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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 10. बंगभंग आंदोलन व स्वराज्य की अवधारणा पीछे     आगे

यह देश तीस करोड़ लोगों का ऐसा समूह या संघ है जिसमें सभी चीजें साझा है। एक ऐसा आदर्श समाज है जो विश्व में अनन्य है।

सन 1906 में वाईसरॉय रहे लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का बँटवारा पूर्वी और पश्चिमी के रूप में किया। बंगाल वासियों को यह बँटवारा तनिक भी मंजूर नहीं था। अँग्रेजों ने सदा ही 'बाँटो और शासन करो' वाली पॉलिसी अपनाई थी। बंगाल बँटवारे से जो बंगभंग आंदोलन प्रारंभ हुआ उसी से स्वराज्य के धारणा की उत्पत्ति हुई। इन हालातों ने भारतीजी के हृदय में दबी देशभक्ति की भावना को झिंझोड़कर रख दिया। उन्होंने अपने कुछ दोस्तों की सहायता से तमिल में 'इंडिया' नाम की पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। लाल रंग को खतरे का निशान माना जाता है और भारतीजी ने पत्रिका के पन्ने लाल रखे। लोग बड़ी उत्सुकता से इस साप्ताहिक के आने की बाट जोहते।

सन 1906 में क्षेत्रीय भाषा की पत्रिका की चार हजार प्रतियाँ बिकती थीं जो अवश्य ही बहुत बड़ी घटना है। भारतीजी की साहित्यिक, जोश से भरी भाषा में सच्चाई को सत्यता से परोसना बहुत अहमियत रखता था। 'इंडिया' पत्रिका के अग्रलेखों, संपादकीयों ने सभी को प्रभावित किया और भारतीजी की ख्याति फैलती गई।

यही समय था जब बंगाल में भी बँटवारे के खिलाफ बोलने या विचार रखने को कई पत्रिकाएँ शुरू हुई। यहाँ प्रारंभ हुई स्वराज्य की धारणा पूरे देश में व्याप्त हो गई।

1906 में कलकत्ता (आज का कोलकाता) काँग्रेस के सभापति थे वयोवृद्ध श्री दादाभाई नौरोजी। उन्होंने मूलमंत्र 'स्वराज्य' का मानों जाप ही किया था। 'स्वराज्य' पर इतना जोर दिए जाने पर सभा में एक स्वर में चार बातों के पालन करने की घोषणा हुई।

स्वदेशी पर जोर, विदेशी सामान का बहिष्कार, देशीय शिक्षा तथा स्वराज्य। इन्हीं बातों से अँग्रेज सरकार आगे जाकर कुछ भयभीत भी हुई।

अँग्रेजों व उनकी नीति के खिलाफ भारतीजी 'इंडिया' पत्रिका में हर सप्ताह आग उगल रहे थे। बंगभंग के खिलाफ भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा। उनके लेखों की चर्चा पूरे भारत में हो रही थी। तभी बंगाल के विपिनचंद्र पाल चेन्नै आए। चेन्नै के विविध स्थानों पर उनके पाँच भाषण होने थे। श्री पाल को भारतीजी और उनके दोस्तों ने ही बड़े कष्ट और परेशानी उठाकर बुलवाया था। श्री विपिनचंद्र अँग्रेज सरकार की आँख की किरकिरी थे सो उन्हें बुलाने का भारतीजी के अलावा और कौन साहस करेगा! उनकी पहली सभा में कोई अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हो रहा था, सभी भयभीत थे। गनीमत हुई कि श्री जी. सुब्रह्मणिय अय्यर मान गए थे, वरना तमिल भाषियों की इज्जत खतरे में पड़ जाती। इसमें जो अथक प्रयास हुए वो भारतीजी के खाते में जाते हैं।

विदेशी कपड़ों के बहिष्कार की शुरुआत चेन्नै के तिरूवलीकेनी के समुद्र तट पर विपिनचंद पाल के सभा में ही हुई थी। जो बाद में देशव्यापी रूप में फैली और बड़ी होली के रूप में जलाई गई। इसी समय से चेन्नै में स्वराज्य और आजादी का जोश बढ़ता गया।

चेन्नै में 'महाजन सभा' के नाम से एक संस्था थी। पर ये अँग्रेज सरकार के ही पेरोकार थे। भारतीजी ने 'चेन्नै जनसंघम्' नाम से संस्था बनाई। संस्था के बनते ही अँग्रेज सरकार की आँखों में खटकने लगी। जब तक वो संस्था जीवित रही सरकार की नजरें उस पर बनी रहीं। इसी समय तमिलनाडु के तुतूकूड़ी में भी अँग्रेजों के खिलाफ जुलूस निकाला गया जिसमें कई गिरफ्तारियाँ हुई और राजद्रोह की सजा सुनाई गई। इन लोगों ने भारतीजी के लिखे देशभक्ति के ओजपूर्ण गानों को सामूहिक रूप से गाते हुए घोष किया था। अँग्रेज जज का कहना था कि 'भारती के गीत तो लाश में भी जान डाल देते हैं। ऐसे में जनता तो आसानी से भड़क कर सरकार के खिलाफ गदर मचा सकती है या बलवा कर सकती है।'


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