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कविता

बेहया सा मन हरा है
गिरिधर करुण


रेत सी इस जिंदगी में
बेहया सा मन हरा है,
कील की सहकर चुभन दिन-रात
चक्कर काटती रहती धरा है।

देवता गण पी गए
अमृत कलश का
मेरु पर्वत - बासुकी को
क्या मिला है ?
कैकेयी की मातृका को
कर गई जग में कलंकित मंथरा है।

क्‍या पता
पत्‍थर पुनः पानी बनेगा
गा रहा लेकिन कभी से बावरा है।

हर किसी की साँस में
आरोह है
अवरोह भी है
किंतु मेरी साँस में
बस अंतरा है
और फिर भी
मैं प्रफुल्लित हूँ स्‍वयं में
क्‍योंकि मेरे साथ
मेरी अक्षरा है।

 


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