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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 64 शासन-संबंधी समस्याएँ पीछे     आगे

मुझे डर है कि अगले कई वर्षों तक दबी हूई और गिरी हुई जनता को दु:ख और गरीबी के कीचड़ से उठाने के लिए आवश्‍यक कानून-कायदे बनाने का कार्य करते रहना होगा। इस कीचड़ में उसे एक हद तक तो पूँजीपतियों, जमींदरों और तथा‍कथित उच्‍च वर्गों ने और बाद में ब्रिटिश शासकों ने फंसाया है; अलबत्‍ता, ब्रिटिश शासकों ने अपना यह काम बहुत वैज्ञानिक रीति से किया है। अगर हमें इस जनता का उसकी इस दुरवस्‍था से उद्धार करना है, तो अपना घर सुव्‍यवस्थित करने की दृष्टि से भारत की राष्‍ट्रीय सरकार का यह कर्त्‍तव्‍य होगा कि वह लगातार उसको ही तरजीह देती रहे और जिन बोझों के भार से उसकी कमद टूटी जा रही है उनसे उसे मुक्‍त भी कर दे। और यदि जमीदारों को, अमीरों को और उन लोगों को जो आज विशेषाधिकार भोग रहे हैं-वे यूरोपीय हों या भारतीय-ऐसा मालूम हो कि उनके साथ निष्‍पक्षता का व्‍यवहार नहीं हो रहा है, तो मैं उनसे सहानुभूति रखूँगा। लेकिन मैं उनकी कोई सहायता नहीं कर सकूँगा । क्‍योंकि मैं तो इस प्रयत्‍न में उनकी मदद चाहूँगा और सच तो यह है कि उनकी मदद मे बिना इस जनता का उद्धार करना संभव ही नहीं होगा।

इसलिए धन या अधिकारों के रूप में जिनके पास कोई संपत्ति है उनके तथा जिनके पास ऐसी कोई संपत्ति नहीं है उन गरीबों के बीच संघर्ष तो अवश्‍य होगा; और यदि इस संघर्ष का भय रखा जाता हो और सब वर्ग मिलकर करोड़ो बेजुबान लोगों के सिरपर पिस्‍तौल तानकर ऐसा कहना चाहते हों कि तुम लोगों को तुम्‍हारी अपनी सरकार तब तक नहीं मिलेगी, जब तक कि तुम इस बात का आश्‍वासन नहीं देते कि हमारी संपत्ति और हमारे अधिकारों को कोई आँच नहीं आएगी, तब तो मुझे लगता है कि राष्‍ट्रीय सरकार का निर्माण है।

गवर्नर

...इसके बावजूद कि लोगों की तिजोरी की कौड़ी-कौड़ी को बचाना मुझे बहुत पसंद है, पैसे की बचत के लिए प्रांतीय गवर्नरों की संस्‍था को एकदम उड़ा देना सही अर्थशास्‍त्र नहीं होगा। गवर्नरों को दखल देने का बहुत अधिकार देना ठीक नहीं है। वैसे ही उनकी सिर्फ शोभा के लिए पुतला बना देना भी ठीक नहीं होगा। मंत्रियों के काम को दुरुस्‍त करने का अधिकार उन्‍हें होना चाहिए। सब की खटपट से अलग होने के कारण भी वे सूबे का कारबार ठीक तरह से देख सकेंगे और मंत्रियों को गलतियों से बचा सकेंगे। गवर्नर लोग अपने-अपने सूबों की नीति के रक्षक होने चाहिए।

मंत्रीगण

अगर कांग्रेस को लोकसेवा की ही संस्‍था रहना है, तो मंत्री 'साहब लोगों' की तरह नहीं रह सकते और न सरकारी साधनों का उपयोग निजी कामों के लिए ही कर सकते हैं।

