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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 25. हिंदुस्तान में पीछे     आगे

कलकत्ते से बंबई जाते हुए प्रयाग बीच में पड़ता था। वहाँ ट्रेन 45 मिनट रुकती थी। इस बीच मैंने शहर का एक चक्कर लगा आने का विचार किया। मुझे केमिस्ट की दुकान से दवा भी खरीदनी थी। केमिस्ट ऊँघता हुआ बाहर निकला। दवा देने में उसने काफी दे कर दी। मैं स्टेशन पहुँचा तो गाड़ी चलती दिखाई पड़ी। भले स्टेशन-मास्टर ने मेरे लिए गाड़ी एक मिनट के लिए रोकी थी, पर मुझे वापस आते न देखकर उसने मेरा सामान उतरवा लेने की सावधानी बरती।

मैं केलनर के होटल में ठहरा और वहाँ से अपने काम के श्रीगणेश करने का निश्चय किया। प्रयाग के 'पायोनियर' पत्र की ख्याति मैंने सुन रखी थी।

मैं जानता था कि वह जनता की आकांक्षाओ का विरोधी है। मेरा खयाल है कि उस समय मि. चेजनी (छोटे) संपादक थे। मुझे तो सब पक्षवालों से मिलकर प्रत्येक की सहायता लेनी थी। इसलिए मैंने मि. चेजनी को मुलाकात के लिए पत्र लिखा। ट्रेन छूट जाने की बात लिखकर यह सूचित किया कि अगले ही दिन मुझे प्रयाग छोड़ देना है। उत्तर में उन्होंने मुझे तुरंत मिलने के लिए बुलाया। मुझे खुशी हुई। उन्होंने मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनी। बोले, 'आप जो भी लिखकर भेजेंगे, उस पर मैं तुरंत टिप्पणी लिखूँगा।' और साथ ही यह कहा, 'लेकिन मैं आपको यह नहीं कह सकता कि मैं आपकी सभी माँगो का स्वीकार ही कर सकूँगा। हमें तो 'कॉलोनियल' (उपनिवेशवालों का) दृष्टिकोण भी समझना और देखना होगा।'

मैंने उत्तर दिया, 'आप इस प्रश्न का अध्ययन करेंगे और इसे चर्चा का विषय बनाएँगे, इतना ही मेरे लिए बस है। मैं शुद्ध न्याय के सिवा न तो कुछ माँगता हूँ और न कुछ चाहता हूँ।'

बाकी का दिन मैंने प्रयाग के भव्य त्रिवेणी-संगम का दर्शन करने में और अपने सम्मुख पड़े हुए काम का विचार करने में बिताया।

इस आकस्मिक भेंट ने मुझ पर नेटाल में हुए हमले का बीज बोया।

बंबई में रुके बिना मैं सीधा राजकोट गया और वहाँ एक पुस्तिका लिखने की तैयारी में लगा। पुस्तिका लिखने और छपाने में लगभग एक महीना बीत गया। उसका आवरण हरा था, इसलिए बाद में वह 'हरी पुस्तिका' के नाम से प्रसिद्ध हुई। उसमें दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियों की स्थिति का चित्रण मैंने जान-बूझकर नरम भाषा में किया था। नेटाल में लिखी हुई दो पुस्तिकाओं में, जिसका जिक्र मैं पहले कर चुका हूँ, मैंने जिस भाषा का प्रयोग किया था उससे नरम भाषा का प्रयोग इसमें किया था। क्योंकि मैं जानता था कि छोटा दुख भी दूर से देखने पर बड़ा मालूम होता है।

'हरी पुस्तिका' की दस हजार प्रतियाँ छपाई थी और उन्हें सारे हिंदुस्तान के अखबारों और सब पक्षों के प्रसिद्ध लोगों को भेजा था। 'पायोनियर' में उस पर सबसे पहले लेख निकला। उसका सारांश विलायत गया और सारांश का सारांश रायटर के द्वारा नेटाल पहुँचा। वह तार तो तीन पंक्तियों का था। नेटाल में हिंदुस्तानियों के साथ होनेवाले व्यवहार का जो चित्र मैंने खीचा था, उसका वह लघु संस्करण था। वह मेरे शब्दों में नहीं था। उसका जो असर हुआ उसे हम आगे देखेंगे। धीरे-धीरे सब प्रमुख पत्रों में इस प्रश्न की विस्तृत चर्चा हुई।

इस पुस्तिका को डाक से भेजने के लिए इसके पैकेट तैयार करने का काम मुश्किल था, और पैसा देकर कराना खर्चीला था। मैंने सरल युक्ति खोज ली। मुहल्ले के सब लड़कों को मैंने इकट्ठा किया और उनसे सबेरे के दो-तीन घंटो में से जितना समय वे दे सके उतना देने के लिए कहा। लड़कों ने इतनी सेवा करना खुशी से स्वीकार किया। अपनी तरफ से मैंने उन्हें अपने पास जमा होनेवाले काम में आए हुए डाक टिकट और आशीर्वाद देना कबूल किया। इस प्रकार लड़कों ने हँसते-हँसते मेरा काम पूरा कर दिया। इस प्रकार बच्चों को स्वयंसेवक बनाने का यह मेरा पहला प्रयोग था। इस बालकों में से दो आज मेरे साथी हैं।

