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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम आठवाँ प्रकरण -आत्मा का गर्भविकास पीछे     आगे

मनुष्य की आत्मा को हम चाहे जिस रूप का समझें पर यह निश्चित है कि उसकी भी जीवनकाल में क्रम क्रम से वृद्धि होती है। अत: मनोव्यापारों के निरूपण के लिए गर्भविज्ञान की परीक्षा अत्यंत प्रयोजनीय है। हमें भ्रूण के मस्तिष्कविकास और शिशु के मनोव्यापारों की ओर ध्यान देना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टि से विचार न करने वाले आत्मा की क्रमश: वृद्धि नहीं मानते। वे आत्मा को सदा एकरस मानते हैं। आत्मा के सम्बन्ध में जो भिन्न भिन्न प्रकार के विचार प्रचलित हैं उनमें से कुछ ये हैं-
1. आवागमन- इस सिद्धांत के अनुसार आत्मा एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में, दूसरे से तीसरे में इसी प्रकार बराबर गमन करती रहती है और नाना योनियों में भ्रमण करती है। वह मनुष्य योनि में भी आ जाती है और फिर उसमें से निकलकर मनुष्य या और कोई योनि प्राप्त करती है।
2. आनयन- अर्थात आत्माओं का कहीं अक्षय भण्डार है जहाँ से बराबर आत्माएँ शरीरों में लाई जाती हैं और जहाँ फिर चली जाती हैं।
3. ईश्वर द्वारा सृष्टि- ईश्वर आत्माओं की सृष्टि करता है और उन्हें संचित रखता है।
जीवनतत्व के अनुसंधान द्वारा ऊपर लिखी कल्पनाएँ असार प्रमाणित हो चुकी हैं। पहले कहा जा चुका है कि गर्भ विधान में पुंस्तत्व और तत्व दोनों सूक्ष्य घटक मात्र हैं। इन दोनों घटकों में ऐसे शारीरिक गुण होते हैं जिन्हें हम घटकात्मा कह सकते हैं। इन दोनों बीजघटकों में गति और संवेदन शक्ति होती है। गर्भांड या अंडघटक जल में रहने वाले अस्थिराकृति अणुजीवों के समान चलते फिरते हैं। अत्यंत सूक्ष्म शुक्रकीटाणु अपनी रोइयों के सहारे वीर्य में उसी प्रकार तैरते रहते हैं जिस प्रकार रोईंवाले समुद्र के सूक्ष्म कीटाणु।
स्त्री पुरुष का संयोग होने पर दोनों बीजघटक परस्पर मिलते हैं; अथवा उनका संयोग बाहर ही बाहर होता है जैसा कि कुछ जलजंतुओं में, तब दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित होकर जुट जाते हैं। इस आकर्षण का प्रधान कारण कललरस की रासायनिक और संवेदनात्मक क्रिया है जो घ्राण या रसन से मिलती जुलती होती है और 'अनुरागमूलक रासायनिक प्रवृत्ति' कहलाती है। इसे हम घटकों का प्रेमव्यापार भी कह सकते हैं। पुरुष के वीर्य में रहनेवाले बहुत से रोईंदार घटक (शुक्रकीटाणु) स्त्री के अंडघटक की ओर रेंग पड़ते हैं और उसमें घुसना चाहते हैं। पर इनमें से घुसने पाता है कोई एक ही। ज्यों ही कोई शुक्रकीटाणु गर्भांड में सिर के बल घुसा कि गर्भांड के ऊपर की झिल्ली छूटकर एक आवरण के रूप में हो जाती है जिससे और कोई शुक्रकीटाणु भीतर नहीं घुस सकता। एक वैज्ञानिक ने बर्फ या मरफिया के प्रयोग से गर्भांड का ऊपरी तल कठोर कर दिया जिससे यह झिल्ली नहीं छूटने पाई। फल इसका यह हुआ कि गर्भांड अतिगर्भित हो गया अर्थात उसमें कई शुक्रकीटाणु घुस पड़े। इन बातों से पाया जाता है कि बीजघटकों में भी एक प्रकार की आन्तरिक प्रवृत्ति या संवेदना होती है। गर्भांड और शुक्रकीटाणु जब परस्पर मिल कर एक हो जाते हैं तब अंकुरघटक की उत्पत्ति होती है जिसके उत्तरोत्तर विभाग द्वारा अनेकघटक भ्रूण का स्फुरण होता है।
