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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 3
साहित्य शास्त्र : सिद्धांत और व्यवहार पक्ष

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

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हमारे मान्य साहित्य विधायकगण,
आज इस प्राचीन वाराणसी पुरी में आप महानुभावों को अपने साहित्य की समृद्धि, प्रसार और परिष्कार के लिए सुशोभित देख हम जिस अपूर्व भाव शबलता का अनुभव कर रहे हैं, उसे शब्दों द्वारा व्यक्त करने का प्रयास तो हम हारकर छोड़ देते हैं। आपका प्रतिभा प्रदीप्त सान्निधय हमें हर्ष से पुलकित कर रहा है। यात्रा के अनेक कष्ट उठाकर आपका यहाँ पधारना हमें कृतज्ञता से झुका रहा है, आपका मातृभाषा प्रेम हमें राजनीति के चक्रों में फँसी हुई अपनी भाषा के क्षेम की आशा बँध रहा है और अपने साहित्य के समृद्धिसाधन के लिए आपकी यह सन्नद्धाता हमें उत्साह से पूर्ण कर रही है। आप भावलोक के प्राणी हैं। अत: आपका सच्चा स्वागत हम अपने हृदय के इन भावों से ही कर सकते हैं। 
इस अत्यंत प्राचीन पुरी की गणना मुख्य तीर्थों और सरस्वती पीठों में होती आई है। हजारों वर्ष से यह संस्कृत विद्या का केन्द्र रहती आई है। 'काशी पढ़ने जाना' पूर्ण पंडित बनने की तैयारी करना समझा जाता रहा है। यहाँ के संस्कृताभिमानी पंडितों द्वारा 'भाषा' का तिरस्कार भी एक पुरानी बात है। भाषा में रामायण लिखने के कारण गोस्वामी तुलसीदासजी की जो उपेक्षा यहाँ के कुछ प्रसिद्ध पंडितों ने की थी, वह उनके जीवन की एक विशेष घटना है। पर यह भी समझ रखना चाहिए कि इस तिरस्कार का सम्यक् परिहार भी इस विचित्र भूमि पर साथ ही साथ होता आया। भगवान् बुद्धा ने इसी काशी के अंतर्गत इसिपतन (सारनाथ) से अपने धर्मचक्र का प्रवर्तन संस्कृत छोड़ पाली भाषा में किया और वह पाली प्रौढ़ होकर बौध्दों की धर्म भाषा और साहित्य भाषा के रूप में विकसित हुई। स्वामी रामानंद ने भक्तिमार्ग में सब जातियों का समन अधिकार घोषित करके हिन्दी साहित्य के भक्ति प्रवाह का उद्गम इसी पुण्य क्षेत्र में प्रतिष्ठित किया। उस उद्गम से एक और तो निर्गुण भक्तिधारा बही, दूसरी ओर सगुण राम भक्तिधारा। पहली धारा को उत्तर भारत में फैलानेवाले कबीरदास इसी काशी के थे। रैदास की भक्ति साधना की भूमि भी यही है। स्वत: रामनन्दजी द्वारा प्रवर्तित दूसरी धारा को अपनी दिव्य वाणी के प्रभाव से समस्त उत्तारापथ में रमा देनेवाले गोस्वामी तुलसीदासजी भी यहीं आकर जमे थे। 
आधुनिक हिन्दी साहित्य का सूत्रपात करनेवाले, हिन्दी गद्य की भाषा का स्वरूप स्थिर करनेवाले भारतेंदु हरिश्चंद्र की जन्मभूमि भी यही है। छायावाद के नाम से प्रसिद्ध हिन्दी काव्य की उस लक्षणा प्रधान नूतन शाखा को स्फुरित करनेवालों में जिसके भीतर अभिव्यंजना के वैचित्रय का बड़ा रमणीय विकास हुआ है, काशी के स्वर्गीय बाबू जयशंकर प्रसादजी का प्रधान स्थान है। उपन्यास सम्राट् स्वर्गीय श्री प्रेमचंदजी भी यहीं के थे। यह सब निवेदन करने का तात्पर्य केवल यही है कि अपनी भाषा और अपने साहित्य की इतनी सेवा तो लोक से न्यारी इस नगरी की है कि इसके हमारे ऐसे निवासी भी अपने को आप महानुभावों के सम्मुख स्वागत करने के लिए खड़े होने का अधिकारी समझें। 
