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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 3
साहित्य शास्त्र : सिद्धांत और व्यवहार पक्ष

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम युग प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र पीछे     आगे

हिन्दी गद्य साहित्य का सूत्रपात करनेवाले चार महानुभाव कहे जाते हैं मुंशी सदासुख लाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लू लाल और सदल मिश्र। ये चारों सं. 1860 के आसपास वर्तमान थे। सच पूछिए तो ये गद्य के नमूने दिखानेवाले ही रहे, अपनी परंपरा प्रतिष्ठित करने का गौरव इनमें से किसी को भी प्राप्त न हुआ। हिन्दी गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का प्रवर्तन इन चारों लेखकों के 70-72 वर्ष पीछे हुआ। विक्रम की बीसवीं शताब्दी का प्रथम चरण समाप्त हो जाने पर जब भारतेंदु ने हिन्दी गद्य की भाषा को सुव्यवस्थित और परिमार्जित करके उसका स्वरूप स्थिर कर दिया तब से गद्य साहित्य की परम्परा लगातार चली। इस दृष्टि से भारतेंदुजी जिस प्रकार वर्तमान गद्य भाषा के स्वरूप प्रतिष्ठापक थे, उसी प्रकार वर्तमान साहित्य परंपरा के प्रवर्तक। जिस समय राजा लक्ष्मण सिंह और राजा शिवप्रसाद मैदान में आए थे उस समय खींचतान बनी थी, भाषा के स्वरूप को स्थिरता नहीं प्राप्त हुई थी। यह भाषा का प्रस्ताव काल था। प्रवर्तन काल का आरंभ भारतेंदु की कुछ रचनाओं के निकल जाने के उपरांत सं. 1930 के लगभग हुआ। यद्यपि इसके पहले 'विद्यासुन्दर' (सं. 1925) तथा और कई नाटक भारतेंदुजी लिख चुके थे, पर वर्तमान हिंदी गद्य के उदय का समय उन्होंने 'हरिश्चंद्र मैगजीन' के निकलने पर अर्थात् सं. 1930 से माना है।
भारतेंदु की भाषा में ऐसी क्या विशेषता पाई गई कि उसका इतना चलन उन्हीं के सामने हो गया, इसका थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। सं. 1860 में खड़ी बोली के गद्य का सूत्रपात करनेवालों में मुंशी सदासुख और सदल मिश्र ने ही व्यवहार योग्य चलती भाषा का नमूना तैयार किया था। पर इन दोनों की रचनाओं में सफाई नहीं थी। बहुत कुछ कूड़ा करकट भरा था। मुंशी सदासुख भगवद्भक्त पुरुष थे और पंडितों तथा साधु संतों के सत्संग में रहा करते थे। इससे उनके 'सुखसागर' की भाषा में बहुत कुछ पंडिताऊपन है। इसके अतिरिक्त ब्रजभाषा या काव्यभाषा के ऐसे ऐसे प्रयोग, जैसे 'फ़ूलन्ह के' 'चहुँदिशि' 'सुनि' भी लगे रह गए हैं।
इन दोनों के पीछे राजा शिवप्रसाद और लक्ष्मण सिंह का समय आता है। राजा शिवप्रसाद के गद्य में अधिक खटकने वाली बात थी उर्दूपन, जो दिन दिन बढ़ता गया। इसी प्रकार राजा लक्ष्मण सिंह के गद्य में खटकने वाली बात थी आगरे की बोलचाल का पुट। दूसरी बात यह थी कि विशुद्धता का जो आदर्श लेकर राजा लक्ष्मण सिंह चले थे यह एक चलती व्यावहारिक भाषा के उपयुक्त न था। फारसी अरबी के जो शब्द लोगों की जबान पर नाचा करते थे उन्हें एकदम छोड़ देना भाषा की संचित शक्ति को घटाना था। हँसी मजाक के लिए अरबी फारसी के चलते शब्द कभी कभी कितना अच्छा काम देते हैं यह हम लोग बराबर देखते हैं।
ऊपर लिखी त्रुटियों को ध्यान में रखते हुए जब हम भारतेंदु की भाषा पर विचार करने बैठते हैं तब इस बात को समझना कुछ सुगम हो जाता है कि उन्होंने हिन्दी गद्य का क्या संस्कार किया। उनकी भाषा में न तो लल्लूलाल का व्रजभाषापन आने पाया, न मुंशी सदासुख का पंडिताऊपन, न सदल मिश्र का पूरबीपन, न राजा शिवप्रसाद का उर्दूपन और न राजा लक्ष्मण सिंह का खालिसपन और आगरापन। इतने 'पनों' से एक साथ पीछा छुड़ाना भाषा के संबंध में बहुत ही परिष्कृत रुचि का परिचय देता है। संस्कृत शब्दों के रहने पर भी भाषा का सुबोध बना रहना, फारसी अरबी के शब्द आने पर भी साथ साथ उर्दूपन न आना, हिन्दी की स्वतंत्र सत्ता का प्रमाण था। उनका भाषा संस्कार शब्दों की काटछाँट तक ही नहीं रहा। वाक्य विन्यास में भी वे बड़ी सफाई लाए। उनकी लिखावट में एक साथ न जुड़ सकने वाले वाक्य एक में गुँथे हुए प्राय: नहीं पाए जाते। तात्पर्य यह है कि उपयुक्त संयोजक अव्ययों का व्यवहार जैसा उन्होंने चलाया वैसा उनके पहले न था। विराम की परख भी उन्हें राजा लक्ष्मण सिंह और राजा शिवप्रसाद सिंह से कहीं अच्छी थी। 