गर्भ विधान की ओर ध्यान देने से हमें मनोविज्ञानसम्बन्धी कई महत्त्व की बातों का आभास मिलता है। इस प्रकार के अनुसंधान द्वारा ये पाँच सिद्धांत निकलते हैं-
1. जीवन के आंरभ में प्रत्येक मनुष्य या उन्नत जंतु एक अत्यंत सूक्ष्म घटक के रूप में होता है।
2. सब उन्नत जीवों में अंकुरघटक की उत्पत्ति समान विधान से अर्थात दो बीजघटकों के परस्पर एक हो जाने से होती है।
3. दोनों बीजघटकों में से प्रत्येक की एक घटकात्मा होती है- अर्थात दोनों में एक विशेष रूप की संवेदना और गति होती है।
4. गर्भाधान के समय दोनों घटकों के कललरस और बीज ही मिलकर एक नहीं हो जाते बल्कि उनकी घटकात्माएँ भी परस्पर मिल जाती हैं अर्थात दोनों में जो निहित या अव्यक्त गतिशक्तियाँ, और द्रव्यों के समान, होती हैं वे भी एक नवीन शक्ति की योजना के लिए मिलकर एक हो जाती हैं। अंकुरघटक की यह नवयोजित शक्ति ही 'बीजात्मा' है।
5. अत: प्रत्येक मनुष्य के शारीरिक और मानसिक गुण माता पिता से ही प्राप्त होते हैं। वंशक्रमानुसार माता के गुणों का कुछ अंश गर्भांड द्वारा और पिता के गुणों का कुछ अंश शुक्रकीटाणु द्वारा प्राप्त होता है।
इन सिध्दान्तों के द्वारा यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो जाती है कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन का आदि होता है। दोनों बीजघटकों का जिस घड़ी संयोग होता है वही घड़ी अंकुरघटक के शरीर और आत्मा दोनों की उत्पत्ति की है। अत: लोगों का यह कहना कि आत्मा अनादि और अमर है, प्रलाप मात्र है। इसी प्रकार यह भावना भी असंगत है कि गर्भ के भीतर ईश्वर शरीर को गढ़ता है। जीवन की उत्पत्ति माता पिता के संयोग से होती है। इस संयोग के लिए यह आवश्यक है कि शुक्रकीटाणु का गर्भाशय में प्रवेश हो, दर्शन या आलिंगन मात्र से गर्भाधान नहीं हो सकता। स्थलचारी जीवों में गर्भाधान की यही रीति है कि गर्भाशय में गर्भोत्पादक तत्व पहुँचाया जाय। कुछ क्षुद्र जलचर जंतुओं में दूसरे प्रकार की व्यवस्था है। उनमें नर और मादा अपना अपना वीर्य और रजोबिन्दु जल में डाल देते हैं जिनका संयोग बाहर ही बाहर किसी अवसरपर हो जाता है। ऐसे जंतुओं में वास्तविक मैथुन नहीं होता, अत: उनमें प्रेम का वह मानसिक उद्गार नहीं देखा जाता जो उन्नत जीवों में इतना अधिक पाया जाता है। क्षुद्र अमैथुनीय जंतुओं में स्त्री पुरुष भेदसूचक कुछ ऐसे चिन्ह भी नहीं होते, जैसे बारहसिंगों के सींग, पुरुषों की दाढ़ी, नर मोर का सुन्दर चित्रित पुच्छवितान।
ऊपर बतलाया जा चुका है कि शिशु, माता और पिता दोनों के मानसिक गुण ग्रहण करता है। दोनों के स्वभाव, लक्षण, संकल्प की दृढ़ता, प्रतिभा आदि गुण उसमें वंशपरम्परा के प्राकृतिक नियमानुसार आते हैं। माता पिता के ही नहीं पितामह आदि के कुछ गुण भी उसमें बराबर पाए जाते हैं। सारांश यह कि शारीरिक विशेषताओं के समान मानसिक विशेषताएँ भी वंशानुक्रम द्वारा एक से दूसरे में जाती हैं। अत: यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि वंशपरम्परा का प्राकृतिक नियम भी एक शरीरधर्म है जिसका निर्धारण भौतिक और रासायनिक क्रियाओं के अनुसार-कललरस की योजना के अनुसार होता है।