आप हमारे हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि के लिए, उसके विस्तार के लिए, उसके भीतर वर्तमन जगत् की भिन्न भिन्न भावनाओं के संचार के लिए जो कुछ कर रहे हैं, उसके लिए कृतज्ञता प्रकट करके ही यदि हम रह गए; अपनी आवश्यकताओं, अपनी आकांक्षाओं और अपनी आशंकाओं को आपके सामने न रख पाए, तो हाथ में आया हुआ एक बड़ा भारी अवसर हमने खो दिया। अपने साहित्य क्षेत्र के इतने यशस्वी कर्मवीरों को सामने पाकर हमारे लिए यह स्वाभाविक है कि हम अपनी कुछ धारणाएँ और इच्छाएँ भी प्रकट करें क्योंकि उन धारणाओं का संशोधान और उन इच्छाओं की पूर्ति आप ही के द्वारा हो सकती है।
सबसे पहले हम आप महानुभावों के सामने अपनी वह आशंका प्रकट करना चाहते हैं जो वर्तमन राजनीति की गतिविधि देख अपनी भाषा के परंपरागत स्वरूप के संबंध में हो रही है। हजारों वर्ष से हमारी भाषा, उत्तारापथ की और दूसरी भाषाओं के समन, आवश्यकतानुसार संस्कृत पदावली का सहारा लेकर चलती आ रही है। हमारे आधुनिक साहित्य का जब से आरम्भ हुआ तभी से भाषा को विकृत और विकलांग करने का प्रयत्न भी चलने लगा, पर सारे देश के बीच चिरकाल से प्रचलित उसका शिष्ट रूप अनेक विघ्न बाधाओं के बीच अपनी रक्षा करता अब तक चला आया। हम उसकी ओर से अब थोड़ा निश्चिन्त हो रहे थे कि आजकल का प्रकांड राजनीतिक अभिनय हमारे सामने आया, जिसके बीच फिर 'आमफ़हम, मुश्तरक: ज़बान' आदि की पुकार सुनाई देने लगी। इससे अपनी भाषा की स्वरूप रक्षा की चिंता फिर हमें घेर रही है। पर हमें दृढ़ विश्वास है कि आप अपनी भाषा की वह दुर्दशा कभी नहीं देख सकेंगे जो ईरान में फ़ारसी की हुई-जिसके कारण ईरान के स्वदेशभक्तों को अपनी प्रकृत भाषा के उद्धार के लिए इतना प्रयास करना पड़ रहा है।
भाषा के संबंध में इतना निवेदन करने के उपरांत अब हम वर्तमन साहित्य की गति के संबंध में दो चार बातें आपके सामने लाना चाहते हैं। इस समय हमारा साहित्य चार प्रधान शाखाओं में विभक्त होकर चल रहा है-काव्य, उपन्यास, कहानी, निबन्ध और आलोचना। 
काव्य की तीन धाराएँ इस समय थोडी बहुत चल रही हैं। प्रथम तो ब्रजभाषा की पुरानी धारा जो क्रमश: क्षीण होती जा रही है। दूसरी द्विवेदीजी के समय से चली हुई खड़ी बोली की धारा जो क्रमश: परिष्कृत और कई शाखाओं में विभक्त होकर प्रौढ़ता प्राप्त करती चली आ रही है; तीसरी खड़ी बोली की वह नूतन अभिव्यंजना प्रधान धारा जो छायावाद के नाम से प्रसिद्ध है। हमें आज यह देखकर बहुत आनंद होता है कि इन तीनों धाराओं के अनुयायियों के बीच अब पूर्ण सहिष्णुता और उदारता का भाव प्रतिष्ठित हो गया है। एक दूसरे का सम्मान करने की प्रवृत्ति भी अब उनमें जग गई है। यह बहुत कुछ हमारे कवि सम्मेलनों का प्रभाव है। 
हमारे देखने में खड़ी बोली की दोनों धाराओं के बीच मुख्य भेद वस्तु विधान और अभिव्यंजन कला के परिमाण में है। खड़ी बोली की पहली धारा में वस्तु विधान की अनेकरूपता के साथ साथ अभिव्यंजना लगी हुई चलती है। छायावाद कही जानेवाली धारा में अभिव्यंजना का वैचित्रय प्रधान रहता है, वस्तु विधान गौण। पर यह कोई ऐसी बात नहीं जो हममें परस्पर सामंजस्य का भाव बना न रहने दे। हमारे प्रेम और श्रद्धा के पात्र तीनों धाराओं के प्रतिभाशाली कविजन हैं। यदि हम नूतन धारा की कविता की ओर ध्या न देते हैं तो उसका किसी न किसी रूप में आविर्भाव अनिवार्य दिखाई पड़ता है। 
