’
कविता


बात अपनी एक कहानी की कुछ पंक्तियों से ही शुरू करती हूँ -

'कुछ अपना बिल्कुल अपना रचने का अहसास औरतों के मन में रचता है एक घर। घर एक सपना है औरतों की नींद में बचपन से सुगबुगाता, डग भरता, ढहता, टूट जाता। उसने बड़ी दी की डायरी में लिखा देखा था कभी... बड़ी दी के सपनों का घर कहीं गुम हो गया था। वही बड़ी दी जो शादी के पहले बड़े ही सुर में गुनगुनाती थी - जिंदगी, मेरे घर आना... मेरे घर आना जिंदगी...' (आ-शियाना)

अपनी जिंदगी में जिन्हें सबसे करीब से देखा जाना वे मेरे परिवार और आसपास की स्त्रियाँ थीं; शायद खुद को भी जानूँ-समझूँ उससे भी पहले से। उनके छोटे-छोटे सुख उनके बड़े-बड़े दुख, उनकी पीड़ा, उनकी चाहना, उनके सपने और उनके सपनों का कुचला जाना भी।

पुरुष तो जो होते थे, शाम-सुबह घर में आए, दिखे फिर गायब। और जब तक घर में उपस्थित हैं घर भर के आकर्षण और ध्यान के केंद्रबिंदु बने हैं... उन्हें किसी चीज की जरूरत तो नहीं... उनके मन लायक खाना तो बना... उनके आसपास शोर गुल न करने की हिदायतें... आदि-आदि। उन्हें करीब से जानने-समझने का मौका ही कहाँ था।

पर आसपास स्त्रियाँ थीं और भरपूर थीं। खुद अपने ही घर में एक विधवा माँ, चार बड़ी बहनें और आसपास भी इसी तादाद में इसी तरह के परिवार। स्त्रियाँ थीं तो कहानियाँ भी थीं; न सिर्फ उनके द्वारा कही जाने वाली बल्कि खुद उनकी कहानियाँ भी।

मेरी शुरूआती लगभग सभी कहानियाँ मैं शैली में लिखी गई हैं। जाहिर है इन कहानियों में मैं हूँ, और मेरा जीवन भी... और वे कहानियाँ नहीं हुई होती अगर मैं स्त्री नहीं होती।

लिखना मेरे लिए एक यातना है, अपने को पाने की बेचैनी, उसे पकड़ पाने की विकलता। यथार्थ के प्रति आग्रह, जो बचपन से ही मेरी बुनावट मे घुला हुआ है शायद और जिसमें वक्त के साथ आदर्श भी आ मिला है, मेरी कहानियों के शिल्प के आड़े आता रहा है। अधिकतर 'मैं' आकर घेर लेता है मेरी बृहत्तता। 'मैं' मुझे सीमाओं में बाँध देता है। 'मैं' के बिना मैं अवरोध रहित होती पर 'मैं' मेरे लिए एक चुनौती है। अपने को उघाड़ना, अपनी परतें खोलना ज्यादा दुसाध्य है। 'मैं' मेरे लेखन पर इल्जाम भी बना रहा। पर मैने इस मैं को बार-बार खुरचा, परखा, रचा और पुनर्सृजित किया है समाज की एक इकाई के रूप में, अपनी पीढ़ी के एक व्यक्ति के रूप में, आधी आबादी और उसके अनचीन्हे-अजाने पीड़ाओं की अभिव्यक्ति के रूप में। और इस क्रम में कई बार दूसरों के अनुभवों को भी मैं पहले 'मैं' की कसौटी पर परखती हूँ; एक लेखक के रूप में, उससे भी ज्यादा एक स्त्री के रूप में।

