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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम सोलहवाँ प्रकरण - ज्ञान और विश्वास पीछे     आगे

सत्य की खोज करना ही सच्चे विज्ञान का काम है। प्रत्येक विज्ञान इस बात का प्रयत्न करता है कि सत्य का ज्ञान प्राप्त हो। प्रकृति का ज्ञान ही हमारा वास्तव ज्ञान है। यह उन अन्तराभासों से संघटित होता है जिनका वाह्यपदार्थों से बिम्बप्रतिबिम्ब सम्बन्ध होता है। यह ठीक है कि हमारी बुद्धि इस जगत् की आभ्यन्तर सत्ता या वास्तविक स्वरूप तक नहीं पहुँच सकती, पर विशुद्ध विज्ञानदृष्टि से विचार करने पर हम देखते हैं कि ज्ञानेन्द्रियों और मस्तिष्क की अविकृत क्रियाओं के द्वारा, वाह्य जगत् के जो अनुभव होते हैं वे सब मनुष्यों में समान होते हैं और अन्त:करण की अविकृत क्रियाओं के द्वारा, कुछ ऐसे अन्तराभास उत्पन्न होते हैं जो सर्वत्रा एक होते हैं। ऐसे अन्तराभासों को हम 'सत्य' कहते हैं क्योंकि हमें इस बात का निश्चय रहता है कि वे वस्तुओं के ज्ञेय स्वरूप के ठीक ठीक प्रतिबिम्ब हैं।
सत्य का सारा ज्ञान दो विभिन्न, परस्परसम्बद्ध, शरीरव्यापारों पर निर्भर है, वाह्यार्थ या विषय के इन्द्रियानुभव पर जो इन्द्रियों की क्रियाओं द्वारा प्राप्त होता है, और इन्द्रियानुभावों की योजना द्वारा संघटित और स्वयं द्रष्टा या विषयी ही में उपस्थित अन्तराभास पर। इन्द्रियानुभव जिनके द्वारा होते हैं उन्हें वाह्यकरण अर्थात ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं और अन्तराभासों को जो ग्रहण और संयोजित करते हैं उन्हें अन्त:करण कहते हैं। वाह्यकरण विज्ञानमयकोश के ऊपरी तल के अंश हैं और अन्त:करण भीतरी केन्द्रस्थान के। इसी जटिल मनोविज्ञानमय कोश के द्वारा समस्त मनोव्यापार होते हैं।
मनुष्य के इन्द्रियव्यापार बनमानुसों के इन्द्रियव्यापार के समुन्नत रूप हैं। जिस प्रकार बनमानुसी शरीर से क्रमश: उन्नत होते होते मानव शरीर का विकास हुआ है उसी प्रकार बनमानुसी इन्द्रियव्यापारों से मनुष्य के इन्द्रियव्यापारों का विकास हुआ है। किंपुरुष वर्ग जिसके अन्तर्गत बन्दर, बनमानुस और मनुष्य हैं, के सब प्राणियों की इन्द्रियों की बनावट एक ही ढाँचे की होती है। जिन भौतिक और रासायनिक नियमों के अनुसार एक के इन्द्रियव्यापार होते हैं उन्हीं के अनुसार दूसरे के भी। जिस क्रम से और जिन अवस्थाओं में होते हुए एक के इन्द्रियव्यापार गर्भावस्था से क्रमश: वृद्धि को प्राप्त होते हैं उसी क्रम से और उन्हीं अवस्थाओं में होते हुए दूसरे के भी। प्रारम्भ में सम्पुर्ण त्वचा ही वाह्यकरण अर्थात ज्ञानेन्द्रियों का काम देता है। भ्रूण की ऊपरी कला (झिल्ली) के जो संवेदनात्मक घटक होते हैं वे ही ज्ञानेन्द्रियों के मूल हैं। भिन्न भिन्न विषयों प्रकाश, शब्द, ताप आदि को विशेष रूप से ग्रहण करने के कारण वे मिलकर विशिष्ट इन्द्रियों के रूप में हो जाते हैं। जिस विषय का जिन घटकों के साथ अधिक संयोग हुआ उसे ग्रहण करने ही के उपयुक्त वे हो गए। नेत्रापटल के शलाकाघटक, कानों के भीतर के श्रोत्राघटक, नाक भीतर के घ्राणघटक, जिह्ना पर के रसघटक, सबके सब आंरभ में ऊपरी झिल्ली के घटक थे और उसपर सर्वत्रा फैले थे। मनुष्य तथा और दूसरे उन्नत जीवों के भ्रूणवृद्धिक्रम को ध्यानपूर्वक देखने से इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाता है। पहले कहा जा चुका है कि गर्भाधान के