हिन्दी कविता के लिए जब खड़ी बोली ली गई तब उसे हिन्दी के छंदों में ढलते कुछ दिन लगे। इस अभ्यास काल में यह स्वाभाविक था कि पहले भाषा की सफाई पर ही ध्या न रहे। इससे पहले इतिवृत्तात्मक पद्यों के रूप में खड़ी बोली सामने आई। धीरे धीरे उसे इस रूखे सूखे रूप में देख लोग ऊबने लगे। उन्हें उन पद्यों में काव्योपयुक्त पदावली, भावावेश के उन्मुक्त प्रवाह, भाव प्रेरित वक्रता, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय आदि की बहुत कमी दिखाई देती थी। जिनकी दृष्टि बंगभाषा की नूतन कविताओं की ओर भी जाती थी उन्हें यह कमी और भी खटकती थी। कोमलकान्त पदावली तो हरिऔधाजी के 'प्रियप्रवास' में दिखाई पड़ी। पर बात केवल पदावली की ही न थी। धीरे धीरे 'प्रसादजी' तथा बंग भाषा पर दृष्टि रखनेवाले कुछ और कवियों की रचनाओं में भी प्रतिवर्तन के चिह्न लक्षित होने लगे। इस प्रकार भाषा की भावानुकूल उन्मुक्त गति तथा कुछ लाक्षणिक वैचित्रय का आभास हिन्दी कविता में दिखाई पड़ने ही लगा था कि श्री रवींद्र के प्रभाव से आध्याीत्मिक रहस्य के रंग में रंगी कविताओं की धुम हुई और हिन्दी काव्य क्षेत्र में भी उनका प्रवेश होने लगा। 
हमारा विचार है कि आध्याुत्मिक रहस्यवाद का यह नूतन रूप हिन्दी में न भी आता तो भी अभिव्यंजना की वे विशेषताएँ जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है हिन्दी काव्य में स्फुरित होतीं; पर तब शायद 'छायावाद' नाम न आता। पर अब तो वह आ ही गया है, अत: इसका अर्थ स्पष्ट कर रखना चाहिए। 
बात यह है कि छायावाद शब्द काव्यवस्तु से भी सम्बन्ध रखता है और अभिव्यंजन प्रणाली से भी। जहाँ वह वस्तु से सम्बन्ध रखता है वहाँ तो वह रहस्यवाद के अन्तर्गत है, जहाँ अभिव्यंजन प्रणाली से ही सम्बन्ध रखता है वहाँ प्रतीकवाद (Symbolism) और अभिव्यंजनावाद (Expressionism) के अन्तर्गत। नई रंगत की अधिकतर रचनाओं को छायावादी इसी दूसरे अर्थ में कह सकते हैं क्योंकि सबका सम्बन्ध आध्याोत्मिक रहस्यवाद से नहीं रहता। ऐसी कविताओं में कल्पना की उड़ान, लाक्षणिक प्रयोगों की विचित्रता सबसे बड़ी विशेषता होती है। जैसा कि हम अभी कह आए हैं भाषा की भावानुकूल उन्मुक्त गति, कल्पना की उड़ान, लाक्षणिक विचित्रता इत्यादि विशेषताओं का विकास वर्तमन समय में आकर हमारे काव्य क्षेत्र में होता ही, चाहे आध्यातत्मिक रहस्यवाद आता या न आता। इस विकास के बीज हमारे ब्रज भाषा काव्य में भी-विशेषत: घनानंद की रचनाओं में-वर्तमन हैं। घनानंद की कुछ पंक्तियाँ लीजिए-
1. अरसानि गही वह बानि कछू, सरसानि सों आनि निहोरत है। 
2. ह्नैहै सोऊ घरी भाग उघरी अनंदघन सुरस बरसि, लाल! देखिहौ हरीहमैं। 
3. उघरो जग, छाय रहे घनआनंद, चातक ज्यों तकिए अब तौ।
4. झूठ की सचाई छाक्यो, त्यों हित कचाई पाक्यो, ताके गुनगन घनआनंद
कहा कहौं।
5. उजरनि बसी है हमारी ऍंखिआनि, देखौ, सुबस सुदेस जहाँ रावरे बसतहौ।
उध्दृत पंक्तियों में रेखांकित प्रयोगों के लाक्षणिक वैचित्रय की ओर ध्यांन दीजिए।