कविताएँ छोड़कर जब कहानियाँ लिखनी शुरुआत की निजी तौर पर बहुत उथल-पुथल का समय था। अपना शहर, अपना घर, अपने लोग सब छोड़कर आ चुकी थी; अपना परिवार भी... जिंदगी अपने दम पर चुनने का कोई जुनून था। पीछे छूटी लड़कियों और औरतों में से एक होना या बनना नहीं चाहती थी मैं। पर यह इतना आसान भी तो नहीं था। आर्थिक समजिक और पारिवारिक कारणों के मद्देनजर बाहर निकलने, पढ़ने जाने की बात हर सिरे से मुश्किल थी। पर कुछ आसन सा करने का शौक भी तो नहीं था। एक परीक्षा देने दिल्ली आई फिर लौटी ही नहीं। राकेश वहाँ पहले से थे। हमने साथ-साथ रहना शुरू किया; पर वैसा भी कोई साथ नहीं। कई लोग मिल कर हम एक फ्लैट शेयर करते थे, जिसमें लड़की सिर्फ मैं। आरंभिक चिंता पहचान बनाने से ज्यादा कुछ पैसे कमा कर लाने की थी। कला, साहित्य, स्त्री और समसामयिक मुद्दों पर लिखे अखबारी लेखों ने रहने-खाने लायक पैसे दिए और धीरे-धीरे एक पहचान भी। आर्थिक दिक्कतें धीरे-धीरे ठीक हो रही थीं पर मेरी दुश्चिंताएँ दूसरी थीं। लगातार दवाब बनाता परिवार, अपने भीतर के आदिम और थोपे हुए संस्कारगत भय और कुछ हद तक सामाजिक मजबूरियाँ भी। मै लड़ रही थी लागातार अपने आप से, अपने पूर्वानुभवों से, अपने आसपास से और उन से भी जो मेरे सबसे ज्यादा अपने थे। लगभग साढ़े तीन-चार साल का वह समय बहुत कठिन था; पर अपने लिए खुद चुनने और कुछ कर पाने का अहसास भी मेरे भीतर कुलाँचे मार रहा था। मेरी इन्हीं भावनाओं ने मेरी आरंभिक कहानियों का बाना लिया। 'भय', 'मेरी नाप के कपड़े' और 'आ-शियाना' मेरे और मेरे भीतर बैठी स्त्री के मानसिक पारिवरिक और सामाजिक संघर्षों के ही तीन आयाम हैं। मैंने इन कहानियों में बतौर स्त्री 'लिव इन रिलेशन' के आधुनिक जीवन पद्धति और परंपरागत विवाह संस्था के द्वंद्वों को अपने अनुभवों के आधार पर पकड़ने की कोशिश की है।

'पैसे जोड़-जोड़ कर इकट्ठा मैं करूँ और माँगे तो दे दूँ। अपने मन का कुछ भी ले लूँ यह तुम्हें... मैं किसी की क्रीत दासी नहीं। न हीं मजबूर हूँ किसी की हर बात मानने को... हमारा रिश्ता तो आपसी समझ और तालमेल पर आधारित है। एक दूसरे का सम्मान करते हुए साथ रह सकें तो अच्छा वर्ना...'

'मैं बिना कुछ बोले ऑटो में बैठ चुकी हूँ पर जाने क्यों लगता है जैसे रवि को अंतिम बार देख रही हूँ... मैं चाहती हूँ यह याद करूँ कि रवि मुझ पर अपनी इच्छाएँ थोपता है, मुझसे लड़ता है, मुझ पर गुस्साता है... पर ऐसा कुछ भी याद नहीं आता... रवि का उदास चेहरा बार-बार मेरे आगे आता है... कोई जरूरत हो, मुश्किल हो तो मुझे तुरंत फोन करना...' (मेरी नाप के कपड़े)

'सीढ़ियाँ चढ़ने के क्रम में पता नहीं कैसे यह भय मेरे पीछे आ लगा। दिन भर का सारा सोचा-समझा पानी में। पर इसमें मेरा क्या दोष है। एक तो दरवाजा इतनी देर पर खुला, उस पर सामने इतना अजीब दृश्य। मैं कोई काठ-पत्थर की बनी हुई हूँ...

कितना अकूत विश्वास था पर आज विश्वास की शिराएँ क्यों तनतनाने लगी हैं। दिमाग दिल पर काबू क्यों नहीं कर पा रहा... शायद हम दोनों ने शादी कर ली होती तो रह-रह कर यह भय मेरे भीतर नहीं काँपता।' (भय)

'घर हवा था या हवाएँ घर थी और उसे चेहरा देने की उसकी कोशिश बेमानी... अलग तरीके से ही सही ढूँढ़ती तो वह भी यही है। किसी पुरातन स्त्री की तरह अपना एक घर। अपना मुकम्मल घर... क्या मुकम्मल घर एक सपना है?

दो वर्ष तेरह मकान। तमाम जिल्लतें क्या यही है... क्या यही है उसकी तलाश की मंजिल। कहीं वह पीछे की ओर तो नहीं लौट रही... बढ़ते-बढ़ते पीछे लौट आना, यह कौन सी मंजिल है उसकी यात्रा की। क्या आगे बढ़ना ही गंतव्य का रास्ता है? पहले हम समझें कि हमे चाहिए क्या... कोई दूसरा क्यों नियत करे हमारी जय-पराजय, हमें सीखना तो अपने अनुभवों से ही होगा।' (आ-शियाना)

मेरी छोटी-छोटी लड़ाइयाँ, छोटी-छोटी जीत, छोटी-छोटी हार सबको मेरी कहानियों ने दर्ज किया और अपनी इन छोटी-छोटी उपलब्धियों और उसके अंकन ने अपने कुछ अलग कुछ विशिष्ट होने की अनुभूति तो जगाई ही, अपने ऊपर विश्वास करना भी सिखाया; अपने लेखन पर भी।

'ख्वाहिशों और जिंदगी के बीच बड़े गहरे फासले थे। उसके हिस्से तो बस दो-चार बूँदें थीं - खारी, छिछली, नमकीन। इतने से उसकी चाहत कम होती भी तो कैसे' (यह डर क्यों लगता है)