चली आती हुई काव्यभाषा के स्वरूप पर भी उनकी दृष्टि गई। उन्होंने देखा कि बहुत से ऐसे शब्द जिन्हें बोलचाल से उठे कई सौ वर्ष हो गए थे, कविताओं में बराबर लाए जाते हैं, जिससे वे सर्वसाधारण के लगाव से कुछ दूर पड़ती जाती है। 'ठायो', 'करसायल' 'ईठ', 'दीह', 'ऊनी', 'लोय' आदि के कारण बहुत से लोग हिन्दी कविता को अपने से कुछ दूर की चीज समझने लगे थे। दूसरा दोष जो बढ़ते बढ़ते बहुत बुरी हद तक पहुँच गया था वह शब्दों का तोड़ मरोड़ था।
बाबू हरिश्चंद्र द्वारा इन बातों का भी बहुत कुछ सुधार चाहे जान में या अनजान में हुआ। इस प्रकार काव्य की व्रजभाषा के लिए भी उन्होंने बहुत अच्छा रास्ता दिखाया। अपने रसीले कवित्तों और सवैयों में उन्होंने चलती भाषा का ही व्यवहार किया है,जैसे
आजु लौं जौ न मिले तौ कहा, हम तौ तुम्हरे सब भाँति कहावैं।
मेरो उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावैं॥
जो 'हरिश्चंद्र' भई सो भई अब प्रान चले चहैं तासों सुनावैं।
प्यारे जू! है जग की यह रीति, विदा के समय सब कंठ लगावैं॥
यह तो हुई भाषा की रूप प्रतिष्ठा की बात। इससे भी बढ़कर काम उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नए मार्ग पर खड़ा करके किया। वे साहित्य के नए युग के प्रवक्ता हुए। यद्यपि देश में नएनए विचारों और भावनाओं का संचार हो गया था, पर हिन्दी उनसे दूर थी। लोगों की अभिरुचि बदल चली थी, पर हमारे साहित्य पर उनका कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता था। शिक्षित लोगों के विचारों और व्यापारों ने तो दूसरा मार्ग पकड़ लिया था, पर उनका साहित्य उसी पुराने मार्ग पर था।
बात यह थी कि जिन लोगों के मन में नई दिशा के प्रभाव से नए विचार उत्पन्न हो रहे थे, जो अपनी ऑंखों काल की गति देख रहे थे और देश की आवश्यकताओं को समझ रहे थे, उनमें अधिकांश तो ऐसे थे जिनका कई कारणों से विशेषत: उर्दू के बीच में पड़ जाने से हिन्दी साहित्य से लगाव छूट सा गया था और शेष जिनमें नवीन भावों की कुछ प्रेरणा और विचारों की कुछ स्फूर्ति थी ऐसे थे जिन्हें हिन्दी साहित्य का क्षेत्र इतना परिमित दिखाई देता था कि नए नए विचारों को सन्निविष्ट करने के लिए स्थान ही नहीं सूझता था। उस समय एक ऐसे सामंजस्य पटु, साहसी और प्रतिभासंपन्न पुरुष की आवश्यकता थी जो कौशल से इन बढ़ते हुए विचारों का मेल देश के परंपरागत साहित्य से करा देता। ऐसे ही पुरुष के रूप में बाबू हरिश्चंद्र साहित्य क्षेत्र में उतरे। उन्होंने हमारे जीवन के साथ हमारे साहित्य को फिर से लगा दिया। बड़े भारी विच्छेद से उन्होंने हमें बचाया।
वे सिद्ध वाणी के अत्यन्त सरस हृदय कवि थे। इससे एक ओर तो उनकी लेखनी से श्रृंगार रस के रसपूर्ण मर्मस्पर्शी कवित्त सवैये निकलते थे जो उनके जीवन काल में ही इधर उधर लोगों के मुँह से सुनाई पड़ने लगे थे और दूसरी ओर स्वदेश प्रेम से भरे हुए उनके लेख और कविताएँ चारों ओर देश के मंगल का मंत्र सा फूँकती थीं। साहित्य के एक नवीन युग के आदि में प्रवर्तक के रूप में खड़े होकर उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि नए नए या बाहरी भावों को पचाकर इस ढंग से मिलाना चाहिए कि वे अपने ही साहित्य के विकसित अंग से लगें। प्राचीन और नवीन के उस सन्धिकाल में जैसी शीतल और मृदुल कला का संचार अपेक्षित था वैसे ही शीतल और मृदुल कला के साथ भारतेंदु का उदय हुआ, इसमें संदेह नहीं। 