भाई-भतीजावाद

पद ग्रहण से यदि पद का सदुपयोग किया जाए जो कांग्रेस की प्रतिष्‍ठा बढ़ेगी और यदि उसका दुरुपयोग होगा तो वह अपनी पुरानी प्रतिष्‍ठा भी खो देगी। यदि दूसरे परिणाम से बचना हो तो मंत्रियों और विधान-सभा के सदस्‍यों को अपने वैयक्तिक और सार्वजनिक आचरण की जाँच करते रहना होगा। उन्‍हें, जैसा अँग्रेजी लोकोक्ति में कहा जाता हैं, सीजर को पत्‍नी की तरह अपने प्रत्‍येक व्‍यवहार में संदेह से परे होना चाहिए। वे अपने पद का उपयोग अपने या अपने रिश्‍तेदारों अथवा मित्रों के लाभ के लिए नहीं कर सकते। अगर रिश्‍तेदारों या मित्रों की नियुक्ति किसी पद पर होती हें, तो उसका कारण यही होना चाहिए कि उप पद के तमाम उम्‍मीदवारों में वे सबसे ज्‍यादा योग्‍य हैं और बाजार में उनका मूल्‍य उस सरकारी पद से उन्‍हें जो कुछ मिलेगा उससे कहीं ज्‍यादा है। मंत्रियों और कांग्रेस के टिकटपर चुने गए विधान-सभा के सदस्‍यों को अपने कर्त्‍तव्‍य के पालन में निर्भर होना चाहिए। उन्‍हें हमेशा ही अपना स्‍थान या पद खोने के लिए तैयार रहना चाहिए। विधान-सभाओं की सदस्‍यता या उसके आधार पर मिलने वाले पद का एकमात्र मूल्‍य यही है कि वह संबंधी व्‍यक्तियों को कांग्रेस की प्रतिष्‍ठा और ताकत बढ़ाने की योग्‍यता प्रदान करता है; इससे अधिक मूल्‍य उसका नहीं है। और चूँकि ये दोनों चीजें पूरी तरह वैयक्तिक और सार्वजनिक नीतिमत्‍ता पर निर्भर हैं, इसिलए संबंधित व्‍यक्तियों की प्रत्‍येक नैतिक त्रुटि से कांग्रेस को हानि होगी।

कर-निर्धारण

मंत्रि-मंडल धारासभा के सदस्‍यों के मातहत रहकर काम करता है। उनकी इजाजत के बिना वह कुछ कर नहीं सकता। और हर एक मेंबर अपने वोटरों के यानी लोकमत के अधीन है। चुनांचे उसके हर एक काम गहराई के साथ सोचने के बाद ही उसका विरोध करना मुनासिब होगा। आम लोगों की एक खराब आदत पर भी इस सिलसिलें में गौर किया जाना चाहिए। टैक्‍स चुकाने वाले को टैक्‍स के नाम से नफरत होती है। फिर भी जहाँ अच्‍छा इंतजाम है वहाँ अक्‍सर यह दिखाया जा सकता है कि टैक्‍स देने वाला खुद टैक्‍स या कर के रूप में जो कुछ देता है, उसका पूरा-पूरा मुआवजा उसे मिल जाता है। शहरों में पानी पर वसूल किया जाने वाला टैक्‍स इसी ढँग का है। शहर में जिस दर से मुझे पानी मिलता है, उस दर में मैं अपनी जरूरत का पानी खुद पैदा नहीं कर सकता। मतलब यह है कि पानी मुझे सस्‍ता पड़ता है। उसकी यह दर मुझे अपनी यानी वोटरों की इच्‍छा के मुताबिक तय करनी पड़ती है। तिस पर भी जब पानी का टैक्‍स जमा करने की नौबत आती है, तब आम श‍हरियों में उसके खिलाफ एक नफरत-सी पैदा हो जाती है। वही हाल दूसरे टैक्‍सों का भी है। यह सच है कि सभी तरह के टैक्‍सों का ऐसा सीधा हिसाब नहीं किया जा सकता। जैसे-जैसे समाज का और उसकी सेवा का दायरा बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे यह बताना मुश्किल हो जाता है कि टैक्‍स चुकाने वाले को उसका सीधा मुआवजा किस तरह मिलता है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि समाज पर जो एक खास का या टैक्‍स बैठाया जाता है, उसका समाज को पूरा-पूरा मुआवजा मिलता ही है। अगर ऐसा न होता हो तो जरूर ही यह कहा जा सकता है कि वह समाज लोकमत की बुनियादी पर नहीं चल रहा है।

अपराध और उसका दंड

अहिंसा की नीति पर चलने वाले आजाद भारत में अपराध तो होते रहेंगे, लेकिन उन्‍हें करने वालों के साथ अपराधियों जैसा व्‍यवहार नहीं किया जाएगा। उन्‍हें दंड नहीं दिया जाएगा। दूसरी व्‍याधियों की तरह अपराध भी एक बीमारी है और प्रचलित समाज-व्‍यवस्‍था की उपज है। इसलिए सारे अपराधों का, जिनमें हत्‍या भी शामिल है, बीमारियों की तरह इलाज किया जाएगा। भारत इस मंजिल तक कभी पहुँचेगा कि नहीं, यह एक अलग सवाल है।