'मैं खिड़की से उसे जाते हुए देख कर सोचती हूँ, मेरे लिए ये पल कितने भारी थे, मुझसे पूछो। भय, आशंका और साहस से भरा तन-मन अब रीत कर रिक्त हो चला था। अरे पुलिस वाली कोई आदत तो होती... ऐसी धाकड़ सस्पेंस रचती फिल्म का इतना फ्लाप और टाँय-टाँय फिस्स अंत। मैं चैन की साँस अपने फेफड़ों में भरती हूँ। इतने वक्त तक हवा की इस ताजगी का अहसास कहाँ गुम था...?' (चार घंटे)

अब सोचती हूँ तो हैरत होती है कि इस सारी कालावधि में राकेश (राकेश बिहारी, अब मेरे पति) भी तो मेरे साथ ही थी। कमोबेश उन्हीं स्थितियों-परिस्थितियों से गुजरते हुए और कहानियाँ भले ही प्रकशित न होने को भेजी जा रही हों पर सृजन के स्तर पर तो हम सहयात्री ही थे। 'और अन्ना सो रही थी', 'बाकी बातें फिर कभी' और 'फाँस' जैसी उनकी कहानियाँ भी उसी कालावधि में तो लिखी गई हैं। पर इन कहानियो का फलक मेरी कहानियों से बिल्कुल भिन्न हैं। जहाँ मेरी कहानियों का संबंध मुझसे और मेरे अंतर्जगत से है, राकेश अपनी कहानियों में कम हैं या कि गौण पात्र के रूप में। उनकी कहानियों का नाता बाह्य जगत और उसकी घटनाओं से है। शायद यह स्त्री और पुरुष की सोच का फर्क हो याकि फिर मेरे और उनके लिए कहानियों के विषय चुनने का, पर यह तो तय है कि जो बातें मेरे लिए महत्वपूर्ण थीं उनके लिए गौण। छोटे-छोटे सुख-दुख उन्हें या तो व्यापते ही नहीं थे या कि उन स्थितियों से स्त्रियों को ही गुजरना होता है ज्यादातर। कोई चाहे तो उनके सरोकारों को बड़ा और मेरी दुनिया को छोटी कह सकता है। आखिरकार हमारा सामाजिक ढाँचा भी तो पुरुषों को विशिष्ट और अलग होने की छूट देता ही है।

धीरे-धीरे मेरी कहानियाँ विकसित हो रही थीं। खुद से निकल कर यह कथायात्रा अब माँ तक पहुँच गई थी। विधवा माँ का दुख, अकेलापन... मैं सोचकर सिहर उठती, जिस उम्र में मैं अपनी जिंदगी चुनने का निर्णय लेती या उसे लेने की भूमिका तय करती हूँ तेरह की उम्र में ब्याही माँ तबतक नौ बच्चों (सात जीवित और दो मृत) को जन्म देकर एक विधवा के बाने में आ चुकी होती हैं। यह त्रासदी कोई छोटी त्रासदी नहीं थी। माँ के दुख से मन भीतर तक द्रवित होता पर कुछ भी कर पाने या कि बदल पाने में मैं अपनी कहानी 'नीमिया तले डोला रख दे मुसाफिर' की प्रीति की तरह ही असमर्थ थी। माँ का एकांत था कि कमता नहीं था और मुझे बस मूक दर्शक की तरह उसे देखते रहना था - 'मैं चौके तक पहुँची ही थी कि जैसे किसी की उपस्थिति के भान से सहमकर चक्की की घर्र-घर्र बंद हो चली थी, साथ में माँ का पिघलता-गलता स्वर भी - अम्मा कहे बेटी निस दिन अइयो, बाबा कहे छह मास रे... भैया कहे बेटी जग ही परोजन, भाभी कहे क्या है काम रे... माँ की दृष्टि में मुझे देख कर एक राहत भाव तैरा था। तू है। मैं तो सोच रही थी कि किशोर लौट आया। इसी से भय लगा। मैने माँ के कंधे पर अपनी संवेदना भरी हथेलियाँ रखी थी कि वह फूट-फूट कर रो पड़ी। पूरी जिंदगी में उन्हें पहली बार इस तरह रोते पाया था।' (नीमिया तले दोला रख दे मुसाफिर)