उपरान्त किसी एक जीव के उत्तरोत्तर एक अवस्था से दूसरी अवस्था में होते हुए विकास का जो क्रम है, वही क्रम एक प्रकार के जीवों से दूसरे प्रकार के जीवों के उत्पन्न होने का भी है। सामान्य कलाकोश या झिल्ली की थैली के रूप के जो क्षुद्र आदिम जीव थे जैसे पेट के केंचुए आदि, उनमें भिन्न भिन्न इन्द्रियों का विभाग नहीं था। उनकी बाहरी झिल्ली में जो संवेदनग्राही घटकों की तह थी उन्हीं से सर्वत्रा समानरूप में संवेदन व्यापार होता था। विकास क्रमानुसार उन क्षुद्र जीवों से ज्यों ज्यों उत्तरोत्तर उन्नत जीवों की उत्पत्ति होती गई त्यों त्यों उनके त्वचा के घटक इस प्रकार विभक्त होते गए कि कुछ केवल एक प्रकार का संवेदन ग्रहण करने लगे और कुछ दूसरे प्रकार का। कुछ प्रकाश को ग्रहण करने लगे, कुछ शब्द को और कुछ गन्धा को। इस प्रकार इन भिन्न भिन्न प्रकार के घटकों की योजना से उन्नत जीवों में भिन्न भिन्न प्रकार के संवेदनसूत्रों और ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति हुई। एक प्रकार के संवेदनसूत्रा से वाह्य पदार्थ के एक ही गुण का ग्रहण होता है, और का नहीं। आँख में जो संवेदनसूत्रा हैं उनसे रूप ही का, कान में जो हैं उनसे शब्द ही का, नाक में जो हैं उनसे गन्धा ही का बोध होगा।
संवेदनसूत्रों की इस विशेषधर्मता से, उनके विशेष विशेष गुणों को ही ग्रहण करने की शक्ति रखने से, लोगों ने कई प्रकार के भ्रान्त सिद्धांत निकाले। बहुतों ने यह कहना आंरभ किया कि मस्तिष्क या आत्मा को संवेदनसूत्रा की विशेष अवस्था ही का बोध हो सकता है अत: उसकी इस क्रिया द्वारा वाह्यपदार्थ के अस्तित्व और वास्तव स्वरूप के विषय में कोई सिद्धांत नहीं स्थिर किया जा सकता। संशयवादियों ने वाह्य जगत् के होने तक में सन्देह प्रकट किया और मायावादियों ने तो उसका होना अस्वीकार ही कर दिया।
इस प्रकार के मत भ्रम से उत्पन्न हुए हैं। सबसे पहले तो समझने की बात यह है कि भिन्न भिन्न संवेदनसूत्रों के जो 'विशेष धर्म' कहे जाते हैं वे उनके मूल गुण नहीं हैं बल्कि ऊपरी झिल्ली के घटकों के क्रमश: एक एक विषय में अधिकाधिक अभ्यस्त होने से प्राप्त हुए हैं। आंरभ में ऊपरी झिल्ली के ये घटक भिन्न भिन्न विषयों को ग्रहण करने के लिए अलग अलग वर्गों में विभक्त नहीं थे, सबमें सब विषयों को अत्यंत अल्प परिमाण में ग्रहण करने की समान शक्ति थी। क्रमश: कुछ घटक एक विषय के रूप मे करने में अभ्यस्त होते गए और कुछ दूसरे विषय के। कुछ घटक प्रकाशरश्मियों को ही ग्रहण करने के योग्य हो गए, कुछ शब्दतरंगों को, कुछ गन्धा के रासायनिक उत्तोजन को, इत्यादि। इस प्रकार कार्यविभाग हो जाने से विषयों को ग्रहण करने की शक्ति क्रमश: तीव्र होती गई और एक एक विषय को ग्रहण करने वाले घटकों की अलग अलग योजना और स्थिति से ऊपरी झिल्ली के बनावट में भी विभेद पड़ते गए। प्राकृतिक ग्रहण प्रवृत्ति द्वारा ये विभेद उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करते गए और आँख, कान आदि भिन्न भिन्न इन्द्रियों का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार भिन्न भिन्न इन्द्रियों के संवेदनसूत्रा और उनके विशेष विशेष धर्म उत्तरोत्तर अभ्यास द्वारा प्रादुर्भूत हुए हैं और प्रादुर्भूत होकर वंशपरम्परा के नियमानुसार पीढ़ी दर पीढ़ी बराबर चले आ रहे हैं।
