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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 7. अनुभवों की बानगी पीछे     आगे

नेटाल के बंदरगाह को डरबन कहते हैं और वह नेटाल बंदर के नाम से पहचाना जाता है। मुझे लेने के लिए अब्दुल्ला सेठ आए थे। स्टीमर के घाट (डक) पर पहुँचने पर जब नेटाल के लोग अपने मित्रों को लेने स्टीमर पर आए, तभी मैं समझ गया कि यहाँ हिंदुस्तानियों की अधिक इज्जत नहीं है। अब्दुल्ला सेठ को पहचाननेवाले उनके साथ जैसा बरताव करते थे, उसमें भी मुझे एक प्रकार की असभ्यता दिखाई पड़ी थी, जो मुझे व्यथित करती थी। अब्दुल्ला सेठ इस असभ्यता को सह लेते थे। वे उसके आदी बन गए थे। मुझे जो देखते वे कुछ कुतूहल की दृष्टि से देखते थे। अपनी पोशाक के कारण मैं दूसरे हिंदुस्तानियों से कुछ अलग पड़ जाता था। मैंने उस समय 'फ्राक कोट' वैगरा पहने थे और सिर पर बंगाली ढंग की पगड़ी पहनी थी।

अब्दुल्ला सेठ मुझे घर ले गए। उनके कमरे की बगल में एक कमरा था, वह उन्होंने मुझे दिया। न वे मुझे समझते और न मैं उन्हें समझता। उन्होंने अपने भाई के दिए हुए पत्र पढ़े और वे ज्यादा घबराए। उन्हें जान पड़ा कि भाई ने उनके घर एक सफेद हाथी ही बाँध दिया है। मेरी साहबी रहन-सहन उन्हें खर्चीली मालूम हुई। उस समय मेरे लिए कोई खास काम न था। उनका मुकदमा तो ट्रान्सवाल में चल रहा था। मुझे तुरंत वहाँ भेजकर क्या करते? इसके अलावा, मेरी होशियारी या ईमानदारी का विश्वास भी किस हद तक किया जाए? प्रिटोरिया वे मेरे साथ रह नहीं सकते थे। प्रतिवादी प्रिटोरिया में रहता था। मुझ पर उसका अनुचित प्रभाव पड़ जाए तो क्या हो? यदि वे मुझे इस मुकदमे का काम न सौंपे, तो दूसरे काम तो उनके कारकुन मुझसे बहुत अच्छा कर सकते थे। कारकुनों से गलती हो तो उन्हें उलाहना दिया जा सकता था, पर मैं गलती करूँ तो? काम या तो मुकदमे का था या फिर महर्रिर का था। इसके अलावा तीसरा कोई काम न था। अतएव यदि मुकदमे का काम न सौंपा जाता, तो मुझे घर बैठे खिलाने की नौबत आती।

अब्दुल्ला सेठ बहुत कम पढ़े लिखे थे, पर उनके पास अनुभव का ज्ञान बहुत था। उनकी बुद्धि तीव्र थी और स्वयं उन्हें इसका भान था। रोज के अभ्यास से उन्होंने सिर्फ बातचीत करने लायक अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इस पर अपनी इस अंग्रेजी के द्वारा वे अपना सब काम निकाल लेते थे। वे बैंक के मैनेजरों से बातचीत करते थे, यूरोपियन व्यापारियों के साथ सौदे कर लेते थे और वकीलो को अपने मामले समझा सकते थे। हिंदुस्तानी उनकी बहुत इज्जत करते थे। उन दिनों इनकी फर्म हिंदुस्तानियों की फर्मों में सबसे बड़ी अथवा बड़ी फर्मों में एक तो थी ही। अब्दुल्ला सेठ का स्वभाव वहमी था।

उन्हें इस्लाम का अभिमान था। वे तत्वज्ञान की चर्चा के शौकीन थे। अरबी नहीं जानते थे, फिर भी कहना होगा कि उन्हें कुरान-शरीफ की और आम तौर पर इस्लाम के धार्मिक साहित्य की अच्छी जानकारी थी। दृष्टांत तो उन्हें कंठाग्र ही थे। उनके सहवास से मुझे इस्लाम का काफी व्यावहारिक ज्ञान हो गया। हम एक-दूसरे को पहचानने लगे। उसके बाद तो वे मेरे साथ खूब धर्म-चर्चा करते थे।

वे दूसरे या तीसरे दिन मुझे डरबन की अदालत दिखाने ले गए। वहाँ कुछ जान-पहचान कराई। अदालत में मुझे अपने वकील के पास बैठाया। मजिस्ट्रेट मुझे बार-बार देखता रहा। उसने मुझे पगड़ी उतारने के लिए कहा। मैंने इनकार किया और अदालत छोड़ दी।

मेरे भाग्य में यहाँ भी लड़ाई ही बदी थी।

अब्दुल्ला सेठ ने मुझे पगड़ी उतारने का रहस्य समझाया, 'मुसलमानी पोशाक पहना हुआ आदमी अपनी मुसलमानी पगड़ी पहन सकता है। पर हिंदुस्तानियों को अदालत में पैर रखते ही अपनी पगड़ी उतार लेनी चाहिए। '