माँ का अकेलापन, भरे-पूरे परिवार के होते हुए भी उसका अकेली और निहत्थी होती जाना जैसे कोंचते रहते मुझे, भीतर तक। एक जिरह लगातार चलती रहती - 'माँ ही क्यों थमी रहे आजीवन उसी मोड़ पर जिसकी चाह उसे नहीं थी... जब धरती, आकाश, ग्रह-नक्षत्र सब घूमते रहते हैं अपनी धुरी पर, नदियाँ बदल देती हैं अपना रास्ता फिर माँ से अथाह धीरज की अपेक्षा क्यों? माँ पर्वत नहीं थी। और पर्वत भी तो टूटता-छीजता है समय के साथ-साथ।' हम भूल चुके हों पर आदिम सुख-दुख उन्हें भी व्यापते थे। इस निरंतर चलती बहस ने 'नीमिया...' के लगभग सात वर्षो बाद 'उलटबाँसी' की रचना करवाई। 'नीमिया...' की माँ-बेटी को जैसे इस कहानी में विस्तार मिल गया था। लेकिन यह सिर्फ कथ्य की ही नहीं मेरे कथाकार की भी विकासयात्रा थी और मेरे भीतर बैठी स्त्री की भी। 'उलटबाँसी की प्रौढ़ा माँ अपने अकेलेपन से ऊबकर-टूटकर विवाह का निर्णय लेती है और पूरे परिवार के विरोध के बावजूद उस निर्णय में उसकी बेटी और पोती उसके साथ खड़ी होती हैं। बेटी तो अपने परिवार के टूटने की आशंका के बाद भी। 'निशा ने उनके कंधे पर सिर रख दिया है, मैने उनकी कलाइयाँ अपने हाथों में ले ली है। अब हम तीन पीढ़ी की औरतें नहीं। दादी, बुआ और पोती तो बिल्कुल भी नहीं। बस तीन स्त्रियाँ हैं, तीन बहनें या फिर तीन सहेलियाँ। समय ने अपने चारों तरफ से अपनी चौहद्दी हटा ली है। वह मूक सा खड़ा कोने से ताक रहा है, हम तीनों को। हमारी चुप्पी बतिया रही हैं आपस में बहुत सारी बातें... निशा कब बड़ी हो गई हमें पता ही नहीं चला... औरत कब बड़ी हो जाती है कौन जान पाता है।' (उलटबाँसी)

इस कहानी को लिखकर मैं अपने वर्षों पुराने उस द्वंद्व से जैसे निवृत्त हो चुकी थी, अपने ऊहापोह से भी। पर मूल चुनौती तो सामने अब आनी थी। जो यात्रा मैंने सात वर्षों में पूरी की थी, वह दूसरों की तो बिल्कुल भी नहीं थी। अमतौर पर पुरुषों के समझ से तो बिल्कुल परे की। पहली दृष्टि में तो राजेंद्र जी ने ही इसे बकवास करार दिया... बूढ़ी माँ अचानक शादी कैसे कर सकती है, कौन मिल जाएगा उसे? ...वह बूढ़ी नहीं है, प्रौढ़ा है। और गर पुरुषों को मिल सकती है कोई, किसी भी उम्र में तो फिर औरत को क्यों नहीं? ...होने को तो कुछ भी हो सकता है, तू मेरी माँ हो सकती है, यह (राकेश) तेरा पिता हो सकता है... लिख डाल एक और कहानी... बातें खिंचती-खिंचती लंबी खिंच गई थी और जो भी उस दिन हंस के दफ्तर में आता उस बहती गंगा में हाथ धो डालता। लेकिन टाइप होने के बाद राजेंद्र जी ने कहानी दुबारा पढ़ने को माँगी। उन्हें पुनः कहानी दे कर मैं अभी घर तक लौटी भी नहीं थी कि उनका फोन आ गया था 'मुझे कहानी पसंद है, मैं रख रहा हूँ किसी और को मत देना। पर एक आपत्ति अब भी है मेरी... कहानी से एक पात्र सिरे से नदारद है... वह कौन है... कहाँ मिला, कैसे मिला कुछ भी नहीं... कह नहीं सकती यह उनके अंदर का कथामर्मज्ञ बोल रहा था या कि कुछ मसाले ढूँढ़ता उनका संपादक... पर मैं हिली नहीं थी... मुझे उसकी जरूरत नहीं लगती... कहानी माँ और बेटी के बदलते संबंधों की है... राजेंद्र जी भी अंततः मान गए थे। आज उन्हें यह मेरी कहानियों में शायद सबसे ज्यादा पसंद है। राजेंद्र जी अपने भीतर के पुरुष से लगातार संघर्ष करते हैं। उनकी यही खासियत उन्हें औरों से अलग करती है।

खैर, धीरे-धीरे मुझे यह महसूस हुआ कि इसमें किसी का दोष नहीं था; यह अचानक ग्राह्य हो जानेवाली बात भी नहीं थी, खास कर पुरुषों के लिए। माँ शब्द ही हमारे यहाँ इतनी गरिमा त्याग और धैर्य का पर्याय है या कि बना दिया गया है कि उसके मामले में कोई छूट उसकी तथाकथित छवि से खिलवाड़ लगता है। ये बातें सिर्फ इसलिए कि इस कहानी को स्त्रियाँ जितनी जल्दी स्वीकार कर पाती हैं, पुरुष इतनी आसानी से नहीं कर पाते। आज इस कहानी को खुले मन से स्वीकार करने वाले कई मित्रों को भी मैंने तब ऊहापोह की स्थिति में देखा था। इसलिए यह कहानी कोई औरत ही लिख सकती थी। अन्यथा पुरुष के लिखने पर यह 'तलाश' (कमलेश्वर) हो जाती जहाँ माँ बेटी की नजर में एक खल चरित्र बन कर ही उभरती है और सहानूभूति योग्य नहीं हो पाती।

