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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 9. सहायक संपादक पीछे     आगे

गद्य और पद्य दोनों की रचना करें , सारी कलाओं को सीखें और उसका अभ्यास करें। हमें जो कुछ भी नजर आता है उसकी अंतिम सच्चाई को जाने। इस तरह एक नए धर्म ग्रंथ का निर्माण करें।

वहाँ 'स्वदेशमित्रन' के सहायक संपादक बन कर काम करने लगे। वेतन बहुत कम था और कार्य अत्यधिक। संपादक महोदय स्वयं ही कहते - 'भारती तुम्हारी तमिल इतनी प्यारी और सुंदर है कि हर शब्द पर धन लुटाने का मन करता हैं पर क्या करूँ? तुम भले ही कालीदास हो मैं राजा भोज नहीं हूँ। तुम्हें सम्मानित करने लायक मेरे पास धन नहीं है।'

भारती सच बात को मजाक की तरह प्रस्तुत कर कहते - 'बहुत चतुरता से मुझसे सलीके का कार्य करवा लिया।' बाद में वो जब-तब ये जोड़ना नहीं भूलते - 'इस क्षेत्र में प्रशिक्षण व हुनर मैंने श्री सुब्रम्हणीय अय्यर से ही पाया! मैं उन्हें इस क्षेत्र में, अपना परम गुरु मानता हूँ।

कहते हैं कि अच्छे काम करने वालों पर ही काम का बोझ लादा जाता है। सो भारतीजी के साथ भी यही हुआ। शाम को घर जाने का समय हो रहा होता। भारतीजी को धन की आवश्यकता होती और वो मन को तैयार कर रहे होते कि अय्यर से किस तरह पैसे माँगे। तभी दफ्तर का एक लड़का उनके लिए बढ़िया कॉफी ले आता और कहता अय्यर ने भिजवाया है। भारती अय्यर की इस कृपापूर्ण दयालुता से आनंद मग्न हो रहे होते तभी अय्यर स्वयं अवतरित हो जाते। तब तक भारती कुछ हद तक पैसों की आवश्यकता वाली बात भूल चुके होते।

तभी अय्यर शुरू हो जाते - 'भारती, सर हेनरी कॉटन ने लंका में जो भाषण दिया है, उसमें भारत के पक्ष में बड़ा भावुक बयान दिया है। तुमने पढ़ा क्या?

'हाँ-हाँ क्यों नहीं, पूरा भाषण ही प्रभावशाली है।'

क्या तुमको नहीं लगता कि वो हमारे पत्र में कल के अंक में जाना चाहिए? अय्यर मनोवैज्ञानिक की तरह पूछते।

इस प्रश्न का उत्तर भारती 'हाँ' के अलावा और क्या दे सकते थे। जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि उनका कार्यभार अनावश्यक रूप से बढ़ जाएगा।

'ऐसा है, तथ्यों को बिगाड़े बिना, रुचिकर तरीके से उस भाषण का तमिल में अनुवाद तुम्हारे अलावा कोई और नहीं कर सकता।' अय्यर अपने मंतव्य को विस्तार से कहते।

भारती जाल में फँसे पंछी की तरह बेबस सिर झुकाए खड़े रह जाते। कोई दूसरा चारा भी तो न था।

उस पर अय्यर आगे ये और जोड़ते मानों उन पर कृपा कर रहे हों। 'आवश्यक नहीं है कि तुम दफ्तर में बैठ कर ही ये काम करो। घर ले जाकर 'आराम' से कर के कल सुबह ले आना। वैसे भी तुम्हारे लिए ये मुश्किल से आधे घंटे का काम होगा।

भारतीजी अपनी हास्य भरी शैली में कहते 'अय्यर ने प्रेम छड़ी के बल पर मुझसे सारे ही काम करवा लिए।' वो मानते थे कि अनुवाद के इन कामों ने उनकी बहुत मदद की। इससे अँग्रेजी भाषा की महत्ता को उन्होंने पहचाना और तमिल की मिठास और रस को और स्पष्ट रूप में जाना। ऐसा कहा जाता है कि भारती ने ही तमिल भाषा को पुर्नजीवित किया है।

राजनीति में भारतीजी को उग्रवादी माना जाता था। सो 'स्वदेशमित्रन' में अय्यर ने कभी न तो उनसे संपादकीय लिखवाया न कोई अग्रलेख। पता नहीं अय्यर उग्रवादी वाली बात को बहाना बना रहे थे या वे भारती को अपने से आगे निकलने नहीं देना चाह रहे थे। पत्र-पत्रिकाओं में वर्तमान में भी ये चलन है तो कोई आश्चर्य नहीं।

भारतीजी की आर्थिक हालत अच्छी तो कभी नहीं थी। जरा से वेतन पर इतना कार्य करना। किराए की कोठरी में रहना जिसमें सहूलियत के नाम पर कुछ न होता। फिर भी उन्होंने अपने हास्य और व्यंग्य को जीवित रखा। यह उनके ही बूते की बात थी। उनका वेतन एक रुपया बढ़ जाता और परिवार में कभी एक और सदस्य का आगमन या कोई और खर्च आ जाता। इन विडंबनाओं का उन्होंने अपनी पुस्तक 'ज्ञानरथम्' में हास्यपूर्ण तरीके से वर्णन किया है। यही वो समय था जब उनके कई दोस्त बने जिन्होंने उम्र भर दोस्ती निभाई। ये सभी भारतीजी की कविताओं के प्रशंसक थे। इन दोस्तों में सबसे प्रमुख और सर्वप्रथम नाम आता है श्री एस. दौरेस्वामी का। दौरेस्वामी भारतीजी की कविताओं के मुग्ध प्रशंसक थे। श्री दौरस्वामी उदार, संकोची, तीक्ष्ण बुद्धि के अति संवेदनशील व्यक्ति थे। इन्होंने भारतीजी की हमेशा मदद की और करते ही रहे।