इन्हीं दिनों बंबई में पहली बार प्लेग का प्रकोप हुआ। चारों तरफ घबराहट फैल रही थी। राजकोट में भी प्लेग फैलने का डर था। मैं सोचा कि मैं आरोग्य-विभाग में अवश्य काम कर सकता हूँ। मैंने अपनी सेवा राज्य को अर्पण करने के लिए पत्र लिखा। राज्य में जो कमेटी नियुक्त की उसमें मुझे भी स्थान दिया गया। मैंने पाखानों की सफाई पर जोर दिया और कमेटी ने निश्चय किया कि गली-गली जाकर पाखानों का निरीक्षण किया जाए। गरीब लोगों ने अपने पाखानों का निरीक्षण करने देने में बिलकुल आनाकानी नहीं की, यही नहीं बल्कि जो सुधार उन्हें सुझाए गए थे वे भी उन्होंने कर लिए। पर जब हम मुत्सद्दी वर्ग के यानि बड़े लोगों के घरों का मुआयना करने निकले, तो कई जगहों में तो हमें पाखाने का निरीक्षण करने की इजाजत तक न मिली, सुधार की तो बात ही क्या की जाय? हमारा साधारण अनुभव यह रहा कि धनिक समाज के पाखाने ज्यादा गंदे थे। उनमें अँधेरा, बदबू और बेहद गंदगी थी। खड्डी पर कीड़े बिलबिलाते थे। जीते जी रोज नरक में ही प्रवेश करने जैसी वह स्थिति थी। हमारे सुझाए हुए सुधार बिलकुल साधारण थे। मैला जमीन पर न गिराकर कूंडे में गिराएँ। पानी की व्यवस्था ऐसी की जाए की वह जमीन में जज्ब होने के बदले कूंडे में इकट्ठा हो। खुड्डी और भंगी के आने की जगह से बीच जो दीवार रखी जाती है वह तोड़ दी जाय, जिससे भंगी सारी जगह को अच्छी तरह साफ कर सके, पाखाने कुछ बड़े हो जाएँ तथा उनमें हवा-उजाला पहुँच सके। बड़े लोगों ने इन सुधारों को स्वीकार करने में बहुत आपत्ति की, और आखिर उन पर अमल तो किया ही नहीं।

कमेटी को भंगियों की बस्ती में भी जाना तो था ही। कमेटी के सदस्यों में से एक ही सदस्य मेरे साथ वहाँ जाने को तैयार हुए। भंगियों की बस्ती में जाना और सो भी पाखानों का निरीक्षण करने के लिए! पर मुझे तो भंगियों की बस्ती देखकर सानंद आश्चर्य हुआ। अपने जीवन में मैं पहली ही बार उस दिन भंगी बस्ती देखने गया था। भंगी भाई-बहनों को हमें देखकर अचंभा हुआ। मैंने उनके पाखाने देखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा, 'हमारे यहाँ पाखाने कैसे? हमारे पाखाने को जंगल में है। पाखाने तो आप बड़े आदमियों के यहाँ होते है।'

मैंने पूछा, 'तो क्या अपने घर आप हमें देखने देंगे?'

'आइए न भाई साहब! जहाँ भी आपकी इच्छा हो, जाइए। ये ही हमारे घर है।'

मैं अंदर गया और घर की तथा आँगन की सफाई देखकर खुश हो गया। घर के अंदर सब कुछ लिपा-पुता देखा। आँगन झाड़ा-बुहारा था; और जो इने-गिने बरतन थे, वे सब साफ और चमचमाते हुए थे। मुझे इस बस्ती में बीमारी के फैलने का डर नहीं दिखाई दिया।

यहाँ मैं एक पाखाने का वर्णन किए बिना नहीं रह सकता। हर एक घर में नाली तो थी ही। उसमें पानी भी गिराया जाता और पेशाब भी किया जाता। इसलिए ऐसी कोठरी क्वचित ही मिलती, जिसमें दुर्गंध न हो। पर एक घर में तो सोने के कमरे में ही मोरी और पाखाना दोनों देखे; और घर की वह सारी गंदगी नाली के रास्ते नीचे उतरती थी। उस कोठरी में खड़ा भी नहीं रहा जा सकता था। घर के लोग उसमें सो कैसे सकते थे, इसे पाठक ही सोच ले।

कमेटी ने हवेली (वैष्णव-मंदिर) का भी निरीक्षण किया। हवेली के मुखियाजी से गांधी परिवार का मीठा संबंध था। मुखियाजी ने हवेली देखने देना और सब संभव सुधार करा देना स्वीकार किया। उन्होंने खुद वह हिस्सा कभी नहीं देखा था। हवेली में रोज जो जूठन और पत्तल इकट्ठा होती, उन्हें पिछवाड़े की दीवार के ऊपर फेंक दिया जाता था। और, वह हिस्सा कौओं और चीलों का अड़ड़ा बन गया था। पाखाने तो गंदे थे ही। मुखियाजी ने कितना सुधार किया, सो मैं देख न सका। हवेली की गंदगी देखकर दुख तो हुआ ही। जिस हवेली को हम पवित्र स्थान मानते है, वहाँ तो आरोग्य के नियमों का अधिक से अधिक पालन होने की आशा रखी जानी चाहिए। स्मृतिकारों ने अंतर्बाह्य शौच पर बहुत जोर दिया है, यह बात उस समय भी मेरे ध्यान से बाहर नहीं थी।


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