मनुष्यों के इन्द्रियव्यापारों को और दूसरे रीढ़वाले जंतुओं के इन्द्रियव्यापारों के साथ ध्यानपूर्वक मिलाने से कई बातें मालूम होती हैं। ज्ञान और भावुकता के सबसे बड़े कारण आँख और कान ही को ले लीजिए। और जंतुओं के आँख कान से रीढ़वाले जंतुओं के आँख कान की बनावट भी भिन्न और पेचीली होती है और गर्भ में उनकी वृद्धि भी विशेष प्रकार से होती है। सब मेरुदंड जीवों की इन्द्रियों के ढाँचे और उनकी गर्भवृद्धि के क्रम को देखने से यही निश्चय होता है कि वे एक ही मूल जीव से उत्पन्न हुए हैं। मेरुदंड वर्ग के जीवों में भी कई प्रकार के ढाँचे देखने में आते हैं। यह विभिन्नता भिन्न भिन्न परिस्थिति में पड़ने और तदनुसार 

1 सांख्यशास्त्र में अव्यक्त प्रकृति से सृष्टि की उत्पत्ति का जो क्रम निर्धारित किया गया है उसमें एक ही मूल इन्द्रिय से क्रमश: और इन्द्रियों की उत्पत्ति नहीं मानी गई है, बल्कि अहंकार से पहले पाँचों सूक्ष्म इन्द्रियाँ और फिर पाँच स्थूल इन्द्रियाँ सब की सब एक साथ और एक दूसरे से स्वतन्त्र उत्पन्न हुईं, ऐसा कहा गया है। सांख्य में जिस प्रकार इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धा, तन्मात्रा रूप से अर्थात परस्पर अभिश्रित और सूक्ष्म मूलरूप में एक साथ उत्पन्न माने गए हैं उसी प्रकार उनको ग्रहण करनेवाली पाँचों इन्द्रियाँ भी। पर सृष्टितत्व के आधिभौतिक आचार्यों ने परीक्षा द्वारा यह निश्चित किया है कि आंरभ में त्वचा ही एक मूल इन्द्रिय थी जिससे और इन्द्रियाँ क्रमश: उत्पन्न हुई हैं, जैसे त्वचा पर प्रकाश का संयोग होते होते आँख उत्पन्न हुई। इस पर सांख्यवादी यह कह सकते हैं कि मूल प्रकृति में यदि भिन्न भिन्न इन्द्रियों के उत्पन्न होने की शक्ति न हो तो क्षुद्र कीटों की त्वचा पर प्रकाश का चाहे जितना आघात या संयोग होता रहे तो भी उन्हें आँखें नहीं उत्पन्न हो सकतीं। उत्पन्न होने की शक्ति तो आधिभौतिक तत्वज्ञ भी मानते हैं पर उनका कहना है कि यह शक्ति अस्पष्टरूप में थी विशिष्ट या पृथक् रूप में नहीं थी।

भिन्न भिन्न प्रकार से जीवननिर्वाह करने के कारण उत्पन्न हुई है। परिस्थिति के अनुसार किसी को किसी इन्द्रिय का अधिक उपयोग करना पड़ा और किसी का कम। इस प्रकार मेरुदंड वर्ग में भिन्न भिन्न आकार और प्रकार की इन्द्रियों वाले भिन्न भिन्न जीव उत्पन्न हुए। मनुष्य, कुत्तो, बिल्ली, बैल आदि के आँख, कान की रचना और शक्ति में भेद दिखाई पड़ता है।
मनुष्य सबसे उन्नत प्राणी है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी इन्द्रियाँ सबसे अधिक पूर्ण हैं। गीधा की दृष्टि मनुष्य की दृष्टि से कहीं अधिक तीव्र होती है। जितनी दूर की चीजें उसकी आँखें देख सकती हैं उतनी दूर की चीजें मनुष्य की भी आँखें नहीं देख सकतीं। स्तन्यजंतुओं में शेर, भेड़िए आदि हिंसक जंतुओं, खुरवाले जंतुओं और कुतरनेवाले जंतुओं, जैसे चूहों, गिलहरियों आदि की श्रवणशक्ति मनुष्य की श्रवणशक्ति से कहीं अधिक तीव्र होती है। उनके कानों के भीतर की कुंडली को देखने से ही इसका पता लग जाता है। कोकिल आदि पक्षियों की वाणी कोमल संगीत स्वर निकालने में मनुष्य की वाणी से श्रेष्ठ होती है। कुत्तो यदि मनुष्य की घ्राणशक्ति को अपनी घ्राणशक्ति से मिलावें तो उन्हें मनुष्यों पर दया आ सकती है। इसी प्रकार रसना, काम वेदना, स्पर्श आदि की शक्तियों के विषय में भी कह सकते हैं कि वे कुछ जंतुओं में जितनी तीव्र हैं उतनी मनुष्य में नहीं।