शरीरविज्ञान सम्बन्धी यह बात मनोविज्ञान के क्षेत्र में बहुत ध्यान देने की है कि मनस्तत्तव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में बराबर चला चलता है। जिस क्षण गर्भाधान होता है उसी क्षण एक नए जीव का प्रादुर्भाव होता है। पर इस नए जीव में कोई स्वतन्त्र शारीरिक और मानसिक सत्ता नहीं होती; यह शुक्रघटक और रजोघटक रूप दो उपादानों की योजना का परिणाम मात्र है। जिस प्रकार मनोव्यापाररूपिणी निहित शक्ति के भौतिक आधार, उक्त दोनों घटकों की गुठलियों के मेल से एक नई गुठली पैदा हो जाती है, उसी प्रकार दोनों घटकात्माओं के योग से, निहित शक्तियों की समष्टिरूप एक नई घटकात्मा बन जाती है। अब यहाँ पर प्रश्न यह होता है कि एक ही माता पिता से उत्पन्न दो शिशुओं के स्वभाव आदि में भेद क्यों दिखाई पड़ता है? इसके कई कारण हैं। पहली बात तो यह है कि यह भेद कुछ न कुछ दोनों बीजघटकों में ही-उनके कललरस की योजना में ही, रहता है। माता पिता अपने जीवन में स्थिति के परिवर्तन के अनुरूप जो नई नई विशेषताएँ प्राप्त करते जाते हैं उनका प्रभाव बीजघटकों के अण्वात्मक कललरस के विधान पर भी उलटकर पड़ता है और उनके द्वारा संयोजित सन्तति में देखा जाता है।
इस विभेद के सम्बन्ध में एक बात और है। यद्यपि गर्भाधान के समय दो आत्माओं का जो सम्मिश्रण होता है उसमें दोनों घटकों के अनुरागात्मक संयोग द्वारा केवल जनक जननी की आत्माओं की निहित शक्तियों की ही सम्प्राप्ति अधिकतर शिशु को होती है; पर ऐसा भी होता है कि और ऊपर की पीढ़ियों के पूर्वजों के मानसिक संस्कार भी साथ ही उसे प्राप्त हो जाते हैं। कुलपरम्परासम्बन्धी प्राकृतिक नियम आत्मा पर भी ठीक वैसे ही घटते हैं जैसे अंग विधान पर। छत्राक आदि समुद्र के उभिदाकार कृमियों में एक एक पीढ़ी का अन्तर देकर पूर्वजों की विशेषताएँ प्रकट होती हैं। एक कृमि से जो दूसरा कृमि उत्पन्न होगा उसमें पहले का लक्षण न होगा, उस दूसरे से जो तीसरा उत्पन्न होगा उसमें पहले के लक्षण मिलेंगे, फिर उस तीसरे के लक्षण पाँचवीं पीढ़ी में मिलेंगे, पाँचवीं के सातवीं में, इसी प्रकार यह क्रम बराबर चला चलेगा। इसी नियम के अनुसार दूसरी पीढ़ी के लक्षण चौथी में, चौथी के छठी में, छठी के आठवीं में मिलेंगे। मनुष्य आदि उन्नत जीवों में यद्यपि इस प्रकार के अन्तर का नियम नहीं है पर उनमें भी कभी कभी एक पीढ़ी का अन्तर देकर लक्षण प्रकट होते हैं, जिसका कारण वंशपरम्परा का निहित नियम है। बड़े बड़े लोगों में प्राय: ऐसा देखा जाता है कि उनके गुण और स्वभाव उनके पितामहों से मिलते हैं।
आत्मविकास की दो अवस्थाएँ कही जा सकती हैं-एक गर्भावस्था, दूसरी जीवनावस्था।
गर्भ में आत्मोपत्ति- मनुष्य का गर्भ साधारणात: नौ महीनों में पूरा होता है। इस बीच में बाहरी संसार से वह बिलकुल अलग रहता है और उसकी रक्षा के लिए केवल गर्भकोश ही नहीं रहता, आवरण की तरह लिपटी हुई झिल्लियाँ भी होती हैं। ये झिल्लियाँ सब सरीसृपों, पक्षियों और स्तन्यजीवों में होती हैं। इन समस्त जीवों के भ्रूण झिल्लियों के जलपूर्ण कोश में रहते हैं। आघात से रक्षा का यह आयोजन आदिम सरीसृपों ने अत्यंत प्राचीन कल्प में प्राप्त किया था जब कि वे जल में न रह कर जमीन पर घूमने और साँस लेने लगे थे। उनके पूर्वज जलस्थलचारी जंतु (मेंढक आदि) अपने पूर्वज मत्स्यों के समान जल ही में रहते और साँस लेते थे।
