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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 33 सहकारी गो पालन पीछे     आगे

प्रत्‍येक किसान अपने घर में गाय-बैल रखकर उनका पालन भली-भाँति और शास्‍त्रीय पद्धति से नहीं कर सकता। गोवंश के ह्रास के अनेक कारणों में व्‍यक्तिगत गोपालन भी एक कारण रहा है। यह बोझ वैयक्तिक किसान की शक्ति के बिलकुल बाहर है।

मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि आज संसार हर एक काम में सामुदायिक रूप से शक्ति का संगठन करने की ओर जा रहा है। इस संगठन का नाम सहयोग है। बहुत-सी बातें आजकल सहायोग से हो रही हैं। हमारे मुल्‍क में भी सहयोग आया तो है, लेकिन वह ऐसे विकृत रूप में आया है कि उसका सही लाभ हिंदुस्‍तान के गरीबों को बिलकुल नहीं मिलता।

हमारी आबादी बढ़ती जा रही है और उसके साथ किसान की व्‍यक्तिगत जमीन कम होती जा रही हे। नतीजा यह हुआ है कि प्रत्‍येक किसान के पास जितनी चाहिए उतनी जमीन नहीं है। जो है वह उसकी अड़चनों को अढ़ाने वाली है। ऐसा किसान अपने घर में या खेत पर गाय-बैल नहीं रख सकता। रखता है तो अपने हाथों अपनी बरबादी को न्‍यौता भी देता है। आज हिंदुस्‍तान की यही हालत है। धर्म, दया या नीति की परवाह न करने वाला अर्थशास्‍त्र तो पुकार-पुकार कर कहता है कि आज हिंदुस्‍तान में लाखों पशु मनुष्‍य को खा रहे हैं। क्‍योंकि उनसे कुछ लाभ नहीं पहुँचने पर भी उन्‍हें खिलाना तो पड़ता ही है। इसलिए उन्‍हें मार डालना चाहिए। लेकिन धर्म कहों, नीति कहों या दया कहों, ये हमें इस निकम्‍मे पशुओं को मारने से रोकते हैं।

इस हालत में क्‍या किया जाए? यही कि जितना प्रयत्‍न पशुओं को जीवित रखने और उन्‍हें बोझ न बनने देने का हो सकता है उतना किया जाए। इस प्रयत्‍न में सहयोग का बड़ा महत्‍त्‍व है। सहयोग अथवा सामुदायिक पद्धति से पशु-पालन करने से:

1. जगह बचेगी। किसान को अपने घर में पधु नहीं रखने पड़ेंगे। आज तो जिस घर में किसान रहता है, उसी में उसके सारे मवेशी भी रहते हैं। इससे हवा बिगड़ती है और घर में गंदगी रहती है। मनुष्‍य पशु के साथ एक ही घर में रहने के लिए पैदा नहीं किया गया है। ऐसा करने में न दया हैं, न ज्ञान।

2. पशुओं की वृद्धि होने पर एक घर में रहना असंभव हो जाता है। इसलिए किसान बछड़े को बेच डालता है और भैंसे या पाड़े को मार डालता है, या मरने के लिए छोड़ देता है। यह अधमता है। सहयोग से यह रुकेगा।

3. जब पशु बीमार होता है तब व्‍यक्तिगत रूप से किसान उसका शास्‍त्रीय उपचार नहीं करवा सकता। सहयोग से ही चिकित्‍सा सुलभ होती है।

4. प्रत्‍येक किसान साँड़ नहीं रख सकता। सहयोग के आधार पर बहुत से पशुओं के लिए एक अच्‍छा सांड़ रखना सरल है।

5. प्रत्‍येक किसान गोचर-भूमि तो ठीक पशुओं के लिए व्‍यायम की यानी हिरने-फिरने की भूमि भी नहीं छोड़ सकता। किंतु सहयोग के द्वारा ये दोनों सुविधाएँ आसानी से मिल सकती हैं।

6. व्‍यक्तिगत रूप में किसान को घास इत्‍यादि पर बहुत खर्च करना पड़ता है। यहयोग के द्वारा कम खर्च में काम चल जाएगा

7. किसान व्‍यक्तिगत रूप में अपना दूध आसानी से नहीं बेच सकता। सहयोग के द्वारा उसे दाम भी अच्‍छे मिलेंगे और वह दूध में पानी वगैरा मिलाने के लालच से भी बच सकेगा।

8. व्‍यक्तिगत रूप में किसान के लिए पशुओं की परीक्षा करना असंभव है, किंतु गाँव भर के पशुओं की परीक्षा सुलभ है। और उनकी नसल के सुधार का प्रश्‍न भी आसान हो जाता है।

9. सामुदायिक या सहयोगी पद्धति के पक्ष में इतने कारण पर्याप्‍त होने चाहिए। परंतु सबसे बड़ी और सचोट दलील तो यह है कि व्‍यक्तिगत पद्धति के कारण ही हमारी और पशुओं की दशा आज इतनी दयानीय हो उठी है। उसे बदल दें तो हम भी बच सकते हैं और पशुओं को भी बचा सकते हैं।

मेरा तो विश्‍वास है कि जब हम अपनी जमीन को सामुदायिक पद्धति से जोतेंगे, तभी उससे फायदा उठा सकेंगे। गाँव की खेती अलग-अलग सौ टुकड़ों में बँट जाए, इसके बनिस्‍बत क्‍या यह बेहतर नहीं होगा कि सौ कुटंब सारे गाँव की खेती सहयोग से करें और उसकी आमदनी आपस में बाँट लिया करेंᣛ? और जो खेती के लिए सच है, वह पशुओं के लिए भी सच है।

यह दूसरी बात है कि आज लोगों को सहयोग की पद्धति पर लाने में सभी अंग कठिनाई हे। कठिनाई ताक सभी सच्‍चे और अच्‍चे कामों में होती है। गोसेवा के सभी अंग कठिन हैं। कठिनाइयाँ दूर करने से ही सेवा का मार्ग सुगम बन सकता है। यहाँ तो मुझे इतना ही बताना था कि सामुदायिक पद्धति क्‍या चीज है और यह कि वैयक्तिक पद्धति गलत है और सामुदायिक सही है। व्‍यक्ति अपने स्‍वातंत्र्य की रक्षा भी सहयोग को स्‍वीकार करके ही का सकता है। अतएव सामुदायिक पद्धति अहिंसात्‍मक है, वैयक्तिक हिंसात्‍मक।

गोबर, कचरे और मनुष्‍य के मल वगैरा में से खूबसूरत और सुगंधित खाद मिल सकता है। यह सुनहली चीज है। धूल में सेक धन पैदा करने की बात है। ... यह खाद बनाना भी एक ग्रामोद्योग है। यह तभी चल सकता है जब करोड़ों लोग उसमें हिस्‍सा लें, मदद दें।


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