हम उन्हीं संवेदनों के विषय में कुछ कह सकते हैं जिनका हमें अपनी इन्द्रियों के द्वारा अनुभव होता है। पर अंगविच्छेद परीक्षा द्वारा बहुत से जंतुओं में कुछ और ऐसी इन्द्रियाँ पाई गई हैं जिनसे हम परिचित नहीं। मछलियों तथा कुछ और जलजंतुओं की त्वचा में कुछ ऐसे इन्द्रियगोलक होते हैं जो विशेष प्रकार के संवेदनसूत्रों से सम्बद्ध होते हैं। मछली के दाहिने और बाएँ एक एक लम्बी नली होती है जिससे और छोटी छोटी नलियाँ शाखा के रूप में निकली होती हैं। इन नलियों में एक विशेष प्रकार के संवेदन सूत्रहोते हैं जो स्थलचारी जंतुओं में नहीं पाए जाते। इन संवेदन सूत्रों के बाहरी छोर पर अनुभवात्मक इन्द्रियगोलक होते हैं। यह शरीरव्यापी इन्द्रिय शायद जल के दबाव तथा उसके और गुणों के अनुभव के लिए होती है। कुछ जाति की मछलियों में कुछ और भी इन्द्रियगोलक होते हैं जिनका क्या उपयोग है हम नहीं कह सकते।
इन बातों से यह स्पष्ट है कि मनुष्य के इन्द्रियानुभव परिमित हैं। पहले तो जितनी इन्द्रियाँ उसे प्राप्त हैं उनके द्वारा पदार्थों के सब गुणों का अनुभव नहीं हो सकता। उन्हीं गुणों का अनुभव हो सकता है जिन्हें विषय रूप से ग्रहण करने के लिए इन्द्रियाँ हैं। दूसरी बात यह है कि जिन गुणों का जो अनुभव हमें होता भी है वह किसी हद तक होता है। यह नहीं है कि हमारी आँखें सूक्ष्म अणुओं को देख सकती हैं या हमारे कान नाड़ियों के रक्तसंचार का शब्द सुन सकते है। हमारी इन्द्रियाँ 

1 जो अनाहत नाद सुनने लगते हैं उनकी बात दूसरी है।
अपूर्ण हैं। सम्पर्क या आघात को जिस रूप में इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं उसी रूप में संवेदनसूत्रा उन्हें मस्तिष्क या अन्त:करण तक पहुँचाते हैं।
हमारी इन्द्रियाँ चाहे अपूर्ण हों पर उनके महत्त्व को हम अस्वीकार नहीं कर सकते। हमारे सारे ज्ञान विज्ञान का मूल इन्द्रियबोध है। ज्ञान का प्रथम साधान इन्द्रियाँ हैं। अन्त:करण जब तक काम के योग्य नहीं होता है तब तक इन्हीं इन्द्रियों, वाह्यकरणों से ही हमारा काम चलता है; ये ही हमें बतलाती हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अत: जो लोग इन्द्रियों के एकबारगी दमन या नाश का उपदेश दिया करते हैं वे बड़ी भारी भूल करते हैं। यदि कोई आदमी इसलिए अपनी आँखें निकलवा डाले कि वे एक बार बहुत बुरी चीजों पर पड़ गई थीं, अथवा इस डर से अपना हाथ कटा डाले कि वह 'पराए माल' पर न पड़े तो उसे लोग क्या कहेंगे? इन्द्रियज ज्ञान के आधार पर ही सारे दर्शन विज्ञान प्रतिष्ठित हैं। इन्द्रियों के बिना ज्ञान हो नहीं सकता।
पर इन अपूर्ण इन्द्रियों के द्वारा वाह्यजगत् का जो परिज्ञान होता है उससे शिक्षितों और विचारवानों को संतोष नहीं हो सकता। वे इन्द्रियों द्वारा प्राप्त संस्कारों को मस्तिष्क की संवेदन ग्रन्थियों के भीतर अनुभवरूप में ग्रहण करते हैं और फिर अन्त:करण की ब्रह्मग्रन्थि में अन्तराभास के रूप में उनकी योजना करते हैं। अन्त में इन अन्तराभासों की योजना से सम्बद्ध ज्ञान की प्राप्ति होती है। पर बुद्धि की यह योजना शक्ति परिमित होती है। कल्पना शक्ति यदि बीच बीच में कुछ स्वरूपों का न्यास करके इन अन्तराभासों को अच्छी तरह संयोजित न करे तो सम्बद्ध ज्ञान पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार अन्त:करण की भिन्न भिन्न वृत्तियों के द्वारा खंडज्ञान के संयोजित और समन्वित हो जाने पर एक नए सामान्य स्वरूप का आभास होता है जिससे उपस्थित विषय का समाधान हो जाता है और हमारी कार्यकारण बुद्धि तुष्ट हो जाती है।