एक ओर खड़ी बोली की पहली काव्यधारा श्री मैथिलीशरण गुप्त और ठाकुर गोपालशरण सिंहजी ऐसे कवियों के हाथ में पड़कर बहुत कुछ निखरती तथा प्रौढ़ और प्रगल्भ होती चली चल रही है। दूसरी ओर छायावाद के अन्तभूर्त रचनाओं में उक्त पहली धारा से अपनी विशिष्टता को विभिन्नता की हद पर ले जाने की प्रवृत्ति का वेग क्रमश: कम तथा सुव्यवस्थित और सुसंयत रूप देने की रुचि क्रमश: अधिक होती जाती है। श्री सुमित्रनंदन पंत, इस परिषद् के सभापति निरालाजी तथा श्री भगवतीचरण वर्मा ऐसे प्रतिभासंपन्न कवियों की इधर की रचनाओं में इस बात का आभास मिलेगा। इससे पूरी आशा होती है कि खड़ी बोली की दोनों धाराएँ एक दूसरे को देखकर प्रसन्न होती हुई बराबर साथ साथ चली चलेंगी। हम दोनों धाराओं को पूर्ण स्वतन्त्र देखना चाहते हैं, जिसमें किसी को यह कहने का अवसर न मिले कि ''यह ऍंगरेजी के इसका अनुकरण है, वह बंगला के उसका अवतरण है।'' देश की स्वतंत्रता के साथ साथ हमारे साहित्य को भी विदेशी अधिकपत्य से स्वतंत्रता प्राप्त होती जायगी, इसका हमें पूरा भरोसा है। 
अब उपन्यास और छोटी कहानियों के संबंध में भी कुछ बातें आपके विचार के लिए उपस्थित की जाती हैं। इसमें तो संदेह नहीं कि इन दोनों के ढाँचे हमने पश्चिम से लिए हैं। हैं भी ये ढाँचे बडे सुंदर। हम समझते हैं, हमें ढाँचों ही तक रहना चाहिए। पश्चिम में भिन्न भिन्न दृष्टियों से किए हुए उनके वर्गीकरण, उनके संबंध में निरूपित तरह तरह के सिद्धांत भी हम समेटते चलें, इसकी कोई आवश्यकता हमें नहीं दिखाई देती। हम तो समझते हैं कि उपन्यासों और छोटी कहानियों का हमारे वर्तमन हिन्दी साहित्य में इतनी अनेकरूपता के साथ विकास हुआ है कि उनके संबंध में हम कुछ अपने स्वतंत्र सिद्धांत स्थिर कर सकते हैं, अपने ढंग पर उनके भेद उपभेद निरूपित कर सकते हैं। छोटी कहानियों के जो संग्रह निकलते हैं उनमें भूमिका के रूप में ऍंगरेजी पुस्तकों से लेकर कुछ सिद्धांत प्राय: रख दिए जाते हैं। यह देखकर हमें दु:ख होता है, विशेष करके तब जब उन सिध्दांतों से सर्वथा स्वतंत्र कुछ सुंदर कहानियाँ उन संग्रहों के भीतर ही मिल जाती हैं। 
निबंधों के संबंध में पहले तो हमें यह कहना है कि जितनी ही अधिक उनकी आवश्यकता है उतने ही कम वे हमारे सामने आ रहे हैं। दूसरी बात है उनके स्वरूप की। आधुनिक पाश्चात्य कसौटी के अनुसार शुद्ध निबंध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व अर्थात् व्यक्तिगत विशेषता प्रधान हौ। बात तो ठीक है, पर यह व्यक्तिगत विशेषता किन किन बातों में देखी जाय, यह स्पष्ट हो जाना चाहिए। क्या भाषा शैली और अभिव्यंजन प्रणाली ही तक से उसका संबंध माना जाय? अर्थसंबंधी व्यक्तिगत विशेषता आवश्यक न समझी जाय? इस संसार की हर एक बात और सब बातों से सम्बद्धा है। अपने अपने मनसिक संघटन के अनुसार किसी का मन किसी संबंध सूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर। ये संबंध सूत्र पीपल के पत्तोंन के भीतर की नसों के समन एक दूसरे से नथे हुए चारों ओर जाल की तरह अनंतता तक फैले हैं। निबंध लेखक किसी बिंदु से चलकर तार्किकों के समन किसी एक ओर सीधा न जाकर अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से कभी इधर कभी उधर मुड़ता हुआ नाना अर्थ संबंध सूत्रों पर विचरता चलता है। यही उसकी अर्थ संबंधी व्यक्तिगत विशेषता है। एक ही बात को कई लेखकों का भिन्न भिन्न दृष्टियों से देखना भी यही है। 