(वीणा, सितम्बर 1935 ई.)

स्वर्णकलश




जो रस प्रबन्ध काव्यों में धारा के रूप में बहता है वही मुक्तक पद्यों की छोटी छोटी नलिकाओं से पिचकारी की तरह छूटता है। यह पिछला ढंग समाज और जलसों के अधिक अनुकूल पड़ता है। इसी से प्रबन्धों के साथ साथ मुक्तकों की परंपरा भी बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। हिन्दी के पुराने कवियों ने साहित्य ग्रन्थों में निरूपित रस के अवयव के क्रम से अपनी फुटकल रचनाओं के सन्निवेश की जो परिपाटी चलाई वह बहुत दिनों तक हिन्दी साहित्य में चलती रही है। आजकल हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित पुराने कवियों में इस काव्य के आधुनिक मार्ग पर जिन्हें पाते हैं उनमें से कई एक उस पुरानी परिपाटी पर अत्यंत रसमयी रचना कर चुके हैं। ऐसे कवियों में आधुनिक काव्य क्षेत्र के महारथी 'हरिऔध' जी प्रमुख हैं। आजकल लोग प्राय: खड़ीबोली के कई रूपों की झलक दिखाने वाले उनके उन प्रौढ़, सरस और मधुसिक्त काव्यों से ही परिचित हैं जिन्होंने खड़ी बोली काव्य के गौरवपूर्ण भविष्य को स्थिर किया है। उनकी व्रजभाषा की नई और पुरानी कविताओं के माधुर्य के आस्वादन का सौभाग्य बहुत लोगों को प्राप्त नहीं हुआ था। मेरी बहुत दिनों से इच्छा थी कि हरिऔधजी की व्रजभाषा की माधुरी भी लोगों को सुलभ हो जाय। सौभाग्य से मेरी इच्छा पूरी हुई। व्रजभाषा का रसभरा स्वर्णकलश सामने आया।
रस ही काव्य का प्राण या आत्मा कहा गया है। अलंकार आदि उसी के भीतर अपनी शोभा का रमणीय प्रकाश करते हैं। उससे विच्छिन्न होकर वे चमकीली वस्तुओं के निर्जीव ढेर से जान पड़ते हैं। रस भरे हृदय और रस भरी ऑंखों के लिए यह सारी सृष्टि रसमयी है। रस की कच्ची सामग्री प्रत्येक घर के भीतर रहती है। पर उसे रस रूप में परिणत करने वाला प्रभाव कवियों की वाणी द्वारा प्राप्त होता है जो उसे शब्दों से खोद कर कल्पना और भावों की रसविधायिनी क्रिया में तत्पर करती है। अत: और बातों के अतिरिक्त कवियों में ये बातें अवश्य होनी चाहिए। भाव प्रवणता, प्रतिभा या कल्पना, शब्द धन तथा उसके उपयोग की प्रत्युत्पत्ति।