आजाद हिंदुस्‍तान में कैदियों के जेल कैसे हों? बहुत समय से मेरी वह राय रही है कि सारे अपराधियों के साथ बीमारों-जैसा बरताव किया जाए और जेल उनके अस्‍पताल हों, जहाँ इस वर्ग के बीमार इलाज के लिए भरती किए जाएँ। कोई आदमी अपराध इसलिए नहीं करता कि ऐसा करने में उसे मजा आता है। अपराध उसके रोगी दिमाग की निशानी है। जेल में ऐसी किसी खास बीमारी के कारणों का पता लगाकर उन्‍हें दूर करना चाहिए। जब अपराधियों के जेल उनके अस्‍पताल बन जाएँगे, तब उनके लिए आलीशान इमारतों की जरूरत नहीं होगी। कोई भी देश यह नहीं कर सकता। तब हिंदुस्‍तान जैसा गरीब देश तो अपराधियों के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें कहाँ से बनावेᣛ? लेकिन जेल के कर्मचारियों की दृष्टि अस्‍पताल के डॉक्‍टरों और नर्सों-जैसी होनी चाहिए। कैदियों को महसूस होना चाहिए कि जेल के अफसर उनके दोस्‍त हैं। अफसर वहाँ इसलिए हैं कि वे अपराधियों को फिर से दिमागी तंदुरुस्‍ती हासिल करने में मदद करें। उनका काम अपराधियों को किसी तरह सताने का नहीं है। लोकप्रिय सरकारों को इसके लिए जरूरी हुक्‍म निकालने होंगे। लेकिन इस बीच जेल के कर्मचारी अपने बंदोबस्‍त को इंसानियत भरा बनाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।

कैदियों का कया फर्ज है? पहले कैदी रह चुकने के नाते मैं अपने साथी कैदियों को सलाह दूँगा कि वे जेल में आदर्श कैदियों-जैसा बरताव करें। उन्‍हें जेल मे अनुशासन को तोड़ने से बचना चाहिए। जो भी काम उन्‍हें सौंपा जाए, उसमें उन्‍हे अपना दिल और आत्‍मा, दोनों लगा देने चाहिए। मिसाल के लिए, कैदी अपना खाना खुद पकाते हैं। उन्‍हें चावल, दाल या दूसरे मिलने वाले अनाज को साफ करना चाहिए, ताकि उसमें कंकड़ रेत, भूसी या कीड़े न रह जाएँ। कैदियों को अपनी सारी शिकायतें जेल के अधिकारियों के सामने उचित ढँग से रखनी चाहिए। उन्‍हें अपने छोटे से समाज में ऐसा काम करना चाहिए कि जेल छोड़ते समय वे जैसा आए थे उससे ज्‍याद अच्‍छे आदमी बनकर जाएँ।

वयस्‍क मताधिकार

मैं वयस्‍क मताधिकार का हिमायती हूँ। ... वयस्‍क मताधिकार अनेक कारणों से जरूरी है। और उसके पक्ष में जो निर्णायक कारण दिए जा सकते हैं, उनमें से एक यह है कि वह मुझे न सिर्फ मुसलमानों की बल्कि तथा‍कथिक अस्‍पृश्‍यों, ईसाइयों और सभी वर्गों के मेहनत-मजदूरी करके रोजी कमाने वालों की उचित आकांक्षाओं को संतुष्‍ट करने का सामर्थ्‍य देता है। मैं इस विचा को बरदाश्‍त ही नहीं कर सकती कि ऐसी किसी आदमी को, जो चरित्रवान है किंतु जिसके पास धन या अक्षर-ज्ञान नहीं है, मताधिकार न दिया जाए; या कि कोई आदमी, जो ईमानदारी के साथ शरीर-श्रम करके रोजी कमाता है, महज गरीब होने के अपराध के कारण मताधिकार से वंचित रहे।