उन रीढ़वाले जंतुओं के भ्रूण में जो जल में रहते थे, आदिम जीवों के बहुत अधिक लक्षण बहुत अधिक काल तक रहते थे जैसा कि आजकल की मछलियों और मेंढकों में देखा जाता है। यह बात प्राय: सब लोग जानते हैं कि अंडे से निकलने के बाद मेंढकों के भ्रूण लम्बी पूँछवाले कीड़ों के रूप में होते हैं और केवल जल ही में तैरा करते हैं। इन बच्चों को साधारणा भाषा में छुछुमछली कहते हैं। इनमें इनके पूर्वज मत्स्यों का ढाँचा बहुत काल तक बना रहता है। इनकी रहन सहन और संवेदना भी उन्हीं की सी होती है। ये गलफड़ों के द्वारा साँस लेते हैं। फिर जब कुछ दिनों के उपरान्त इनका विलक्षण रूपान्तर या कायाकल्प होता है और इनका अंग विधान स्थलचारी जीवन के अनुकूल संघटित होता है तब इनका मत्स्याकार शरीर कूदनेवाले चतुष्पद मेंढक के रूप में परिवर्तित हो जाता है। फिर तो गलफड़ों द्वारा पानी में साँस लेने के बदले ये फेफड़ों के द्वारा स्थल पर साँस लेने लगते हैं, इनकी इन्द्रियाँ और अन्त:करण अर्थात सारा विज्ञानमय कोश अधिक उन्नत अवस्था को प्राप्त हो जाता है। यदि हम छुछुमछली के आत्मस्फुरणक्रम को आदि से अन्त तक ध्यानपूर्वक देखें तो पता लगे कि जीवनोत्पत्ति के सामान्य नियम किस प्रकार आत्मविकास के क्रम पर भी ठीक ठीक घटते हैं। बात यह है कि छुछुमछली की वृद्धि का वाह्य संसार की उस बदलनेवाली परिस्थिति से सीधा लगाव होता है जिसके अनुकूल उसकी संवेदना और गति में परिवर्तन उपस्थित होता है। तैरनेवाली छुछुमछली का ढाँचा ही नहीं रहनसहन भी मछली ही की सी होती है, मेंढक के लक्षण परिवर्तन के उपरान्त आते हैं।
मनुष्य के भ्रूण में ऐसा नहीं होता। झिल्लियों के कोश में बन्द रहने के कारण वह वाह्य संसार के प्रभावों से अलग रहता है और वाह्य परिस्थिति के अनुरूप प्रतिक्रिया उसमें स्वच्छन्द रूप से नहीं होने पाती। जलपूर्ण कोश के भीतर रक्षापूर्वक बन्द रहने के कारण मनुष्य आदि के भ्रूण में आदिम जीवों के लक्षणों का उत्तरोत्तर विकास पूर्णरूप से नहीं होने पाता। अत्यंत संक्षिप्त उद्धरणी के द्वारा ही उसे नए जीव का स्वरूप प्राप्त होने का सुगम साधान प्राप्त हो जाता है। पहली बात तो यह है कि ऐसे भ्रूण के पोषण का पूरा प्रबन्ध रहता है। यह पोषण अण्डजों में तो उस जरदी के द्वारा होता है जो अण्डों के भीतर रहती है। जरायुजों में जरायु के द्वारा माता के रक्त का जो संचार भ्रूण में होता है उसके द्वारा उसका पोषण पूर्ण रूप से होता है। अत: इनका भ्रूण धरती पर गिरने के पहले ही पूर्ण वृद्धि को प्राप्त रहता है। पर गर्भावस्था में भ्रूण की आत्मा सुषुप्तावस्था में रहती है। इसी प्रकार की सुषुप्ति उन कीड़ों के कायाकल्प काल में रहती है जिनका रूपान्तर होता है। तितलियाँ, मक्खियाँ गुबरैले, रेशम के कीड़े इत्यादि जब ढोले से फतिंगे के रूप में आने लगते हैं तब इसी प्रकार की सुषुप्त दशा में रहते हैं। इस सुषुप्तिकाल के बीच उनके तन्तुओं और विविध अंगों का निर्माण होता है। ध्यान देने की बात यह है कि इस कायाकल्प काल के पूर्व जब वे ढोले के रूप में रहते हैं तब उनमें इन्द्रियों और अन्त:करण के व्यापार अच्छी तरह दिखाई पड़ते हैं। फिर इस सुषुप्तावस्था के हट जाने पर जब इन कीड़ों का पूरा कायापलट हो जाता है और ये पूर्ण यौवनप्राप्त फतिंगों के रूप में उड़ने लगते हैं तब ये मनोव्यापार और भी उन्नत रूप में देखे जाते हैं।
मनुष्य के मनोव्यापार की भी जीवनकाल में कई अवस्थाएँ होती हैं। जिस प्रकार उसका शरीर शैशव, कुमार, पोंगंड, यौवन और जरा नामक चढ़ानी उतरानी की अवस्थाओं को क्रमश: प्राप्त होता है उसी प्रकार उसकी आत्मा या मनोव्यापार भी।


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