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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 11. सूरत अधिवेशन में जाना पीछे     आगे

आओ-आओ विजयी हाथों के साथ , आओ-आओ विनम्र शब्दों के साथ , आओ-आओ महान कार्यों को करना है , लोगों को एकता और शांति के जीवन में ढालना है।

सन 1907 में सूरत (गुजरात) में काँग्रेस का अधिवेशन हुआ। तभी कोलकाता में बम बनना शुरू हुआ। जिससे पूरे देश में हलचल मच गई। वैसे कोलकाता के बाद नागपुर में अधिवेशन होना था।

जिन लोगों ने त्याग किए थे, शहीद हुए थे और देशप्रेम की मिसाल कायम की थी उनकी उपेक्षा की गई और नरम रवैया अपनाया जा रहा था। नागपुर के नेताओं को यह कदापि मंजूर नहीं था। इसीलिए गुजरात के सूरत शहर, जो कि नरम दल का गढ़ था, में अधिवेशन करने का तय किया। जिन वीरों ने त्याग किए या करने आगे आए उनकी अगुवाई लोकमान्य तिलक ने की। भारतीजी भी तिलक के अनुयायी थे। कलकत्ता में अँग्रेज सरकार के खिलाफ जो निश्चय किए गए, लो. तिलक उन्हें बदलने के पक्ष में नहीं थे। तिलक का पक्ष मजबूत करने के लिए भारतीजी के साथ सौ लोगों का जत्था तमिलनाडु से गया था।

सूरत में जो काँग्रेस का अधिवेशन हुआ वो भारतीजी के लिए यादगार बन गया था। भारतीजी ने कभी लोकमान्य तिलक को देखा नहीं था, बस उनके विचारों को जानकर ही उनके प्रति श्रद्धा हो गई थी। यहाँ उनको देखने, उनसे मिलने के विचार से उत्साहित और उत्तेजित थे। इस समय वहाँ बहुत बारिश हुई थी जिससे अधिवेशन के स्थान से ठहरने के स्थान तक सड़क बहुत खराब हो गई थी। श्री तिलक ने बहुत से कारीगरों को काम पर लगा कर उसे दुरुस्त करवाने का जिम्मा उठाया। भारतीजी अपने आवास से निकलकर अपने श्रद्धामूर्ति को खोजते रहे। तिलक कहीं नहीं मिले तो निराश होकर अपने कमरे की ओर हताश से भरे लौट रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि ढेरों कारीगर रास्ते को सुधार रहे हैं और एक व्यक्ति छाता लगाए उनकी निगरानी कर रहा है। थोड़ा पास आने पर कुछ शंका सी हुई और भारतीजी उस व्यक्ति के ठीक सामने आ गए। उस व्यक्ति की प्रदीप्त, आग उगलती आँखों को देख उन्हें तनिक भी शंका न रही और वो उस व्यक्ति (तिलक) के पाँव पर साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में आ गए। भारती ने बाद में जब भी इस वाकए को किसी को बताया तो ये बताना नहीं भूले कि श्री तिलक की दोनों आँखों में आजादी की आग की भूख दिख रही थी। भारतीजी के मन में तिलक से मिल कर उनके प्रति सम्मान और बढ़ गया।

1905 का वर्ष एक खास अहमियत रखता है क्योंकि यही वह समय था जब पूरे देशवासियों की तंद्रा भंग हुई। यहीं से आजादी के लिए उनकी छटपटाहट प्रारंभ हुई थी। बंगाल के बँटवारे और श्री बाल गंगाधर तिलक द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए जा रहे प्रयत्न का ही यह नतीजा था। लोगों का स्वाभिमान जागने लगा था और इस आग में सब उतरने को तत्पर होने लगे। सूरत में अधिवेशन बुरी तरह असफल रहा और काँग्रेस के दो दल बन चुके थे। नरम और गरम दल। गरम दल (श्री तिलक वाला) के लोग कर्म में विश्वास करते थे। स्वतंत्रता को भीख की तरह नहीं पाना चाहते थे।

सन 1906 में पंजाब के लाला लाजपत राय और सरदार अजितसिंह को गिरफ्तार कर बर्मा (रंगून) भेज दिया गया। भारतीजी ने 'लाजपत का प्रलाप' नाम से एक लंबा गीत लिखा और उसे गाया। 1907 में तिलक दल ने लाजपत राय को काँग्रेस अध्यक्ष बनाने की मंशा जाहिर की। पर अँग्रेज सरकार के भड़क जाने के डर से नरम दल राजी नहीं हो रहा था। तभी रंगून से रिहा होकर लाला लाजपत राय सीधे सूरत अधिवेशन में पहुँच गए।

सूरत काँग्रेस में उग्रवादी दल की पैरवी करने वाली पत्रिकाओं के संपादकों ने मिलकर एक शैली अपनाने का फैसला किया। जिसके तहत पूरे देश में समरूप और संयुक्त रूप से कदम उठाये जाएँ। जिससे सरकार की ज्यादती के खिलाफ पूरे देश में एक साथ विरोध किया जाएँ। वरना उसको उस खास जगह एक छोटे विरोध के रूप में दमित कर दिया जाता था। चेन्नै का भार भारतीजी ने उठाया और लगातार उसके लिए प्रयासरत रहे। शारिरिक रूप से कमजोर दिखने वाले दुबले-पतले भारतीजी मन से बहुत बलशाली और प्रबल इच्छाशक्ति वाले थे। सूरत काँग्रेस के बाद उग्रवादियों की सोच के अनुरूप भारती और उनके युवा मित्रों ने मिलकर ''चेन्नै जनसंगम'' नाम से एक दल बनाया। स्वदेशी वस्तुओं की बिक्री के लिए ''भारत भंडार'' नामक दुकान भी प्रारंभ की।


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