वह अन्तराभास जिसकी उभावना ज्ञान की शृंखला पूरी करने के लिए अथवा निश्चयात्मक ज्ञान के अभाव में उसका स्थान ग्रहण करने के लिए की जाती है, 'विश्वास' कहलाता है। प्रतिदिन के व्यवहार में हमें इसका काम पड़ता है। जब हमें यह निश्चय नहीं होता है कि बात ऐसी ही है तब हम कहते हैं कि हमें विश्वास है कि बात ऐसी ही है। इस प्रकार का विश्वास विज्ञान तक में चलता है। दो बातों के बीच अमुक सम्बन्ध है इसका प्रत्यक्ष द्वारा निश्चय न होने पर भी हम यह अनुमान कर लेते या मान लेते हैं कि सम्बन्ध है। यदि यह सम्बन्ध कार्यकारण का हुआ तो इस प्रकार का मानना अभ्युपगम कहलाता है। विज्ञान में ऐसे ही अभ्युपगम ग्राह्य होते हैं जो मनुष्य की बुद्धि में आ सकते हैं और अनुभव के विरुद्ध नहीं पड़ते। भौतिक विज्ञान में ईथर की गति, रसायन शास्त्र में परमाणु और उनकी प्रवृत्ति, जीवविज्ञान में सजीव कललरस का अण्वात्मक होना इसी प्रकार के अभ्युपगम हैं। ईथर इतना सूक्ष्म है कि उसकी गति को हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते। इसी प्रकार रासायनिक मूल द्रव्यों के परमाणुओं और कललरस के अणुओं का निश्चय भी हम परीक्षा आदि द्वारा नहीं कर सकते।
बहुत सी सम्बद्ध बातों का समाधान एक सामान्य कारण मान कर करना सिद्धांत निकालना कहा जाता है। चाहे अभ्युपगम हो, चाहे सिद्धांत, विश्वास दोनों में आवश्यक है। दोनों में कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। वस्तु सम्बन्ध ज्ञान के लिए अकेली बुद्धि ही को नहीं काम करना पड़ता। कुछ बातों का तो हमें प्रत्यक्ष होता है, कुछ का बुद्धि के द्वारा निश्चय होता है और कुछ का कल्पना के सहारे अनुमान होता है। इन तीनों के मेल से ही बड़े बड़े सिद्धांत निकलते हैं। दर्शन या विज्ञान में कोई ऐसा सिद्धांत नहीं जिसमें अनुमान से काम न लिया गया हो। शुद्ध प्रत्यक्ष ही के आश्रय पर यदि कोई किसी विज्ञान की स्थापना करना चाहे तो नहीं कर सकता। कार्यकारण सम्बन्ध ज्ञान केवल प्रत्यक्ष के द्वारा नहीं हो सकता।
ज्योतिष में आकर्षणसिद्धांत, भौतिकविज्ञान में गतिशक्ति का सिद्धांत, रसायन में परमाणुसिद्धांत, प्राणिविज्ञान में विकाससिद्धांत इत्यादि बड़े महत्त्व के सिद्धांत हैं। इनके द्वारा प्राय: समस्त प्राकृतिक व्यापारों का सामंजस्य भिन्न भिन्न क्षेत्रों में बहुत सी बातों के लिए एक एक सामान्य कारण मान लेने से हो जाता है। इन सामान्य कारणों का स्वरूप आदि चाहे हम न भी स्थिर कर सकें पर इनका अस्तित्व मान लेने से हमारा काम चल जाता है। संशयवादी कह सकते हैं कि आकर्षण, परमाणु, विकास इत्यादि काम चलाने के लिए मानी हुई बातें हैं। इनका आधार 'शास्त्री या विश्वास' है और कुछ नहीं। पर इस प्रकार के शास्त्री य अनुमान या शास्त्री या विश्वास के बिना किसी प्रकार का ज्ञान हो नहीं सकता।
यह तो हुआ 'शास्त्री या विश्वास' जो अनुमान के आधार पर होता है। इससे सर्वथा भिन्न वह विश्वास होता है जो साम्प्रदायिक या मतमतान्तरसम्बन्धी कल्पित बातों में होता है। साम्प्रदायिक विश्वास का अर्थ है अलौकिक और अप्राकृतिक बातों में विश्वास जिनकी संगति बुद्धि के अनुसार नहीं बैठ सकती। इस प्रकार का विश्वास व्यवस्थित अनुमान1 के उपरान्त नहीं होता, यों ही बुद्धि को किनारे रख कर किया जाता है। अत: इसे एक प्रकार का अन्धविश्वास ही कह सकते हैं। इसमें और शास्त्री या विश्वास में बड़ा भारी भेद यह है कि यह ऐसी बातों के प्रति होता है जिनका प्रकृति में प्राय: अत्यन्ताभाव होता है, जो विज्ञान द्वारा निश्चित प्राकृतिक नियमों के सर्वथा 