धीरे-धीरे मेरी दृष्टि अब 'मैं', 'माँ', 'परिवार', 'पास-पड़ोस' से इतर स्त्री जगत के उन सारे संघर्षों को भी देखने लगी थी जिनके रास्ते और जिनकी दुविधाएँ दूसरी या नए तरह की हैं। इन स्त्रियों के मन तक पहुँचना तब और ज्यादा जरूरी लगने लगता है जब मैं अपने पुरुष कथाकार मित्रों की कहानियों में इन स्त्रियों को सिर्फ महत्वाकांक्षी, मौकापरस्त और मतलबी चेहरों की तरह पाती हूँ। ऐसे में मंजिल की तलाश में जीवन के साथ रस्साकशी करती स्त्रियों की कहानियाँ लिखना खुद को उनके साथ एकाकार करना भी लगता है। ऐसा करते हुए मैं अपने 'मैं' को ही खुरचती-परखती और पुनर्सृजित करती हूँ; एक स्त्री के रूप में, आधी आबादी की एक प्रतिनिधि के रूप में।

भले ही वह एक अखबारी खबर रही हो पर वह और उस जैसी आँखों के आगे से गुजरनेवाली कई खबरों की स्मृति 'देहदंश' के लेखन का कारण बनी। 'कौन सा होगा वह रहस्य जो एक पल में किसी इनसान को बनैले पशु में तब्दील कर देता है। सींग, नाखून और दाँतों वाले हिंस्र पशु में और फिर जानवर के उतरते ही वही नर्म मुलायम इनसान। कौन से होंगे वे कारण जो पिता की पूजित होती आई हुई छवि भी किसी दरिंदे में परिवर्तित कर दे। कैसी होती होगी उस बेटी की जिंदगी, उस जिंदगी की त्रासदी। मेरे 'देहदंश' में मेरे 'मैं' ने उस पीड़ित लड़की का जामा ले लिया था। वह कोई तूफानी रात थी जब रात के बारह बजे से सुबह चार बजे तक कलम रुकी नहीं थी पल भर को; सुबह शरीर ऐसा टूटा हुआ जैसे कि वह सब कुछ मेरे ही साथ घटा हुआ हो। 'देहदंश' कई लोगों को बहुत पसंद आई, कइयों को 'भयानक' कहानी भी लगी। एक पाठक ने तो पत्र लिख कर यहाँ तक कह डाला कि 'आपके घर में होता होगा यह सब, पर हमारे घर की बेटियों को अपने घर में सुरक्षित रहने दें। कथाकार संजीव तब इस कहानी की निंदा करते न थकते थे, पर सच कहूँ तो यह अपनी कहानियों में एक पसंदीदा कहानी है। अपने 'मैं' की विकासयात्रा की, उसके विस्तार की।

हंस के जिस अंक में यह कहानी छपी थी उसमें एक और कहानी थी जिसके केंद्र में पिता द्वारा बलात्कृत बेटी थी। कहानी थी अजय नावरिया की 'ढाई आखर'। मैंने यानी एक स्त्री ने जब इस कहानी को लिखा कहानी बलात्कार की उस घटना से आगे निकल कर जिंदगी की रौ में बह निकलने के निर्णय तक पहुँची; पिछला सब कुछ भूल कर एक पूर्ण जिंदगी जीने और चुनने की चाहत और सपने के रूप में। लेकिन अजय नावरिया की 'ढाई आखर' की समीरा की जिंदगी वहीं, उसी बिंदु पर बंद घड़ी की सूई की तरह अटकी रह जाती है। एक स्त्री होना कैसे हमारी कहानियों को प्रभावित करता है उसे इन दोनों कहानियों के अंतर से भी समझा जा सकता है। बलात्कर जैसा कोई हादसा आज एक स्त्री के लिए सबकुछ खत्म कर देने का कारण नहीं हो सकता लेकिन पुरुष-मानसिकता शायद अब भी इसे उसी तरह देखती है तभी तो ऐसे हादसों से उत्पन्न तात्कलिक शून्य का अतिक्रमण नहीं हो पता। इसका मतलब यह कतई नहीं कि अजय नावरिया की यह कहानी कमतर है, बल्कि यह उनकी और अपने समय की अच्छी कहानियों में से एक है। यहाँ इनका जिक्र सिर्फ इसलिए कि इन दोनों कहानियों की पात्रगत परिणतियों का अंतर स्त्री और पुरुष लेखन के अंतर और स्त्री लेखन की जरूरतों दोनों को रेखांकित करता है।