मृत्‍यु-कर

किसी आदमी के पास अत्‍यधिक धन का होना और देशों की अपेक्षा हमारे देश मे ज्‍यादा निंदनीय माना जाना चाहिए। मैं तो कहूँगा कि वह भारतीय मानव-समाज के खिलाफ किया जाने वाला गुनाह है। इसलिए एक नियत राशि के ऊपर जितना धन हो उस पर कितना कर लगाया जाए, इसकी उच्‍च्‍तम सीमा आ ही नहीं सकती। मझे मालूम हुआ है कि इंग्लैंड में नियम राशि के ऊपर होने वाली कमाई का 70 प्रतिशत तक कर के रूप में वसूल करते हैं। कोई कारण नहीं कि भारत इससे भी ज्‍यादा क्‍यों न वसूल करे। मृत्‍यु-कर क्‍योनहीं लगाया जाना चाहिएᣛ? अमीरों के जिन लड़कों को वयस्‍क हो जाने पर भी बाप-दादों के धन की विरासत मिलती है, उनकी इस प्राप्ति से सचमुच तो हानि ही होती है। इस तरह देखें तो राष्‍ट्र को दोहरा नुकसान होता है। क्‍योंकि वह विरासत न्‍याय से तो राष्‍ट्र की मिलनी चाहिए। राष्‍ट्र को दूसरा नुकसान यह होता है कि विरासत पाने वाले उत्‍तराधिकारी की सारी शक्तियाँ खिलती नहीं, प्रकाश में नहीं आतीं। वे धन-संपत्ति के बोझ के नीचे कुचल जाती है।

कानून द्वारा सुधार

लोग ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि किसी बुराई के खिलाफ कानून बना दिया जाए, तो वह अपने-आप निर्मल हो जाती है। उस संबंध में और अधिक कुछ करने की आवश्‍यकता नहीं रहती। लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ी कोई आत्‍म-वंचन नहीं हो सकती। कानून तो अज्ञान में फंसे हुए या बुरी वृत्ति वाले अल्‍पसंख्‍यक लोगों को ध्‍यान में रखकर यानी उसने उनकी बुराई छुड़वाले के उद्देश्‍य से बनाया जाता है और उसी स्थिति में वह कारगर भी होता है। बुद्धिमान और संघटित लोकमत अथवा धर्म की आड़ लेकर दुराग्रही बहुसंख्‍यक लोग जिस कानून का विरोध करते हैं वह कभी सफल नहीं हो सकता।

पहली चीज तो यह है कि हमारे प्रयत्‍न में जबरदस्‍ती या असत्‍य का लेश भी नहीं होना चाहिए। मेरी नम्र राय में आज तक जबरदस्‍ती के द्वारा कोई भी महत्‍त्‍वपूर्ण सुधार नहीं कराया जा सका है। कारण यह है कि जबरदस्‍ती के द्वारा ऊपरी सफलता होती दिखाई दे यह तो संभव है, किंतु उससे दूसरी अनेक बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं, जो मूल बुराई से भी ज्‍यादा हानिकारक सिद्ध होती हैं।

जूरी द्वारा न्‍याय-विचार की पद्धति

जूरी द्वारा न्‍याय-विचार की पद्धति से अक्‍सर न्‍याय की हानि होती है। सारी दुनिया का इस विषय में यही अनुभव है। लेकिन उसकी इस कमी के बावजूद लोगों ने सब जगह उसे खुशी के साथ स्‍वीकार किया है। क्‍योंकि एक तो लोगों में उससे स्‍वातंत्रय की भावना का विकास होता है, जो एक महत्‍त्‍वपूर्ण लाभ है; और दूसरे इस समुचित भावना की तृप्ति होती है कि विचार अपने ही जैसे यानी समकक्ष लोगों द्वारा किया जा रहा है।

मैं इस बात को नहीं मानता कि न्‍यायाधीशों की अपेक्षा जूरी द्वारा न्‍याय-विचार की पद्धति में ज्‍यादा लाभ है। हमें… अँग्रेजों की हर एक नीति का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। जहाँ संपूर्ण निष्‍पक्षता, समुचित्‍त्‍ता, गवाही की छान-बीन करने और मनुष्‍य-स्‍वभाव को पहचानने की योग्‍यता अपेक्षित है, वहाँ प्रशिक्षित न्‍यायाधीशों की जगह ऐसी तालीम से शून्‍य और संयोगवश एकत्र किए गए लोगों को नहीं बिठाया जा सकता। हमारा उद्देश्‍य यह होना चाहिए कि नीचे से लगाकर ऊपर तक हमारे न्‍याय-विभाग में ऐसे लोग हों जिनकी न्‍यायनिष्‍ठा किसी भी कारण से विचलित न हो, जो सर्वथा निष्‍पक्ष हों और योग्‍य हों।