1 जो कल्पना प्रत्यक्ष के आधार पर और हेतु ज्ञानपूर्वक की जाती है उसी को अनुमान कहते हैं। बुद्धि की सहयोगिता से या उसके आदेश पर प्रयोजनवश जो अन्तराभास कल्पना उपस्थित करती है वही अनुमान है। इसी से अनुमान एक प्रकार से बुद्धि ही का कार्य कहा जाता है। कल्पना की अव्यवस्थित क्रीड़ा को अनुमान नहीं कह सकते।

विरुद्ध पड़ती हैं। भिन्न भिन्न धर्मों में विश्वास रखनेवाले एक या कई भूतातीत शक्तियाँ मान कर अनेक प्रकार की कल्पित और असम्भव बातें मानते हैं।
भूमंडल पर बसनेवाली मनुष्यजातियों की जो ईधर खूब छानबीन की गई तो अनेक प्रकार के अन्धविश्वासों का पता लगा जो भिन्न भिन्न असभ्य जातियों के बीच अब तक प्रचलित हैं। इन अन्धविश्वासों का परस्पर मिलान करने पर उनमें विलक्षण सादृश्य पाया जाता है। कुछ विचार करने पर बहुतों का, और तत्वदृष्टि से विचार करने पर सब का, एक ही मूल निश्चित होता है। सब का मूल है कारण जिज्ञासा जो मनुष्य के लिए स्वाभाविक है। मनुष्य प्रकृति के बहुत से व्यापारों को देखता है और उनका कारण जानना चाहता है। ऐसी बातों के कारणों को जानने की व्यग्रता सबसे अधिक होती है जिनसे मन में किसी प्रकार का भय उत्पन्न होता है, जैसे बादल गरजना, बिजली चमकना, भूकंप आना, ग्रहण लगना इत्यादि। असभ्य से असभ्य, जंगली से जंगली जातियों में ऐसी बातों के कारण जानने की व्यग्रता पाई जाती है। और कहाँ तक कहें कुछ पशुओं तक में पाई जाती है। कुत्ते जब पूर्ण चन्द्र को देखकर, फहराते हुए झंडे को देख कर, शंख या घंटे का शब्द सुनकर भूँकने लगते हैं तब वे केवल अपना भय ही प्रकट नहीं करते बल्कि इन रहस्यपूर्ण व्यापारों के कारण जानने की व्यग्रता भी प्रकट करते हैं। प्राचीन जातियों के बीच धर्म का उदय ऐसे ही व्यापारों के कल्पित कारणों में विश्वास करते करते हुआ है। आगे की पीढ़ियों में ये विश्वास संस्कार के रूप में और अधिक बद्धमूल होते गए। इस प्रकार अन्धविश्वास, पितरों की उपासना और अनेक प्रकार के मनोरागों से भिन्न भिन्न जातियों के बीच मत मतान्तरों की स्थापना हुई।
आजकल की सभ्य जातियों के बीच जो धर्म विश्वास प्रचलित हैं वे असभ्य जंगली जातियों के अन्धविश्वास से बहुत उन्नत समझे जाते हैं। ये जातियाँ समझती हैं कि सभ्यता द्वारा हमारे सब अन्धविश्वास दूर हो गए हैं। पर यह बड़ी भारी भूल है। निष्पक्ष भाव से यदि मिलान करके देखा जाय तो धर्मविश्वास जैसा असभ्य जातियों का है वैसा ही सभ्य कहलानेवाली जातियों का भी। दोनों में केवल स्वरूपभेद है, ऊपरी बातों में थोड़ा बहुत फर्क है। तत्वज्ञान की दृष्टि से सभ्य जातियों के परिमार्जित धर्मविश्वास भी वैसे ही असंगत और ऊपपटाँग हैं जैसे जंगली जातियों के, जिन्हें वे अहंकारवश उपेक्षा की दृष्टि से देखती हैं। सभ्य देशों में जो मत प्रचलित हैं उनकी यदि समीक्षा की जाय तो वे सब अन्धविश्वासपूर्ण ही पाए जायँगे। ईसाई मत को ही लीजिए। सृष्टि की 6 दिन में रचना, देवत्रायी अर्थात पिता, पुत्रा और पवित्रातात्मा, पवित्राात्मा द्वारा कुमारी मरियम का गर्भाधान , ईसा का मर कर जी उठना और सदेह स्वर्ग जाना इत्यादि वैसी ही बेसिर पैर की बातें हैं जैसी मुसलमान, हिन्दू, बौद्ध आदि और मतों में पाई जाती हैं। इनमें से किसी एक