हर काल में स्त्री और पुरुषों के लेखन और लेखन शैली में अंतर रहा है। हिंदी कथा इतिहास के प्रारंभिक दौर में जब पुरुष लेखक स्त्री के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हुए 'विधवा' (ज्वालादत्त शर्मा), 'वेश्या की बेटी' (जगदीश प्रसाद झा 'विमल'), 'वियोगिनी' (मुरली मनोहर श्रीवास्तव) जैसी कहानियाँ लिख रहे थे, जिस समय प्रेमचंद ने 'सौत' लिखा लगभग उसी काल में शिवरानी देवी ने 'कुर्बानी' और राजेंद्र बाला घोष जिन्हें कि लोग बंग महिला के नाम से जानते हैं ने 'कुंभ में छोटी बहू' और 'दुलाईवाली' जैसी सशक्त कहानियाँ लिखीं। भले ही ये कहानियाँ मुख्यतः किसी स्त्री या उसके जीवन संघर्ष की कहानियाँ न हों, लेकिन किसी सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के तहत स्त्रियों को अबला या बेचारी की तरह इन कहानीकारों ने चित्रित न कर के न सिर्फ स्त्री चरित्रों के साथ बल्कि कहानी विधा के साथ भी न्याय किया।

कालांतर में जयशंकर प्रसाद की 'पुरस्कार' और जैनेंद्र की 'पत्नी' में स्त्री का पक्ष और उसका जीवन खुल कर सामने आते हैं। 'मधूलिका' और 'पत्नी' इन कहानियों के मजबूत स्त्री चरित्र हैं। धीरे-धीरे कहानी धारा में इस संवेदनापरक दृष्टि में भी ह्रास दिखाई देता है। नई कहानी के पुरुष कथाकारों ने जहाँ 'जहाँ लक्ष्मी कैद है', 'एक कमजोर लड़की की कहानी' (राजेंद्र यादव), 'अपरिचित' (मोहन राकेश), 'तलाश', 'राजा निरबंसिया (कमलेश्वर) जैसी कहानियों में वस्तुस्थिति का चित्रण करते हुए अपनी तटस्थताबोध का परिचय दिया वहीं उसी समय मन्नू भंडारी ने 'यही सच है' में स्त्री के लिए चुनने और अपना जीवन जीने के हक के लिए संघर्ष करती स्त्री का चित्र खींचा। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पुरुष दृष्टि का प्रतिलोम ले कर उपस्थित होती हैं चित्रा मुद्गल (तीन किलो की छोरी), ममता कालिया (बोलने वाली औरत), अर्चना वर्मा (जोकर), मृदुला गर्ग (मीरा नाची), सुधा अरोड़ा (रहोगी तुम वही), जया जादवानी (अंदर के पानियों में कोई सपना काँपता है), गीतांजल श्री (बेलपत्र) आदि। ये और इन जैसी कई अन्य कहानियाँ स्त्री जीवन के विभिन्न आयामों को दर्शाती हुई उन्हें स्त्री से ज्यादा एक मनुष्य के रूप में चित्रित करती हैं।

पुरुष लेखकों में स्त्री चरित्रों के प्रति जो सद्भाव प्रेमचंद या कि उनके पूर्ववर्ती और परवर्ती कहानीकारों (जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, शैलेश मटियानी आदि) में विकासोन्मुख होती दिखती है कालांतर में उसमें ह्रास ही चिह्नित होता है। नई कहानी तक कम से कम स्थिति यह तो थी कि स्त्रियाँ और उनकी जिंदगी एक तटस्थताबोध के साथ यथास्थिति की तरह ही सही दर्ज तो थीं पर क्रमशः बाद के लेखकों या कि उनकी कहानियों में स्त्री पात्र या तो न के बराबर हैं या फिर जो हैं भी वो किसी सशक्त चरित्र के रूप में उभर कर सामने नहीं आ पाती। वे चाहे संजीव हों (अपवाद मानपत्र) या उदय प्रकाश या कि अखिलेश या प्रियंवद। संजीव की दृष्टि स्त्री के संदर्भ में छायावादी रूमानियत का शिकार हो जाती है। उदय प्रकाश के यहाँ स्त्री कहानी को उसकी बृहत्तता में उपस्थित करने के लिए एक टूल मात्र हैं तो प्रियंवद के यहाँ बहुत हद तक 'सेक्स ऑब्जेक्ट'। द्रष्टव्य है कि अपनी कुछेक कहानियों से ही एक मजबूत पहचान बना लेने वाली गीतांजलि श्री, जया जादवानी और एकाध अच्छी कहानियाँ लिख कर लुप्त हो जाने वाली रेखा और सुरभि पांडे जैसी लेखिकाओं को छोड़ दें तो इस पीढ़ी में जिस तरह से और जितने लेखक सामने आए लेखिकाओं की संख्या उतनी नहीं रही। नतीजतन इस पीढ़ी का दूसरा पक्ष अपेक्षाकृत अछूता ही रहा या कि कम दर्ज हुआ। बल्कि यह कहें तो कुछ गलत न होगा कि आज के कई पुरुष कथाकार वे चाहे शशिभूषण द्विवेदी हों या राकेश मिश्र या कि कुणाल सिंह या गीत चतुर्वेदी आदि इन सब की कहानियों की मौकापरस्त, अतिमहत्वाकांक्षी और भोगे जाने को आतुर स्त्रियाँ अपने पूर्ववर्ती पुरुष कथाकारों की उसी ह्रासोन्मुख रचनाधारा को ही आगे बढ़ाती हैं। यह सब लिखे या कहे जाने का मतलब हिंदी कहानी की सुदीर्घ परंपरा में अपने पूर्ववर्ती या समकालीन कथाकारों के अवदान को छोटा करना नहीं बल्कि उस फाँक की तरफ इशारा करना है जिसने मेरे लेखन को एक दिशा दी है। इस तरह मैं कह सकती हूँ कि हमारी परंपरा के समर्थ कथाकारों की खूबियाँ और मेरी सीमित दृष्टि में उन कहानियों की दरारों दोनों ने मिल कर मेरे कथाकार का निर्माण किया है।