इस सूक्ष्म भेद को समझाने के लिए मुझे कुछ तथ्यों की जानकारी देनी होगी।

इन दो-तीन दिनों में ही मैंने देख लिया था कि हिंदुस्तानी अफ्रीका में अपने-अपने गुट बनाकर बैठ गए थे। एक भाग मुसलमान व्यापारियों का था, वे अपने को 'अरब' कहते थे। दूसरा भाग हिंदू या पारसी कारकुनों, मुनीमों या गुमाश्तों का था। हिंदू कारकून अधर में लटकते थे। कोई अरब में मिल जाते थे। पारसी अपना नाम परसियन के नाम से देते थे। व्यापार के अलावा भी इन तीनों का आपस में थोड़ा-बहुत संबंध अवश्य था। एक चौथा और बड़ा समुदाय तमिल, तेलुगु और उत्तर हिंदुस्तान के गिरमिटिया तथा गिरमिट-मुक्त हिंदुस्तानियों का था। गिरमिट का अर्थ है वह इकरार यानि 'एग्रिमेंट', जिसके अनुसार उन दिनों गरीब हिंदुस्तानी पाँच साल तक मजदूरी करने के लिए नेटाल जाते थे। गिरमिट एग्रिमेंट' का अपभ्रंश है और उसी से गिरमिटिया शब्द बना है। इस वर्ग के साथ दूसरों का व्यवहार केवल काम की दृष्टि से ही रहता था। अंग्रेज इन गिरमिटवालों को 'कुली' के नाम से पहचानते थे, और चूँकि वे संख्या में अधिक थे, इसलिए दूसरे हिंदुस्तानियों को भी कुली कहते थे। कुली के बदले 'सामी' भी कहते थे। सामी ज्यादातर तमिल नामों के अंत में लगनेवाला प्रत्यय है। सामी अर्थात स्वामी। स्वामी का मतलब तो मालिक हुआ। इसलिए जब कोई हिंदुस्तानी सामी शब्द से चिढ़ता और उसमें कुछ हिम्मत होती तो वह अपने को 'सामी' कहनेवाले अंग्रेज से कहता, 'तुम मुझे सामी कहते हो, पर जानते हो कि सामी का मतलब होता है? मैं तुम्हारा मालिक तो हूँ नहीं।' यह सुनकर कोई अंग्रेज शरमा जाता, कोई चिढ़ कर ज्यादा गालियाँ देता और कोई-कोई मारता भी सही; क्योंकि उसकी दृष्टि से तो 'सामी' शब्द निंदासूचक ही हो सकता था। उसका अर्थ मालिक करना तो उसे अपमानित करने के बराबर ही हो सकता था।

इसलिए मैं 'कुली बारिस्टर' कहलाया। व्यापारी 'कुली व्यापारी' कहलाते थे। कुली का मूल अर्थ मजदूर तो भुला दिया गया। मुसलमान व्यापारी यह शब्द सुनकर गुस्सा होता और कहता, 'मैं कुली नहीं हूँ। मैं तो अरब हूँ।' अथवा 'मैं व्यापारी हूँ।' थोड़ा विनयशील अंग्रेज होता तो यह सुनकर माफी भी माँग लेता।

ऐसी दशा में पगड़ी पहनने का प्रश्न एक महत्व का प्रश्न बन गया। पगड़ी उतारने का मतलब था अपमान सहन करना। मैंने तो सोचा कि मैं हिंदुस्तानी पगड़ी को बिदा कर दूँ और अंग्रेजी टोपी पहन लूँ, ताकि उसे उतारने में अपमान न जान पड़े और मैं झगड़े से बच जाऊँ।

पर अब्दुल्ला सेठ को यह सुझाव अच्छा न लगा। उन्होंने कहा, 'अगर आप इस वक्त यह फेरफार करेगे तो उससे अनर्थ होगा। जो दूसरे लोग देश की ही पगड़ी पहनना चाहेंगे, उनकी स्थिति नाजुक बन जाएगी। इसके अलावा, आपको तो देशी पगड़ी ही शोभा देगी। आप अंग्रेजी टोपी पहनेंगे तो आपकी गिनती वेटरों में होगी।'

इन वाक्यों में दुनियावी समझदारी थी, देशभिमान था और थोड़ी संकुचितता भी थी। दुनियावी समझदारी तो स्पष्ट ही है। देशाभिमान के बिना पगड़ी का आग्रह नहीं हो सकता, और संकुचितता के बिना वेटर की टीका संभव नहीं। गिरमिटिया हिंदुस्तानी हिंदू, मुसलमान और ईसाई इन तीन भागों में बँटे हूए थे। जो गिरमिटिया हिंदुस्तानी ईसाई बन गए, उनकी संतान ईसाई कहलाई। सन 1893 में भी ये बड़ी संख्या में थे। वे सब अंग्रेजी पोशाक ही पहनते थे। उनका एक खासा हिस्सा होटलों में नौकरी करके अपनी आजीविका चलाता था। अब्दुल्ला सेठ के वाक्यों में अंग्रेजी टोपी की जो टीका थी, वह इन्हीं लोगों को लक्ष्य में रखकर ली गई थी। इसके मूल में मान्यता यह थी कि होटल में वेटर का काम करना बुरा है। आज भी यह भेद बहुतों के मन में बसा हुआ है।

कुल मिलाकर अब्दुल्ला सेठ की दलील मुझे अच्छी लगी। मैंने पगड़ी के किस्से को लेकर अपने और पगड़ी के बचाव में समाचार पत्रों के नाम एक पत्र लिखा। अखबारों में मेरी पगड़ी की खूब चर्चा हुई। 'अनवेलकम विजिटर' (अवांछित अतिथि) शीर्षक से अखवारों में मेरी चर्चा हुई और तीन-चार दिन के अंदर ही मैं अनायास दक्षिण अफ्रीका में प्रसिद्धि पा गया। किसी ने मेरा पक्ष लिया और किसी ने मेरी धृष्टता की खूब निंदा की।

मेरी पगड़ी तो लगभग अंत तक बनी रही। कब गई सो हम अंतिम भाग में देखेंगे।


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