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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 36 गाँवों का आहार पीछे     आगे

हाथ-कुटाई का चावल

अगर चावल पुरानी पद्धति से गाँवों में ही कूटा जाए, तो उसकी मजदूरी हाथ-कटाई करने वाली बहनों के हाथ में जाएगी और चावल खाने वाले लाखें लोगों को, जिन्‍हें आज मिलों के पालिश किए हुए चावल से केवल स्‍टार्च मिलता है, हाथ-कुटे चावल से कुछ पोषक तत्‍त्‍व भी मिलेंगे। चावल पैदा करने वाले प्रदेशों में जहाँ-तहाँ जो भयावनी चावल की मिलें खड़ी दिखाई देती हैं, उनका कारण मनुष्‍य का वह अमर्यादित लोभ ही है, जो न तों अपनी तृप्ति के लिए अपने पंजे में आए हुए लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य की परवाह करता है और न उनके सुख की। अगर लोकमत शक्तिशाली होता तो वह चावल की मिलों के मालिकों से इस व्‍यापार को-जो समूजें राष्‍ट्र के स्‍वास्‍थ्‍य को खोखला बनाता है और गरीबों को जीविकोपार्जन के एक ईमानदारी के साधन से वंचित करता है-बंद करने का अनुरोध करता और हाथ-कुटाई के चावलों के ही उपयोग का आग्रह रखकर चावल कूटनेवाली मिलों का चलना अशक्‍य कर देता।

गेहूँ का चोरक-युक्‍त आटा

यह तो सभी डॉक्‍टरों की राय है कि बिना चोकर का आटा उतना ही हानिकार है जितना कि पालिश किया हुआ चावल। बाजार में जो महीन आटा या मैदा बिकता है उसके मुकाबले में घर की चक्‍की का पिसा हुआ बिना चला गेहूँ का आटा अच्‍छा भी होता है और सस्‍ता भी। सस्‍ता इसलिए होता है कि पिसाई का पैसा बच जाता है। फिर घर के पिसे हुए आटे का वजन कम नहीं होता। महीन आटे या मैदे में तौल कम हो जाती है। गेहूँ का सबसे पोष्टिक अंश उसके चोकर में होता है। गेहूँ की भूसी चालकर निकाल डालने से उसके पौष्टिक तत्‍त्‍व की बहुत बड़ी हानि होती है। ग्रामवासी या दूसरे लोग, जो घर की चक्‍की का पिसा आटा बिना चला हुआ खाते हैं, वे पैसे के साथ-साथ अपना स्‍वास्‍थ्‍य भी नष्‍ट होने से बचा लेते हैं। आज आटे की मिलें जो लाखों रुपए कमा रही है, उस रकम का काफी बड़ा हिस्‍सा गाँवों में हाथ की चक्कियाँ फिर से चलने लगने से गाँवों में ही रहेगा और वह सत्‍पात्र गरीबों के बीच बँटता रहेगा।

गुड़

डॉक्‍टरों की राय के अनुसार गुड़... सफेद चीनी की अपेक्षा कहीं अधिक पौष्टिक है; और अगर गाँव वालों ने गुड़ बनाना छोड़ दिया, तो उनके बल-बच्‍चों के आहार में से एक जरूरी चीज निकल जाएगी। वे खुद शायद गुड़ के बिना अपना काम चला सकेंगे, पर उनके बच्‍चों की शारीकि ताक गुड़ के अभाव में निश्‍चय ही घट जाएगा। ...अगर गुड़ बनाना जारी रहा और लोगों ने उसका उपयोग करना न छोड़ा, तो ग्रामवासियों का करोड़ों रुपया उनके पास ही रहेगा।

हरी पत्‍ता-भाजियाँ

आहार या विटामिनों के विषय पर लिखी गई कोई भी आधुनिक पाठ्य-पुस्‍तक उठाइए, तो उसमें आप इस बात की जोरदार सिफारिश पाएँगे कि हर एक भोजन के साथ थोड़ी-सी कच्‍ची हरी पत्‍ता-भाजी जरूर ली जाए। बेशक, खाने से पहले उन्‍हें चार-छह बार अच्‍छी तरह धो लेना चाहिए, ताकि उनमें लगी हुई मिट्टी और दूसरा कचरा बिलकुल साफ हो जाए। ये पत्‍ता-भाजियाँ हर एक गाँव में आसानी से मिल सकती है; सिर्फ उन्‍हें तोड़ने की जरूरत है। फिर भी, हरी पत्‍ता-भाजियाँ शहरों के ही लोगों के शौक की चीज समझी जाती हैं।

भारत के अधिकांश हिस्‍सों में गाँव वाले तो दाल, चावल या रोटी पर ही गुजारा करते हैं और इनके साथ बहुत-सी मिर्चें खाते हैं, जो शरीर को नुकसान पहुँचाती हैं। चूँकि गाँवों के आर्थिक पुनर्गठन का काम आहार के सुधार से शुरू किया गया है, इसलिए सस्‍ते और सादे ऐसे खाद्यों को ढूँढ़ निकालना बहुत जरूरी है, जिनसे गाँव वाले अपना खोया हुआ स्‍वास्‍थ्‍य पुन: प्राप्‍त कर सकें। भोजन के साथ थोड़ी-सी हरी पत्‍ता-भाजी लेने से गाँव के लोग ऐसे अनेक रोगों से बच जाएँगे जिनमें वे आज अधिकांश की पूर्ति ताजे हरे पत्‍तोंसे हो सकती है। मैंने अपने भोजन में सरसों, सोया, शलजम, गाजर और मूली की पत्तियाँ लेना शुरू लिया है। यह कहने की जरूरत नहीं कि शलजम, गाजर और मू‍ली की सिर्फ पत्तियां ही नहीं, उनके कंद भी कच्‍चे खाए जाते हैं। इनकी पत्तियों या कंदों को आग पर पकाकर खाना उनके सुप्रिय स्‍वाद को मारना और पैसे का दुर्व्‍यय करना है। आग पर पकाने से इन भाजियों के विटामिन बिलकुल या अधिकांश नष्‍ट हो जाते है। इन्‍हें पकाकर खाना इनके स्‍वाद की हत्‍या करना है। ऐसा मैं इसलिए कहता हूँ कि कच्‍ची भाजियों में एक प्राकृतिक स्‍वाद होता है, जो पकाने से नष्‍ट हो जाता है।


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