जिस तरह मेरी शिकायत पुरुष लेखकों की एकांगी कहानियों से है, उसी तरह की शिकायत एक खास ढाँचे में मढ़ी अपने समय या कि अपने से कुछ पहले की उन तथाकथित स्त्रीवादी कहानियों से भी है जिनके पुरुष पात्र अनिवार्यतः और सुनियोजित रूप से खल ही होते हैं। हम जिस समाज में जी रहे हैं वहाँ धीरे-धीरे ही सही बदलाव तो आ ही रहा है। ये बदलाव स्त्री-पुरुष संबंधों में भी देखे जा सकते हैं फिर उनके चरित्रांकन से परहेज कैसा? जिस तरह स्त्री जीवन में आए सार्थक बदलावों को नजरअंदाज कर के सिर्फ नकारात्मक स्त्री चरित्रों को कहानियाँ में लाना एक तरह का पुरुषवाद ही कहा जाएगा उसी तरह स्त्री कथाकारों की कहानियों में पुरुष को हमेशा खल पात्र की तरह चित्रित किया जाना भी समकालीन समय का एक अतिवादी चित्र है। मेरी राय में खल पुरुषों की शिनाख्त के समानांतर मित्रवत पुरुषों को चीन्हना और उन्हें सामने लाना भी स्त्रीवाद के लिए उतना ही जरूरी है। मेरे पात्र चाहे वे स्त्री हों या पुरुष अपने समय-समाज का एक महत्वपूर्ण अंग बन कर उसके बदलावों को चिह्नित करते हुए मनुष्य और मनुष्यता के हक में खड़े हो सकें यही मेरी लेखकीय प्रतिबद्धता रही है। मैं नहीं जानती मेरी कहानियाँ मेरी लेखकीय प्रतिबद्धताओं को हासिल करने में कितनी सफल होती हैं, लेकिन मेरी कहानियों की दशा-दिशा तय करने में अपने पूर्ववर्ती और समकालीन स्त्री कथाकारों की ऐसी कहानियों का भी योगदान है।

जाहिर है मेरे कथाकार की निर्मिति में जितना हाथ अपनी प्रिय कहानियों का है उतना ही हाथ उन कहानियों का भी जिनसे कहीं न कहीं मेरी असहमति भी रही है। इसलिए मुझे यह कहने में कोई झिझक या संकोच नहीं है कि चाहे कोई लेखक जिस किसी भी तरह खुद को अपनी परंपराओं से जुड़ा, उससे अलग या कि उसका विकास माने किसी न किसी रूप में उसकी परंपरा उसकी बनावट का जरूरी और अहम हिस्सा होती हैं।

सामाजिक रूप से स्त्री के लिए अब भी कई बंधन हैं। विवाह, संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया, संतान का पालन-पोषण... जिनसे बंधकर जिंदगी की कई चाहतें असमय ही कुम्हलाती और कुचल दी जाती हैं। और स्त्री की नियति रही है कि उसे सबकुछ सहना है। आधुनिक स्त्रियों ने ऐसे कई मिथों को तोड़ा है, उसे पीछे छोड़ दिया है। मुझे अब खुद को उन्हीं आधुनिक स्त्रियों में बदलना था। उनकी सोच, उनकी विचारधारा को पकड़ना था, पहचानना था। 'पत्थर माटी दूब' की 'मैं' यानी नायिका अपने स्वर्गीय पिता के संस्कारों और जिम्मेदरियों से इस तरह लदी है कि विवाह उसके लिए असंगत सा ही लगता है। पर प्रेम तो पूछ कर जीवन में नहीं आता न। वह आता है और अपने चिह्न भी छोड़ जाता है। प्रेमी को अपने जीवन से पहले ही विदा कर चुकी नायिका अपनी माँ और सहेली जैसी विद्यार्थियों के साथ के बल पर कुँवारी माँ बनने का निर्णय लेती है और एक बच्ची को जन्म देती है। इस कहानी में नायिका का द्वंद्व सिर्फ सामाजिक और मानसिक नहीं आर्थिक भी है।और वह इन परिस्थितियों से लड़कर जीतती भी है।