हमारी समझ में इस अर्थ संबंधी व्यक्तिगत विशेषता के आधार पर ही भाषा और अभिव्यंजन प्रणाली की विशेषता-शैली की विशेषता-दृढ़ता के साथ खड़ी हो सकती है। जहाँ नाना अर्थसंबंधों के वैचित्रय का आधार न रहेगा वहाँ केवल भाषा या शैली का निराधार वैचित्रय किसी को विचार ऋंखला न रखने में लगाएगा, किसी को वह ऋंखला बीच बीच में तोड़ने के लिए उभारेगा, किसी को भाषा से सर्कस वालों की सी कसरत या हठयोगियों के से आसन कराने में प्रवृत्त करेगा। सीधा ढंग से यों कह सकते हैं कि निबंधों में व्यक्तिगत वैचित्रय के लिए उत्तरोत्तर जुड़ती चलती हुई बातों की विचित्रता पहले होनी चाहिए। बात की विचित्रता पर टिकी भाषा की विचित्रता ही पूरा प्रभाव डालती है और मन अपनी ओर लगाए रहतीहै।
इधर कुछ दिनों से गद्यकाव्य के रूप में भावात्मक निबंधों का चलन हो गया है। गद्य साहित्य का यह रूप भी वांछनीय है। पर सारे प्रबंध ही इस रूप में लिखे जायँ, यह भाषा की शक्ति के सर्वतोमुख विकास के लिए ठीक नहीं जान पड़ता। 
समालोचना के संबंध में हमें इतना ही कहना है कि इधर शुद्ध समालोचनाएँ कम और भावात्मक समालोचनाएँ (Impressionist Criticism) बहुत अधिक देखने में आती हैं जिनमें कवियों की विशेषताएँ हमारे सामने उतनी नहीं आतीं जितनी आलोचकों की अपनी भावनाओं की अलंकृत छटा। पर किसी कवि की आलोचना कोई इसीलिए पढ़ने बैठता है कि उस कवि के लक्ष्य को, उसके भाव को ठीक ठीक हृदयंगम करने में सहारा मिले; इसलिए नहीं कि आलोचक की भावभंगी और पद विन्यास द्वारा अपना मनोरंजन करे। हमें पूरा विश्वास है कि शुद्ध समालोचना की ओर अधिक ध्यायन दिया जायगा। 
अंत में हमारी आप महानुभावों से यही प्रार्थना है कि आप हममें साहित्य संबंधि स्वतंत्रता का ऐसा भाव जगा दें कि यूरोप में हर एक उठी हुई बात की ओर लपकना छोड़ दें; समझ बूझकर उन्हीं बातों को ग्रहण करें जिनका कुछ स्थायी मूल्य हो, जो हमारी परिस्थिति के अनुकूल हों। यूरोप की दशा तो आजकल यह हो रही है कि वहाँ जीवन के हर एक विधान से उसे धारण करनेवाला शाश्वत तत्व निकलता जा रहा है। क्या राजनीति, क्या समाज, क्या साहित्य सब डगमगा रहे हैं। रूस के बोल्शेविकों की बात सुनिए तो बड़ी उपेक्षा से अब तक के सारे साहित्य को ऊँचे वर्ग के लोगों का साहित्य बताकर बढ़ैयों, लोहारों और मजदूरों के साहित्य का आसरा देखने को कहेंगे। जर्मनी की ओर दृष्टि दौड़ाइए तो वहाँ केवल नात्सी सिध्दांतों का समर्थक साहित्य ही सिर उठा सकता है। फ्रायड साहब अभी मरे हैं जिनकी समझ में स्वप्न भी हमारी अतृप्त वासनाओं के तृप्तिविधान के छायामय रूप हैं और काव्यादि कलाएँ भी हमारी अतृप्त कामवासनाओं की तृप्ति के विधान हैं। अब हमारे लिए समझने की बात यह है कि क्या हमें इन सब बातों को ज्यों का त्यों लेते हुए अपने साहित्य का निर्माण करते चलना चाहिए अथवा संसार के भिन्न भिन्न देशों की भिन्न भिन्न प्रवृत्तियों की समीक्षा करते हुए अपनी वाह्य और आभ्यंतर परिस्थिति के अनुसार उसके स्वतंत्र मार्ग निकालते रहना चाहिए। 
ये दो चार बातें विचार के लिए सामने रखकर अब हम आप महानुभावों को यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाने के लिए भूरि भूरि धन्यवाद देते हैं और जो कुछ भूलें या त्रुटियाँ हमसे हुई हैं उनके लिए बारबार क्षमा माँगते हैं। 
(अट्ठाइसवाँ अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, साहित्य परिषद्, स्वागताधयक्ष का भाषण, आश्विन सौर मंगलवार 17 अक्टूबर, 1939)
[चिन्तामणि, भाग-3]


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