न्‍यायालय

यदि हमारे मन पर वकीलों का और न्‍यायालयों का मोह न छाया होता और यदि हमें लुभाकर अदालतों के दलदल में ले जाने वाले तथा हमारी नीच वृत्तियों की उत्‍साहित करने वाले दलाल न होते, तो हमारा जीवन आज जैसा है उसकी अपेक्षा ज्‍यादा सुखी होता। जो लोग अदालतों में ज्‍यादा आते-जाते हैं उनकी यानी उनमें से अच्‍छे आदमियों की गवाही लीजिए, तो वह इस बात की पुष्टि करेंगे कि अदालतों का वायुमंडल बिलकुल सड़ा हुआ होता है। दोनों पक्षों की ओर से सौगंध खाकर झूठ बोलने वाले गवाह खड़े किए जाते हैं, जो धन या मित्रता के खातिर अपनी आत्‍मा को बेच डालते हैं।

अब अगर आप कानून या वकालत के पेशे को धार्मिक बनाना चाहते है, तो आपके लिए सबसे पहले यह आवश्‍यक है कि आप अपने इस पेशे को धन बटोरने का नहीं, बल्कि देश-सेवा का एक साधन मानिए। सभी देशों में ऐसे बहुत ही योग्‍य वकीलों के उदाहरण मिलेंगे, जिन्‍होंने बहुत बड़े स्‍वार्थत्‍याग का जीवन बिताया, अपनी कानूनी ज्ञान को देश-सेवा में लगाया, यद्यपि इससे उनके हिस्‍से में गरीबी-ही-गरीबी पड़ी। ... रस्किन ने कहा है, क्‍यों कोई वकील दो-दो सौ रुपए अपना मेहनताना लेगा, जब कि एक बढ़ाई को उतने पैसे भी नहीं मिलतेᣛ? वकीलों की फीस हर जगह उनके काम के हिसाब से बहुत ज्‍यादा होती है। दक्षिण अफ्रीका में, इग्लैंड में, बल्कि सभी कहीं मैंने देखा है कि चाहे जान-बूझकर या अनजाने वकीलों को अपने मुवक्किलों के खातिर झूठ बोलना पड़ता है। एक प्रसिद्ध अँग्रेज वकील ने तो यहाँ तक लिखा है कि अपने मुवक्किलों को अपराधी जानकर भी उसका बचाव करना वकील का धर्म है, कर्त्‍तव्‍य है। मेरा मत दूसरा है। वकील का काम तो यह है कि वह हमेशा जजों के आगे सच्‍ची बातें रख दें, सच की तह तक पहुँचने में उनकी मदद करे। अपराधी को निर्दोष साबित करना उसका काम कभी नहीं है।

सांप्रदायिक प्रतिनिधित्‍व

आजाद भारत सांप्रदायिक प्रतिनिधित्‍व की प्रणाली को प्रश्रय नहीं दे सकता। किंतु यह भी सही है कि यदि अल्‍पसंख्‍यक लोगों पर जबरदस्‍ती नहीं करना है, तो उसे सभी संप्रदायों को पूरा संतोष देना चाहिए।

सैनिक खर्च

हमारे नेता पिछली दो पीढ़ियों से ब्रिटिश शासन के अंतर्गत होने वाले भारी फौजी खर्च की जोरदार निंदा करते आए हैं। लेकिन अब जब कि हम राजनीतिक गुलामी से आजाद हो गए हैं, हमार सैनिक खर्च बढ़ गया है और मालूम होता है कि अभी और बढ़ेगा। आश्‍चर्य यह है कि हमें इसका गर्व है। इस बात के खिलाफ हमारी विधान-सभाओं में एक भी आवाज नहीं उठाई जाती। लेकिन इस पागलपन और पश्चिम की ऊपरी चमक-दमक के निरर्थक अनुकराण के बावजूद मुझ में और अन्‍य अनेकों में यह आशा बाकी है कि भारत विनाश के इस तांडव से सुरक्षित बाहर निकल जाएगा और उस नैतिक ऊँचाई को प्राप्‍त करेगा, जो सन् 1915 से लगातार 32 वर्ष तक अहिंसा की तालीम-यह तालीम कितनी भी अधूरी क्‍यों न रही हो-लेने के बाद उसे प्राप्‍त करनी ही चाहिए।

जलसेना

जलसेना के बारे में मैं नहीं जानता। लेकिन यह मैं जरूर जानता हूँ कि भावी भारत की स्‍थलसेना में आज की तरह दूसरे देशो से उनकी स्‍वतंत्रता छीनने के लिए और भारत की गुलामी के पाश में बांधे रखने के लिए किराए के सैनिक नहीं होंगे। उसकी संख्‍या बहुत-कुछ घटा दी जाएगी और उसकी रचना देश सेवा के लिए स्‍वच्‍छापूर्वक भरती हुए सैनिकों के आधार पर होगी, जिनका उपयोग देश में ही पुलिस-व्‍यवस्‍था के लिए किया जाएगा।


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