'लौट आना ली' में ली यानी लीजा की दुविधा दूसरी है। उसने जिस पुरुष से प्रेम किया, शादी की उसने खुद को जैसे उसके जीवन से पूरी तरह काट लिया है। लीजा की स्त्री को यह जीवन बर्दाश्त नहीं है और वह घर-बार पीछे छोड़कर चली आई है। अब जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए उसे एक नौकरी की सख्त जरूरत है। वह किसी पर आश्रित नहीं रहना चाहती। ऐसे में अपने अनचाहे गर्भ का वह क्या करे? उसकी परिस्थितियाँ और मनोदशा बच्चा पैदा करने की इजाजत नहीं देते। ऐसे में बच्चा नहीं रखने का अपना निर्णय वह उन ससुराल वालों से भी कैसे बताए जिनका बेटा उसका तथाकथित पति है। '...माँ मैंने गलत निर्णय तो नहीं लिया न। मैं अपने आप से लड़ती हुई कहती हूँ 'नहीं'। उसे इस वक्त भीतर से कमजोर नहीं होना चाहिए... मैं ओ.टी. के बाहर खड़ी हूँ। उसे स्ट्रेचर पर ला रहे हैं। स्ट्रेचर ठीक मेरे आगे से गुजरा है... मैंने उसकी हथेलियाँ कसकर थामी है। मेरा भरोसा, मेरा विश्वास प्रवाहित हो उसकी शिराओं में। मैंने हौले से कहा है, लौट आना ली। लौटना जरूर...' (लौट आना ली)

संबंधों का बदलता स्वरूप और पात्रों की बदलती मनःस्थितियाँ इन दोनों कहानियों में गौरतलब हैं। 'पत्थर, माटी, दूब...' की जिंदगी भर इस बात पर रोनेवाली माँ कि 'काश उसे इस बेटी की जगह पर बेटा हुआ होता' बेटी के अन्ब्याही माँ बनने के निर्णय में उसके साथ संबल बनकर खड़ी है। वहीं दूसरी कहानी की 'मैं' यानी लीजा की वह सास जो साथ रहते हुए उससे हमेशा एक शीतयुद्ध लड़ती रही कि इस विधर्मी लड़की ने उससे उसका एकलौता बेटा छीन लिया उनके अलग होते ही उन्हें साथ लाने की हर संभव कोशिश में लग जाती है। और आखिर में अपनी नाकामयाबी के बाद लीजा के गर्भपात के निर्णय में उसके साथ खड़ी हो जाती है, परिवार के विरुद्ध जा कर भी। ये दोनों परिस्थितियाँ कोई असंभव या कौतुक रचने की कोशिश नहीं होकर स्त्रियों के जीवन में धीरे-धीरे बदल रहा वह 'बहुत कुछ' है जिसका सपना एक अथाह पीड़ा के साथ हर एक स्त्री की आँखों में कब से पल रहा है। मैंने एक स्त्री लेखक के रूप में उन सारी स्त्रियों को अपने 'मैं' में आत्मसात करने की कोशिश भर की है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, हम स्त्रियों के दुख एक से ही तो हैं... जो मेरा है वह सबका है और जो सबका है वही मेरा भी।

मुझे अपनी कहानियों में एक लेखिका के साथ-साथ एक स्त्री का विकास भी दिखता है; उसके साथ-साथ चलते पुरुष का भी। आखिर कब तक उस संपूर्ण साथी की कल्पना सिर्फ कल्पना ही बनी रहे। यूँ तो शुरुआत से ही मेरी कहानियों के पुरुष संयत, संवेदी और सामयिक रहे हैं पर अब एक 'दोस्त-पुरुष' की कल्पना भी मेरी कहानियों में साकार होने लगी है। 'जिरह', मध्यवर्ती प्रदेश', 'उस पार की रोशनी' जैसी कहानियाँ वैसे ही पुरुषों की खोज की कहानियाँ हैं जो मालिक नहीं हमसफर हैं। इनमें से भी कुछ कहानियाँ 'मैं' शैली में लिखी गई हैं। 'मैं' का यह कायांतरण कितना सार्थक और सजीव है यह निर्णय तो पाठकों के हाथ में ही है। एक लेखक होने के नाते मेरा दायित्व तो उन मुद्दों पर लिखना या लिखने की कोशिश करना है जो कहीं न कहीं एक ऐसे समाज के निर्माण के सपनों से जुड़ा है जो समान रूप से स्त्री और पुरुष दोनों का है। और यह सपना मेरे लेखक से पहले मेरी जैसी अनेक स्त्रियों का है।


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