मत पर जिसे पक्का विश्वास है वह अपने ही मत को एकमात्र सत्य और दूसरे मत को मिथ्या क्या घोर अधर्म समझता है। जितना ही जो सम्प्रदाय अपने मत का अनन्य और दृढ़विश्वासी होगा उतने ही कट्टरपन और भीषणता के साथ वह और सम्प्रदायों के साथ झगड़ा करने के लिए तैयार रहेगा। संसार में धर्म के नाम पर जो इतने भीषण युद्ध हुए हैं वे सब इसी अनन्य विश्वास, इसी अन्धविश्वास के कारण। शुद्ध बुद्धि की कसौटी पर तो सारे प्रचलित मत समान रूप से असंगत, मिथ्या और कपोलकल्पित हैं। युक्ति और विश्वास के सामने कोई ठहरने के योग्य नहीं।
इस अन्धविश्वास ने मनुष्य जाति का कितना अपकार किया है। धर्मान्धाता के कारण कितना रक्तपात हुआ है, कितने प्राणियों का सुख धूल में मिल गया है। कितने आदमियों को घरबार छोड़ दूर देशों में भागना पड़ा है। राज्यशासन में जहाँ जहाँ धर्मान्धाता का प्रवेश रहा है वहाँ वहाँ घोर अनर्थ हुए हैं। बहुत से देशों में धर्मशिक्षा स्कूलों में अनिवार्य रखी गई है जिसका फल यह होता है कि बालकों के कोमल हृदयों पर ऐसे कुसंस्कार जम जाते हैं जो कभी नहीं जाते। उनका वित्ता अन्धविश्वास का अनुयायी हो जाता है, फिर उन्हें व्याहत और असंगत बातें अभ्यास के कारण नहीं खटकतीं। दु:ख की बात है कि जिन देशों में सौभाग्यवश धर्मशिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था नहीं है वहाँ भी अब कुछ लोग गला फाड़ फाड़ कर उसकी आवश्यकता बतला रहे हैं। पर आधुनिक सभ्य राज्यों के लिए यह परम आवश्यक है कि सर्वसाधारण की शिक्षा के लिए ऐसे विद्यालय खुलें जो साम्प्रदायिक बन्धानों से मुक्त हों।
साम्प्रदायिक शिक्षा के लिए जो इतना आग्रह किया जाता है वह कई प्रकार के मनोरागों के कारण। इनमें सबसे प्रबल है परम्परा से चली आती हुई बातों पर 'आस्था'। जिन बातों को बाप-दादे मानते चले आए हैं उनसे एक प्रकार की आसक्ति हो जाती है-उनका मानना धर्म समझा जाता है। पर ऐतिहासिक दृष्टि जो विचार करेगा उसे प्रकट हो जायेगा कि पूर्वजों की परम्परा में बराबर एक ही प्रकार का विश्वास नहीं रहा है। 1000 वर्ष पहले के बापदादे जिन बातों को मानते थे वे उनसे भिन्न थीं जिन्हें 2500 वर्ष पूर्व के बाप-दादे मानते थे। इसी प्रकार 300 वर्ष पहले जिन जिन बातों पर लोगों का विश्वास था उनका 1000 वर्ष पहले कहीं नाम तक न था। लोगों के विश्वास और धारणा में देशकालनुसार बराबर परिवर्तन होता आया है। दूसरी बात यह है कि अपनी विद्या, बुद्धि और स्थिति के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने लिए धर्म का एक विशेष रूप ग्रहण कर लेता है जो और लोगों के तथा बाप-दादों के धर्म से कुछ निराला ही होता है।
सबसे प्रबल अन्धविश्वास जिसका जनता पर अब तक बहुत कुछ प्रभाव है अध्यात्म वा आत्मविद्या है। दु:ख और आश्चर्य की बात है कि करोड़ों शिक्षित पुरुष, बड़े बड़े विज्ञानवेत्ता तक इस घोर अन्धविश्वास में निमग्न हैं। अध्यात्म सम्बन्धी बहुत सी पत्रिकाएँ प्रकाशित होकर इस अन्धविश्वास को चारों ओर दूर दूर तक फैलाती हैं। अच्छे खासे पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोग ऐसे चक्रों में सम्मिलित होते हैं जिनमें प्रेतात्माएँ आकर बोलती, लिखतीं और परलोक का हाल बताती हैं। अध्यात्मवादी प्राय: इस बात का गर्व प्रकट किया करते हैं कि उनके अन्धविश्वासों का समर्थन बड़े बड़े विज्ञानविशारद करते हैं। वे अपने पक्ष की पुष्टि में ऐेसे लोगों