हरिऔधजी शब्दों के कितने बड़े धनी हैं यह उनके प्रियप्रवास आदि काव्यों का अनुशीलन करने वाले जानते ही हैं। खड़ी बोली से जब उनकी कोमल कान्त पदावली इतनी मिठास घोल देती है तब स्वभावत: कोमल और मधुर व्रजभाषा के बीच उसकी छटा का क्या कहना। रीतिग्रन्थ माला अब इस युग में समाप्त हो गई। अत: उसके लिए जैसे सुमेरु की आवश्यकता थी वैसा ही सुमेरु इसमें पिरो दिया गया। रसकलश में हरिऔधजी ने काव्य की प्रतिष्ठित परंपरा को चरम उत्कर्ष पर पहुँचा कर छोड़ दिया। हिन्दी के पुराने ग्रन्थों में नायिका भेद ही वास्तव में रहता था। और रस प्राय: एक एक उदाहरण देकर किसी प्रकार चलता कर दिए जाते थे। रस के अवयवों पर भी पूरा ध्यान नहीं दिया जाता था। पर इस कलश के भीतर जिस प्रकार और रसों का भी पूरा समावेश है उसी प्रकार रस के अवयवों की भी निराली छटा है। इस रसकलश की स्थापना आधुनिक काल में हुई है। अत: इसमें आधुनिकता का रंग बिना कुछ घुले कैसे रह सकता था। जबकि अवस्था, प्रकृति आदि के विचार से नायिकाओं के इतने भेद किए गए हैं तब और भेदों की संभावना की ओर ध्यान जाना आवश्यक ही है। देश प्रेम, जाति प्रेम आदि का पुनीत स्रोत आज कितने ही हृदयों से फूट कर जनता के जीवन की गतिविधि निर्दिष्ट कर रहा है। अत: हरिऔधजी ने इन नूतन भावों से अलंकृत नायिकाओं के लिए भी स्थान निकाल कर रसज्ञों के निकट विचार के लिए एक विषय उपस्थित कर दिया है। देशप्रेम और जातिप्रेम भी प्रेम का एक प्रकार ही है। यह एक ऐसे गुण के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है कि जिससे नायिका का उत्कर्ष साधन होता है और वह श्रृंगार की भी नायिका बनी रहती है।
रसकलश में हरिऔधजी ने जो विचारपूर्ण भूमिका लगा दी है उससे रस के सम्बन्‍ध में लोगों को बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हो सकती है। अन्त में वही कहना पड़ता है कि व्रजभाषा की काव्य परंपरा का अत्यंत पूर्णता पर पहुँचा हुआ रूप दिखाकर हरिऔधजी ने एक बार फिर शिक्षित समाज को उसकी ओर आकर्षित कर लिया है।
('प्रेम पत्र', अंक 4 पूर्णांक 5 शुक्ला द्वितीय श्रावण, 1934 ई.)
[चिन्तामणि, भाग-4]

[ 'रसकलश' अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कृति है। नेता, लेखक एवं संपादक वेंकटेश नारायण तिवारी ने इस पुस्तक के संबंध में दो लेख लिखे थे। एक लेख का शीर्षक था 'हरिऔध जी का बुढ़भस'। इसी से इन लेखों की विचारधारा स्पष्ट हो जाती है। इसी पर गिरिजादत्त शुक्ल 'गिरीश' ने अरुणोदय पब्लिशिंग हाउस, इलाहाबाद से 'प्रेम-पत्र' का एक विशेषांक (अंक 4, पूर्णांक 5, शुक्ला द्वितीय श्रावण) रसकलश पर 1934 ई. में निकाला था। इस अंक में आचार्य शुक्ल का 'स्वर्णकलश' शीर्षक यह लेख प्रकाशित है। ]


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