भारतीजी की ही तरह आवेश से भरे युवा सुरेंद्रनाथ आर्य उनके एक और प्रशंसक तथा दोस्त थे। ये आंध्र प्रदेश के थे। इन्होंने अँग्रेजों के विरुद्ध गतिविधि के लिए छ वर्ष की सजा काटी थी। हर कार्य को निष्ठा और उत्साह से निभाना इनका स्वभाव था।

तीसरे दोस्त थे श्रीमान वी. चेट्टियार याने व्यापारी वर्ग के। ये क्रिश्चियन थे। बहुत धार्मिक व देश प्रेम से ओत प्रोत। साथ ही नई सोच व नए विचारों से मोह की हद तक प्रगतिशील थे। इन्होंने मद्रास शहर के मेयर पद के लिए अँग्रेज के खिलाफ चुनाव लड़ा था और हार गए थे। बाद में कभी ये मद्रास के मेयर बने भी थे।

चौथे दोस्त थे एक धनवान, रईस श्री एस.एन. तिरूमलाचारी थे। ये जब पैंतीस वर्ष के थे तभी इनका देहांत हो गया। ये शरीर से शक्तिशाली भी थे और उत्साह से सदा भरे रहते। अपनी मृत्यु से पहले अपनी संपत्ति के बड़े भाग से अपना अधिकार हटा लिया था। आगे चलकर भारतीजी ने 'इंडिया' पत्रिका चलाई तो इन सज्जन ने बहुत आर्थिक मदद की थी। इन्हीं सज्जन के दूर के रिश्तेदार एम.पी. तिरूमलाचारी भी भारती के दोस्त और साथी थे। इन्होंने बाहरी देश में किसी विदेशी लड़की से शादी कर ली थी।

भारतीजी के प्रशंसकों और दोस्तों का विवरण देने का मकसद यही है कि पाठक उनकी प्रगतिशील सोच को पहचान सके। जात-पाँत, धर्म, सामाजिक समानता सभी में भिन्नता होते हुए भी ये सब भारतीजी के खास दोस्त बने रहे। इसी तरह के एक और सज्जन जो तिरूवलीकेनी में सन 2001 तक भी थे, वे हैं श्री म. श्रीनिवासचारी, 'इंडिया' पत्रिका' के मालिकों में से एक थे। इन्हें तमिल, कन्नड़, उर्दू, फ्रेंच, अँग्रेजी भाषाओं का बहुत अच्छा ज्ञान था। भारतीजी पर इनका अपार स्नेह था।

इन सबके अलावा डॉक्टर एम.सी. नचुंडराव का जिक्र न हो तो दोस्तों का कोरम अधूरा लगेगा। ये भारतीजी से उम्र में बहुत अधिक बड़े थे। धीर-गंभीर, दयालु और परम देशभक्त थे। दूसरे देशभक्तों को अपनी सोच-सलाह तथा आर्थिक और अन्य जो भी मदद चाहिए होती ये तत्परता से पूर्ति करते। डॉक्टर साहब भारतीजी की उन्मुक्त मोहक हँसी के कारण उनकी ओर आकर्षित हुए। उस हँसी में उन्हें एक निर्मलता, सच्चाई नजर आती थी। चेन्नै में रहते हुए भारतीजी की बड़ी सुपुत्री तंगम बीमार पड़ गई। तब भारतीजी जॉर्ज टाउन में रहते थे। डॉक्टर ने उन्हें बेटी के इलाज के लिए अपने करीब तेरूवल्लीकेनी में रहने को बाध्य किया। डॉक्टर सा. भारतीजी की कविताओं और वार्ताओं, लेखों से बहुत प्रभावित थे और उनसे अत्यधिक स्नेह करते थे सो उनके आग्रह को टाल न सके।

गांधीजी और दीनबंधु-एंड्रूज के बीच जिस तरह सखाभाव पनपा था उसी तरह का भारतीजी का भी एक इनसान से दोस्ताना हुआ। ये थे उम्र में भारतीजी से बहुत ही बड़े और ब्रिटिश सरकार के मुलाजिम श्री कृष्णस्वामी अय्यर। श्री अय्यर चेन्नै (मद्रास) में डिप्टी कमीश्नर रहे थे। एक पुलिस अफसर और देशभक्त भारतीजी में अपनापा होना कौतूहल का विषय लगता है। सोचने पर समझ आता है कि आखिर सब भारतीय तो हैं ही, बस परिवार, जीवन निर्वाह और नौकरी के कारण इनसान कर्तव्यों में जकड़ जाता है।

'स्वदेशमित्रन' में भारतीजी को खुलकर अपने विचार प्रकट करने की सुविधा नहीं थी। ऐसे भारती जिनकी सोच थी हमेशा बड़े से बड़ा सोचो, ऊँचा सोचो, मामूली और साधारण सा तो वो सोच ही नहीं सकते थे। असाधारण सोच और नए विचारधारा भारतीजी ने अपने लेखों के संग्रह में यही कुछ लिखा भी है। उन्होंने 'स्वदेशमित्रन' से स्वयं को अलग कर लिया। वैसे भी पत्रिका काँग्रेस के नरम दल की पैरवी करती हुई ही लगती थी। बाल गंगाधर तिलक ने ही भारतीजी में नई जान फूँकी। भारतीजी तिलक के आवेश और ओज के ही मानों अनुगूँज थे।


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