का नाम लेते हैं जैसे जर्मनी के जोलनर और फेक्नर, इंगलैंड के वालेस और क्रुक्स। ऐसे ऐसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक जो अध्यात्म के चक्कर में पड़ जाते हैं इसका कारण है कुछ तो उनकी कल्पना की अधिकता और विवेचन शक्ति की न्यूनता और कुछ उन प्रबल संस्कारों का प्रभाव जो साम्प्रदायिक शिक्षा द्वारा उनके चित्ता में बचपन ही में जमा दिए जाते हैं। अमेरिका के प्रसिद्ध इन्द्रिजालिक स्लेड ने जोलनर, फेक्नर और बेवर को अपने चक्र में सम्मिलित करके कैसे धोखे में डाला था इस बात को जर्मनी में प्राय: सब लोग जानते हैं। पीछे उसकी चालाकियाँ खुल गईं और वह एक धूर्त प्रमाणित हुआ। इसी प्रकार आत्मविद्या के चमत्कार जहाँ जहाँ दिखाए गए हैं वहाँ वहाँ अनुसंधान करने पर उनके भीतर गहरी चालबाजियाँ पाई गई हैं। जिनके ऊपर प्रेतात्माएँ बुलाई जाती हैं वे या तो पक्के धूर्त होते हैं अथवा दुर्बलचित्ता के मनुष्य। आत्माओं का अन्य लोक से आना, बातचीत करना, परोक्ष का वृत्तान्त कहना ये सब बातें कल्पना की उच्छृंखलता, विवेचना की न्यूनता और शरीरविज्ञान की अनभिज्ञता से उत्पन्नहैं।
संसार के प्रचलित मतों के बीच बहुत सी बातों में परस्पर भेद होते हुए भी एक बात ऐसी है जो सबमें समानभाव से पाई जाती है और जिसे प्रत्येक अपना बड़ा भारी सहारा समझता है। जितने मत हैं सब इस बात का दावा करते हैं कि हम जगत् की स्थिति, जीवन के रहस्य आदि के सम्बन्ध में दैवी आभास वा दिव्यदृष्टि द्वारा ऐसी बातों का ज्ञान कराते हैं जो मनुष्य की प्राकृतिक बुद्धि के बाहर हैं। भिन्न भिन्न मतवाले अपने उपदेशों और वितंडावादों को दैवी आभास द्वारा प्राप्त बतलाते हैं। उनका कहना है कि उन्हीं के अनुकूल आचरण और विश्वास करना मनुष्य का धर्म है। मानवजीवन का शासन उन्हीं के अनुसार होना चाहिए, वे ही ईश्वरीय धर्मशास्त्र हैं। बहुत सी ऊटपटाँग गढ़ी हुई कथाओं का मूल भी दैवी आभास ही बतलाया जाता है। कहीं तो ईश्वर साक्षात् प्रकट होकर मनुष्य की तरह बातचीत करता हुआ बताया गया है और कहीं मेघगर्जन, आँधी, भूकंप, दावाग्नि में प्रज्वलित झाड़ी, जैसी मूसा ने देखी थी इत्यादि द्वारा अपने को व्यक्त करता हुआ कहा गया है। पर जिस ज्ञान को ईश्वर इनके द्वारा व्यक्त करता है वह वैसा ही होता है जैसा मनुष्य अपने मस्तिष्क में उद्भावित करके अपने कंठ और वाणी द्वारा प्रकट करता है। प्राचीन भारत, मिश्र, यूनान और रोम की धर्मकथाओं में, नई और पुरानी बाइबिल में देवता या ईश्वर मनुष्य ही के समान बोलता, सोचता, विचारता और काम करता हुआ बतलाया गया है। अत: जिस ज्ञान को वह कल्पित रीति से व्यक्त करता हुआ बतलाया गया है वह मनुष्यों की कपोलकल्पना मात्र है। उसे ज्ञान नहीं कह सकते। उसमें विश्वास करना घोर अन्धविश्वास है।
सच्चे ज्ञान का आभास प्रकृति ही में मिल सकता है; उसमें ही उसे ढूँढ़ना चाहिए। उसके लिए अप्राकृतिक शक्ति की कल्पना करना प्रमाद और बुद्धि का आलस्य है। सत्य का ज्ञान जो कुछ मनुष्य को हुआ है और हो सकता है कि प्रकृति की समीक्षा द्वारा प्राप्त अनुभवों तथा इन अनुभवों की संगत योजना द्वारा स्थिर सिध्दान्तों द्वारा ही। प्रत्येक बुद्धिसम्पन्न और अविकृत मस्तिष्क का मनुष्य सत्य का आभास प्रकृति निरीक्षण द्वारा प्राप्त कर सकता है और अपने को अज्ञान और अन्धविश्वास के बन्धन से मुक्त कर सकता है।


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